ख़ास बात: पहली कालबेलिया नर्तकी ‘जिप्सी क्वीन’ पद्मश्री गुलाबो सपेरा से
तस्वीर साभार: रिमझिम
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कालबेलिया नृत्य की शुरुआत राजस्थान में हुई थी। इस शैली का आधिकारिक नाम, कालबेलिया, उस समुदाय को संदर्भित करता है जो इस नृत्य को करते हैं। कालबेलिया नृत्य के बारे में यह कहा जाता है कि ये पुरुषों द्वारा किया जाता था। महिलाओं का कुछ ही समूह इस नृत्य को करने के लिए स्वतंत्र था। कुछ शर्तों के साथ कालबेलिया पुरुष महिलाओं को यह नृत्य करने की अनुमति देते थे। 80 के दशक में गुलाबो सपेरा जो कि एक कालबेलिया नर्तकी हैं उनका नाम सामने आया। गुलाबो सपेरा भारत की ‘जिप्सी क्वीन’ के नाम से प्रसिद्द हैं। उनसे बातचीत के दौरान उनके जीवन के कठनाइयों के बारे में पता चला।

परिवारिक जीवन: डर में गुज़रा बचपन   

गुलाबो सपेरा एक जिप्सी परिवार से संबंध रखती हैं। उनका बचपन बड़ी जटिल परिस्थितियों में गुज़रा। कालबेलिया समाज में लड़कियों को जन्म के बाद जमीन में अंदर जिंदा दफ़ना दिया जाता था। गुलाबो बताती हैं कि उनके जन्म के दौरान उनके माँ -बाप को डर था कि उनकी अगर बेटी हुई तो समाज वाले उसे जिंदा दफन कर देंगे। इस कारण वे दोनों अपने गाँव को छोड़कर शहर आ गए। लेकिन कालबेलिया हमेशा एक साथ एक ही कबीले में रहते हैं। इसलिए जन्म के बाद गुलाबो सपेरा इस प्रथा से बच नहीं पाई।

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वह बताती हैं, “पूरे छह घंटे जमीन के अंदर दफ़न होने के बाद मेरी माँ ने मुझे मौसी की मदद से बाहर निकाला। मेरी माँ का विश्वास था कि मैं ज़िंदा हूं इस कारण मुझे ऊपरवाले ने सांसें बक्शी। कुछ सालों तक मैं सापों के साथ उसकी टोकरी में बैठकर पिताजी के साथ जाया करती थी। पिताजी को डर था कि घर में छोड़कर जाने पर कहीं समाज वाले मुझे मार न दें। मेरी माँ ने मुझे बचाया और मैंने अपनी बेटी को पढ़ाया।”

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वह आगे कहती हैं, “बचपन से मुझे बीन की धुन बहुत प्रिय थी। इसका यह बड़ा कारण है कि बचपन में मेरे प्रिय मित्र सांप हुआ करते थे। उनके साथ खेलना और साथ रहना मुझे भाता था। उनको मिला दूध पिताजी मुझे भी पिलाया करते थे। कालबेलिया पुरुष अपनी आजीविका के लिए सापों का ज़हर निकालकर उन्हें बीन की धुन पर नचाते थे। उससे मिले कुछ पैसों से अपना गुज़र-बसर करते थे।” 

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साक्षात्कार के दौरान गुलाबो संपेरा

कालबेलिया समाज में लड़कियों को जन्म के बाद जमीन में अंदर जिंदा दफ़ना दिया जाता था। गुलाबो बताती हैं कि उनके जन्म के दौरान उनके माँ -बाप को डर था कि उनकी अगर बेटी हुई तो समाज वाले उसे जिंदा दफन कर देंगे। इस कारण वे दोनों अपने गाँव को छोड़कर शहर आ गए। लेकिन कालबेलिया हमेशा एक साथ एक ही कबीले में रहते हैं। इसलिए जन्म के बाद गुलाबो सपेरा इस प्रथा से बच नहीं पाई। वह बताती हैं, “पूरे छह घंटे जमीन के अंदर दफ़न होने के बाद मेरी माँ ने मुझे मौसी की मदद से बाहर निकाला।”

काले कपड़ों के लिए विद्रोह 

गुलाबो कालबेलिया नृत्य में काले कपड़े के महत्व को बताते हुए कहती हैं, “ये आसान सफ़र नहीं रहा। साल 1985 तक कालबेलिया महिलाओं को काला कपड़ा पहनना मना था। उस समय मेरी उम्र करीब 12 साल थी। पुष्कर मेले में नृत्य के दौरान कुछ पैसे मिले। मुझे काला रंग बेहद पसंद था। मैंने पिताजी को काले कपड़े के लिए कहा लेकिन पिताजी ने मना कर दिया। उनके मना करने के बावजूद भी मैंने काले कपड़े की जिद नहीं छोड़ी। पिताजी समाज की परवाह न करते हुए छह मीटर काला कपड़ा लाए। लेकिन समस्या यह थी कि मैं घाघरा और चोली बनवाऊं कैसे क्योंकि कपड़ा कम था। इसके बाद मैं रंगबिरंगे कपड़े, शीशे, मोती और धागे बाजार से लाई। कपड़े को रंगबिरंगा बनाया और काला रंग न दिखे इसलिए बहुत सारे रंगबिरंगे कपड़े, शीशा, मोती का इस्तेमाल किया। फिर क्या था उसी समय से कालबेलिया नर्तकियों के लिए काले घाघरा-चोली का प्रचलन चलने लगा।” महिलाएं काले वस्त्र को पहनकर नृत्य करने लगी। वह कहती हैं कि समाज में काले कपड़े और नृत्य करने के लिए समाज से बहिष्कृत भी किया गया लेकिन विद्रोही मन था और कुछ करने की चाह थी।

