कमलजीत कौर संधूः एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वाली पहली महिला एथलीट
तस्वीर साभारः Hindustan Times
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कमलजीत कौर संधू एक भारतीय महिला एथलीट हैं। उन्होंने 1970 के एशियन खेलों में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया था। किसी भी व्यक्तिगत खेल स्पर्धा में यह कामयाबी हासिल करनेवाली वह पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनीं। भारतीय एथलीट के तौर पर कई उपलब्धियां अपने नाम करने वाली कमलजीत कौर संधू खेलों में आनेवाली पीढ़ी को प्रेरित करनेवाली एक मजबूत मिसाल हैं, आइए जानते हैं उनके सफ़र के बारे में।

कमलजीत संधू का जन्म 1948 में पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम मोहिंदर सिंह कोरा है। उनके पिता खुद एक खिलाड़ी थे जो अपने कॉलेज के दिनों में हॉकी खेलते थे। उनके परिवार की पृष्ठभूमि मिलिट्री सर्विस से जुड़ी हुई है। वह एक शिक्षित परिवार से ताल्लुक रखती हैं। अपनी चार बहनों में वह दूसरे नंबर की थी। कमलजीत के पिता उन्हें हमेशा प्रोत्साहित किया करते थे। हालांकि, उस समय लड़कियों के खेलने को बिल्कुल सही नहीं माना जाता था। कमलजीत की खेलों में रूचि देखकर उनकी माँ कहा करती थीं कि इस तरह से तो वह रोटी बनाना नहीं सीख पाएंगी।

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“मुझे नहीं मालूम कि अधिकारी मुझे पसंद करते थे। मैं हमेशा से बहुत जिद्दी थी। वे इससें सही से डील नहीं कर पाते थे। जब मेरा ट्रायल था वे सब मुझे घूर रहे थे। मेरे हारने की उम्मीद कर रहे थे। बाद में जब में जीत गई उन्होंने मुझे दोबारा दौड़ाया लेकिन दूसरी बार मैंने और बेहतर समय में दौड़ पूरी की थी।”

कमलजीत की बचपन से ही खेलों में गहरी रूचि थी। स्कूल के दौरान वह हर खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लिया करती थीं। उनकी यह प्रतिभा देखकर उनके पिता ने अपने मित्र राजा करणी सिंह से सलाह मांगी और उन्हें खेलों वाले स्कूल में एडमिशन दिला दिया। उस समय लड़कियों को किसी शारीरिक या खेल स्पर्धा में शामिल नहीं किया जाता था ना उनसे से खेल-कूद की कोई उम्मीद की जाती थी। कमलजीत संधू ने इस सोच को गलत साबित किया और खेलों में हिस्सा लेकर खुद को साबित किया। धीरे-धीरे लोग उन्हें जानने लगे थे। 

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संधू ने चंडीगढ़ में पंजाब विश्वविद्यालय में शारीरिक शिक्षा विभाग में शामिल हुई। साल 1967 में कमलजीत ने नैशनल चैम्पियनशिप में 400 मीटर की दौड़ में हिस्सा लिया। लेकिन अनुभव और प्रशिक्षिण की कमी की वजह से वह रेस पूरी नहीं कर पाई। हार के बावजूद कमलजीत ने वहां मौजूद लोगों को बहुत प्रभावित किया। राजा करणी सिंह ने एशियन खेलों में गोल्ड मेडलिस्ट अजमेर सिंह से उन्हें ट्रेनिंग देने के लिए कहा। उन दिनों खेलों में महिला खिलाड़ियों की ट्रेनिंग की कोई सुविधा नहीं थी। यही नहीं. नेशलन इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स, पटियाला में भी महिला कोच की कोई सुविधा नहीं थी। इसके बावजूद संधू ने कोच अजमेर सिंह से ट्रेनिंग ली। कोच अजमेर सिंह पहली बार किसी महिला खिलाड़ी को ट्रेनिंग दे रहे थे।

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संधू के कोच जो कुछ भी कहा उन्होंने उसका पालन किया। कोच के कहने पर ही संधू ने दौड़ना शुरू किया था। 1970 एशियाई खेलों में हिस्सा लेने के बारे में सोचा। साल 1969 में उन्होंने एनआईएस में एक शॉर्ट कैंप में हिस्सा लिया। संधू खेल की पूरी तैयारी में लग गई। उनका सारा ध्यान आने वाले टूर्नामेंट पर लगा था। वह हर हाल में खुद को साबित करना चाहती थी। 

