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भारत सरकार की ओर से हर साल विभिन्न क्षेत्रों जैसे कला, शिक्षा, उघोग, साहित्य, विज्ञान, चिकित्सा, समाज सेवा आदि में विशिष्ट योगदान देने वाले लोगों को पद्म विभूषण, पद्म भूषण और पद्मश्री से सम्मानित कर उनके काम की प्रशंसा करती है। इस लेख के ज़रिये हम आपको उन चुनिंदा महिलाओं से परिचित कराने जा रहे हैं जिन्हें साल 2021 में कला के क्षेत्र में योगदान देने के लिए पद्म श्री दिया गया है।

भूरी बाई

भूरी बाई एक भारतीय भील कलाकार हैं। मध्य प्रदेश के झाबुआ जिले के पिटोल गांव में जन्मी भूरी बाई भारत के सबसे बड़े आदिवासी समूह ‘भील’ के समुदाय से हैं। वह पहली आदिवासी महिला कलाकार है जिन्होंने पारंपरिक पिथौरा कला के चित्रों को गांव की झोपड़ियों की दीवारों से अलग विशाल कैनवस और कागज़ पर उतारा। भूरी बाई राज्य के भारत भवन में मज़दूरी का काम करती थीं। भारत भवन के तत्कालीन निदेशक जगदीश स्वामीनाथन ने उनकी कला को पहचाना और उन्हें कागज पर चित्रकारी करने के लिए प्रोत्साहित किया। भील कला को आदिवासी कला के प्रारूपों में सबसे पुराना माना जाता है। वह कैनवास पर पांरपरिक पौराणिक विषय, मानव-पशु बातचीत पर आधारित चित्र को बनाती है।

वह पहली आदिवासी महिला कलाकार हैं जिन्होंने अपनी आदिवासी कला में आधुनिकता के तत्वों को शामिल किया है। उन्होंने आधुनिकता के प्रतीक मोबाइल फोन, कार और हवाई जहाज को भी अपने चित्रों में शामिल किया है। उन्हें प्रदेश सरकार द्वारा 1986 में कलाकारों को दिए जाने वाले सर्वोच्च राजकीय पुरुस्कार ‘शिखर सम्मान’ से सम्मानित किया गया। 1998 में मध्यप्रदेश सरकार नें उन्हें ‘अहिल्या सम्मान’ से विभूषित किया और 2009 में ‘रानी दुर्गावती सम्मान’ से सम्मानित किया। भूरी बाई भोपाल में आदिवासी लोककला अकादमी में एक कलाकार के तौर पर काम करती हैं। भारत सरकार की ओर से उन्हें 2021 में पद्मश्री सम्मान दिया गया है।

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कुमारी लाजवंती

पंजाब के पटियाला की रहने वाली लाजवंती अपने काम से राज्य की फुलकारी परंपरा को जिंदा रखने के लिए जानी जाती हैं। इस साल उन्हें पद्मश्री से नवाज़ा गया हैं। 64 साल की लाजवंती छह साल की उम्र से यह काम कर रही है। विभाजन के समय पाकिस्तान के मुल्तान क्षेत्र से पलायन करने वाला लाजवंती का परिवार पारंपरिक फुलकारी कला अपने साथ लाया था। उन्हें कई राष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा जा चुका है। लाजवंती अपनी कला के माध्यम से पजांब के साथ हरियाणा, उत्तर-प्रदेश और बिहार तक की महिलाओं को यह काम सिखा रही हैं।

फुलकारी एक तरह की कढ़ाई होती है जो चुनरी और दुपट्टों पर होती है। लाजवंती के अनुसार, उन्हें विदेशों में रहने वाले भारतीयों के ऑर्डर भी मिलते हैं। फुलकारी कला, कलाकारों के लिए अब एक बड़ा व्यवसाय बन गया है। खासतौर पर गरीब पृष्ठभूमि के कलाकारों को आर्थिक मदद पहुंचा रहा है। राज्य सरकार के प्रोत्साहन के बाद भारत सरकार ने भी इन्हें इस वर्ष पद्मश्री से नवाज़ा हैं।

दुलारी देवी

दुलारी देवी कला के क्षेत्र में एक जाना पहचाना नाम हैं जिन्होंने कला के माध्यम से सामाजिक परिवर्तन का मार्ग बनाया है। वह उन महिला कलाकारों में से हैं जिन्होंने कला के क्षेत्र से वर्चस्व, भेदभाव और उत्पीड़न के महत्वपूर्ण मुद्दे का प्रतिनिधित्व किया है। बिहार के मधुबनी जिले के रांटी गांव में 1968 में इनका जन्म हुआ था। दुलारी देवी मल्लाह समुदाय से आती हैं, जो अतिपिछड़ा समुदाय में आता है। वह अपने परिवार की पहली महिला हैं, जिन्होंने मिथिला पेंटिंग बनाना सीखा। दुलारी देवी की शादी तेरह साल की उम्र में हो गई थी। शादी न चलने के कारण वह अपने दो-तीन साल बाद अपने घर वापस आ गई। बाकी परिवार की तरह उन्होंने भी मज़दूरी करनी शुरू कर दी।

