नारीवाद लॉकडाउन ने कैसे विकसित किया मेरा नारीवादी दृष्टिकोण

लॉकडाउन ने कैसे विकसित किया मेरा नारीवादी दृष्टिकोण

"अब तक मेरे व्यक्तित्व को पितृसत्ता की बेड़ियों ने इस प्रकार जकड़ा था कि उससे खुद को मुक्त करा पाना मेरे लिए कठिन कार्य था। अब मैं न केवल अपने साथ बल्कि अपने आसपास औरतों के साथ होनेवाले अत्याचार, मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न को ठीक तरह से समझ पा रही थी।"

‘फेमिनिज़म’, अपने कॉलेज के दिनों में बहुत बार सुना था मैंने यह शब्द। उस समय न तो मैं इसका मतलब जानती थी और न ही इसकी प्रकृति और दृष्टिकोण से परिचित थी। लेकिन कहते हैं न समय सब समझा देता है। नारीवाद को लेकर मेरा दृष्टिकोण गढ़ने और उसे विकसित करने में समय का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। कोविड-19 ‘लॉकडाउन’ यह एक ऐसा समय था जब दुनिया के अन्य लोगों की तरह मैं भी घर के किसी कोने में निराश, हताश और अपने ही परिवारवालों के पक्षपातपूर्ण व्यवहार से प्रभावित, उनसे दूर भागने और बातचीत न करने का हर संभव प्रयास कर रही थी। अपने ही घर में, अपनों के बीच मैं खुद को एक बंदी की तरह बेड़ियों में जकड़ा हुआ महसूस कर रही थी।

लॉकडाउन के शुरुआती दिन तो ठीक से निकल गए। लेकिन जैसे-जैसे दिन बीतते गए वैसे-वैसे वे मेरे लिए और मुश्किल होते गए। मेरे परिवार के सदस्य ही मुझे शत्रु के समान लगने लगे, जो हाथ में तलवार लिए हर घड़ी मुझ पर अंधाधुंध वार करने के लिए तैयार रहते। उनका सामना कैसे करना है मैं नहीं जानती थी, क्योंकि ये शत्रु मेरे अपने ही थे। मैं पहली बार खुद को इतना असहाय महसूस कर रही थी। अपनों के साथ होते हुए भी एकदम अकेली।

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“अब तक मेरे व्यक्तित्व को पितृसत्ता की बेड़ियों ने इस प्रकार जकड़ा था कि उससे खुद को मुक्त करा पाना मेरे लिए कठिन कार्य था। अब मैं न केवल अपने साथ बल्कि अपने आसपास औरतों के साथ होनेवाले अत्याचार, मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न को ठीक तरह से समझ पा रही थी।”

पहली बार मेरे क़दमों तले ज़मीन तब खिसकी जब मैंने अपने पिता को अपनी माँ पर चिल्लाते देखा। मेरे मन को सबसे ज्यादा धक्का तब लगा जब मैंने अपने ही घर की औरतों को इसका समर्थन करते देखा। उस समय मैं उन औरतों की गिनती समाज की उस श्रेणी में करने लगी जो खुद औरत होकर दूसरी औरत का शोषण करती हैं। उस समय मैं, “एक औरत ही औरत की सबसे बड़ी दुश्मन होती है”, जैसी व्यर्थ की धारणाओं में विश्वास करने लगी थी, लेकिन बाद में नारीवाद को लेकर जब थोड़ी-बहुत समझ विकसित हुई तब महसूस हुआ कि एक औरत तो दूसरी औरत की सबसे आत्मीय मित्र होती है फिर वह सबसे बड़ी दुश्मन कैसे हो सकती है! तब समझ आया यह सब सदियों से हो रहे पितृसत्तात्मक शोषण का नतीजा है।

लॉकडाउन में मैंने अपने पिता और भाई के माध्यम से पितृसत्तात्मक समाज का असली रूप देखा। माँ के बाद मेरे पिता और भाई का अगला वार मुझ पर ही था। लेकिन मैंने मन बना लिया था, मैं माँ की तरह चुप नहीं रहूंगी। माँ ने बचपन से चुप रहना ही सिखाया था। उनका कहना था कि औरतों के चुप रहने से उनकी लाज और मर्यादा बनी रहती है। वह कहती हैं कि ऊंचा बोलने से या ज़ुबान खोलने से औरतों को न घर में सम्मान मिलता है न बाहर। आवाज़ उठाने से उनके चरित्र पर दाग़ लग जाता है। ऐसी औरतें हमारे समाज में सम्मान के योग्य नहीं मानी जाती। इन औरतों को समाज के किनारे पर धकेल दिया जाता है।

