घरेलू हिंसा ‘घर की बात’ नहीं है
तस्वीर साभार: Huffpost
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सेवापुरी ब्लॉक के एक गाँव में रहनेवाली राखी (बदला हुआ नाम) चाहती हैं कि उनके साथ होनेवाली घरेलू हिंसा की कहानी लोगों को पता चले। लेकिन उन्हें इस बात का भी डर है कि अगर गलती से भी उनका या उनके गाँव के नाम का ज़िक्र होता है तो इससे उनकी परेशानी और बढ़ जाएगी। राखी की शादी अट्ठारह साल में ही कर दी गई थी। शराबी पति के साथ आए दिन मारपीट होना उसकी ज़िंदगी की आम बात हो चुकी थी। बीस साल की उम्र में उसने अपनी बेटी को जन्म दिया, जिसके बाद पति की हिंसा और भी बढ़ती गई।

रक्षाबंधन के दिन जब राखी ने मायके जाने की बात की तो उसके पति ने उसे इतना मारा कि वह अधमरी हो गई। मायके वालों को पता लगते ही वे उसे अस्पताल लेकर गए और थाने में शिकायत के लिए पहुंचे। वहां पुलिस वालों ने समझा-बुझाकर मामले को रफ़ा-दफ़ा कर दिया। राखी पर भी परिवारवालों ने दबाव देना शुरू किया कि उसने बेटी को जन्म दिया है, इसलिए उसको ससुराल में रहना चाहिए वरना गरीब पिता उसका भरण-पोषण नहीं कर पाएंगें। ससुराल वापस ले जाने के लिए उसके पति ने ये शर्त रखी कि वह मोबाइल फ़ोन नहीं रखेगी, सारी शर्त मानकर राखी अब अपनी बेटी के साथ ससुराल में है और हर दिन शारीरिक और यौन हिंसा का सामना करती है। राखी के कई बार संस्थाओं ने मदद करने की कोशिश की लेकिन पारिवारिक और सामाजिक दबाव के चलते ये संभव नहीं हो पाया। राखी का मामला थाने तक पहुंचा पर वो कहीं दर्ज़ नहीं हुआ। इसे थाने की शिकायत वाली कॉपी से दूर बाहर ही रफ़ा-दफ़ा कर दिया गया, जैसा कि ज़्यादातर घरेलू हिंसा के मामले में किया जाता है।

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ग्रामीण क्षेत्रों में घरेलू हिंसा की समस्या आम होती जा रही है। जैसे-जैसे वक्त बदल रहा है, वैसे-वैसे लोगों के रहन-सहन में बदलाव हो रहा है पर परिवार में महिलाओं की स्थिति में कोई ख़ास बदलाव देखने को नहीं मिल रहा है। मैंने खुद भी बचपन से अपने परिवार और आसपास में महिलाओं के साथ हिंसा होते देखा है। कभी महिलाओं के साथ मारपीट करना, गाली-गलौच करना या कई बार उन्हें कोई खर्च न देने जैसी बातें मानो रोज़ की ज़िंदगी जैसी थी। हमें लगता था कि ये सिर्फ़ मेरे आसपास तक की जगहों तक सीमित है। लेकिन आज जब मैं खुद अलग-अलग गाँव में जाकर महिलाओं और किशोरियों के साथ बैठक करती हूं तो पता चलता है कि ये ऐसी समस्या है जिसका सामना क़रीब हर औरत को कभी न कभी ज़रूर करना पड़ता है।

