जानिए कामकाजी गर्भवती महिलाओं के ये पांच अधिकार
तस्वीर साभारः SheKnows
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हाल ही भारत के दो बड़े बैंकों, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन बैंक की ओर से कुछ ऐसे दिशा-निर्देश जारी हुए जिनसे गर्भवती कामकाजी महिलाओं के अधिकारों का सीधा-सीधा उल्लघंन हुआ। आलोचनाओं के बाद स्टेट बैंक बैंक ऑफ इंडिया ने अपना फैसला वापस ले लिया था बावजूद इसके गर्भवती महिलाओं की भर्ती पर इस तरह की रोक का फैसला दोबारा आया। इससे साफ ज़ाहिर होता है कि कामकाजी महिलाओं को मातृत्व की वजह से कार्यक्षेत्र में भेदभाव का सामना करना पड़ता है। कामकाजी महिलाओं को प्रेग्नेंसी की वजह से अनेक परेशानियों से गुजरना पड़ता है। नौकरी में उनके सामने कई बाधाएं खड़ी की जाती हैं जिसकी वजह से वे करियर में पीछे रह जाती हैं। अधिकतर कामकाजी महिलाओं को अपने अधिकारों की जानकारी नहीं होती है जिस वजह से वे इस असमानता को कार्य का हिस्सा मानकर सहन कर लेती हैं। 

न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित लेख के मुताबिक अमेरिका में निम्न आय वाली महिला कर्मचारियों को उनकी प्रेग्नेंसी की वजह से सबसे ज्यादा नौकरी से निकाला जाता है। भारत में गर्भवती महिलाओं के अधिकारों के लिए मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट 1961 के तहत विस्तृत रूप से उनके अधिकारों की व्याख्या की गई है। भारत में काम करनेवाली 94 फीसदी महिलाएं असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं जिस वजह से असंगठित क्षेत्र में 10 से कम कर्मचारियों वाली इकाई में काम करने पर ऐक्ट लागू नहीं किया जाता है। हालांकि, असंगठित क्षेत्र में मातृत्व अधिकार की अन्य योजनाएं लागू होती हैं लेकिन उनका प्रभाव कम नज़र आता है। इस क्षेत्र में काम करनेवाली महिलाएं भी अपने अधिकार और योजनाओं के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं रखती हैं। 

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न्यूयार्क टाइम्स में प्रकाशित लेख के मुताबिक अमेरिका में निम्न आय वाली महिला कर्मचारियों को उनकी प्रेग्रेंसी की वजह से सबसे ज्यादा नौकरी से निकाला जाता है। भारत में गर्भवती महिलाओं के अधिकारों के लिए मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट 1961 के तहत विस्तृत रूप से उनके अधिकारों की व्याख्या की गई है।

1-गर्भवती होने की वजह से काम से नहीं निकाला जा सकता

यदि कोई महिला कामकाजी है और वह गर्भवती होती है तो इस वजह से उसे काम से नहीं निकाला जा सकता है। एक गर्भवती महिला को काम करने का पूरा अधिकार है। नौकरी करनेवाली गर्भवती महिला कर्मचारियों के लिए छुट्टी का प्रावधान होता है। लेकिन इस वजह से महिलाओं को काम से निकाला नहीं जा सकता है। किसी महिला को गर्भावस्था की वजह से अगर नौकरी से निकाल दिया जाता है तो यह भारत में कामकाजी महिलाओं के अधिकारों का भी उल्लघंन करता है। गर्भवती महिलाओं के अधिकार के लिए बने मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट 1961 के अनुसार यदि कोई महिला गर्भावस्था के दौरान मातृत्व अवकाश पर है तो उन्हें काम से निकाला नहीं जा सकता है। किसी महिला को छुट्टी के दौरान काम से निकाल देने पर छह महीने की जेल का प्रावधान है।

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2-हायरिंग करने से नहीं किया जा सकता है मना

कामकाजी महिलाओं के साथ गर्भावस्था की वजह से होनेवाले भेदभाव में से एक उनकी हायरिंग है। हाल में इंडियन बैंक ने अपने यहां भर्ती में तीन महीने से अधिक की गर्भवती महिलाओं को नई नियुक्ति के लिए आयोग्य करार साबित किया। बैंक ने बच्चे की डिलीवरी के छह हफ्ते बाद मेडिकल सर्टिफिकेट की मांग की है। इस तरह के फैसले साफ-साफ नौकरी में महिलाओं को पीछे करने का काम करते हैं। कोई महिला गर्भवती है और वह नई नौकरी ढूढ़ रही है या उसका चयन हो गया है तो उसे जॉइनिंग करने से नहीं रोका जा सकता है।

