महिलाओं की एकल जिम्मेदारी नहीं, सामूहिक योगदान से हो सकता है सही, सुरक्षित और आसान स्तनपान
तस्वीर साभार: First Cry Parenting
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हम सबने अपने जीवन में कभी न कभी बच्चों के जन्म के तुरंत बाद से ही स्तनपान करवाने की सलाह देने वाले विज्ञापन देखें हैं। लेकिन हमें शायद ही कोई विज्ञापन याद हो जहां स्तनपान के तरीके, कठिनाई या इससे जुड़ी महिलाओं के समस्याओं पर कोई सलाह दी गई हो। आम तौर पर समाज यह मानता है कि महिलाओं को बच्चे होते ही, स्तनपान करवाना प्राकृतिक रूप से आना चाहिए। साथ ही यह माना जाता है कि बच्चों को स्तनपान करवाने की ज़िम्मेदारी सिर्फ महिलाओं की होती है। बच्चे के स्वास्थ्य और जीवन को सुरक्षित रखने के लिए स्तनपान सबसे प्रभावी तरीकों में से एक है। लेकिन विभिन्न संस्थाएं और स्वास्थ्य विशेषज्ञ आज स्तनपान को सिर्फ माँओं की एकल ज़िम्मेदारी नहीं मान रहे। आज इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि स्वाभाविक रूप से स्तनपान में परिवार, समुदाय, स्वास्थ्य चिकित्सक, अस्पताल, महिलाओं के काम करने और सार्वजनिक जगह और सरकार के बनाए गए कानून की भी अहम भूमिका है।

भारतीय परिवेश में महिलाओं को सही तरीके से स्तनपान करवाने या उससे जुड़ी चुनौतियों से उबरने के लिए कोई विशेष जानकारी या सुझाव नहीं मिलते। बॉलीवुड या टेलीविज़न की दुनिया पर गौर करें, तो यह सिर्फ माँ बनने को किसी महिला की सबसे बड़ी उपलब्धि दिखाता है। लेकिन गर्भवती होने से माँ बनने तक के सफर में जिन चुनौतियों और स्वास्थ्य समस्याओं से महिलाओं को जूझना पड़ता है, उन्हें मुख्यधारा में कोई जगह नहीं मिलती। यह ज़रूरी है कि हम इस बात को माने और समझे कि भले ही बच्चों को जन्म के बाद से स्तनपान करवाना ज़रूरी हो, लेकिन सिर्फ माँ बनने से स्तनपान प्राकृतिक रूप से समझ आना सुनिश्चित नहीं होता। अनेक महिलाओं को यह पूरा प्रक्रिया आरमदायक और प्राकृतिक नहीं लगता। कई महिलाएं स्तनपान कराने में कठिनाई का अनुभव करती हैं। कभी-कभी इन कठिनाइयों के कारण उनका स्तनपान कराना समय से पहले बंद भी हो जाता है।

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क्यों स्तनपान की प्रक्रिया प्राकृतिक नहीं है

स्तनपान अपने बच्चे को दूध पिलाने का एकमात्र तरीका नहीं है। माँ बनी हर महिला की कहानी और तरीका अलग होता है। कुछ महिलाएं बच्चों को सिर्फ स्तनपान करवाती हैं जबकि कुछ ब्रेस्ट मिल्क पंप करती हैं। वहीं, कुछ महिलाएं बच्चों के लिए बने फार्मूला का इस्तेमाल करती हैं। इस पूरे सफर को कई माँएं आराम से तय कर लेती हैं, जबकि कइयों को परेशानियों का सामना करना पड़ता है। गर्भावस्था के दूसरे तिमाही से माँ का शरीर ‘कोलोस्ट्रम’ या ‘पहला दूध‘ तैयार करना शुरू कर देता है। कोलोस्ट्रम एक गाढ़ा, पोषक तत्वों से भरपूर पदार्थ है जो बच्चे को ‘मच्योर दूध’ बनने तक पोषण देने का काम करता है। अगर माँ बनने के बाद, कोई महिला अपने नवजात बच्चे को स्तनपान करवाने का फैसला करती है, तो पहले कुछ दिनों में बार-बार दूध पिलाना या पंप करना महत्वपूर्ण है। यह तब तक ज़रूरी है जब तक कि माँ का शरीर कोलोस्ट्रम के उत्पादन को ‘मच्योर दूध’ में बदलना शुरू नहीं करता।

