अमी घिया और कंवल ठाकर सिंहः कॉमनवेल्थ खेलों में भारत के लिए पहली बार पदक जीतने वाली महिला खिलाड़ी
तस्वीर साभारः Scroll.in
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1934 में लंदन में आयोजित कॉमनवेल्थ खेलों में भारत ने पहली बार हिस्सा लिया था। उस साल भारत ने केवल एक पदक जीता था। कुश्ती में राशिद अनवर ने भारत की ओर से कांस्य पदक जीता था। उसके बाद से भारत का राष्ट्रमंडल खेलों में सफर जारी रहा। बीच में कभी भारत ने हिस्सा नहीं लिया तो कभी एक भी पदक जीतने में नाकामयाब रहा। इस दौरान पदक जीतने वालों में भारतीय पुरुष खिलाड़ी ही शामिल रहे। साल 1978 में पहली बार भारत के लिए पदक जीतनेवालों में महिला खिलाड़ियों का नाम शामिल हुआ। उस साल बैडमिंटन की दो महिला खिलाड़ियों ने यह उपलब्धि हासिल की थी।

अमी घिया और कंवल ठाकर सिंह ने उस स्टीरियोटाइप को तोड़ा कि पदक पुरुष खिलाड़ी ही लाते हैं। वे युगल बैडमिंटन में कांस्य जीतकर विजेता के रूप में पोडियम पर खड़ी होनेवाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं। अमी घिया और कंवल ठाकर सिंह ने यह करिश्मा उस समय किया था जब बैडमिंटन में पुरुष खिलाड़ियों का पूरी तरह दबदबा था। 

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1978 में इस जोड़ी से किसी को मेडल की ही नहीं बल्कि पहला राउंड क्लियर करने की उम्मीद नहीं थी। लेकिन दोंनो ने अपने दमदार खेल से सबको चौंका दिया। अमी घिया और कंवल ठाकर सिंह की जोड़ी का सेमीफाइनल में इंग्लैंड की मजबूत जोड़ी नोरा पेरी और ऐनी स्टैट से मुकाबला हुआ था।

बेमिसाल जोड़ी ने सबको चौंका दिया

1978 में इस जोड़ी से किसी को मेडल की ही नहीं बल्कि पहला राउंड क्लियर करने की उम्मीद नहीं थी। लेकिन दोंनो ने अपने दमदार खेल से सबको चौंका दिया। अमी घिया और कंवल ठाकर सिंह की जोड़ी का सेमीफाइनल में इंग्लैंड की मजबूत जोड़ी नोरा पेरी और ऐनी स्टैट से मुकाबला हुआ था। हालांकि, उनसे हारने के बाद कांस्य पदक के लिए उनका मुकाबला जेन वेबस्टर और बारबरा सटन के साथ हुआ। कांस्य पदक के लिए हुए इस मुकाबले में दोंनो खिलाड़ियों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए तीसरी पोजिशन अपने नाम की। मैच जीतने के बाद इन दोंनो की जोड़ी ने भारतीय खेलों में इतिहास रच दिया। भारत की तरफ से मेडल जीतने वाली ये दोंनो पहली महिला खिलाड़ी बनीं। अमी और कंवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोड़ी के तौर पर पहली बार खेल रही थीं। 

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एक ओर अमी घिया खिलाड़ी के तौर पर अपनी तकनीकों की वजह से जानी जाती हैं वहीं दूसरी और कंवल ठाकर की पहचान आक्रामक खेलने वाली हैं। 1978 में यह जोड़ी अपनी इन्हीं खूबियों की वजह से विरोधियों के लिए एक मुश्किल साबित हुईं। दूसरी ओर दोंनो ही खिलाड़ियों को के पास ज्यादा अनुभव नहीं था लेकिन अपने बेहतर हुनर की बदौलत उन्होंने यह उपलब्धि हासिल की। एक मीडिया कार्यक्रम में बोलते हुए अमी घिया कहती हैं, “यह हमारे लिए एक स्पेशल मेडल था क्योंकि हमें मुश्किल से ही अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट में खेलने का मौका मिलता था क्योंकि उस समय एक्सपोजर ज्यादा नहीं मिलता था। कॉमनवेल्थ से पहले मुझे कुछ अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में खेलने का मौका मिला और इससे एडमोंटन में मदद मिली थी।”

