स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य अबॉर्शन को लेकर किन गलतफ़हमियों की शिकार हैं ग्रामीण औरतें

अबॉर्शन को लेकर किन गलतफ़हमियों की शिकार हैं ग्रामीण औरतें

अक्सर महिलाओं से अबॉर्शन के मुद्दे पर महिलाओं से बात करने पर पहली बात गलतफ़हमी यह सामने आती है कि अबॉर्शन करवाना ग़ैरक़ानूनी है। महिलाओं के दिमाग़ में अक्सर यह बात बैठी होती है कि अगर वे अबॉर्शन करवाती हैं तो इससे उन्हें सजा हो सकती है। यह सिर्फ़ एक गलतफ़हमी ही है।

महिलाओं के साथ बैठक के दौरान अबॉर्शन के मुद्दे पर बात आते ही बसुहन गाँव की गौरा ने तुरंत कहा, “यह तो पाप होता है। ये बच्चे की हत्या है। इसमें महिलाएँ अपने स्वार्थ से चलते ये ग़लत कदम उठाती है।” गौरा की बात से सहमत हुए गुंजा ने भी कहा कि अबॉर्शन ग़लत और ग़ैरक़ानूनी है क्योंकि इसमें जान ली जाती है। यह काम वही करता है जो कोई ग़लत काम करता है। इसके बाद बैठक में मौजूद और भी महिलाओं ने अबॉर्शन को लेकर अपने-अपने विचार साझा करने शुरू किए। इन सभी विचारों और बातों में अबॉर्शन को लेकर वे तमाम गलतफ़महियां मौजूद थीं।

गाँव स्तर पर महिलाओं और किशोरियों के साथ उनके यौन और प्रजनन स्वास्थ्य के मुद्दे पर काम करते हुए जब भी बात अबॉर्शन की आती है तो इससे जुड़ी जानकारियों से ज़्यादा इससे जुड़ी भ्रांतियां सामने आने लगती हैं। इन्हें दूर करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि ये गलतफ़हमियां ही हैं जो हमें हमेशा अपने अधिकारों से दूर करने का काम करती हैं। आज आपके साथ अबॉर्शन से जुड़ी उन्हीं भ्रांतियों के बारे में बात करूंगी, जो अक्सर ग्रामीण क्षेत्रों में देखने और सुनने को मिलती हैं।

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अबॉर्शन ग़ैर क़ानूनी है

अक्सर महिलाओं से अबॉर्शन के मुद्दे पर महिलाओं से बात करने पर पहली गलतफ़हमी यह सामने आती है कि अबॉर्शन करवाना ग़ैरक़ानूनी है। महिलाओं के दिमाग़ में अक्सर यह बात बैठी होती है कि अगर वे अबॉर्शन करवाती हैं तो इससे उन्हें सजा हो सकती है। यह सिर्फ़ एक गलतफ़हमी ही है। हमारे क़ानून में मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी ऐक्ट, 2021 भारत में महिलाओं को 20 से 24 सप्ताह के गर्भ को समाप्त करने की अनुमति देता है। इसका मतलब है कि अबॉर्शन करवाना ग़ैरक़ानूनी नहीं है।

अबॉर्शन करवाने वाली महिलाएं ग़लत या बुरी होती हैं

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं के मातृत्व पक्ष को हमेशा से पूजनीय बताया जाता है। परिवार नियोजन का पूरा भार और इसकी पूरी ज़िम्मेदारी महिलाओं की ही समझी जाती है। ऐसे में जब कोई महिला अबॉर्शन का फ़ैसला लेती है तो उसे बुरी महिला की नज़र से देखना शुरू कर दिया जाता है। पितृसत्ता हम महिलाओं पर बचपन से ही ‘अच्छी औरत’ बनने का दबाव डालती है। अच्छी औरत का यह गुण बताया जाता है कि वह कभी भी अपने शरीर से जुड़ा कोई फ़ैसला नहीं ले सकती है।

जब बात बच्चे को जन्म देने की हो तो बिल्कुल भी नहीं है। अगर कोई महिला ऐसा नहीं करती तो वो समाज के लिए बुरी महिला मानी जाती है। हमें मालूम होना चाहिए कि कई बार परिवार नियोजन के साधन फेल होने पर भी महिलाओं को अनचाहे गर्भ का सामना करना पड़ता है, जिसे समाप्त करने का अधिकार हमारा क़ानून हमें अधिकार देता है। इसका ग़लत या सही से कोई लेना-देना नहीं होता है।

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जब भी कोई अविवाहित महिला माँ बनती है या फिर गर्भधारण कर लेती है तो उसे समाज बुरी नज़र से देखता है। अबॉर्शन को लेकर भी इसी विचार के अनुसार सभी सोचते हैं कि गर्भसमापन का अधिकार सिर्फ़ विवाहित महिला को ही है, जो ग़लत है।

