तस्वीर साभारः The New Indian Express
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कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 की शुरुआत हो चुकी है। बर्घिंगम में चल रहे इस साल के खेलों में मीराबाई चानू पहली महिला एथलीट हैं जिन्होंने गोल्ड मेडल जीता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉमनवेल्थ गेम्स में सबसे पहले गोल्ड मेडल जीतनेवाली महिला एथलीट कौन हैं? आइए जानते हैं उस महिला एथलीट के बारे में जिसने कॉमनवेल्थ गेम्स में सबसे पहले मेडल जीता था।

भारतीय शूटर रूपा उन्नीकृष्णन के नाम कई उपलब्धियां जुड़ी हैं लेकिन उसमें से एक खास बात यह भी है कि वह कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतनेवाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं। आज भले ही वह अन्य भारतीय खिलाड़ियों की तरह बहुत चर्चित नाम न हो लेकिन उन्होंने साल 1998 में कुआलालंपुर में पदक जीतकर इतिहास में हमेशा के लिए अपना नाम दर्ज करा दिया था।

रूपा उन्नीकृष्णन, भारतीय शूटर हैं जिन्होंने महज 20 साल की उम्र में कॉमनवेल्थ गेम्स में पदक जीतकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान कायम की। रूपा उन्नीकृष्णन मूल रूप से चेन्नई की रहनेवाली हैं। उन्होंने महज 12 साल की उम्र में शूटिंग करनी शुरू कर दी थी। उनके पिता एक पुलिस अधिकारी रहे हैं। उन्होंंने पुलिस शूटिंग रेंज से ही शूटिंग की पहली ट्रेनिंग लेनी शुरू की थी।

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रूपा ने स्कूल की पढ़ाई के साथ-साथ अपनी शूटिंग ट्रेनिंग शुरू की। आगे भी वह खेल और पढ़ाई को हमेशा साथ-साथ लेकर चली। वह नियमित तौर पर 2-3 घंटे शूटिंग प्रैक्टिस किया करती थीं। रूपा उन्नीकृष्णन ने वीमंस क्रिश्चिन कॉलेज, चेन्नई से स्नातक की डिग्री हासिल की थी। वहीं एथिराज कॉलेज, चेन्नई से एमए किया है। 14 साल की उम्र में उन्होंने नेशनल चैंपियनशिप में हिस्सा लिया था और मेडल भी अपने नाम किया था। रूपा उन्नीकृष्णन ने शूटिंग में अपनी पहचान जल्द ही बना ली थी। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम कमा लिया था। वह भारत की ओर से रोड्स स्कॉरशिप भी हासिल कर चुकी हैं। उसके बाद वह ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से भी पढ़ी हैं। रूपा, ऑक्सफोर्ड वीमंस शूटिंग की कप्तान भी रह चुकी हैं। उनके नेतृत्व में ऑक्सफोर्ड शूटिंग टीम ने यूनिवर्सिटी लीग का खिताब जीता था। 

आज भले ही वह अन्य भारतीय खिलाड़ियों की तरह बहुत चर्चित नाम न हो लेकिन भारतीय शूटर रूपा उन्नीकृष्णन के नाम कई उपलब्धियां जुड़ी हैं लेकिन उसमें से एक खास बात यह भी है कि वह कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतनेवाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी हैं।

बनीं पहला स्वर्ण पदक जीतने वाली महिला

साल 1998 में कुआलालंपुर में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स से पहले भी रूपा उन्नीकृष्णन कई महत्वपूर्ण खिताब अपने नाम कर चुकी थीं। लेकिन इस प्रतियोगिता में गोल्ड मेडल जीतकर उन्होंने हमेशा के लिए इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया। कॉमनवेल्थ गेम्स 1998 में स्वर्ण पदक जीतने से पहले वह 1994 में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स में 50 मीटर स्मॉल बोर राइफल थ्री पोजीशन इवेंट में रजत पदक और टीम इवेंट में कांस्य पदक भी जीत चुकी हैं। 1998 में वर्ल्ड शूटिंग ग्रैंड प्रिक्स, जॉर्जिया में उन्होंने रजत पदक जीता। दक्षिण एशिया में शूटिंग में कई रिकॉर्ड रूपा उन्नीकृष्णन के नाम हैं। साल 1999 में भारत के सर्वोच्च खेल पुरस्कार ‘अर्जुन अवार्ड’ से सम्मानित किया गया। 