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सालों से हम लोगों की दादी-नानी और न जाने कितनी पुश्तों ने ये सब देखा-सुना अनुभव किया है कि कहीं न कहीं जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा अब हमलोगों के परिवारों का हिस्सा जैसा बन गया है। यही वजह है कि महिलाओं की कंडीशनिंग ही घरेलू हिंसा के साथ जीने वाली की जाती है। इस बात का अंदाज़ा, गाँव में घरेलू हिंसा के मुद्दे पर एक बैठक के दौरान महिलाओं की इन बातों से लगाया जा सकता है, “आदमी है, कभी-कभी ग़ुस्सा जाते हैं और हाथ उठा देते हैं। अब परिवार में चार लोग रहेंगे तो ये सब तो चलता ही रहता है। औरतों को भी थोड़ा सहकर रहना चाहिए।” खरगूपुर गाँव की रहनेवाली सुनीता देवी ने ये बात घरेलू हिंसा के मुद्दे पर हो रही चर्चा में कहा। तभी इसका ज़वाब देते हुए तीस वर्षीय बबिता ने कहा, “ग़ुस्सा हम महिलाओं को भी आता है पर हम लोग तो कभी हाथ नहीं उठाते। ग़ुस्सा या पुरुष होना ये सब सिर्फ़ बहानेबाज़ी है।”

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हाल ही में घरेलू हिंसा को लेकर नैशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS- 5) की रिपोर्ट जारी की गई है। इस रिपोर्ट में देशभर में महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा की घटनाओं के बारे में आंकड़े दिए गए हैं। इसमें ये बताया कि देश में क़रीब एक तिहाई महिलाओं को घरेलू हिंसा का सामना करना पड़ता है, जिसमें शारीरिक हिंसा के साथ-साथ यौन हिंसा भी शामिल है। यूं तो पिछली रिपोर्ट में घरेलू हिंसा के मामले का स्तर 31.2% था जो अब घटकर 29.3% हो गया है।

अब सवाल ये भी है कि ये कोई बहुत बड़ा अंतर भी नहीं है और इस संख्या के पीछे वह हिंसा जो हम हर रोज़ अपने घरों में देखते हैं जिसका कहीं भी कोई नामो-निशान तक नहीं होता। इन आकंड़ों में राखी जैसी तमाम महिलाओं के केस कभी दर्ज ही नहीं होते हैं, क्योंकि इन हिंसाओं के ख़िलाफ़ किसी थाने में रिपोर्ट तो क्या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ चर्चा तक नहीं की जाती है। जो मामले थाने तक पहुंचते भी हैं तो उसको थाने के बाहर ही समझा-बुझाकर समझौते की तर्ज़ पर वापस कर दिया जाता है।

सालों से हम लोगों की दादी-नानी और न जाने कितनी पुश्तों ने ये सब देखा-सुना अनुभव किया है कि कहीं न कहीं जेंडर आधारित भेदभाव और हिंसा अब हमलोगों के परिवारों का हिस्सा जैसा बन गया है। यही वजह है कि महिलाओं की कंडीशनिंग ही घरेलू हिंसा के साथ जीने वाली की जाती है।

नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की इस रिपोर्ट में महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा से जुड़ी और भी कई जानकारी साझा की गई है, जिससे ये पता चलता है कि लगभग तीस प्रतिशत महिलाओं को शारीरिक हिंसा और छह प्रतिशत महिलाओं को यौन हिंसा का सामना करना पड़ता है। इन आंकड़ों में यौन हिंसा का स्तर बहुत कम बताया गया है, लेकिन जब हमलोग अपने घर-परिवार और समाज में इस मुद्दे को लेकर बात करने के स्तर को देखें तो इस बात का अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि कितनी प्रतिशत शादीशुदा महिलाएं यौन हिंसा के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाती हैं।

हमारे समाज में जहां हमेशा से महिलाओं को “पति ही परमेश्वर होता है” और “शादी के बाद तुम पर उसका पूरा हक़ है” जैसी सीख के साथ लड़कियों को बड़ा किया जाता है और इस सीख को नियम बनाकर उनकी शादी की जाती है। ऐसे में जब उनके पति महिलाओं के साथ यौन हिंसा करते हैं तो ज़्यादातर महिलाएं इसे उनका हक़ और चुप रहना खुद का कर्तव्य समझ लेती हैं और इसके ख़िलाफ़ कभी भी शिकायत नहीं करती हैं। अगर हम लोग रिपोर्ट में महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा का स्तर देखें तो इससे पता चलता है कि केवल 14 प्रतिशत महिलाएं ही हिंसा के ख़िलाफ़ अपनी आवाज़ उठाती हैं और इसे रिपोर्ट के रूप में दर्ज़ करवाती हैं।

