समाजविज्ञान और तकनीक ऑनलाइन गेमिंग में लैंगिक पूर्वाग्रह के चलते अपमान और हिंसा का सामना करती लड़कियां

ऑनलाइन गेमिंग में लैंगिक पूर्वाग्रह के चलते अपमान और हिंसा का सामना करती लड़कियां

ऑनलाइन गेमिंग के दौरान फीमेल गेमर्स उत्पीड़न से बचने के लिए अपनी पहचान छुपाने पर मजबूर किया जाता है। वे चुपचाप म्यूट रखकर गेम खेलती हैं।

नोब प्लेयर है, अरे! तुम्हें किसने कहा था खेलने को, ये तुम्हारा काम नहीं है, जाओ रसोई संभालों, ये तो करिश्मा हो गया, ओह! तुम भी हो यहां, अब ये भी खेलेंगी देखते हैं कितना दम है, निकल गई सारी हवा, चलो तुम गुडिया सजाओ…ये कुछ ऐसी बातें हैं जो ऑनलाइन गेम खेलने वाली फीमेल गेमर्स को मैच के दौरान सुनने को मिलती है। इस तरह की बातें सिर्फ कमजोर दिखाने या अपमान करने तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसमें यौन दुर्व्यवहार, भद्दी गालियां, ऑनलाइन स्टॉक करना भी शामिल है। 

वर्तमान दौर में हम उस सोच को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ रहे हैं कि वीडियो गेम्स सिर्फ लड़के खेलते हैं। आज ऑनलाइन गेम्स खेलने में लड़कियां भी पीछे नहीं है लेकिन ऑनलाइन गेमिंग दुनिया एक ऐसी जगह है जहां पुरुषों का वर्चस्व ही है। गेमिंग वर्ल्ड में महिलाओं के मुकाबले पुरुषों को ज्यादा स्पेस मिलता है और उन्हें ही दर्शाया जाता है। बावजूद इसके गेमिंग वर्ल्ड में लड़कियां अपना क्लब बना रही हैं। बड़ी संख्या में फीमेल गेमर्स का आंकड़ा बढ़ रहा है। ऑनलाइन गेमिंग की दुनिया भी ऐसी जगह बनी हुई है जहां महिलाओं को उनकी लैंगिक पहचान की वजह से पुरुषों से उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है। उनके साथ अश्लीलता से भरा व्यवहार किया जाता है और उनका यौन उत्पीड़न किया जाता है। 

रिपोर्ट के अनुसार भारत में 507 मिलियन गेमर्स हैं। साल 2021-22 में दो मिलियन नये खिलाड़ी हर महीने जुड़े। वैश्विक स्तर पर गेम डाउनलोड का 17 फीसदी बीते वर्ष भारत में दर्ज किया गया है। इस रिपोर्ट में पुरुष और महिला गेमर्स का रेशो 60:40 दर्ज किया गया है।

ऑनलाइन गेमिंग के दौरान फीमेल गेमर्स को उत्पीड़न से बचने के लिए अपनी पहचान छुपाने पर मजबूर किया जाता है। वे चुपचाप म्यूट रखकर गेम खेलती हैं। यह सब दिखाता है कि वीडियो गेम के उद्योग और संस्कृति के लिए महिला गेमर्स के लिए अभी खुला माहौल नहीं है। वे इस वजह से अक्सर अपनी पहचान को छिपाकर या सब कुछ सहते हुए गेम खेलती है। गेमिंग की दुनिया में लैंगिक पूर्वाग्रह वैश्विक स्तर पर प्रचलित है। 

फीमेल गेमर्स की बढ़ती संख्या

भारत में ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री  बहुत तेजी से बढ़ रही है। भारत में गेमिंग केंद्रित वेंचर कैपिटलिस्ट फंड लुमिकाई द्वारा जारी स्टेट ऑफ इंडिया गेमिंग रिपोर्ट 2022 के अनुसार साल 2022 के वित्तीय वर्ष में भारत में गेमिंग मार्किट 2.6 बिलियन यूएस डॉलर की थी जिसके साल 2027 तक 8.6 बिलियन यूएस डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। रिपोर्ट के अनुसार भारत में 507 मिलियन गेमर्स हैं। साल 2021-22 में दो मिलियन नये खिलाड़ी हर महीने जुड़े। वैश्विक स्तर पर गेम डाउनलोड का 17 फीसदी बीते वर्ष भारत में दर्ज किया गया है। इस रिपोर्ट में पुरुष और महिला गेमर्स का रेशो 60:40 दर्ज किया गया है। औसतन हर हफ्ते का 8.5 से 11 घंटे का समय भारतीय गेमर्स गेमिंग में बिताते हैं। भारत में 507 मिलियन गेमर्स में से 43 फीसदी महिलाएं हैं।

