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दुलारी देवी एक ऐसी महिला हैं जिन्होंने गरीबी से बाहर निकलकर पद्मश्री तक का सफर तय किया है। यह कठिन सफर किसी के लिए भी आसान नहीं हो सकता बल्कि नामुमकिन सा लगता है लेकिन दुलारी देवी ने इस बात को नामुमकिन से मुमकिन में तब्दील किया है। दुलारी देवी ऐसी महिला हैं जो एक छोटे से गांव से निकलकर  अपनी कला के दम पर इतने ऊंचे मुकाम पर पहुंची हैं। इस लेख के ज़रिये हम पद्मश्री दुलारी देवी के कठिन जीवन संघर्ष से लेकर सफलता तक के सफर के बारे में जानेंगे।

दुलारी देवी का जन्म 27 दिसंबर 1968 में हुआ था। वह बिहार के मधुबनी ज़िले के एक छोटे से गांव रांटि से हैं। वह एक गरीब मछुआरे परिवार से संबंध रखती थी। वैसे तो उनके परिवार का पारिवारिक पेशा मछलियां पकड़ना था लेकिन वे खेतिहर मजदूर भी थे। उनके परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत खराब हुआ करती थी। उनकी आर्थिक स्थिति इतनी खराब हुआ करती थी कि उनका परिवार अपनी सामान्य व दैनिक जरूरतों को भी पूरा नहीं कर पाते थे। इन समस्याओं के साथ हम बात करें उनके घर की तो उनका कोई अपना मकान नहीं था वह टीन की एक छोटी-सी झोपड़ी में रहा करती थीं। छोटी सी झोपड़ी में उनके परिवार का गुजारा बहुत मुश्किल हुआ करता था।

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मधुबनी पेंटिंग का आगमन दुलारी देवी के जीवन में कुछ इस तरह हुआ इस कला ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया। दूसरों के घरों में काम करने वाली दुलारी देवी को मधुबनी पेंटिंग का कोई ज्ञान नहीं था। उनके परिवार का इस कला से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। वह पहली अकेली महिला थी जो अपने परिवार में से  इस कला को जानती हैं। दुलारी देवी ने दूसरों के घरों में काम करते-करते ही इस कला को सीखा।

दुलारी देवी ने अपने जीवन में बहुत से संघर्षों का सामना किया। आर्थिक समस्याओं के साथ-साथ उनका विवाहित जीवन भी सुखी नहीं था। आर्थिक समस्याओं के कारण दुलारी की शादी कम उम्र में कर दी गई थी। कम उम्र में विवाह होने के कारण विवाहित जीवन की बड़ी-बड़ी ज़िम्मेदारियों को उठाना उनके लिए इतना आसान नहीं था। विवाह के सात साल बाद ही उन्हें अपने मायके वापस आना पड़ा। इतनी समस्याओं का सामना करने के बाद भी उन्हें सबसे बड़ा सदमा तब लगा जब उन्होंने अपनी छह महीने की बेटी को खो दिया। इतनी समस्याओं और संघर्ष के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी और इन समस्याओं का डटकर सामना किया।

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इन सभी चुनौतियों के बाद भी अपने मायके में उनसे अपने माता-पिता की बिगड़ती आर्थिक स्थिति देखी नहीं गई जिसके कारण उन्हें भी अपने माता-पिता का हाथ बंटाने के लिए घर से बाहर निकलना पड़ा। शिक्षा के अभाव के कारण उन्हें कोई दूसरा काम तो मिल नहीं पाया जिसके कारण उन्होंने दूसरों के घरों में घरेलू काम कर अपने परिवार का गुजारा करना पड़ा।

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मधुबनी पेंटिंग का आगमन दुलारी देवी के जीवन में कुछ इस तरह हुआ इस कला ने उनका जीवन पूरी तरह बदल दिया। दूसरों के घरों में काम करने वाली दुलारी देवी को मधुबनी पेंटिंग का कोई ज्ञान नहीं था। उनके परिवार का इस कला से दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं था। वह पहली अकेली महिला थी जो अपने परिवार में से  इस कला को जानती हैं। दुलारी देवी ने दूसरों के घरों में काम करते-करते ही इस कला को सीखा।

दुलारी देवी ने मधुबनी पेंटिंग महासुंदरी देवी के यहां देखी। महासुंदरी देवी भी मधुबनी पेटिंग की एक मशहूर कलाकार हैं। इस तरह मधुबनी पेंटिंग में उनकी दिलचस्पी बढ़ती गई। उन्होंने यह कला महासुंदरी देवी से ही सीखीं। धीरे-धीरे उन्होंने पेंटिंग करना शुरू किया। शुरुआती दौर में उन्हें इतनी अच्छी पेंटिंग बनानी तो नहीं आती थी लेकिन धीरे-धीरे उनकी कला में सुधार आता गया और उनकी पेंटिग और अच्छी होती गई। उन्होंने साड़ियों पर भी पेंटिंग की, वह दीवारों और जमीन पर भी लकड़ी से पेंटिंग किया करती थीं। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी पेंटिंग को बाजार में उतारना शुरू किया। लोगों को उनकी पेंटिंग बहुत पसंद आने लगी।

इसी बीच  55 वर्षीय दुलारी को एक दिल्ली से एक फ़ोन आया। इस फ़ोन पर उन्हें यह सूचना दी गई कि उन्हें पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना गया है। एक बार को उन्हें तो यकीन ही नहीं हुआ और उन्हें यह भी लगा कि किसी ने उनके साथ मज़ाक किया है। उन्हें यह सब एक सपना लग रहा था क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने पूरे जीवन में यह नहीं सोचा था कि उन्हें भी एक पद्मश्री पुरुस्कार से सम्मानित किया जाएगा। बीते  8 निवंबर को दुलारी देवी को राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद द्वारा पद्मश्री पुरस्कार से नवाज़ा गया। कल तक जिस महिला को कोई भी नहीं जानता था आज उसे और उसकी कला को पूरी दुनिया जानती है।

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स्रोत : BBC Hindi

तस्वीर साभार : Twitter

मेरा नाम नाज़ परवीन है। मैं बीए ऑनर्स की द्वितीय वर्ष की छात्रा हूं। मुझे लिखना पढ़ना और नयी-नयी चीजें सीखना बहुत पसंद है। मुझे रिपोर्टिंग करना भी बेहद पसंद है।

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