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विभिन्न संस्थाएं और स्वास्थ्य विशेषज्ञ आज स्तनपान को सिर्फ माँओं की एकल ज़िम्मेदारी नहीं मान रहे। आज इस बात पर ज़ोर दिया जा रहा है कि स्वाभाविक रूप से स्तनपान में परिवार, समुदाय, स्वास्थ्य चिकित्सक, अस्पताल, महिलाओं के काम करने और सार्वजनिक जगह और सरकार के बनाए गए कानून की भी अहम भूमिका है।

यह आम तौर पर, बच्चे के जन्म के बाद, महिलाओं के शरीर में जबरदस्त हार्मोनल बदलाव के साथ तीन से सात दिनों के बाद होता है। इसलिए पहले कुछ दिनों में माँ चाहे बच्चे को दूध पिला रही हो या पंप का इस्तेमाल कर रही हो, दूध अधिक मात्रा में नहीं निकलता। इसलिए यह ज़रूरी नहीं कि बच्चे को जन्म देते से ही माँ स्तनपान के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तैयार होगी। भारतीय परिप्रेक्ष्य में बात करें तो सार्वजनिक या काम के जगहों में स्तनपान कराना लगभग वर्जित है। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में न सिर्फ बाहर बल्कि घरों में भी सबके सामने स्तनपान कराना आम नहीं है। ऐसे में पहले से ही हार्मोनल बदलाव से गुज़र रही महिलाओं के लिए स्तनपान और भी ज्यादा शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन सकता है। आज स्तनपान से जुड़े मिथकों और समस्याओं को दूर करने और स्तनपान को बढ़ावा देने के लिए हर साल 120 से भी अधिक देशों में 1 से 7 अगस्त तक के समय को विश्व स्तनपान सप्ताह के रूप में मनाया जाता है।

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स्तनपान से जुड़े मिथक इसे कठिन बनाते हैं

चूंकि स्तनपान को हमारा समाज प्राकृतिक मानता है, इसलिए आज भी लोग सही, सुनिश्चित और आरामदायक स्तनपान के लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह नहीं लेते। हमारे देश में आम तौर पर यह सोच काम करती है कि या तो यह पूरी प्रक्रिया महिला को खुद ही समझ आ जाएगी या इसके लिए बड़े-बुजुर्ग की सलाह और तजुर्बा ही काफी है। कई बार महिलाओं से यह उम्मीद कि उन्हें यह सब सामान्य रूप से आता होगा, उन्हें अपनी समस्याओं को खुलकर बताने से रोकता है। साथ ही, इससे जुड़े कई मिथक इसे और कठिन बना देती है। इसमें सबसे ज्यादा यह धारणा काम करती है कि स्तनपान आसान है और इसमें निपल्स में दर्द होना स्वाभाविक है।

गर्भवती होने से माँ बनने तक के सफर में जिन चुनौतियों और स्वास्थ्य समस्याओं से महिलाओं को जूझना पड़ता है, उन्हें मुख्यधारा में कोई जगह नहीं मिलती। यह ज़रूरी है कि हम इस बात को माने और समझे कि भले ही बच्चों को जन्म के बाद से स्तनपान कराना ज़रूरी हो, लेकिन सिर्फ माँ बनने से स्तनपान प्राकृतिक रूप से समझ आना सुनिश्चित नहीं होता।

स्तनपान से अलग-अलग समुदाय और संस्कृति के अनुसार मिथक जुड़े हुए हैं। स्तनपान से पहले निपल को धोने की ज़रूरत या यह धारणा कि कई माँएं पर्याप्त दूध नहीं बना पाती, इसे और भी कठिन बना देता है। यूनिसेफ के अनुसार ब्रेस्टमिल्क की मात्रा इस बात पर निर्भर है कि बच्चे को स्तन से कितनी अच्छी तरह लगाया जा रहा है, कितनी बार स्तनपान किया जा रहा है या हर स्तनपान के साथ बच्चा कितनी मात्रा में और कितनी अच्छी तरह दूध पी पा रहा है।

इसके अलावा, माँ के बीमार होने पर स्तनपान न कराने का प्रचलन, स्तनपान के दौरान माँ के स्वास्थ्य के लिए किसी भी प्रकार की दवाई लेने से मनाही जैसे मिथक खुद स्तनपान को ही माँओं के लिए समस्या बना देते हैं। कई भारतीय घरों में यह धारणा भी प्रचलित है कि नवजात बच्चों के लिए बना फार्मूला स्तनपान के दौरान इस्तेमाल नहीं करने चाहिए। कामकाजी या घरेलू दोनों ही माँओं को फार्मूला की ज़रूरत महसूस हो सकती है। आज बाज़ार में ऐसे फार्मूला मौजूद हैं, जो बिल्कुल हानिकारक नहीं होते। कई बार यह माना जाता है कि कसरत माँ के दूध के स्वाद को प्रभावित करता है। यूनिसेफ बताता है कि व्यायाम स्तनपान करवाने वाली मांओं के लिए भी लाभदायक है।