भारत में 1.4 बिलियन आबादी में से 27.3 फीसदी की आयु 15 से 29 साल के बीच है। कोविड-19 के लॉकडाउन के बाद से ई-स्पोर्ट्स में काफी बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है। फिक्की के अनुसार साल 2020 के 12 प्रतिशत के मुकाबले 2022 में 22 प्रतिशत फीमेल प्लेयर बढ़े हैं। लेकिन भारत में महिला खिलाड़ियों को ऑनलाइन गेम्स की अपनी लैंगिक पहचान की वजह से कीमत भी चुकानी पड़ रही है। इस आभासी दुनिया में महिला गेमर्स को हिंसा, अपमान का सामना करना पड़ता है।

तस्वीर साभारः Bizz Buzz

मैंने अपने जान-पहचान वालों के साथ ही खेलना तय किया

14 वर्षीय उन्नति ने ऑनलाइन गेम खेलने की शुरुआत कोविड-19 के बाद लगे लॉकडाउन के समय की थी जब उन्हें ऑनलाइन शिक्षा के लिए अलग से फोन मिला था। हमसे बात करने के दौरान उनका कहना है, “पहले में अजनबियों के साथ किसी भी ऑनलाइन गेम में शामिल हो जाती थी लेकिन धीरे-धीरे मुझे वहां इतना सही नहीं लगा। लड़कों का बातचीत करने का तरीका सही नहीं था, वो आपस में भी गंदी गालियों का इस्तेमाल करते थे। साथ ही लड़की प्लेयर को बहुत ही डिमोटिवेट करते थे या फिर अगर जीत जाते थे तो कहा जाता था कि मैच बहुत आसान था तुम इस वजह से जीत गई। ऑनलाइन गेम की वजह से बहुत सारे लोग मेरे सोशल मीडिया पर ऐड होने लगे थे जो मुझे अजीब लग रहा था इसलिए उसके बाद से मैंने पर्सनल अपने लोगों के साथ रूम बनाकर खेलना शुरू कर दिया था। रूम बनाकर खेलने से हमें यह पता रहता है कि हम किसके साथ खेल रहे हैं और कोई कुछ गलत बोलेगा तो हम उसे तुरंत कह सकते हैं कि आप ऐसा नहीं बोल सकते। ये मुझे सुरक्षित विकल्प लगा तो तब से मैं ऐसे ही खेलती हूं।”

लड़कियों के ऑनलाइन गेमिंग में बहुत सेफ माहौल नहीं

27 वर्षीय शीतल दीक्षित ऑनलाइन गेम्स अपने कॉलिज के दिनों से खेल रही हैं। ऑनलाइन गेमिंग के अनुभवों को साझा करते हुए उनका कहना है, “मुझे वीडियो गेम्स खेलना पसंद है सबसे पहले तो यही बात मेरे आसपास वाले लोगों को परेशान करती है। मुझे इस वजह से जज किया जाता है। दूसरा अगर ऑनलाइन गेम्स हो लड़कियों को लेकर होने वाले माहौल पर बात करूं तो बहुत सेफ तो बिल्कुल नहीं है। लड़के अक्सर हर बात पर गाली देते है। अगर आपकी पहचान जाहिर होती है कि आप लड़की है तो सबसे पहले तो कमजोर प्लेयर होगी तो खेलने के लिए कोई तैयार भी नहीं होता है। तू कौन हैं, तुझे खेलने को किसने कहा है। लड़कियां अक्सर माइक ऑफ करके खेलती है। मैच में हमें नोब प्लेयर कहा जाता है, अगर कोई मैच जीत जाते है तो कहा जाता है कि लड़की है इसलिए जीतने दिया। साथ ही ये भी कहा जाता है कि घर संभाल जाकर मम्मी की हेल्प कर। कभी-कभी ऑनलाइन पीछा भी किया जाता है तो ये सब चीजें बहुत आम है। साथ ही लड़की होने की वजह से बहुत असजह महसूस कराया जाता है जिस वजह से कई बार मन चाहते हुए भी नहीं खेलते है क्योंकि कल को कुछ भी गलत हो गया तो उसका सारा ब्लेम मुझे पर ही डाल  दिया जाएगा।”

