समाजविज्ञान और तकनीक महिलाओं को डिजिटल दुनिया से जोड़ता कार्यक्रम ‘डिजिटल सार्थक’

महिलाओं को डिजिटल दुनिया से जोड़ता कार्यक्रम ‘डिजिटल सार्थक’

डिजिटल सार्थक एक राष्ट्रीय डिजिटल एंटरप्रेन्योरशिप और सशक्तीकरण प्रोग्राम है जो यूएसएआईडी और डीएआई के सहयोग से चल रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं में डिजिटल योग्यता को बढ़ाना और समाज में हाशिये पर रहनेवाले समुदाय के लोगों को डिजिटल रूप से सक्षम बनाकर उनके विकास में सहयोग देना है।

आज हर काम डिजिटल रूप लेता जा रहा है। मोबाइल फोन, इंटरनेट लोगों के आगे बढ़ने का रास्ता बनाता जा रहा है। दुनियाभर में आज 90 प्रतिशत नौकरियां डिजिटल हैं। सरकारें जन कल्याण की योजानाओं और सेवाओं के लिए डिजिटल तकनीक का सहारा ले रही हैं। लोग भी तेजी से डिजिटल साधनों और सेवाओं से जुड़ रहे हैं। इसमें अगर जेंडर के आधार पर पहुंच की बात करें तो डिजिटल सेवाओं और इसके बारे में जानकारी के मामले में महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले पीछे हैं। उनके लिए इंटरनेट के द्वारा झटपट काम अभी भी एक करिश्मे की तरह है। यही वजह है कि भारत में डिजिटल जेंडर गैप बना हुआ है।

हाशिये के समुदाय के लिए डिजिटल सार्थक अभियान

महिलाओं में डिजिटल तकनीक की जानकारी देने के लिए डिजिटल एम्पावरमेंट फाउंडेशन (डीईएफ) इस दिशा में सालों से काम कर रहा है। डीईएफ महिलाओं को डिजिटल रूप से सक्षम बनाने के लिए ‘डिजिटल सार्थक’ के नाम से कार्यक्रम चला रहा है। डिजिटल सार्थक एक राष्ट्रीय डिजिटल एंटरप्रेन्योरशिप और सशक्तीकरण प्रोग्राम है जो यूएसएआईडी और डीएआई के सहयोग से चल रहा है। इसका मुख्य उद्देश्य महिलाओं में डिजिटल योग्यता को बढ़ाना और समाज में हाशिये पर रहनेवाले समुदाय के लोगों को डिजिटल रूप से सक्षम बनाकर उनके विकास में सहयोग देना है। यह अभियान मुख्यतौर पर महिलाओं को डिजिटल रूप से साक्षर बनाना, स्मार्टफोन का इस्तेमाल करना, महिला उद्यमियों को व्यवसाय विस्तार के लिए सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना सिखाता है।

तस्वीर साभार: DEF
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डिजिटल सार्थक के ज़रिये महिलाओं को आगे बढ़ाने का काम

डिजिटल सार्थक सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों, सेवाओं, व्यापार और लेन-देन में उनके संगठन को मज़बूत करने और बेहतर अवसरों तक पहुंच को बढ़ावा देने के लिए है। यह परियोजना बुनियादी स्तर पर डिजिटल कौशल का प्रशिक्षिण देने का काम करती है। इसके तहत महिला उद्यमियों और महिला के विकास के समुदायिक स्तर पर काम करनेवाले संगठनों को एक साल की ट्रेनिंग दी जाती है। इस प्रोग्राम को 13 राज्यों के 25 जिलों में अलग-अलग केंद्रों पर चलाया जा रहा है। इसमें प्रशिक्षित महिलाएं ग्रामीण क्षेत्र में डिजिटल माध्यमों के इस्तेमाल के ज़रिये सरकारी योजनाओं और सेवाओं के लाभ के बारे में जानकारी देने का काम करती हैं। 

यह व्यक्ति की इच्छा पर निर्भर करता है कि वह कब एग फ्रीज करवाना चाहता है लेकिन विज्ञान इस प्रक्रिया को अपनाने का सही समय 20 से 30 वर्ष की उम्र के बीच बताता है।

डिजिटल सार्थक के उद्देश्य

इस कार्यक्रम का उद्देश्य 10 जिलों में 100 डिजिटल सार्थक के माध्यमों से महिला उद्यमियों और महिला केंद्रित सामुदायिक विकास संघ को सशक्त करना है। डिजिटल सार्थक ट्रेनिंग के ज़रिये दूर-दराज की महिलाओं में डिजिटल कौशल का विकास किया जाता है। महिलाओं को समार्टफोन और इंटरनेट के माध्यम से उनके व्यवसाय को बेहतर करने और उसके विस्तार के लिए कई तरीकों से अवगत कराता है। उनके उद्यम को बढ़ाने के लिए टेलीग्राम, वॉट्सऐप और फेसबुक का इस्तेमाल करना सिखाया जाता है। डिजिटल सार्थक ट्रेनिंग के ज़रिये और बेहतर तरीकें से ग्राहकों की ज़रूरतों, ऑर्डर आदि के लिए वे डिजिटल माध्यम से संवाद करने में मदद मिलती है। इससे उनके समय की बचत होने के साथ-साथ उनका व्यवसाय भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से ज्यादा विस्तारित होता है। 