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कॉलेज जाने या यूं कहूं कि घर की दहलीज़ लांघने के बाद मेरी दुनिया बिल्कुल बदल गई थी। मैंने गलत के ख़िलाफ़ बोलना सीख लिया था। इसी कारण न तो मैं अपने पिता के अन्यायपूर्ण बर्ताव को सह पाई और न ही अपने भाई के दुर्व्यवहारों को बर्दाश्त कर सकी। मैंने इनके दुर्व्यवहारों का जवाब, बिना इसकी परवाह किए कि इसका परिणाम क्या होगा, उसी तेज़ी से दिया जितनी तीव्रता से इन्होंने मेरा मानसिक और भावनात्मक उत्पीड़न किया। इन हिंसात्मक व्यवहारों को मैं आत्मसात नहीं कर पाई। मुझे अपने ही लोगों से घृणा हो रही थी।

अगले ही पल मेरे दिल और दिमाग़ में इन घटनाओं का द्वन्द शुरू हो गया। मैं इस द्वन्द से पार पाने के लिए कुछ ऐसी औरतों से मिली जिन्होंने मुझे नारीवाद का सही अर्थ समझाया। वहीं, से नारीवाद के प्रति मेरा एक स्वस्थ दृष्टिकोण विकसित हुआ। वहीं से मैंने पितृसत्ता की जंजीरों को तोड़ नारीवाद को समझने की राह पर तेज़ी से अपने कदम आगे बढ़ाए। अब तक मेरे व्यक्तित्व को पितृसत्ता की बेड़ियों ने इस प्रकार जकड़ा था कि उससे खुद को मुक्त करा पाना मेरे लिए कठिन कार्य था। अब मैं न केवल अपने साथ बल्कि अपने आसपास औरतों के साथ होनेवाले अत्याचार, मानसिक और सामाजिक उत्पीड़न को ठीक तरह से समझ पा रही थी। तथाकथित सामाजिक ढांचे के ढकोसले में फंसकर जिन व्यवहारों को मैं अब तक स्वाभाविक समझती आ रही थी वही घटनाएं एकदम से मुझे असामाजिक लगने लगीं।

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“लॉकडाउन एक तरह से मेरे लिए खुद को समझने, समाज और अपनों को जानने का एक नया दृष्टिकोण देकर गया। इसने मुझे मेरी ज़िन्दगी का सबसे जरूरी सबक सिखाया और समाज को देखने के लिए एक नयी दृष्टि दी।”

लॉकडाउन के उस छोटे से समय अंतराल में मेरे साथ ऐसी अनेक घटनाएं घटीं जिससे मैं नारी मन को समझने के लिए बेचैन हो उठी और उसके ह्रदय को और गहराई से पढ़ने के लिए उत्सुक। मैंने खुद को समझा, अपना एक नया और सुदृढ़ व्यक्तित्व गढ़ा। नारीवाद से ज्यादा मैंने पितृसत्ता द्वारा रचे चक्रव्यूह को समझने का प्रयास किया। मैंने यह जाना कि पुरुष का औरत पर चिल्लाना, उसके साथ हिंसात्मक दुर्व्यवहार करना, उसको शारीरिक या मानसिक रूप से प्रताड़ित करना कभी भी उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। पुरुष हमेशा से इन सब चीज़ों को अपना अधिकार मानने के भ्रम में जी रहा है। वह इन्हें अपना अधिकार मानने की भूल इसलिए करता है क्योंकि उसे लगता है कि औरत शारीरिक, मानसिक और आर्थिक रूप से उस पर निर्भर है। वह कमा कर लता है और उसका पेट भरता है अर्थात उसका अन्नदाता है इसलिए उसके साथ हिंसात्मक दुर्व्यवहार करना उसका हक़ है।

लॉकडाउन एक तरह से मेरे लिए खुद को समझने, समाज और अपनों को जानने का एक नया दृष्टिकोण देकर गया। इसने मुझे मेरी ज़िन्दगी का सबसे जरूरी सबक सिखाया और समाज को देखने के लिए एक नयी दृष्टि दी। इस प्रकार ‘औरत क्या है?’,’एक नारी का मन क्या सोचता है?’ और ‘एक स्त्री क्या चाहती है?’,जैसे प्रश्न मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो गए। इसलिए कह सकते हैं कि लॉकडाउन मेरे व्यक्तित्व को और अधिक सुंदर, सुदृढ़ और सरल बनाकर गया।

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तस्वीर साभार : The Human Rights Watch

About the author(s)

Renu Kumari

Passionate explorer of social development. Master's candidate at Hindu college, University of Delhi. Vice president at Hindi Sahitya Sabha, Department of Hindi, Hindu College. Worked at VIDYA, a teaching NGO under the National Service Scheme of LSR. Worked with SCHOLASTIC INDIA. Translated various books of Scholastic from English to Hindi. Former Hindi language Editor at LSR College magazine. Former president of Editorial Team, Department of Hindi, LSR.

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