गर्भावस्था को कारण बताकर एक महिला को नौकरी देने से मना करना बतौर नागरिक उसके अधिकारों का उल्लघंन है। अगर महिलाओं को नौकरी में गर्भावस्था की वजह से देर से जॉइनिंग करने के लिए कहा जा रहा है तो इसका असर उनके करियर में भी पड़ता है। इसकी वजह से वे प्रमोशन में अन्य कर्मचारियों से पीछे रह सकती हैं। इस वजह से किसी भी महिला को उसकी गर्भावस्था की वजह से नौकरी देने और नियुक्त करने से मना नहीं किया जा सकता है।

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3-गर्भावस्था की वजह नहीं बना सकते किसी तरह का दबाव

भारत में मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट 1961 के अनुसार कामकाजी महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान मातृत्व अवकाश का प्रावधान है। 2017 के संशोधित ऐक्ट के अनुसार भारत में यदि कोई महिला नौकरी करती है तो उसे प्रेग्रेंसी के दौरान 26 हफ्ते का वेतन सहित अवकाश का अधिकार है। इस अवकाश को वह डिलीवरी से आठ हफ्ते पहले भी ले सकती है और बाकी का लाभ बच्चे के जन्म के बाद ले सकती है।

इससे अलग निजी कंपनियों में ऐसा भी देखा गया है कि गर्भवती होने पर महिला को बिना वेतन के लंबी छुट्टी दे दी जाती है या उन पर दबाव बनाया जाता है। पेड मैटरनिटी लीव देने की जगह गर्भवती महिला कर्मचारियों को जॉब से ब्रेक लेने के लिए कहा जाता है। किसी भी कामकाजी महिला को उसकी गर्भावस्था की वजह से न तो छुट्टी देने से मना किया जा सकता है और न ही जबरन छुट्टी लेने के लिए कहा जा सकता है। न ही बच्चे की डिलीवरी के तुरंत बाद उस पर काम दोबारा जॉइन करने का दबाव बनाया जा सकता है। 

मैटरिनटी ऐक्ट में संशोधन के बाद भारत में 50 से अधिक कर्मचारी वाली कंपनियों में क्रेच ( शिशुगृह) बनाना अनिवार्य कर दिया था, जिसकी लागत कर्मचारी से ली जाएगी। 2017 के संशोधन के बाद कंपनियों को तीन महीने के भीतर इसे लागू करने का आदेश दिया गया था। लेकिन भारत में इससे जुड़ा कोई सार्वजनिक डेटा जारी नहीं किया गया।

4-क्रेच की सुविधा उपलब्ध कराना

वर्कप्लेस में लैंगिक भेदभाव को खत्म करने के लिए सरकार की ओर से नियम बनाकर उनकी भागीदारी को बढ़ाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन दूसरी ओर कागजों पर मौजूद अधिकार धरातल पर गायब नजर आते हैं। इंडियास्पेड के अनुसार मैटरिनटी ऐक्ट में संशोधन के बाद भारत में 50 से अधिक कर्मचारी वाली कंपनियों में क्रेच (शिशुगृह) बनाना अनिवार्य कर दिया था, जिसकी लागत कर्मचारी से ली जाएगी।

साल 2017 के संशोधन के बाद कंपनियों को तीन महीने के भीतर इसे लागू करने का आदेश दिया गया था। लेकिन भारत में इससे जुड़ा कोई सार्वजनिक डेटा जारी नहीं किया गया। कॉरर्पोरेट मंत्रालय के अनुसार भारत में एक मिलियन से अधिक सक्रिय कंपनियां हैं लेकिन कितनी कंपनियां पचास से अधिक कर्मचारी रखती है इससे जुड़ा भी कोई डेटा उपलब्ध नहीं है। 

5-नर्सिंग ब्रेक की है सुविधा

वे महिलाएं जो प्रेग्रेंसी के बाद दोबारा से ड्यूटी जॉइन करती हैं उन्हें वर्कप्लेस पर नर्सिंग ब्रेक की सुविधा उपलब्ध कराई जाने का भी प्रावधान है। मैटरनिटी बेनिफिट ऐक्ट के अनुसार काम के बीच बच्चे की देखभाल के लिए नियमित दो ब्रेक लेने की अनुमति है। नौकरी करनेवाली महिलाओं को दोबारा काम पर लौटने के बाद जबतक बच्चा पंद्रह महीने का नहीं होता है उसे नर्सिंग ब्रेक लेने की अनुमति होती है। महिलाओं को ब्रेस्ट फ्रीडिंग के लिए सुरक्षित जगह उपलब्ध करने का भी प्रावधान हैं। 

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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