इंटरसेक्शनलजेंडर मंगला नर्लिकरः एक गणितज्ञ जिसने लोगों के लिए गणित को बनाया आसान

मंगला नर्लिकरः एक गणितज्ञ जिसने लोगों के लिए गणित को बनाया आसान

“मेरी कहानी शायद मेरी पीढ़ी की कई महिलाओं के जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अच्छी तरह से शिक्षित हैं लेकिन हमेशा विनम्र रहती हैं उनके करियर से पहले उनकी घरेलू जिम्मेदारियां भी है।”

“मैंने अपने अनुभवों के बारे में लिखने का फैसला किया क्योंकि वे शायद मेरे युग की महिलाओं के एक वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं।” ये शब्द भारत की प्रसिद्ध गणितज्ञ डॉ. मंगला नर्लिकर के हैं जिन्होंने गणित में शोध के साथ-साथ आम लोगों को ध्यान में रखते हुए लेखन कार्य भी किया। उन्होंने अपने जीवन के हर पड़ाव पर गणित के क्षेत्र में काम किया। गणित की जटिलताओं को आम लोगों को समझाने के साथ-साथ उन्होंने मराठी में संख्याओं की पहचान करने का आसान तरीका निकालने की भी कोशिश की। अपने सुझावों की वजह से उन्होंने आलोचनाओं का भी सामना किया फिर भी वह अपने काम में लगी रहीं और गणित की दुनिया में काम करती रहीं। 

शुरुआती जीवन और गणित में रूचि

मंगला राजवाडे का जन्म 17 मई 1943 में ब्रिटिश काल के समय बॉम्बे (मुंबई) में हुआ था। वह बचपन से ही पढ़ने में बहुत रूचि रखती थी। पढ़ने-लिखने में बहुत होनहार थी इस वजह से वह बहुत आसानी से अपनी कक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर पाती थी। उन्होंने अपनी मिडिल स्कूल और हाई स्कूल की पढ़ाई सरकारी स्कूल से की थी। हाई स्कूल की पढ़ाई के दौरान उनके एक शिक्षक ने उन पर ध्यान देते हुए कहा कि उनके भीतर महत्वकांक्षा की कमी है। शिक्षक की बात सुनकर उन्होंने इस बात पर ध्यान भी दिया उम्र के हर पड़ाव पर इस बात को ध्यान रखा। 

“मैं जानती हूं गणित एक पुरुष-प्रधान विषय है लेकिन मैं यह सामान्यीकरण बिल्कुल स्वीकार नहीं करती हूं कि लड़कियां गणित में कमजोर होती हैं।”

मंगला की गणित में पहले से ही रूचि थी तो उन्होंने आगे भी इस विषय में पढ़ाई करने की सोची। लेकिन उन्हें सलाह दी गई कि कला और गणित से डिग्री की मान्यता बराबर है तो उन्होंने कला के विषयों में पढ़ाई करने की सोची। कॉलेज के दो वर्षों में उन्होंने इतिहास, अर्थशास्त्र, नागरिक शास्त्र और संस्कृत जैसे विषय पढ़े। उन्हें पढ़कर बहुत अच्छा लगा लेकिन जल्द ही यह भी एहसास हुआ कि वह गणित की पढ़ाई में ज्यादा रूचि रखती है। उसके बाद उन्हें सलाह दी गई कि अगर तुम गणित विषय में जानकारी हासिल करना चाहती हो तो तुम्हें एमएससी की पढ़ाई पढ़नी होगी और फिर उन्होंने गणित के विषय में ही पढ़ाई की।

शिक्षा और करियर

तस्वीर साभारः TOI

उन्होंने बॉम्बे विश्वविद्यालय से साल 1962 में बीए (गणित) की डिग्री हासिल की। इसके बाद 1964 में एमए, गणित में डिग्री हासिल की। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 1964 से 1966 तक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई में रिसर्च स्टूडेंट और रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम किया। उनकी शादी प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक डॉ. जयंत नर्लिकर के साथ हुई थी। शादी के बाद वह अपने पति के साथ इंग्लैड चली गई। वहां उन्होंने साल 1967 से 1969 तक कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के अंडर ग्रेजुएशन स्कूल में पढ़ाया। 1972 में यह दंपत्ति वापस भारत लौटी और उन्होंने दोबारा 1974 से 1980 तक टाटा इंस्टीट्यूय में स्कूल ऑफ मैथामेथिक्स में काम किया। मंगला नर्लिकर ने पीएचडी की उपाधि अपनी शादी के 16 साल बाद हासिल की थी। साल 1981 में विश्र्लेषणात्मक संख्या सिद्धांत के विषय में उन्होंने यह उपाधि मिली थी।