साल 2020 के 12 प्रतिशत के मुकाबले 2022 में 22 प्रतिशत फीमेल प्लेयर बढ़े हैं। लेकिन भारत में महिला खिलाड़ियों को ऑनलाइन गेम्स की अपनी लैंगिक पहचान की वजह से कीमत भी चुकानी पड़ रही हैं।

ऑनलाइन गेम खेलते समय मैंने बुरे व्यवहार का सामना किया

26 वर्षीय तोषी सिंह का कहना है, “ऑनलाइन गेम खेलते समय मुझे अक्सर बहुत बुरे व्यवहार का सामना करना पड़ा है। मेरी ऑनलाइन गेम खेलने के दौरान ही कई लोगों से दोस्ती भी हुई लेकिन जल्दी वे लोग बहुत असजह करने वाला माहौल बना देते थे। निजी चीजों के बारे में जानने को उत्सुक रहा करते थे। उन्हें ब्लॉक करने पर वे दूसरे अकाउंट से मैसेज करते और कई बार इग्नोर करने पर अश्लील तस्वीरें भेजी और धमकियां भी दी। यह पूरी तरह ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लड़कियों के ख़िलाफ़ माहौल है जो बेवजह बहुत परेशान करता है। इस तरह की चीजें मानसिक तौर पर बहुत डराती है इस वजह से अब मैं बहुत कम ऑनलाइन गेम में वक्त बिताती हूं।”

रायटर्स पर प्रकाशित एक रिपोर्ट में ई-स्पोर्ट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया के निदेशक लोकेश सूजी का कहना है कि अभी इस क्षेत्र में बहुत काम करना बाकी है। उन्होंने कहा, “इंडस्ट्री हर तरह के दुर्व्यवहार पर रोक लगाना चाहती है और महिलाओं को गेमिंग में शीर्ष पुरुषों की तरह समृद्ध होते देखना चाहती हैं। लेकिन आखिरकार यह हमारी संस्कृति है, हम लड़कियों को खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते हैं।” 

महिलाओं का गेमिंग में सही प्रतिनिधित्व नहीं

तस्वीर साभारः SnapMunk

भले ही दुनियाभर में बड़ी संख्या में महिलाएं गेमर्स हो लेकिन वे वीडियो गेम्स में खुद का उचित प्रतिनिधित्व नहीं देख पाती है। यानी महिला पात्रों का वीडियो गेम्स में पुरुषों की तुलना में बहुत ज्यादा किरदार नहीं है। अक्सर महिला पात्रों को बहुत ही कामुक या फिर स्त्री विरोधी तरीके से चित्रित किया जाता है। साल 2003 में 20 शीर्ष वीडियो गेम के हुए एक विश्लेषण में पाया गया कि महिला पात्रों का कम प्रतिनिधित्व है। अध्ययन में पाया गया कि पुरुष पात्रों के मुकाबले महिलाओं को आंशिक रूप से नग्न दिखाए जाने की संभावना अधिक थी। उन्हें अवास्तिक शरीर की छवि की तरह दिखाया गया था और उनके कपड़े भी बहुत भडकाऊ थे जो किरदार के अनुसार नहीं थे। साथ ही गेम इंडस्ट्री में अभी मुख्य किरदारों में महिला पात्रों की कमी है।

भारत में ऑनलाइन गेमों की लत को रोकने को लेकर कुछ नियमों की घोषणा की गई है। हानिकारक सामग्री और अश्लीलता को खत्म करने के लिए लिए भी उससे जुड़ी शिकायतों पर जल्दी ही कार्रवाई की बात कही गई। इस तरह के प्रयास ई-स्पोर्टर्स के फील्ड में महिला खिलाड़ियों के लिए कुछ राहत भरे कदम है लेकिन हमें इससे अलग पूर्वाग्रहों आधारित व्यवहार को भी बदलना होगा। गेमिंग इंडस्ट्री का स्ट्रक्चर भी बदलना होगा जहां महिला किरदारो की केंद्र में कमी है और उनको एक ख़ास सोच के तहत आकर्षक के तौर पर प्रदर्शित करने वाली तरीके को बदलना होगा। सबसे पहले तो वीडियो गेम लड़के खेलते हैं इस राय को पीछे छोड़ना होगा।

About the author(s)

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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