मैरिटल रेप
तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए
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मैंने कुछ दिनों पहले एक औरत की इंस्टाग्राम स्टोरी देखी थी। उस औरत की शादी तीन महीने पहले हुई थी। उसने अपनी इंस्टाग्राम स्टोरी में अपने साथ हो रहे मैरिटल रेप की आपबीती शेयर करते हुए अपने पति के उत्पीड़न के बारे में साझा किया था। मेरी रूह कांप गई थी इस इंस्टा स्टोरी को देखकर। मैं यह सोच नहीं पा रही थी कि यह कैसा वैवाहिक संबंध है जिसमें बस जबरदस्ती का संभोग, शारीरक पीड़ा और अकाट्य कष्ट ही कष्ट है।

मैरिटल रेप के कारण औरतें मानसिक, शारीरिक, सामाजिक उत्पीड़न से गुज़रती हैं। बता दें कि मैरिटल रेप का मतलब है जब एक पुरुष अपनी पत्नी की सहमति के बिना ही उसके साथ जबरन यौन संबंध बनाता है। दुनिया के लगभग 100 से अधिक देशों में मैरिटल रेप एक अपराध की श्रेणी में आता है लेकिन आपको जानकर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अपना भारत देश उन गिने-चुने 36 देशो में आता है जहां अभी तक वैवाहिक बलात्कर अपराध नहीं माना जाता है।

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मैरिटल रेप के ख़िलाफ़ चल रहे इन ट्रेंड्स का समर्थन करनेवाले लोगों का तर्क है कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित कर दिया गया तो हिंदुओं की पूरी विवाह व्यवस्था चरमरा जाएगी और इसका दुरुपयोग पुरुषों के ख़िलाफ़ खूब किया जाएगा। यह बहुत हास्यास्पद है कि पुरुषों को औरतों के साथ हो रही हिंसा नज़र नहीं आ रही है लेकिन उन्हें अपने खिलाफ़ भविष्य में होनेवाले तथाकथित ‘झूठे’ मुकदमे साफ़ नज़र आ रहे हैं।

भारत जैसे पितृसत्तात्मक देश में यह सदियों से होता आ रहा है, यहां मैरिटल रेप की बात करना ही अपराध है। भारतीय पितृसत्तात्मक परंपरा में विवाह एक ऐसा बंधन होता है  या यूं कहें कि एक ऐसा एग्रीमेंट होता है जिसमें पुरुष शादी के बाद स्त्री को एक इंसान नहीं समझता है बल्कि वह उसे संभोग और अपनी वासना को पूरा करने का साधन मात्र मान लेता है। भारतीय समाज पुरुषों को पूरी छूट दे देता। एक मर्द की जब भी इच्छा हो वह अपनी पत्नी के साथ बिना उसकी मर्ज़ी जाने संभोग कर सकता है। यहां स्त्री की भावनाएं और सहमति कोई मायने नहीं रखती। इस पितृसत्तात्मक समाज ने स्त्रियों के प्राण को मूल्यहीन ही समझा है, उनके लिए तो बस अपने कामवासनाओं की पूर्ती होना ज़रूरी होता है।

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भारत में कई आंकड़े ऐसे सामने आए हैं जो इस बात की तस्दीक करते हैं कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित न करना औरतों के साथ कितना बड़ा अत्याचार है। जब हम आधिकारिक आकड़ों की बात करते हैं तो नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के आंकड़े काफी महत्वपूर्ण और वास्तविक माने जाते हैं। अभी हाल में हुए NHFS-5 के आंकड़ों के अनुसार 32 फीसदी महिलाओं ने अपने पतियों के द्वारा खुद पर हुए शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा जो कि अपराध की श्रेणी में आते हैं उन्हें स्वीकार किया है। ये तो वे महिलाएं हैं जो जागरूक हैं, अपने साथ हो रही हिंसा को पहचान रही हैं, उसके बारे में बात कर पा रही हैं। बाकी उनका तो कोई आंकड़ा ही नहीं है जो इन सबसे अनजान हैं, ऐसी महिलाएं जो अपने पति को ही ‘परमेश्वर’ मानती हैं, जिनके अंदर यह बचपन से डाल दिया गया है कि उनके लिए उनके पति द्वारा किया गया हर काम जायज़ है। इन आंकड़ों के आधार पर हमें यह स्वीकार करना ही होगा कि मैरिटल रेप एक वास्तविकता है जिसे ख़ासकर भारत जैसे पितृसत्तात्मक देश में तो बिल्कुल भी नकारा नहीं जा सकता है।

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इसी साल मैरिटल रेप के ख़िलाफ़ दायर की गई याचिकाओं पर दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणियों ने फिर से मैरिटल रेप की बहस को हवा दे दी है। फिलहाल इन याचिकाओं पर फ़ैसला अभी अधर में लटका हुआ है। आनेवाले समय में सुप्रीम कोर्ट इस पर संज्ञान लेगा। लेकिन इसको लेकर देश के अंदर टीवी डिबेट्स में, सोशल मीडिया पर खूब चर्चा की गई।मैरिटल रेप से जुड़े अलग-अलग सोशल मीडिया ट्रेंड्स चलाए गए जिसमें से कुछ ट्रेंड्स ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। जैसे मैरिटल रेप को हिन्दू विरोधी और शादी की संस्था के ख़िलाफ़ बताया जा रहा है। मैरिटल रेप के ख़िलाफ़ चल रहे इन ट्रेंड्स का समर्थन करनेवाले लोगों का तर्क है कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित कर दिया गया तो हिंदुओं की पूरी विवाह व्यवस्था चरमरा जाएगी और इसका दुरुपयोग पुरुषों के ख़िलाफ़ खूब किया जाएगा। यह बहुत हास्यास्पद है कि पुरुषों को औरतों के साथ हो रही हिंसा नज़र नहीं आ रही है लेकिन उन्हें अपने खिलाफ़ भविष्य में होनेवाले तथाकथित ‘झूठे’ मुकदमे साफ़ नज़र आ रहे हैं।

NHFS-5 के आंकड़ों के अनुसार 35 फीसदी महिलाओं ने अपने पतियों के द्वारा खुद पर हुए शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक हिंसा जो कि अपराध की श्रेणी में आते हैं उन्हें स्वीकार किया है।

भारत मे नारीवादियों का उभार पश्चिमी देशों की तुलना में थोड़ा धीरे हुआ है। मैरिटल रेप 1960-70 के दशक से ही नारीवादी आंदोलन की दूसरी लहर का मुख्य विषय था। इसने पितृसत्तात्मक समाज के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर दी थी। नारीवाद की दूसरी लहर के परिणाम काफी सुखद थे। इस आंदोलन के बाद महिलाओं को अपने शरीर से संबंधित सभी मामलों में खुद फ़ैसला करने के अधिकार मिल गए लेकिन भारत मे अभी स्थिति उतनी बेहतर नही हुई है। 

हालांकि, हमारे देश की न्याय व्यवस्था में महिलाओं के अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए नारीवादियों ने कई सफल प्रयास किए हैं। नारीवादी आंदोलनों की बदौलत ही हमारे देश में महिलाओं से जुड़े कई आपराधिक कानूनों में संशोधन संभव हो पाया है। लेकिन हमें अभी काफी संघर्ष करना होगा इस पितृसत्तात्मक समाज से ताकि हम मैरिटल रेप को भी आपराधिक क़ानून की श्रेणी में ला सके।

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तस्वीर: रितिका बनर्जी फेमिनिज़म इन इंडिया के लिए

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