वह महासुंदरी देवी के यहां घरेलू सेवक के तौर पर काम किया करती थी। मधुबनी पेंटिंग के क्षेत्र में बड़ा मुकाम हासिल करने वाली महासुंदरी देवी और कर्पूरी देवी से ही दुलारी देवी ने मधुबनी पेंटिंग का शुरुआती काम सीखा था। दुलारी देवी मिथिला क्षेत्र के पारंपरिक राम-सीता चित्रों की एक प्रसिद्ध चित्रकार है। वह बाल विवाह, एड्स जागरूकता और भ्रूण हत्या बहुत से समकालीन विषय और सामाजिक मुद्दों पर आधारित चित्रों को मिथिला कला के अन्तर्गत बनाती हैं। रोजमर्रा के ग्रामीण जीवन, पेड़, खेत और जानवरों के अलावा वह गणेश के चित्रों को बनाने वाली कलाकार हैं। दुलारी देवी का काम कई विदेशी कला म्यूजियम में स्थान हासिल कर चुका हैं। साल 2012 में बिहार सरकार ने कला के क्षेत्र में विशेष योगदान देने के लिए उन्हें सम्मानित किया था। वह मिथिला आर्ट्स इंस्टीट्यूड में नौजवान चित्रकारों को कला सिखाती हैं। दुलारी देवी अपने समुदाय में शादी व उत्सव में दीवारों पर चित्रकारी करने के लिए कोई पैसा नहीं लेती हैं। वह चाहती है कि ज्यादा से ज्यादा नयी पीढ़ी के लोग इस कला से जुड़ें।

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हंजबम राधे देवी

उत्तरपूर्वी राज्य मणिपुर की हंजबम राधे देवी दुल्हन के पहने वाली एक पारंपरिक पोशाक तैयार करती हैं जिसे पोटलोई सेटपी कहा जाता है। वह पिछले 59 सालों से यह काम कर रही हैं। देवी अबतक 1000 से भी अधिक दुल्हनों के इस पारंपरिक परिधान को तैयार कर चुकी हैं। पोटलोई एक बेलनाकार घाघरा, बेल्ट, ब्लाउज़ और दुपट्टे को मिलाकर बनती है। पारंपरिक रूप से घागरे को बनाने में नौ कपड़ों की परत बनाकर उसे चावल की मांड में डालकर कड़ी धूप में सुखाकर घाघरे का आकार दिया जाता है। देवी ने यह कला अपने ही पड़ोस में रहने वाली एक महिला से सीखी थी और बाद में 30 वर्ष की उम्र में स्वंय से पोशाकें बनाना शुरू कर दिया।

देवी ने सबसे पहले अपनी बेटी के लिए यह पोशाक बनाई थी, जो उसने रासलीला के ड्रामा में हिस्सा लेने के लिए बनवायी थी। राधे ने यह काम केवल पांच दिन में पूरा कर दिया था, जिससें उनके अंदर आत्मविश्वास बना कि वह भी कुछ कर सकती है। परिवार की आर्थिक स्थिति को बेहतर करने के लिए पारंपरिक पोशाक बनाने का काम शुरू कर दिया। जिससे कमाये पैसे से उनके परिवार की मदद होने लगी। देवी खंबा-थोबी नृत्य के लिए भी वेशभूषा तैयार करती है। यह एक लोकप्रिय मणिपुरी कथा पर आधारित नृत्य है। इस काम को कला के दर्जे तक पहुंचाने के लिए उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया गया हैं।

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निदुमोलू सुमति

निदुमोलू सुमति का जन्म 16 अक्टूबर 1950 में एलुरू, जिला पश्चिमी गोविंदपुरी, आंध्र प्रदेश में हुआ था। वह भारत की पहली महिला मृदंग वादक हैं। इन्हें दंडमुडी सुमति के नाम से भी जाना जाता है। मात्र छह साल की उम्र में ही इन्होंने अपने पिता से मृदंग बजाना सीखना शुरू कर दिया था। इनके पिता एक मृदंग विद्वान थे। इनकी रुचि को देखते हुए वे इन्हें अपने साथ मृदंग के कार्यक्रमों में ले जाते थे। दस साल की उम्र में इन्होंने स्टेज पर पहली मृदंग प्रस्तुति दी थी।

1964 में इन्होंने मृदंग में डिप्लोमा कोर्स पूरा किया था। इनका विवाह दंडमुडी राम मोहन राव प्रसिद्ध मृदंगम कलाकार से हुआ था। वह भारत की पहली महिला विनयसम कलाकार भी हैं। 2003 में ऑल इंडिया रेडियो की ए-टॉप ग्रेड कलाकार बनीं। वह इस ग्रेड को हासिल करने वाली पहली महिला मृदंग कलाकार थी। अपनी कला के लिए निदुमोलू को अनेक पुरूस्कारों से नवाजा गया है। 1974 में मद्रास म्यूजिक अकेडमी ने बेस्ट मृदंगिस्ट के सम्मान से नवाजा था। 2010 में केन्द्रीय संगीत नाटक अकेडमी से सम्मान प्राप्त हुआ। 2015 में आन्ध्रा प्रदेश की सरकार की ओर से उगादी पुरूस्कारम् से सम्मानित किया गया।

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मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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