ईसपीएन में प्रकाशित एक लेख में संधू कहती हैं, “मुझे नहीं मालूम कि अधिकारी मुझे पसंद करते थे। मैं हमेशा से बहुत जिद्दी थी। वे इससें सही से डील नहीं कर पाते थे। जब मेरा ट्रायल था वे सब मुझे घूर रहे थे। मेरे हारने की उम्मीद कर रहे थे। बाद में जब में जीत गई उन्होंने मुझे दोबारा दौड़ाया लेकिन दूसरी बार मैंने और बेहतर समय में दौड़ पूरी की थी।” 

सिंधू ने अपने खेल और प्रतिभा के बल पर हमेशा लोगों को गलत साबित किया। वहां के जो अधिकारी थे उनके मजबूत नेतृत्व को देखकर उन्हे नापसंद करते थे। उन्होंने अपने खेल से सभी आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था। उन्होंने एशियाई खेलों से पहले दो अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर टूर्नामेंट में बेहतर प्रदर्शन से उन्हें गलत साबित किया। भारतीय महिला एथलीट खासकर ग्रामीण परिवेश से आनेवाली महिलाओं का सफर खेलों में आसान नहीं था। भारतीय महिला एथलीटों को सामाजिक व्यवस्था द्वारा हर कदम पर चुनौती दी जाती थी।

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तस्वीर साभारः ESPN

एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल किया अपने नाम

14 दिसंबर 1970 में बैंकाक में आयोजित छठे एशियन खेलों में कमलजीत संधू ने वो कर दिखाया जो आज तक किसी भारतीय महिला खिलाड़ी ने नहीं किया था। संधू ने 400 मीटर की दौड़ में गोल्ड मेडल अपने नाम किया। उस दिन ट्रैक पर कमलजीत संधू सबसे आगे थी। 200 मीटर तक दौड़ में वह अपनी लीड बनाए हुई थी लेकिन जल्द ही ताइवान की ची चेंग ने तेजी पकड़ी और वह संधू से आगे निकल गई। दौड़ पूरी होने के 50 मीटर पहले चेंग मांसपेशियों में दर्द की वजह से पीछे रह गई। संधू चेंग से केवल 10 मीटर पीछे थे। खेल में बदलाव होते हुए कमलजीत संधू दोबारा आगे निकल आई और उन्होंने 57.8 सेकेंड में यह दौड़ पूरी की। 

कोच के रूप में उन्होंने महिला एथलीटों की ट्रेनिंग को बदला। शॉर्ट कैंप को बदलकर लंबे कैंप आयोजित करने शुरू किए। उस समय किसी भी टूर्नामेंट में महिला खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद नहीं की जाती थी लेकिन संधू ने इस बात को गलत साबित करके दिखाया। बतौर कोच उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहीं।

बतौर कोच भी दिया योगदान

एशियाई खेलों में गोल्ड मेडल जीतने के अलावा संधू ने खेलों में कई सम्मान और उपलब्धियां अपने नाम किया। 1971 में, वह 400 मीटर की दौड़ इटली के त्युरीन में आयोजित विश्व विद्यालय खेलो फाइनलिस्ट में से एक बनी। 1971 में भारत सरकार ने उन्हें पदम श्री पुरस्कार से सम्मानित किया था। 1972 के म्यूनिख ओलंपिक में महिलाओं की 400 मीटर के दौड़ में भाग लिया। कमलजीत ने 1973 में एथलेक्टिस से सन्यास ले लिया था। 1975 में एनआईएस की तरफ से उन्हें कोचिंग करने का प्रस्ताव मिला और उसके बाद उनके खेल करियर की दूसरी पारी शुरू हुई। 1982 में एशियाई खेलों में भारतीय टीम को तैयार किया।

कमलजीत संधू ने खेलों में महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए विशेष तौर पर ध्यान दिया। कोच के रूप में उन्होंने महिला एथलीटों की ट्रेनिंग को बदला। शॉर्ट कैंप को बदलकर लंबे कैंप आयोजित करने शुरू किए। उस समय किसी भी टूर्नामेंट में महिला खिलाड़ियों से पदक की उम्मीद नहीं की जाती थी लेकिन संधू ने इस बात को गलत साबित करके दिखाया। बतौर कोच उनकी भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रहीं। 1982 के एशियाई खेलों में भारतीय महिला एथलीटों ने अच्छा प्रदर्शन किया। कमलजीत संधू ने खिलाड़ी से लेकर कोच के तौर पर भी भारत में खेलों में महिलाओं की भूमिका को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

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तस्वीर साभारः Hindustan Times

संदर्भ:

Wikipedia

Femina

SportStar

ESPN

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