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पद्मश्री सम्मान ग्रहण करतीं गुलाबो सपेरा, तस्वीर साभार- विकीपीडिया

कालबेलिया समाज में महिलाओं पर पाबंदियां 

  • महिलाओं को नंगे पैर इस नृत्य को करना होगा। 
  • सिर से चेहरे तक घूंघट का प्रचलन था ताकि बाहरी लोग के संपर्क से महिलाओं को सुरक्षित रखा जाए । 
  • मंच पर चढ़ने की आज़ादी नहीं थी। 
  • महिलाओं को पुरुषों की तरह काले कपड़े पहनने की आज़ादी नहीं थी । 
  • समाज के पंचायत में महिलाओं को बोलने की आज़ादी नहीं थी। 
  • औरतों को समाज से बाहर काम करने की आज़ादी नहीं है।

कालबेलिया समाज में शिक्षा का दर 2% है। पहली शिक्षित महिला गुलाबो सपेरा की बेटी रेखा हैं। समय के साथ परिवर्तन हो रहा है। गुलाबो सपेरा की पहली विदेश यात्रा के बाद से समाज में कई बदलाव देखने को मिले, पर यह कहना गलत नहीं होगा कि समाज आज भी बहुत पीछे है। बिग बॉस से आने के बाद सपेरा के जीवन को नया आयाम मिला। वह बताती हैं कि वह पहली बाहर पब्लिक में बिना घूंघट के आई। यह एक नई दुनिया थी, उनके कालबेलिया समाज से काफी अलग और अनोखी।

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कालबेलिया नृत्य को आगे बढ़ाने के लिए गुलाबो संपेरा लड़कियों के लिए एक स्कूल बना रही हैं जो पुष्कर में स्थित है। नृत्य और गायन के लिए उन्हें साल 2016 मे पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। 

‘चील गाड़ी’ में पहली विदेश यात्रा

गुलाबो आगे बताती हैं कि उनका सफर बेहद मुश्किल रहा है। उनकी पहली विदेश यात्रा अमेरिका की थी। वह कहती हैं, “साल 1981 पुष्कर मेले में तृप्ति पांडे और हिम्मत सिंह पर्यटन विभाग से आए थे। उन्होंने मेरा नृत्य देखा और वहीं से मुझे विदेश जाने का अवसर प्राप्त हुआ। जहाज में बैठने के बाद मुझे कुछ पता ही नहीं चला, शायद मैं बहुत खुश थी। इस कारण अमेरिका के सम्मेलन में मैंने खुद गाकर नृत्य प्रस्तुत किया।

अमेरिका से आने के बाद समाज के लोगों का नज़रिया बदल गया। 12 साल की उम्र में मुझे समाज का पंच बना दिया गया। सब कुछ मुझसे पूछकर किया जाने लगा। लेकिन मेरा मकसद लड़कियों को पढ़ाना और नृत्य की शिक्षा देना था। मैं समझ चुकी थी इसके लिए मुझे और मेहनत करने की जरूरत है।” साल 1993 में गिटार पर स्पेन में रोमा संगीतकारों के साथ नृत्य के कारण गुलाबो को राजस्थान की जिप्सी क्वीन कह कर पुकारा गया। साल 2004 में जयपुर में रॉबिन तिकठी के तालबद्ध संगीत के साथ गुलाबो की प्रसिद्धि देश-विदेश में फैल गई।

नृत्य के दौरान रोमा महिलाएं और कालबेलिया महिलाओं में समानता 

गुलाबो संपेरा बताती हैं. “रोमा भारतीय हैं, भाषायी तौर पर मुझे उनसे बातचीत में कठिनाई नहीं होती। नृत्य के दौरान भी हमारी मुद्रा, कपड़े काफी मिलते-जुलते हैं। कालबेलिया नृत्य और जिप्सी लोकनृत्य सांप की तरह लहरानेवाला और लचकदार होता है। कालबेलिया नृत्यांगना करनेवाली स्त्री काला ब्लाउज और लंबे घेरेवाला घाघरा पहनती हैं, जिसमे रंग-बिरंगी चटक रंगवाले रिबन और कांच के टुकड़े लगे होते हैं। रोमानी जिप्सी लोकनृत्य में नर्तकी नृत्य के दौरान रंग-बिरंगी स्कर्ट जो घाघरा जैसी होती है उसे ब्लाउज के साथ पहनती है। दोंनो नर्तकी नंगे  पैर लचीले कमर के साथ अपने नृत्य को प्रस्तुत करती हैं। कथक, कालबेलिया नर्तक, नर्तकी और यूरोपियन रोमा जिप्सी, फ्लेमेंकों नर्तक, नर्तकी के वस्त्र में काफी समानता देखने को मिलती है।” बता दें कि कालबेलिया नृत्य को आगे बढ़ाने के लिए गुलाबो संपेरा लड़कियों के लिए एक स्कूल बना रही हैं जो पुष्कर में स्थित है। नृत्य और गायन के लिए उन्हें साल 2016 मे पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। 

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सभी तस्वीरें रिमझिम सिन्हा द्वारा उपलब्ध करवाई गई हैं।

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