स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य बात आर्थराइटिस के लैंगिक पहलू और प्रभाव की

बात आर्थराइटिस के लैंगिक पहलू और प्रभाव की

विश्वस्तर पर साठ वर्ष की उम्र से ऊपर 18.0 प्रतिशत महिलाएं और 9.6 पुरुष ऑस्टियोआर्थराइटिस से पीड़ित है। पचास से कम उम्र के पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में रूमेटीइड आर्थराइटिस होने की चार से पांच गुना ज्यादा संभावना होती है और साठ की उम्र के बाद दोगुना खतरा बढ़ जाता है।

48 वर्षीय अनिता के हाथ और पैर पूरी तरह मुड चुके हैं, उन्हें चलने-फिरने में बहुत कठिनाइयों को सामना करना पड़ रहा हैं, साल में मुश्किल से दो से तीन बार घर से बाहर निकलती हैं उनकी यह स्थिति इस वजह से है क्योंकि उन्हें आर्थराइटिस यानी गठिया दर्द है। बीते 16-17 सालों से उनकी स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही हैं। घर में रसोई और कमरे तक सीमित उनकी दिनचर्या में दर्द और कमजोरी ने एक बड़ा हिस्सा बना लिया है। 

तमाम अध्ययनों और आंकड़ों के अनुसार पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में यह समस्या अधिक देखने को मिलती है। डाउन टू अर्थ में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार विश्वस्तर पर साठ वर्ष की उम्र से ऊपर 18.0 प्रतिशत महिलाएं और 9.6 पुरुष ऑस्टियोआर्थराइटिस से पीड़ित हैं। पचास से कम उम्र के पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में रूमेटीइड आर्थराइटिस होने की चार से पांच गुना ज्यादा संभावना होती है और साठ की उम्र के बाद दोगुना खतरा बढ़ जाता है। साथ ही ऑस्टियोआर्थराइटिस का दर्द महिलाएं, पुरुषों के मुकाबले ज्यादा सहन करती हैं।

महिलाओं में ऑर्थराइटिस ज्यादातर हाथ और घुटनों में देखने को मिलता है। कई अध्ययनों से पता चलता है कि फीमेल हॉर्मोन हड्डियों के बीच ज्वाइंट पर प्रभाव डालते हैं जिससे जोड़ों को आराम से चलने में मदद मिलती है।

180 मिलियन लोग आर्थराइटिस से प्रभावित

भारत में महिलाओं में ऑस्टियोआर्थराइटिस की समस्या बहुत ही सामान्य हो गई है। 65 वर्ष से अधिक 70 फीसदी महिलाओं में ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षण देखे गए हैं। एक रिसर्च के अनुसार भारत में 180 मिलियन लोग आर्थराइटिस से प्रभावित हैं, एड्स, कैंसर और डायबिटिज से ज्यादा लोग गठिया से ग्रसित है। आर्थराइटिस एक क्रोनिक हेल्थ कंडीशन है। महिलाओं में इस स्थिति से अधिक प्रभावित होने की वजह से लैंगिक असमानता उन अंतर्निहित कारकों के बारे में सवाल उठाती है जो इस स्थिति में महिलाओं के प्रति अधिक संवेदनशीलता में योगदान दे सकती है।  

आर्थराइटिस यानी गठिया जोड़ों में सूजन और कोमलता है। इसका मुख्य लक्षण जोड़ों में दर्द और अकड़न है जो उम्र के साथ बहुत जटिल हो जाती है। गठिया कई प्रकार ही होती है। मायो क्लीनिक में छपी जानकारी के अनुसार सबसे कॉमन ऑस्टियोआर्थराइटिस और रूमेटीइड आर्थराइटिस है। आर्थराइटिस के मुख्य लक्षण दर्द, सूजन, त्वचा का लाल रंग होना, जकड़न आदि। हालांकि इसका कोई सटीक कारण नहीं है कि महिलाओं में इसका ज्यादा खतरा क्यों है लेकिन ऐसे कई कारक है जो इसमें योगदान दे सकते हैं। पारिवारिक इतिहास यानी जेनेटिक से लेकर हार्मोनल अंतर से लेकर कुछ सिद्धांतों पर चर्चा की गई है कि महिलाओं में पुरुषों की तुलना में जोखिम ज्यादा क्यों है?

