संस्कृतिकिताबें इदन्नमम: तीन पीढ़ी की स्त्रियों का अंतर्विरोध और उनकी अस्मिता का संघर्ष दर्ज करता उपन्यास

इदन्नमम: तीन पीढ़ी की स्त्रियों का अंतर्विरोध और उनकी अस्मिता का संघर्ष दर्ज करता उपन्यास

मंदा उस ज़मीन से उठकर खड़ी हुई लड़की है जहां की ज़मीन के ज़र्रे-ज़र्रे में अंधविश्वास, धर्म, अशिक्षा, पितृसत्ता, गुलामी और गैरबराबरी है। अपनी उसी उबड़-खाबड़ मिट्टी पाथर के ढोकों की ज़मीन को सींचकर, उपजाऊ बनाना है मंदा को। उसे शिक्षा, चेतना, आत्मनिर्भरता, समानता और मुक्ति का कोई बीज खोजना है और अपनी उस माटी में बोना है।

अशिक्षा, भेदभाव, अन्याय और शोषण के उस अंधकार में वह गंवई लड़की मंदा प्रकाश की तरह उदित होती है। वह एक निरीह सी गंवई लड़की हाशिये के जनों की ठेठ लड़ाई की सशक्त नायिका बनकर खड़ी होती है। मैत्रेयी पुष्पा का लिखा उपन्यास ‘इदन्नमम‘ भारतीय समाज में  स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता के साथ धारा के सबसे पिछड़े वर्गों का जीवन कितना त्रासद है, इसकी एक गहरी और ज़मीनी पड़ताल है। सांप्रदायिकता का ज़हर एक जगह से दूसरी जगह कैसे फैलता है। कैसे हंसी-खुशी से साथ-साथ रहते आ रहे लोग पराए हो जाते हैं। बाबरी विध्वंस और रथयात्रा का असर देश पर कैसे और कितना पड़ा इसका बहुत सच्चा और जीवंत चित्रण किया है मैत्रेयी पुष्पा ने। भारतीय समाज का गंवई परिवेश उसकी रुढ़ियां और लचीलापन मिट्टी पत्थर से बना उसका ढाँचा सबको उपन्यास में बहुत सहज उतारा है।

उपन्यास में तीन पीढ़ियों की स्त्रियां समानांतर खड़ी हैं। बऊ (मंदा की दादी), प्रेम (मंदा की माँ) और तीसरा चरित्र मंदा हैं। यहां मंदा तीसरी पीढ़ी की स्त्री है। स्त्री अस्मिता के संघर्ष की कहानी के साथ ही ये उपन्यास स्त्री की चेतना का भी इतिहास है। यहां हर पीढ़ी की स्त्री अपने बाद की पीढ़ी की स्त्री की यथास्थिति से निकलकर संघर्ष करती हैं और अनजाने ही सही वह स्त्रियों के संघर्ष को एक पड़ाव देती है। बऊ जो कि मंदा की दादी हैं उनके बेटे की हत्या हो जाती है। यहां बऊ का संघर्ष है किसी भी तरह अपनी पोती मंदा को अपने पास रखना और उसके हिस्से की संपत्ति को बचाना क्यों कि उनकी बहू प्रेम अपनी बेटी को अपने साथ लेना चाहती है। यहां बऊ और उनकी बहू प्रेम का संघर्ष अलग-अलग ज़मीन पर खड़ा है। लेकिन दोनों ने अपने दायरे को तोड़कर बाहर कदम रखा है। दोनों का चयन अलग-अलग है। एक ने सामाजिक परंपरा के आदर्शों और पारिवारिक मूल्यों को सबसे ऊपर रखा दूसरे ने अपनी अस्मिता, अधिकार और इच्छा का चयन किया।

मंदा दोनों के बीच की कड़ी है और मंदा ने दोनों की संवेदनाओं को समझा और उसे सम्मान दिया। दोनों की इच्छाओं और अधिकारों का भी सम्मान किया। मंदा नायिका है इस उपन्यास की। जीवन और प्रेम से भरी वह सांवली सी कोमल लड़की अपनी इच्छा शक्ति में बेहद मजबूत है और उसका अपनी माटी के लिए संघर्ष एक बहुत बड़ा जनांदोलन बनता है। धारा के सबसे पिछड़े व्यक्ति का दुख उनकी पीड़ा उनके संघर्ष सब मंदा के अपने हैं। उनके लिए ही संघर्ष करती वह एकदिन अपने जीवन का प्रेम जिसका इंतज़ार करती वह बढ़ती जा रही थी संघर्ष के पथ पर उसको भी तजकर उसी राह पर बढ़ जाती है जहां बहुत से मनुष्यों का जीवन दांव पर है। जहां के लोगों को मंदा पर विश्वास है जहां मंदा को देखकर लोग भूली हुई अपने हक की लड़ाई को लड़ना सीखे थे। मंदा ने उसी राह को अपने जीवन का ध्येय बनाया।