भारत में डिजिटल जेंडर गैप

भारत में महिला और पुरुषों में डिजिटल माध्यमों की जानकारी और पहुंच को लेकर एक बड़ा अंतर है। ओआरएफ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में पुरुषों के मुकाबले महिलाओं के पास 15 प्रतिशत कम मोबाइल फोन है और 33 प्रतिशत महिलाएं कम मोबाइल इंटरनेट सेवा का इस्तेमाल कर पाती हैं। साल 2020 में कुल बालिग महिलाओं में केवल 25 फीसद आबादी के पास ही अपना स्मार्टफोन था वहीं बालिग पुरुषों में यह संख्या 41 फीसदी थी। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भारत में मोबाइल जेंडर गैप सबसे अधिक है। भारत में यह दर 40.4 प्रतिशत है जो पड़ोसी मुल्कों से बहुत ज्यादा है।

तस्वीर साभार: DEF
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जेंडर डिजिटल गैप, महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकता है और कई स्तर पर उन्हें नुकसान पहुंचाता है। सबसे पहले शहरी-ग्रामीण का अंतर होने की वजह से ग्रामीण क्षेत्र की महिलाएं तक यह पहुंच और भी कम हो जाती है। भारत में ग्रामीण ब्रॉडबैंड शहरी क्षेत्र के 51 फीसदी के मुकाबले केवल 29 प्रतिशत है। दूसरा परिवारों में आय आधारित डिजिटल विभाजन की वजह से महिलाएं तकनीक से दूर रह जाती हैं। ठीक इसी तरह घरों में होने वाले लैंगिक भेदभाव की वजह से घर के क्षेत्र में भी महिलाएं डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल नहीं कर पाती है। फोन या इंटरनेट का इस्तेमाल उनके काम की चीज़ नहीं है कहकर उन्हें इनसे दूर कर दिया जाता है।    

डिजिटल सार्थक ट्रेनिंग ने कैसे महिलाओं का जीवन बदला

राजस्थान के भरतपुर जिले की रहनेवाली निशा ने डिजिटल सार्थक कार्यक्रम के ज़रिये ट्रेनिंग हासिल की है। ट्रेनिंग के बाद जीवन में आए बदलाव के बारे में उनका कहना है, “मैं एक माँ, एक गृहणी और कुछ और थी जो खुद से कुछ अपेक्षा से अधिक हासिल करने की कोशिश कर रही थी। डीईएफ ने मुझे वह मौका दिया है जो एक पत्नी की पहचान से अलग भी कुछ करना चाहती थी। अब मैं एक इंटरप्रेन्योर हूं और आत्मविश्वास के साथ एक सुखी और संतुष्ट जीवन जी रही हूं। कुछ लोग कहते हैं कि वे थक गए लेकिन मैं उनमें से नहीं हूं यह मेरा जुनून है। यह वह है जो मैंने खुद के लिए चुना है, जो मुझे थकाने से ज्यादा उत्साहित करता है।” 

डिजिटल सार्थक सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों, सेवाओं, व्यापार और लेन-देन में उनके संगठन को मज़बूत करने और बेहतर अवसरों तक पहुंच को बढ़ावा देने के लिए है। यह परियोजना बुनियादी स्तर पर डिजिटल कौशल का प्रशिक्षिण देने का काम करती है।

रेखा कुमारी एक डिजिटल सार्थक हैं, जो झारखंड के रामगढ़ में महिला इंटरप्रेन्योर्स को ट्रेनिंग और सलाह देती हैं। वह कहती हैं, “जब डीईएफ ने मुझसे संपर्क किया तो मुझसे पूछा कि क्या मैं अपने ज़िले की महिलाओं को स्मार्टफोन और इससे संबधित लाभों के बारे में शिक्षित कर सकती हूं। तब पहला विचार मेरे दिमाग में आया कि मुझे अपनी लड़ाई खुद लड़नी है। इसके बाद डीईएफ में मेंटर के तौर पर मेरा सफर शुरू हुआ। मैंने महिलाओं के पहले कुछ शुरुआती सत्र लिए और बहुत धीरे-धीरे उन्हें तकनीकी पहलूओं के बारे में सिखाया। सबसे पहले मैंने समाज के ख़िलाफ़ और अपने अधिकारों की मांग के लिए खड़े होने के लिए साहस जुटाने के बारे में बताया क्योंकि मैं जानती हूं एक बार शिक्षा की ओर उनकी यात्रा शुरू होगी तब उन्हें हर किसी के सवालों का सामना करना होगा। धीरे-धीरे हमने डिजिटल भुगतान, सरकारी योजनाओं और नीतियों के बारे में जाना। उम्मीद के मुताबिक़ उनके परिवार ने ही स्मार्टफोन को सीखने की ज़रूरत के बारे में सवाल उठाया। लेकिन इन महिलाओं ने साहस के साथ मांग की कि उनके लिए खुद को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह सीखना बहुत ज़रूरी है।”

भारत में क्यों महिलाओं का डिजिटल रूप से साक्षर होना आवश्यक है

डिजिटल साक्षरता, पारंपरिक साक्षरता की तरह ही महत्वपूर्ण हो गई है। दुनिया को जोड़ने के लिए डिजिटल तकनीक सबसे अहम भूमिका निभा रही है। ज्यादातर नौकरियां डिजिटल कौशल के आधार से जुड़ी हुई हैं। ऐसे में महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक कल्याण के लिए उनके पास डिजिटल जानकारी होना बहुत ज़रूरी है। नौकरियों, व्यवसाय के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए उनका डिजिटल रूप से सक्षम होना समय की मांग है। महिलाओं और लड़कियों को सक्रिय और उनमें नेतृत्व की क्षमता को बढ़ाने के लिए भी उनका डिजिटल रूप से सक्षम होना बहुत ज़़रूरी है। सोशल मीडिया जैसे टूल के इस्तेमाल करने से वे अपने पारंपरिक कला को ही व्यवसाय बनाकर खुद को आर्थिक रूप से न केवल सक्षम कर सकती है ब्लकि अपनी कला से ही अपनी पहचान बना सकती हैं।


About the author(s)

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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