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भारतीय घरों में अक्सर यह धारणा की जाती है कि स्तनपान करवाने वाली माँओं को सादा भोजन ही खाना चाहिए। इस मिथक के विपरीत स्वास्थ्य विशेषज्ञ बताते हैं कि हर किसी की तरह, स्तनपान कराने वाली माँओं को भी संतुलित आहार खाने की जरूरत होती है। सामान्य तौर पर, भोजन की आदतों को बदलने की कोई आवश्यकता नहीं होती। यूनिसेफ के 123 देशों के आंकड़ों के मुताबिक यह पता चलता है कि दुनिया भर में लगभग 95 प्रतिशत बच्चों को अपने जीवन में कभी न कभी स्तनपान कराया जाता है। हालांकि यह इन दरों में निम्न और मध्यम आय और उच्च आय वाले देशों के लिए बीच बहुत ज्यादा अंतर है।

जहां निम्न और मध्यम आय वाले देशों में केवल 4 प्रतिशत यानि हर 25 में से 1 बच्चे को कभी भी स्तनपान नहीं कराया जाता है। वहीं ऊँचे आय वाले देशों में यह 21 प्रतिशत यानि 5 में से 1 से अधिक बच्चे को कभी भी मां का दूध नहीं मिलता है। इंटरनेशनल ब्रेस्टफीडिंग जर्नल ने स्तनपान करा रही महिलाओं पर एक अध्ययन जारी किया। इसमें स्तनपान के दौरान महिलाओं के समस्याओं में निपल या स्तनों में दर्द, कम दूध की आपूर्ति और स्तनपान कराने में कठिनाई तीन सबसे प्रमुख समस्याएं पाई गई। डिजिटल रिपॉजिटरी पबमेड सेंट्रल में दिए गए एक शोध अनुसार 40 प्रतिशत मांओं ने स्तनपान के शुरुआती दौर में समस्याओं का सामना किया। यह समस्याएं मूल रूप से स्वास्थ्य कर्मचारी या चिकित्सकों के सलाह या देखभाल में कमी से जुड़ी थीं।

क्यों स्तनपान महिलाओं की एकल ज़िम्मेदारी नहीं है

स्तनपान की प्रक्रिया आरामदायक और लम्बा हो, इसके लिए माँ के अलावा परिवार, समुदाय, स्वास्थ्य चिकित्सक, अस्पताल, महिलाओं के काम करने की जगह, सार्वजनिक जगह और सरकार के बनाए गए कानून और नियमों को भी सहायक के रूप में काम करना होगा। यह सामान्य है कि माँ बनने के बाद स्तनपान करवाना न आ रहा हो। ऐसे में किसी घरेलू नुस्खे की नहीं बल्कि स्वास्थ्य सलाहकार या चिकित्सक की ज़रूरत होती है। आम तौर सबसे पहले स्तनपान कराने का सही तरीका अस्पताल के नर्स या पैरामेडिकल कर्मचारी दे सकते हैं। बच्चे के होने के बाद महिलाओं के शरीर को भी आराम और भरण-पोषण की ज़रूरत होती है। किसी नवजात बच्चे की देखभाल थका देने वाला काम होता है। पितृसत्तात्मक समाज किसी महिला को सबके सामने आराम से स्तनपान कराने की इजाज़त नहीं देता। यह हो सकता है कि माँ अपने बच्चे की खुराक पूरी करने में ज्यादा से ज्यादा समय अकेले बिता रही हो।

