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मानव प्रजनन को विभिन्न तरीकों से अपनी इच्छा से सीमित करने की योजना में गर्भनिरोधक, गर्भसमापन और नसबंदी जैसे तरीकों का इस्तेमाल कर बच्चों में अंतराल या परिवार में बच्चों की संख्या को नियंत्रित करना शामिल है। आज चिकित्सा के क्षेत्र में गर्भनिरोधक उपायों के लिए अलग-अलग दवाएं और प्रक्रियाएं मौजूद हैं। लेकिन जहां महिलाओं के गर्भनिरोध के लिए विभिन्न तरीकों का आविष्कार हुआ, वहीं पुरुषों के लिए ये विकल्प सिर्फ कंडोम और नसबंदी तक ही सीमित हो गए। हालांकि साल 1952 में भारत राष्ट्रव्यापी परिवार नियोजन कार्यक्रम (एनएफडब्ल्यूपी) शुरू करने वाला पहला देश था, लेकिन इसमें महिलाओं की भूमिका और उनके प्रजनन पर नियंत्रण के मानविक, लोकतांत्रिक और प्रजनन अधिकार की बात नहीं हो रही थी।

परिवार नियोजन कार्यक्रम के शुरुआती दौर में इसका मुख्य उद्देश्य जन्मसंख्या नियंत्रण था लेकिन बाद में मां और बच्चे के स्वास्थ्य, पोषण और परिवार कल्याण को भी इसमें शामिल किया गया। आज के दौर के परिवार नियोजन के विज्ञापनों को देखें तो, महिलाओं को न केवल परिवार नियोजन का दायित्व निभाते दिखाया जाता है, बल्कि इसकी पूरी ज़िम्मेदारी भी उनकी ही बताई जाती है। एक ओर कंडोम के इस्तेमाल से पुरुषों के यौन जीवन की संतुष्टि में कोई कमी न होना कंडोम कंपनियों का मूल बन चुका है, तो वहीं दूसरी ओर महिलाओं की संतुष्टि या स्वास्थ्य की बात को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया जाता है।  

गर्भनिरोध का इतिहास 

गर्भनिरोधक के इतिहास और उसके विकास पर नजर डाले तो ईसा पूर्व मिश्र, प्राचीन ग्रीस और यूरोप से लेकर भारत तक परिवार नियोजन के वर्णन दस्तावेजों में पाए जाते हैं। लेकिन जहां अधिकतर जगहों में पुरुषों के लिए गर्भनिरोधक उपायों में कोयटस इंट्रप्टस यानि इजाकुलेशन से पहले पुल-आउट की प्रक्रिया का ज़िक्र है, वहीं, महिलाओं के लिए यह अलग-अलग तरह की जड़ी-बूटी, पेड़ के डंठल आदि के इस्तेमाल को दर्शाया गया है। 19वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रांति, संचार के आधुनिक तरीकों का आना, दुनियाभर में पश्चिमी प्रभाव का विस्तार, वैज्ञानिक विकास, सार्वजनिक स्वास्थ्य, रोग निवारक और उपचार के लिए चिकित्सा की सफल शुरुआत हुई। हालांकि, गर्भनिरोधक विधियों का इस्तेमाल प्राचीन काल से किया जा रहा था लेकिन प्रभावी और सुरक्षित तरीके बीसवीं शताब्दी में उपलब्ध हुए।

भारत में आधुनिक गर्भनिरोधक के इस्तेमाल से लेकर इसकी लोकप्रियता देश की सामाजिक और राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़े रहे हैं। साथ ही परिवार नियोजन और गर्भनिरोधकों को हमेशा गरीबी और जनसंख्या नियंत्रण से जोड़कर देखा गया है। इसके अलावा, हमारे पितृसत्तात्मक समाज में गर्भनिरोधक को महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके प्रजनन अधिकार से कम और पितृसत्तात्मक विचारों से अधिक जोड़कर देखा जाता है।

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साल 1893 में गर्भनिरोधक पर अभूतपूर्व काम कर रहीं ब्रिटिश समाजवादी, थियोसोफिस्ट और महिला अधिकार कार्यकर्ता एनी बेसेंट भारत आईं पर ब्रिटिश सरकार के अधीन भारत की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति में उन्हें इस दिशा में सफलता नहीं मिली। इकॉनकिम टाइम्स में छपे एक लेख के अनुसार इसके बाद अमेरीका में इसी विषय पर काम कर रही मार्गरेट सेंगर जब साल 1935 में भारत आई, तो उन्हें महात्मा गांधी से इस विषय पर सहयोग और समर्थन नहीं मिला। चूंकि महात्मा गांधी अप्राकृतिक तरीके से गर्भनिरोध के खिलाफ थे, उन्होंने सेंगर का समर्थन नहीं किया। स्वतंत्रता के चार साल बाद, साल 1951 के दौरान भारत जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन के लिए एक महत्वपूर्ण कदम लेने वाला था। भारत में तब तक आधुनिक गर्भनिरोधक उपाय जैसे कंडोम या नसबंदी की शुरुआत हो चुकी थी।