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इस रिपोर्ट में ये भी सामने आया है कि महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा में 80 प्रतिशत उनका पति ही अपराधी होता है। इसमें अगर हम पति के अपराधी होने की वजहों को तलाशने की कोशिश करें तो इसमें पितृसत्तात्मक सोच के आधार पर बचपन से लालन-पालन, नकारात्मक मर्दानगी का दबाव, अशिक्षा, बेरोज़गारी और नशा करने जैसे कारण प्रमुख रूप से सामने आते हैं। रिपोर्ट में यह बताया गया है कि जिन पतियों ने स्कूली शिक्षा पूरी की है, उनमें वैवाहिक हिंसा करने की संभावना आधी यानी क़रीब 21 प्रतिशत होती है। वे पुरुष जिन्होंने स्कूली शिक्षा नहीं ली है उनमें हिंसा का स्तर 43 प्रतिशत होता है। इसके बाद, रिपोर्ट में शराब को लेकर यह बताया गया है कि जिन महिलाओं के पति अक्सर शराब पीते हैं उनमें से 70 प्रतिशत पुरुष अपनी पत्नियों के साथ शारीरिक और यौन हिंसा करते हैं।

हमारे समाज में जहां हमेशा से महिलाओं को ‘पति ही परमेश्वर होता है और शादी के बाद तुम पर उसका पूरा हक़ है‘ जैसी सीख के साथ लड़कियों को बड़ा किया जाता है और इस सीख को नियम बनाकर उनकी शादी की जाती है। ऐसे में जब उनके पति महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा करते हैं तो ज़्यादातर महिलाएं इसे उनका हक़ और चुप रहना खुद का कर्तव्य समझ लेती हैं और इसके ख़िलाफ़ कभी भी शिकायत नहीं करती हैं।

इस रिपोर्ट में स्वास्थ्य, शिक्षा, हिंसा और वेल्थ जैसे ज़रूरी पहलुओं पर आंकडें दिए गए हैं, जिन्हें न केवल समझने बल्कि ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाने की ज़रूरत है, जिससे समस्याओं की गंभीरताओं को उजागर किया जा सके। ज़मीनी सच्चाई यह है कि आज भी हम महिलाओं को घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ बोलने में सालों का लंबा समय लगता है और जब महिलाएं हिंसा के ख़िलाफ़ बोलना शुरू करती हैं, तब तक काफ़ी देर हो चुकी होती है।

इसमें महिलाओं की नहीं बल्कि समाज के होने वाली जेंडर आधारित परवरिश का दोष है जो एक तरफ़ महिलाओं को हमेशा घरेलू हिंसा के ख़िलाफ़ चुप रहना का पाठ पढ़ाती है वहीं पुरुषों को हिंसा करने का लाइसेंस देती है। इसलिए आख़िर में हम लोगों को यह सोचना होगा कि विकास और महिला सशक्तिकरण का दावा करनेवाले अपने मौजूदा देश में एक तिहाई महिलाओं के साथ होनेवाली हिंसा क्या विकास का मानक है या दो-तीन प्रतिशत घटते आंकड़े पर हम सभी को खुश होकर बैठ जाना चाहिए?

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रेनू वाराणसी ज़िले के रूपापुर गाँव की रहने वाली है। ग्रामीण महिलाओं और किशोरियों के साथ समुदाय स्तर पर रेनू बतौर सामाजिक कार्यकर्ता काम भी करती हैं और अपने अनुभवों व गाँव में हाशिएबद्ध समुदाय से जुड़ी समस्याओं को लेखन के ज़रिए उजागर करना इन्हें बेहद पसंद है।

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