नाच भिखारी नाच: लौंडा नाच के कलाकारों के जीवन और संघर्षों को दिखाती एक डॉक्यूमेंट्री
तस्वीर साभार: यूट्यूब स्क्रीनग्रैब
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आज से पहले जब फिल्में नहीं बनती थीं, थिएटर नहीं हुआ करते थे तब खुले आसमान के नीचे शामियाने लगते थे। दर्शकों की लंबी-चौड़ी भीड़ लगती थी और एक विशेष प्रकार के कार्यक्रम का आयोजन होता था जिसका नाम है ‘लौंडा नाच।’ इसे मुख्य रूप से बिहार और यूपी के कुछ इलाकों में ही प्रदर्शित किया जाता रहा है। कवि, गीतकार, नाटककार, नाट्य निर्देशक, लोक संगीतकार, अभिनेता और भोजपुरी के शेक्सपियर कहे जानेवाले भिखारी ठाकुर लौंडा नाच को मुख्यधारा में लेकर आए। जब उन्होनें मंच पर नाटक खेलने की बात सोची थी तब उन्हें अपने पात्रों में महिलाओं की आवश्यकता थी। हालांकि, उस समय समाज की महिलाओं का मंच तक आना संभव नहीं था जिसका तोड़ भिखारी ठाकुर ने पुरुषों को महिलाओं के भेष में मंच पर लाकर निकाला और यहीं से लौंडा नाच की शुरुआत हुई।

बिहारी ठाकुर पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के रिसर्च स्कॉलर जैनेन्द्र दोस्त और फिल्म निर्माता शिल्पी गुलाटी ने मिलकर बिहार में भिखारी ठाकुर के लौंडा नाच की मंडली को ‘नाच भिखारी नाच‘ नाम की डॉक्यूमेंट्री में बेहद खूबसूरती से प्रस्तुत किया। यह फिल्म (PSBT) अर्थात पब्लिक सर्विस ब्राडकास्टिंग ट्रस्ट के द्वारा प्रोड्यूस की गई है। कुल 72 मिनट लंबी इस डॉक्यूमेंट्री के अंदर इसके निर्माताओं ने लौंडा नाच और उसके कलाकारों के अलग-अलग पहलुओं को रखा है।

यह डाक्यूमेंट्री मंच और शामयाने के आस-पास के पूरे परिवेश को दिखाते हुए शुरू होती है। इसके बाद वह लौंडा नाच के कलाकारों को भी चित्रित करती है जिसमें अपने नाटक की प्रस्तुति के लिए वे अपना भेष बदलते हुए नज़र आते हैं। चेहरे के लिए काजल, लिपस्टिक और पाउडर, साड़ी ,ब्लाउज, ब्रा और पैडिंग और फिर बाल की साज-सज्जा। नाच के कलाकार किस तरह संजीदगी से अपने आप को तैयार करते हैं इस डॉक्यूमेंट्री में इसे बखूबी दिखाया गया है।

डॉक्यूमेंट्री का एक सीन, तस्वीर साभार: यूट्यूब स्क्रीनग्रैब

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भिखारी ठाकुर के कलाकार अब वृद्ध हैं। उनके पास किसी तरह की कोई सहायता नहीं है। अपने जीवनयापन के लिए वे खेती-किसानी कर रहे हैं। पूछने पर वे बताते हैं कि सरकार की ओर से उनपर कोई ध्यान नहीं दिया जाता ना ही अब उनके पास लौंडा नाच के बहुत मौके हैं।

यह डाक्यूमेंट्री मुख्य रूप से चार परतों को ढकते हुए आगे बढ़ती है। इसका पहला भाग बिहार में लौंडा नाच का मंच और उनके कलाकारों को दिखाता है। इसमें मंच, नाच के कुछ भाग, वहां मौजूद दर्शक, उनके हाव-भाव, मर्दों का औरतों के रूप में खुद को तैयार करने जैसी सारी बातें दिखाई गई हैं। वहीं, इसका दूसरा भाग लौंडा नाच के कलाकरों को दिखाता है कि किस तरह से उन्हें उनके नाटक में निभाया अपना स्त्री रूप अपने घरवालों से छुपाना पड़ता है।

इंटरव्यू के दौरान एक कलाकार की पोती से जब कुछ सवाल पूछे जाते हैं तब वह बताती है की जो भी सामान वह नाटक के लिए इस्तेमाल करते थे उसे घर आने के बाद उन्हें छिपाना पड़ता था। उनकी पोती ने यह बताया की उसने वह सामान देख लिए थे तब से वह दादा और पोती का राज़ बन गया और वह उनका सामान रख दिया करती थी। इसके आलावा कलाकार यह भी बताते हैं की क्योंकि वे नाटक का सामान घर नहीं ले जा सकते थे इसलिए वे अपना सामान कहीं और रखवाते थे जिसके लिए उन्हें किराया भी देना पड़ता।