मेडिकल जर्नल द लैनसेट में छपे एक लेख में नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर हेल्थ एंड सोशल जस्टिस के निदेशक और वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के वैश्विक स्वास्थ्य विभाग के क्लीनिकल सहायक प्रोफेसर अभिजीत दास के अनुसार ‘सरकारी एजेंसियों का मानना ​​है कि महिलाएं ‘गैर-जिम्मेदार प्रजनक’ हैं और इसलिए उन्हें गर्भनिरोधक के स्थायी तरीकों को अपनाने के लिए प्रोत्साहन के रूप में मुआवज़ा प्रदान करती है। हालांकि, जनसांख्यिकीय सर्वेक्षण बताते हैं कि महिलाएं कम बच्चे चाहती हैं। लेकिन उनके पास उपयुक्त जानकारी या गर्भनिरोधक विधियों तक पहुंच नहीं है।’ इमरजेंसी के दौरान राजनीतिक कारणों से शुरू हुई पुरुष नसबंदी का फोकस आज शिफ्ट होकर महिलाओं के गर्भनिरोध पर इस दक़ियानूसी और रूढ़िवादी दलील के आधार पर हुआ। भारत में गर्भनिरोध को पूरी तरह से महिलाओं से जोड़ने के पीछे महिला नीति निर्माताओं या कार्यकर्ताओं की कमी और पितृसत्तात्मक सामाजिक मानदंड भी एक अहम कारण रहा है।

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हमारे पितृसत्तात्मक समाज में गर्भनिरोधक को महिलाओं के स्वास्थ्य और उनके प्रजनन अधिकार से कम और पितृसत्तात्मक विचारों से अधिक जोड़कर देखा जाता है।  

गर्भनिरोध और पितृसत्ता

भारत में परिवार नियोजन कार्यक्रम का लंबा और जटिल इतिहास रहा है। एनएफडब्ल्यूपी की शुरुआत से आज तक इसमें वित्तीय निवेश, लोगों तक इसकी पहुंच, सेवाओं की गुणवत्ता और प्रस्तावित गर्भनिरोधक तरीकों के मामले में महत्वपूर्ण विकास हुआ है। सालों से इस कार्यक्रम ने अलग-अलग दृष्टिकोण अपनाया है। लेकिन पचास साल बाद भी परिवार नियोजन कार्यक्रम न तो लैंगिक समानता हासिल कर पाई है न ही इसकी पहुंच और प्रभाव समान है। देश में परिवार नियोजन की शुरुवात मुख्य रूप से लोगों की अपनी प्रजनन क्षमता पर नियंत्रण करने का एक स्वतंत्र विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि देश की प्रजनन दर को नियंत्रित और प्रबंधित करने के लिए अभिजात वर्ग द्वारा मूल मंत्र के रूप में हुई थी।

भारत में गर्भनिरोधक के इस्तेमाल और लोकप्रियता को मद्देनजर रखें तो औपनिवेशिक काल से ही इसने भारतीय महिलाओं को मुक्त करने के बजाय प्रजनन अधिकारों को बाधित किया है। आज पितृसत्तात्मक सामाजिक मान्यताओं और लैंगिक असमानता के कारण पुरुषों की नसबंदी जैसे उपायों का इस्तेमाल बहुत कम हो रहा है। इस विषय पर मुंबई की स्त्री और प्रसूतिविशेषज्ञ डॉ सुचित्रा डालवी बताती हैं, ‘पुरुषों की तुलना में महिलाओं के लिए विभिन्न प्रकार के गर्भनिरोधक उपायों के विकास के पीछे चिकित्सकीय से ज्यादा राजनीतिक पृष्ठभूमि और पितृसत्तात्मक विचारधारा जिम्मेदार रही है। जबकि पुरुष नसबंदी का प्रक्रिया अधिक सुरक्षित और कम खर्चीला होता है, लेकिन भारत में महिलाओं के नसबंदी पर ज़ोर दिया जाता रहा है।’

डॉ. डालवी बताती हैं कि महिलाओं की नसबंदी की प्रक्रिया में अधिक खतरा और समय के अलावा उनके पूरी तरह स्वस्थ होने में भी पुरुषों की तुलना में अधिक समय लगता है, सरकार पुरुषों को दस गुना तक अधिक आर्थिक प्रोत्साहन देती है। साफ तौर पर गर्भनिरोधक के मामले में पितृसत्तात्मक नजरिया काम करता है। 