यह वही राह थी जिसपर श्यामली के दादा चल रहे थे जिस पर चलने का स्वप्न कुसुमा भाभी भी देखती हैं। उपन्यास के एक अंश में मंदा से मिलने कुसमा भाभी सोनपुरा आती हैं और कहती हैं, “यहां आकर तो हमें यही लगा मंदा उस श्यामली में हम रहे कि नहीं? बस दादा के रहने तक है हमारा वास लग रहा है! कक्को को को लेकर चले जाए जहां मन आए वहां! तुम्हारी तरह ही अपनी जिंदगी लगा दे किसी शुभ काम में! पर विन्नू ! अपने मन में जो संकल्प की गांठ बांध रखी है सो नहीं खोल पाएंगे! स्यात हम भी अनजाने ही कि जानबूझकर क्या मालूम कौन सी घड़ी में दादा का पूरा पूरा हिस्सा हथिया लिया हमने निर्द्वन्द्व कब्जा कर लिया।”

उपन्यास की नायिका मंदाकिनी जिसे पूरे उपन्यास में मंदा कहकर संबोधित किया जाता रहा है, उसका पूरा जीवन-चरित्र मानवीय मूल्यों उसकी सहज संवेदनाओं से रचा गया है। अन्याय और शोषण के उस वातावरण में मंदाकिनी की आवाज़ आंदोलन और मित्रता की आवाज़ है।

मंदाकिनी उठकर बैठ गई और हंस पड़ी और कहा, “वाह भाभी खेत -जायदाद “घर – मकान तो कोई लेने नहीं देता तुमने फिर कौन सा हिस्सा दाब लिया। बिन्नू जो किसी ने नहीं लिया । जिस पर कोई अपना हक नहीं जमा सका, जिसके सच्चे वारिस थे दरोगा जी। पढ़े-लिखे जानकार समझदार और जिसे श्रीकांत भी लेकर चल सकते थे पर बिन्नू उस विरासत को किसी ने छुआ तक नहीं। मंदा दादा की जंग का हम पूरा-पूरा हिस्सा लेंगे! अपने नाम लिखा लिया समूचा का समूचा। ताजिंदगी दादा ने बेबस, लाचार और दीन-हीनों के लिए लड़ाई लड़ी है।” उपन्यास इदन्नमम के इस अंश में पीढ़ियों के उसी संघर्ष की राह पर चलने की बात है जहां न्याय और बराबरी के संसार का स्वप्न होता है। जिसपर चलकर दादा तो थकते जा रहे हैं लेकिन फिर भी कुसुमा भाभी और मंदाकिनी को उसी राह पर चलना है जहां मनुष्य को महज मनुष्य के अर्थ में देखा जाता है। जहां जाति, धर्म और हैसियत मनुष्य होने के मानक नहीं होते।

उपन्यास की नायिका मंदाकिनी जिसे पूरे उपन्यास में मंदा कहकर संबोधित किया जाता रहा है, उसका पूरा जीवन-चरित्र मानवीय मूल्यों उसकी सहज संवेदनाओं से रचा गया है। अन्याय और शोषण के उस वातावरण में मंदाकिनी की आवाज़ आंदोलन और मित्रता की आवाज़ है। जहां मनुष्य-मनुष्य का साथी है वहां कोई जाति, धर्म, वर्ग के आधार पर छोटा बड़ा नहीं है।सबके सुख, दुख साझे हैं। उपन्यास का एक दृश्य है जहां मंदाकिनी की निर्मिति का चित्रण है। मनुष्य के सुख-दुख से बना उसका अंतर्मन मित्रता की ताकत को समझता है, मेलजोल और साथ खड़े रहना ही निर्बलों का बल है जानती है मंदाकिनी। बस यही हेलमेल बना रहे, बस यही भावना बनी रहे। ऐसी ही सद्बुद्धि यही चाहती है मंदाकिनी। यही समझाती है कि बार-बार करोगे तो टूट जाओगे हार जाओगे, मित्रता बाहर से नहीं भीतर से पैदा होती है उजली लकीर की तरह की तरह ज्योतिरवान।