अबॉर्शन किसी भी स्वास्थ्य केंद्र या स्वास्थ्यकर्मी से करवाया जा सकता है

इंडिया टुडे में प्रकाशित खबर के अनुसार भारत में हर दिन क़रीब तेरह महिलाएं असुरक्षित अबॉर्शन की वजह से अपनी जान गंवाती हैं। वहीं, करीब 6.4 मिलियन महिलाएं भारत में हर साल गर्भसमापन करवाती हैं। साथ ही, भारत में हर साल मातृ मृत्यु की वजहों में आठ प्रतिशत मौत असुरक्षित गर्भसमापन की वजह से होती है। ग्रामीण क्षेत्रों में भी असुरक्षित गर्भसमापन की वजह से महिलाओं के मृत्यु के केस सामने आते हैं, जिसकी वजह होती है किसी भी स्वास्थ्य केंद्र या स्वास्थ्य कर्मी से गर्भसमापन करवाना, जो बिल्कुल भी सुरक्षित नहीं होता है। सरकार की तरफ़ से गर्भसमापन के लिए सरकारी स्वास्थ्य केंद्र होते हैं। कुछ प्राइवेट चिकित्सा केंद्रों को भी गर्भसमापन करवाने के लिए मान्यता प्राप्त होती है। इसलिए हमें सुरक्षित गर्भसमापन के लिए हमेशा सरकारी मान्यता प्राप्त केंद्रों पर ही जाना चाहिए।

अबॉर्शन सिर्फ़ विवाहित महिला ही करवा सकती है

पितृसत्तात्मक समाज में वैसे तो किसी भी महिला के लिए माँ बनाना उसकी सार्थकता के लिए ज़रूरी बताया जाता है। लेकिन वह माँ कब बनेगी और यह फ़ैसला सिर्फ़ पितृसत्ता ही करती है। इसलिए जब भी कोई अविवाहित महिला माँ बनती है या फिर गर्भधारण कर लेती है तो उसे समाज बुरी नज़र से देखता है। अबॉर्शन को लेकर भी इसी विचार के अनुसार सभी सोचते हैं कि गर्भसमापन का अधिकार सिर्फ़ विवाहित महिला को ही है, जो ग़लत है। इसे लेकर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने अबॉर्शन को लेकर एक अहम फ़ैसला सुनाया है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एकबार फिर से ये स्पष्ट कहा कि एक अविवाहित महिला को भी विवाहित महिला की तरह अबॉर्शन का अधिकार है।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कहा कि साल 2021 के संशोधन के बाद, मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ़ प्रेग्नेंसी ऐक्ट की धारा-तीन में पति के बजाय पार्टनर शब्द का उपयोग किया गया है। यह अधिनियम में अविवाहित महिलाओं को कवर करने के लिए विधायी मंशा का दर्शाता है। जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में भी बताया है कि इस क़ानून में पार्टनर शब्द का इस्तेमाल किया गया है न कि पति। इसके साथ ही, इस क़ानून में गर्भसमापन एक गर्भवती महिला अधिकार बताया गया है न कि विवाहित या अविवाहित महिला का।

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महिला के गर्भ में आए भ्रूण पर पुरुष का अधिकार होता है

अक्सर घर, समाज और टीवी-सिनेमा में भी हमें यह बात बताई जाती है कि महिला के गर्भ में आए भ्रूण पर सिर्फ़ पुरुष का अधिकार होता है जो कि ग़लत है। महिलाओं के शरीर पर उनका अधिकार होता है, यह हमें समझना होगा। इसलिए जब तक भ्रूण उनके गर्भ में होता है तो उस पर सिर्फ़ और सिर्फ़ महिला का अधिकार होता है। इस बात का निर्णय सिर्फ़ महिला करती है की उसे इस भ्रूण को जन्म देना है या नहीं।

अबॉर्शन को लेकर फैली ऐसी कई और भी भ्रांतियों को हम बैठकों और बातचीत के माध्यम से दूर सकते हैं वरना न जाने कितनी महिलाओं को असुरक्षित अबॉर्शन की वजह से अपनी जान जोखिम में डालनी पड़ेगी। यह महिला अधिकार और उनके स्वास्थ्य से जुड़ा ज़रूरी विषय है, जिस पर चुप रहने की नहीं बल्कि बातचीत करने की ज़रूरत है।

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तस्वीर साभार: नेहा

About the author(s)

लेखन के माध्यम से ग्रामीण किशोरियों और दलित समुदाय के मुद्दों को उजागर करने वाली नेहा, वाराणसी ज़िले के देईपुर गाँव की रहने वाली है। नेहा को किशोरी नेतृत्व विकास करने की दिशा में रचनात्मक कार्यक्रम करना पसंद है, वह समुदाय स्तर पर बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं।

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