इसके तीसरे भाग में जातिवादी समाज की स्थिति दिखाई गई है कि किस तरह सवर्ण जाति के लोग लौंडा नाच को हीन दृष्टि से देखते थे। वे कभी दर्शकों के बीच बैठकर नहीं देखते थे क्योंकि ये उन्हें बड़ी अपमान की बात लगती थी। मगर वे छिप-छिपकर लौंडा नाच देखा करते थे। एक ओर तो वह लौंडा नाच और उसके कलाकारों को हीन बताते थे, वहीं, दूसरी ओर चोरी -छिपे देखने की लालसा भी रखते थे।

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डाक्यूमेंट्री का चौथा और आखिरी बिंदु यह है कि भिखारी ठाकुर के कलाकार अब वृद्ध हैं। उनके पास किसी तरह की कोई सहायता नहीं है। अपने जीवनयापन के लिए वे खेती-किसानी कर रहे हैं। पूछने पर वे बताते हैं कि सरकार की ओर से उनपर कोई ध्यान नहीं दिया जाता ना ही अब उनके पास लौंडा नाच के बहुत मौके हैं। यही वजह है की इन कलाकारों को अपनी कला क्षेत्र छोड़ कर खेती-किसानी की ओर रुख करना पड़ा। इस सब के अलावा यह जेएनयू जैसे संस्थानों में बिहार के इन लोक कलाकरों को अपनी कला का प्रदर्शन करते हुए भी दिखाया गया है। वे बताते हैं कि कैसे वो पहले भी ऐसे जगहों पर अपनी प्रस्तुति दिया करते थे और लता मंगेशकर और उनके जैसे अन्य बड़े कलाकार भी उनकी कला के आगे नतमस्तक थे।

इसके तीसरे भाग में जातिवादी समाज की स्थिति दिखाई गई है कि किस तरह सवर्ण जाति के लोग लौंडा नाच को हीन दृष्टि से देखते थे। वे कभी दर्शकों के बीच बैठकर नहीं देखते थे क्योंकि ये उन्हें बड़ी अपमान की बात लगती थी। मगर वे छिप-छिपकर लौंडा नाच देखा करते थे। एक ओर तो वह लौंडा नाच और उसके कलाकारों को हीन बताते थे, वहीं, दूसरी ओर चोरी -छिपे देखने की लालसा भी रखते थे।

यह डाक्यूमेंट्री लौंडा नाच के कई प्रमुख अंगों को प्रस्तुत करती है मगर ‘नाच भिखारी नाच’ नाम होने के बाद भी इसमें भिखारी ठाकुर के कुछ अंश मात्र ही नज़र आते हैं। जब रामचंद्र मांझी बात करते हैं तब वह ये बताते हैं की भिखारी ठाकुर की शख्सियत क्या थी। इसके अलावा अन्य कलाकार भी अपने साक्षात्कार के दौरान भिखारी ठाकुर से जुड़े अनुभव साझा करते हैं। इसके अलावा भिखारी ठाकुर के नारीवादी विचारों की बात भी यहां की गई है। साथ ही उनके साथ काम करने वाले अन्य कलाकार भी न सिर्फ अपने नाटक के माध्यम से नारीवाद की सीख देते हैं बल्कि खुद भी उन गुणों को आत्मसात किए हुए हैं। लौंडा नाच के एक कलाकार बारी अपने कार्यक्रम के बाद पति रूप में घर जाते हैं और अपनी पत्नी की देखभाल करते हैं। उनकी पत्नी मानसिक रूप से स्वस्थ नहीं है इसलिए वह उनके खाने-पीने और कपड़े से लेकर तमाम छोटी बड़ी बातों का ध्यान रखते हैं।

भिखारी ठाकुर पर बनी इस डाक्यूमेंट्री को अलग-अलग देशों में प्रस्तुत किया गया है और लोगों ने इसे पसंद भी किया। इसके अलावा इस फिल्म को कई अवार्ड भी मिले जिनमें गोल्डन अवार्ड जकार्ता फिल्म एंड आर्ट फेस्टिवल (2018), सर्वश्रेष्ठ डाक्यूमेंट्री इंडिया इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ बॉस्टन (2018 ), सर्वश्रेष्ठ फिल्म आर्ट एंड कल्चर , वुडपीकर फिल्म फेस्टिवल ऑफ़ इंडिया आदि शामिल हैं। सुप्रसिद्ध लोक कलाकार भिखारी ठाकुर को श्रद्धांजलि के रूप में बनी यह डॉक्यूमेंट्री लौंडा नाच और भिखारी ठाकुर को जानने के क्षेत्र में हमेशा एक मुख्य कड़ी रहेगी।

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तस्वीर साभार: यूट्यूब स्क्रीनग्रैब

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