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पितृसत्तात्मक दायरे में चिकित्सा की दुनिया ने पुरुषों के लिए सिर्फ कंडोम और नसबंदी ही दिया है जबकि महिलाओं के लिए यह कंडोम, गर्भनिरोधक गोली, अंतर्गर्भाशयी डिवाइस (आईयूडी), गर्भनिरोधक प्रत्यारोपण, गर्भनिरोधक इंजेक्शन, आपातकालीन गर्भनिरोधक गोली, गर्भनिरोधक रिंग और डायाफ्राम के रूप में उपलब्ध है। द इंडियन एक्सप्रेस में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के रिपोर्ट के आधार पर छपा एक लेख बताता है कि साल 2017-18 में भारत में 93.1 फीसद नसबंदी महिलाओं पर की गई थी। इससे पहले खराब प्रबंधन के कारण साल 2010 से साल 2013 के बीच नसबंदी शिविरों में सर्जरी के दौरान या बाद में 363 महिलाओं की मौत की खबर सामने आई थी। ऐसी खबरों ने सुप्रीम कोर्ट को सामूहिक नसबंदी शिविर पर रोक लगाने पर बाध्य कर दिया था।

गर्भनिरोधक और महिलाएं

महिलाओं में गर्भनिरोधक को लेकर जागरूकता और इस्तेमाल को लेकर डॉ डाल्वी बताती हैं, ‘कई बार सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तबकों में अधिक संख्या में बच्चे होने का कारण सिर्फ जागरूकता या संसाधनों की कमी नहीं होती। अक्सर ये बच्चे अपने मां-बाप के काम में हाथ बटाते हैं जिससे उन्हें मदद मिलती है।’ वह आगे बताती हैं कि महिलाओं की नसबंदी की प्रक्रिया में अधिक खतरा और समय के अलावा उनके पूरी तरह स्वस्थ होने में भी पुरुषों की तुलना में अधिक समय लगता है, सरकार पुरुषों को दस गुना तक अधिक आर्थिक प्रोत्साहन देती है। साफतौर पर गर्भनिरोधक के मामले में पितृसत्तात्मक नजरिया काम करता है। 

भारत में महिलाओं को जन्म नियंत्रण के सभी विकल्पों में नसबंदी के लिए प्रोत्साहित किए जाने की वजह भी सामाजिक रूढ़िवाद रहा है। आज भी समाज शादी से पहले लड़कियों द्वारा आसान गर्भनिरोधक विकल्पों के प्रयोग या गर्भसमापन को हीन नजरों से देखता है। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में शादी का मूल उद्देश्य ही संतान प्राप्ति होता है। समाज में महिलाओं के यौन जीवन या उनकी यौन इच्छाओं और स्वतंत्रता पर बात बात करना वर्जित है। वहीं, भारतीय पुरुषों का नसबंदी या कंडोम से परहेज होने के कारण गर्भनिरोधन का पूरा भार महिलाओं पर आ जाता है। चूंकि गर्भधारण के दौरान पुरुषों में कोई जैविक, शारीरिक या भावनात्मक बदलाव नहीं होते, महिलाओं पर दोहरी ज़िम्मेदारी आ जाती है। डॉ डाल्वी बताती हैं कि जैविक रूप से महिलाएं महीने में सिर्फ एक बार ही ओव्यूलेट कर सकती हैं। जबकि पुरुष हर दिन किसी महिला को गर्भवती करने में सक्षम होते हैं। ऐसी स्थिति में पुरुषों की गर्भनिरोध में भूमिका कहीं अधिक होनी चाहिए। परिवार नियोजन एक बुनियादी मानवाधिकार है। इसलिए महिलाओं के यौन और प्रजनन अधिकार के लिए यह ज़रूरी है कि पुरुषों की इसमें समान भूमिका तय की जाए और परिवार नियोजन के लिए उन्हें भी उतना ही उत्तरदायी माना जाए।

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तस्वीर साभार : IPPF

कोलकाता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से हिंदी में बी ए और पंजाब टेक्निकल यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद बतौर पत्रकार और शिक्षिका मैंने लम्बे समय तक काम किया है। बिहार और बंगाल के विभिन्न क्षेत्र में पले-बढ़े होने के कारण सामाजिक रूढ़िवाद, धार्मिक कट्टरपन्त, अंधविश्वास, लैंगिक और शैक्षिक असमानता जैसे कई मुद्दों को बारीकी से जान पायी हूँ। समावेशी नारीवादी विचारधारा की समर्थक, लैंगिक एवं शैक्षिक समानता ऐसे मुद्दें हैं जिनके लिए मैं निरंतर प्रयासरत हूँ।

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