उपन्यास में तीन पीढ़ियों की स्त्रियां समानांतर खड़ी हैं। बऊ (मंदा की दादी), प्रेम (मंदा की माँ) और तीसरा चरित्र मंदा हैं। यहां मंदा तीसरी पीढ़ी की स्त्री है। स्त्री अस्मिता के संघर्ष की कहानी के साथ ही ये उपन्यास स्त्री की चेतना का भी इतिहास है। यहां हर पीढ़ी की स्त्री अपने बाद की पीढ़ी की स्त्री की यथास्थिति से निकलकर संघर्ष करती हैं और अनजाने ही सही वह स्त्रियों के संघर्ष को एक पड़ाव देती है।

शहर बाजार की संस्कृति कैसे मनुष्य को संवेदनहीन और स्वार्थी बना देता है कि हम अपने दुराग्रह को आग्रह की तरह बरत लेते हैं। मकरंद जो कि मंदाकिनी का प्रेमी है जिसके साथ दादा ने मंदाकिनी की सगाई भी कर दी थी लेकिन मकरंद के घरवाले उस सगाई को तोड़ देते हैं। वे मकरंद को लेकर शहर चले जाते हैं। वह वहां डॉक्टरी की पढ़ाई पढ़ता है मंदाकिनी को हमेशा मकरंद का इंतज़ार रहता है कि एक दिन डॉक्टर बनकर वह उसके गाँव में ही आकर अस्पताल में प्रैक्टिस करेगा। गाँव से जाने के बाद मंदाकिनी को लिखे एक पत्र में मकरंद शहरी सभ्यता के नकलीपन अपने माता-पिता के स्वार्थ और चालाकी को चिन्हित करके लिखता है कि “तुम्हारे साथ तो फिर भी बऊ हैं मंदा! भले गंवई ग्रामीण सही मगर अधकचरी नहीं है वह, जो कहती हैं उसे निबहाती भी हैं। यहां तो एक ओर मेरी हर इच्छा को पूर्ण करने के लिए मुझे स्वतंत्र छोड़ने का दम भरते हैं दूसरी ओर उचित अनुचित मेल-बेमेल के दायरे बांटते हैं। यह लोग पुरानी रूढ़ियों को नयी सभ्यता की चालाकी के तहत चला रहे हैं अपने आपको जो इनका स्वार्थ साधने के लिए उपयुक्त पुर्जा बैठता है उसे तुरंत फिट कर लेते हैं।”

» और पढ़ें:

उपन्यास इदन्नमम की भूमिका में राजेंद्र यादव लिखते हैं कि महानगरी मध्यवर्गीय की संघर्ष करती और पांव के नीचे ज]मीन की तलाश करती कथा नारियों के बीच गांव की मंदा एक अजीब नीरीह, निष्कवच, निश्छल, संकल्प दृढ़ नारी का व्यक्तित्व लेकर उभरती है। बाढ़ के बीच धीरे-धीरे उठते टीले या द्वीप की तरह मगर वह द्वीप नहीं है उसके साथ एक भरी-पूरी दुनिया रूढ़ियों, परंपराओं, अभ्यास आकांक्षाओं और इर्ष्याओं से भरी एक दूसरे के अधिकार झपट के चलते, चूसते और न्याय की रक्षा करते लोगों की जिंदगी। मंदा को इन्हीं के बीच रहना है और रास्ता निकालना है उसकी लड़ाई दोहरी है। औरत होने की और वंचितों के अधिकारों की।

अशिक्षा, भेदभाव, अन्याय और शोषण के उस अंधकार में वह गंवई लड़की मंदा प्रकाश की तरह उदित होती है। वह एक निरीह सी गंवई लड़की हाशिये के जनों की ठेठ लड़ाई की सशक्त नायिका बनकर खड़ी होती है।

उपन्यास इदन्नमम शोषितों, वंचितों और उनके लिए या उनके साथ लड़नेवालों की ही कहानी नहीं है इस उपन्यास में तीन पीढ़ी की स्त्रियों की स्वतंत्रता और अस्मिता का आख्यान भी है। अंत तक आते-आते उपन्यास अपनी श्रेष्ठता के चरम पर पहुंचता है जहां संघर्ष की राह में उपन्यास की मंदाकिनी अपने प्रेम को भी तजकर अपनी राह पर आगे बढ़ जाती है। मंदा उस ज़मीन से उठकर खड़ी हुई लड़की है जहां की ज़मीन के ज़र्रे-ज़र्रे में अंधविश्वास, धर्म, अशिक्षा, पितृसत्ता, गुलामी और गैरबराबरी है। अपनी उसी उबड़-खाबड़ मिट्टी पाथर के ढोकों की ज़मीन को सींचकर, उपजाऊ बनाना है मंदा को। उसे शिक्षा, चेतना, आत्मनिर्भरता, समानता और मुक्ति का कोई बीज खोजना है और अपनी उस माटी में बोना है।


Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content