पीएचडी की उपाधि पूरी होने के बाद उन्होंने 1982 से 1985 तक टाटा इंस्टीट्यूट में पूल ऑफिस इन द स्कूल ऑफ मैथामेथिक्स से जुड़ी रहीं। इतना ही नहीं इस समय उनका शिक्षण कार्य बॉम्बे विश्वविद्यालय में गणित विभाग में एमफिल के लिए भी था। 1989 में उनके पति बॉम्बे गए तो वहां उन्होंने 1989 से 2002 तक पुणे विश्वविद्यालय में गणित विभाग में अध्यापन कार्य किया। इसके बाद 2006 से 2010 तक भास्कराचार्य प्रतिष्ठान से जुड़ीं। नर्लिकर की पूरी रूचि रियल और कॉम्पलेक्स अनैलेसिस, एनालिटिक ज्योमैट्री, नंबर थ्योरी, एलजैबरा और टोपोलॉजी में थी। 

पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने 1964 से 1966 तक टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च, मुंबई में रिसर्च स्टूडेंट और रिसर्च एसोसिएट के तौर पर काम किया। उनकी शादी प्रसिद्ध खगोल वैज्ञानिक डॉ. जयंत नारणीकर के साथ हुई थी।

मंगला के गणित में कई एकेडमिक पेपर भी पब्लिश हुए हैं। ये अधिकतर नंबर थ्योरी और एनालेटिक थ्योरी पर आधारित थे। शिक्षण कार्य के साथ-साथ उन्होंने अंग्रेजी और मराठी में गणित के ऊपर किताबें भी लिखीं। उन्होंने शुरुआती गणित के साथ-साथ उन लोगों को ध्यान में रखकर भी किताबें तैयार की जो गणित से डरते थे। उनकी लिखी बच्चों की किताबें बहुत कम मूल्य में उपलब्ध थी ताकि सभी बच्चों तक उसकी पहुंच बन सके। साथ ही उन्होंने स्कूली छात्रों के गणित के पाठ्यक्रम को संशोधित करने में भी योगदान दिया। वह हमेशा से पाठ्यक्रम को तर्कवाद और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बनाने के पक्ष में रही।  

तस्वीर साभारः Free Press Journal

भारतीय पितृस्तात्मक समाज लैंगिक भेदभाव के चलते आज भी लड़कियों के लिए विज्ञान और गणित की पढ़ाई पढ़ना एक चुनौती है। इसी समाज में गणित विषय की लड़कियों की पढ़ाई को लेकर अनेक तरह के पूर्वाग्रह चलन में है। मंगला नर्लिकर ने अपने पूरे जीवन अपने काम से इन पूर्वाग्रहों की जड़ों को कमजोर करने का काम किया है। इस पर उनका कहना था, “मैं जानती हूं गणित एक पुरुष-प्रधान विषय है लेकिन मैं यह सामान्यीकरण बिल्कुल स्वीकार नहीं करती हूं कि लड़कियां गणित में कमजोर होती हैं।”

इनकी तीन बेटियां हैं और काम और परिवार के बीच संतुलन बनाने के बारे में उनका कहना था, “मेरी कहानी शायद मेरी पीढ़ी की कई महिलाओं के जीवन का प्रतिनिधित्व करती हैं जो अच्छी तरह से शिक्षित हैं लेकिन हमेशा विनम्र रहती हैं उनके करियर से पहले उनकी घरेलू जिम्मेदारियां भी है।” मंगला नर्लिकर ने सेवानिवृत्ति के बाद भी लगातार काम जारी रखा। उन्होंने लगातार आम लोगों को गणित से जोड़ने के लिए प्रयास जारी रखे। 17 जुलाई 2023 को मंगला नर्लिकर ने कैंसर से लड़ते हुए हमेशा के लिए इस दुनिया को अलविदा कह दिया। 

स्रोतः

  1. Wikipedia
  2. Times of India
  3. Indian Academy of science 

About the author(s)

मैं पूजा राठी पश्चिमी उत्तर-प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर की रहने वाली हूँ। अपने आसपास के माहौल मे फ़िट नहीं बैठती हूँ।सामाजिक रूढ़िवाद, जाति-धर्मभेद, असमानता और लैंगिक भेद में गहरी रूचि है। नारीवाद व समावेशी विचारों की पक्षधर हूँ। खुद को एक नौसिखिया मानती हूँ, इसलिए सीखने की प्रक्रिया हमेशा जारी रखती हूँ।

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