ऐसे में स्तनपान करा रही माँ पोस्टपार्टम डिप्रेशन या अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं से ग्रसित हो सकती है। इसलिए यह परिवार की ज़िम्मेदारी है कि वे स्तनपान को किसी भी अन्य दैनिक कामों की तरह देखें जहां सभी का योगदान हो। ज़रूरी है कि माँ को सभी के साथ बैठकर स्तनपान करा पाने की छूट हो या साथ बैठे बच्चों या दूसरे पुरुष सदस्यों से झिझक न हो। अक्सर, स्तनपान कराने के लिए सार्वजनिक जगहों जैसे ट्रेन, पार्क या होटल में कोई अलग जगह नहीं होती। इस तरह न सिर्फ हम माँ बनी महिला को दोबारा सामान्य जीवन जीने से रोकते हैं बल्कि खुले में स्तनपान कराने पर उसकी निंदा कर उसे दोषी भी महसूस करवाते हैं। यह महत्वपूर्ण है कि हम महिलाओं को कामकाजी या सार्वजनिक जगह पर न सिर्फ स्तनपान कराने की सुविधाएं दें, बल्कि एक ऐसा माहौल दे जहाँ उन्हें इसमें संकोच न हो।

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कामकाजी महिलाओं का स्तनपान करवाने की चुनौतियाँ

भारत में आम तौर पर माँ बनने के बाद किसी भी महिला का दोबारा काम पर लौटना या जल्दी लौटना बहुत मुश्किल होता है। भारत में स्तनपान आम तौर पर सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक कारकों से भी प्रभावित होता है। कई महिलाएं अपनी समस्याओं को खुले तौर पर साझा करने में झिझकती हैं और कामकाजी जीवन और स्तनपान के बीच चयन तालमेल बैठाना उनके लिए चुनौतीपूर्ण साबित होता है। हालाँकि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 42 और मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत कामकाजी मांओं के लिए काम पर स्तनपान से संबंधित कुछ भारतीय कानून और नीतियां मौजूद हैं।

लेकिन हमारे देश में ऐसे कानून को लेकर नियोक्ता और कर्मचारी दोनों में जागरूकता की कमी है। मातृत्व लाभ अधिनियम में नियोक्ताओं को नवजात बच्चों के लिए स्तनपान या ब्रेस्टमिल्क के लिए नई मांओं को निर्धारित समय का नर्सिंग ब्रेक देने का प्रावधान है। ये नर्सिंग ब्रेक पूरी तरह से भुगतान किए जाते हैं और बच्चे के 15 महीने की उम्र तक दिए जा सकते हैं। इसी तरह अधिनियम के अनुसार मांओं के लिए क्रेश की सुविधा का भी प्रावधान है जहाँ महिला कार्यकर्ता को दिन चार बार क्रेश में जाने की अनुमति दी जाएगी। लेकिन भारत की अधिकतर कंपनियों में आज भी ऐसी सुविधाएं मौजूद नहीं है। वहीं आम तौर पर महिलाओं के गर्भवती होते ही, उनके समकक्षों को नौकरी दे दी जाती है ताकि मैटरनिटी लीव या बच्चे के बाद नर्सिंग के समय का खर्च कंपनी को व्यय न करना पड़े।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ ने स्तनपान के लिए राजनीतिक, कानूनी, वित्तीय और सार्वजनिक समर्थन जुटाने के लिए ग्लोबल ब्रेस्टफीडिंग कलेक्टिव का निर्माण किया है। यह कलेक्टिव इस मामले पर अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, दानदाताओं और नागरिक समाज के कार्यकर्ताओं को एकजुट करने का काम करता है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार अगर 0-23 महीने के सभी बच्चों को बेहतर तरीके से स्तनपान कराया जाए, तो हर साल 8,20,000 से भी अधिक 5 साल से कम उम्र के बच्चों की जान बचाई जा सकती है। बात भारत की करें, तो राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के साल 2015-16 के आंकड़े बताते हैं कि छह महीने से कम उम्र के बच्चों में केवल स्तनपान कराने का दर 65 प्रतिशत था।

वहीं, इस में सुधार हो कर साल 2019-21 के एनऍफ़एचएस- 5 में यह 76 प्रतिशत पाया गया। वहीं टाइम्स ऑफ़ इंडिया में छपी एक खबर बताती है कि 83 फीसद भारतीय मांओं को स्तनपान से जुड़े समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस खबर के अनुसार हालाँकि महिलाएं स्तनपान में चुनौती का सामना करती हैं, लेकिन वे स्वास्थ्य कर्मचारी या चिकित्सक की सलाह नहीं लेती। साफ़ तौर पर भारत में स्तनपान को लेकर रूढ़ि, झिझक और दकियानूसी सोच ख़त्म नहीं हुई है। इसलिए ज़रूरी है कि हम स्तनपान को महिलाओं की एकल जिम्मेदारी नहीं बल्कि सामुदायिक जिम्मेदारी माने और अपनी-अपनी भूमिका निभाएं।

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तस्वीर साभार: First Cry Parenting

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