तस्वीर साभारः Rediff.com

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सुविधाओं के अभाव में की प्रैक्टिस

रूपा उन्नीकृष्णन जिस समय शूटिंग में करियर बना रही थीं उस समय महिलाओं के लिए खेल नीति बिल्कुल भी मददगार नहीं थी। उन्होंने शूटिंग की प्रैक्टिस बहुत सीमित संसाधनों में की है। भारत में खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं को बढ़ाने की उन्होंने हमेशा वकालत की है। उन्होंने भारतीय खेलों में निहित भेदभाव को भी उजागर किया। उनके अनुसार उन्हें शूटिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के बाद भी मौके नहीं दिए गए। न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक लेख के अनुसार वह आकिटेक्चर में रूचि रखती थी और उन्होंने खेल कोटे के माध्यम से आवेदन किया। शूटिंग में अंतरराष्ट्रीय मेडल जीतने के बावजूद उन्हें रिजेक्ट कर दिया गया था।

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रूपा उन्नीकृष्णन ने भारत में खिलाड़ियों के लिए सुविधाओं को बढ़ाने की हमेशा वकालत की है। उन्होंने भारतीय खेलों में निहित भेदभाव को भी उजागर किया। उनके अनुसार उन्हें शूटिंग में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कामयाबी के बाद भी मौके नहीं दिए गए।

करियर के शीर्ष में कहा शूटिंग को अलविदा

रूपा उन्रीकृष्णन ने कई जगह भारत में खेलों में भेदभाव के बारे में कहा है। उन्होंने उस समय शूटिंग को लोगों के कम महत्व देने की बात भी कही। टाइम्स ऑफ इंडिया में छपे लेख के मुताबिक रूपा उन्नीकृष्णन का कहना है, “1998 में पदक जीतने के मैं दो दिन बाद भारत वापस आई थी और मेरे मन के एक हिस्से में यह चल रहा था मेरे काम को सराहा जाएगा। मैं एयरपोर्ट पर बाहर आई और वहां सिर्फ कुछ चुनिंदा मेरे परिवार, जलाल अंकल कुछ दोस्त और मद्रास राइफल क्लब से एक व्यक्ति मौजूद थे। अपने देश के लिए खेलने के लिए बहुत मेहनत की जबकि मैंने अपनी शिक्षा को भी जारी रखा। मद्रास एयरपोर्ट की घटना मुझे बहुत गहरी लगी।” 

रूपा ने भारतीय कंपनियों से स्पॉन्सरशिप लेने की कोशिश की, लेकिन किसी को आकर्षण नज़र नहीं आया। इस घटना के बाद उन्होंने करियर के तौर पर दूसरा पेशा चुनना तय किया। उसके बाद वह न्यूयार्क जाकर रहने लगी। न्यूयार्क जाकर भी उन्होंने तीन साल लगातार शूटिंग की। रूपा उन्नीकृष्णन की शादी श्रीनाथ श्रीनिवासन के साथ हुई है। साल 2013 में रूपा उन्नीकृष्णन ने अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली थी। रूपा उन्नीकृष्णन जिन्होंने भारतीय खेलों के इतिहास में कई रिकॉर्ड बनाए वर्तमान में एक कामयाब बिजनेस वीमन हैं। उन्होंने वैश्विक स्तर बिजनेस में अपनी एक पहचान बनाई हैं। 2017 में रूपा उन्नीकृष्णन की ‘द करियर कैटापल्ट’ के नाम से लिखी एक किताब भी प्रकाशित हो चुकी हैं। 

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तस्वीर साभारः The New Indian Express

स्रोतः

1- Wikipedia

2- The New Indian Express

3- Times Of India

4- Oylmpics.com

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