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द स्कॉल में प्रकाशित लेख में कंवल ठाकर सिंह कहती है, “पूरे दल में केवल हम दो महिलाएं थी, जिनमें लगभग 40 पुरुष थे। एशियन गेम्स के दलों में कई महिला सदस्य हुआ करती थी लेकिन कॉमनवेल्थ गेम्स में केवल हम दो महिलाएं भेजी गई थी।” अमी घिया और कंवल ठाकर, भारतीय बैडमिंटन की वे महिला खिलाही हैं जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टूर्नामेंट में जीत हासिल करने की नींव रखी। इन दोंनो खिलाड़ियों की उपलब्धि ने भारत में खेलों में महिला खिलाड़ियों की हिस्सेदारी और टूर्नामेंट में उन्हें बाहर भेजने के चलन को बढ़ाने का काम किया। भारत की ओर से उस दौर में बहुत सीमित महिला खिलाड़ी प्रतिनिधित्व करती थी। 1978 में भारत की ओर से कॉमनवेल्थ में महिला खिलाड़ियों को दूसरी बार हिस्सा लेने के लिए भेजा गया था। इससे पहले 1958 में स्टेफनी डिसूजा और एलिजाबेथ ड्वेनपोर्ट ने ट्रैक एंड फील्ड में भारत की तरफ से कॉमनवेल्थ खेलों में हिस्सा लिया था। 

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बैडमिंटन क्वीन अमी घिया

तस्वीर साभारः Firstpost.com

अमी घिया भारत के बैडमिंटन खिलाड़ियो में से एक सर्वक्षेष्ठ खिलाड़ी मानी जाती हैं। अमी घिया ने अपने खेल से अपनी अलग पहचान बनाई। अमी उस दौर की खिलाड़ी है जब भारतीय बैडमिंटन में भारत के दूसरे महान खिलाड़ी प्रकाश पादुकोणे अपने करियर के शीर्ष पर थे। अमी की खेल प्रतिभा और हुनर ही था कि वह अपना नाम बनाने में कामयाब रही और उन्होंने भारतीय बैडमिंटन के लिए कई उपलब्धिया हासिल की।

अमी घिया ने बैडमिंटन खेलने की शुरुआत शौक के तौर पर की थी। उसके बाद उन्होंने मुंबई के जिमखाना में ट्रेनिंग लेनी शुरू की। अमी घिया ने राष्ट्रीय स्तर पर 23 टाइटल जीते हैं। वह सात बार नेशनल सिंगल चैंपियन रह चुकी हैं। अमी केवल एकल प्रतियोगिताओं में ही हिस्सा नहीं लिया करती थी, वह सिंगल, डबल्स और मिक्स्ड डबल्स में भी हिस्सा लिया करती थी।

अमी घिया ने साल 1982-83 में वर्ल्ड कप में हिस्सा लिया था। उस दौरान दुनिया के टॉप 12 खिलाड़ियों को ही इसमें हिस्सा लेने का मौका दिया जाता था। अमी ऐसा करने पहली भारतीय खिलाड़ी बनीं। अमी घिया बैडमिंटन में अपने ड्रॉप शॉट और हाफ स्मैश के लिए विख्यात हैं।  1976 में भारत सरकार की ओर से उन्हें अर्जन अवार्ड से सम्मानित किया गया।

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अमी घिया और कंवल ठाकर सिंह ने उस स्टीरियोटाइप को तोड़ा कि पदक पुरुष खिलाड़ी ही लाते हैं। वे युगल बैडमिंटन में कांस्य जीतकर विजेता के रूप में पोडियम पर खड़ी होने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं।

नेशनल चैंपियन कंवल ठाकर सिंह

कंवल ठाकर सिंह ने महज 15 साल की उम्र में पंजाब स्टेट चैंपियनशिप में महिला एकल खिताब जीता था और जल्द ही अपने खेल की वजह से राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना ली थीं। 1977 में उन्होंने नेशनल चैंपियन टाइटल अपने नाम किया। 1977 में कंवल ठाकर भारतीय बैडमिंटन टीम का हिस्सा बनकर उन्होंने उबर कप में हिस्सा लिया। 1982 के एशियन गेम्स में उन्होंने टीम और मिक्सड डबल्स में कांस्य पदक जीता था। कंवल ठाकर सिंह बैडमिंटन में हासिल उनकी उपलब्धियों के लिए भारत सरकार की ओर से अर्जुन अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका हैं। जुलाई 2002 में वह चंडीगढ़ बैडमिंटन प्लेयर्स वेलफेयर एसोसिएशन की मुख्य संरक्षक बनी थीं। 

अमी घिया और कंवल ठाकर सिंह अपने समय की दो बेहतरीन खिलाड़ी रही हैं। 1978 के बाद कांस्य पदक जीतने के बाद इस जोड़ी ने ऑल इंग्लैंड चैंपियनशिप में भी जोड़ी के तौर पर हि्स्सा लिया था। बतौर जोड़ी ये दोंनो उस प्रतियोगिता के क्वार्टर फाइनल तक पहुंची थी। वहीं उस समज कई राष्ट्रीय स्तर के मुकाबले में दोंनो ने एक-दूसरे के प्रतिद्वद्धी के तौर पर भी खेला है। एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खेलते हुए दोंनो के बीच कड़ी टक्कर होती थी। 

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तस्वीर साभारः Scroll.in

स्रोतः

1-Wikipedia

2- Scroll.in

3- TheBridge.in

4- PipaNews

5- TimesNow

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