ऑस्टियोऑर्थराइटिस की महिलाओं को ज्यादा परेशानी क्यों

तस्वीर साभारः Healthcare Radius

महिलाओं में ऑर्थराइटिस की समस्या पुरुषों के मुकाबले देरी से आती है लेकिन इसके लक्षणों में तेजी से वृद्धि होती है और महिलाओं को ये एकदम से ज्यादा प्रभावित करती है। इतना ही नहीं पुरुषों के मुकाबले उन्हें ज्यादा दर्द का सामना करना पड़ता है। महिलाओं में ऑर्थराइटिस ज्यादातर हाथ और घुटनों में देखने को मिलता है। कई अध्ययनों से पता चलता है कि फीमेल हॉर्मोन हड्डियों के बीच ज्वाइंट पर प्रभाव डालते हैं जिससे जोड़ों को आराम से चलने में मदद मिलती है। हालांकि महिला हॉर्मोन एस्ट्रोजन कॉर्टिलेज को सूजन से बचाता है। महिलाओं में मेनोपॉज के बाद एस्ट्रोजन लेवल कम हो जाता है जिससे वह सुरक्षा खो देती है। रिसर्चर वर्तमान में अन्य निष्कर्षों में पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कैसे हॉर्मोन गठिया के जोखिम को आकार देते हैं। अन्य स्टडी में सुझाव दिया गया है कि हॉर्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी, ओरल कॉन्ट्रासेप्टिव, ब्रेस्टफ्रीडिंग आदि भी इसका कारक है।

अपनी शारीरिक रचना के कारण पुरुषों के मुकाबले महिलाओं को गठिया होने की ज्यादा संभावना भी होती है। महिलाओं के जोड़ों का आकार पुरुषों के मुकाबले छोटा होता है जिसका मतलब होता है कि उनकी हड्डियों में कम कॉर्टिलेस होता है। साथ ही जीवनचर्या भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। अधिक ऊंची एडी के चप्पल पहनने और बड़ा भारी बैग हमेशा साथ लेने से जोड़ों में जकड़न की समस्या पैदा हो जाती है। एक समय बाद इस तरह की स्थिति जोड़ों को नुकसान पहुंचा देती है और गठिया होने का खतरा बना रहता है।

लैंगिक भूमिका और आर्थराइटिस का संबंध

तस्वीर साभारः RACGP

वैज्ञानिक दृष्टि से आर्थराइटिस यानी गठिया बीमारी के कारण अनेक है हालांकि इसके महिलाओं में अधिक होने को लेकर अनेक मिथक भी मौजूद है। अक्सर महिलाओं में गठिया होने की वजह कैल्शियम में कमी को बताया जाता है। लेकिन हां कैल्शियम और विटामिन की कमी शरीर में कमजोरी आती है जो धीरे-धीरे एक थकावट बन  जाती है। रूमेटीइड के मरीजों में सबसे आम कमी फोलिक एसिड, विटामिन (सी,डी,बी-6, बी-12 और ई) कैल्शिमय और मैग्नीशियम जिंक हैं। मरीज शुरुआती अवस्था में अगर इन स्थिति का ध्यान रखेंगे तो स्थिति को संभाला जा सकता है।

वहीं महिलाओं की स्थिति में कमज़ोरी और थकान के लक्षणों को सबसे पहले नज़रअंदाज़ किया जाता है। साथ ही लैंगिक भूमिका, अपने स्वास्थ्य को नज़रअंदाज या कमतर करने की कंडीशनिंग की वजह से स्थिति बहुत खराब हो जाती है। लंबे समय से गठिया का दर्द सहन करने वाली अनिता का कहना है, “आज मेरी यह स्थिति हो गई है कि ये चार दीवारी ही दुनिया बन गई है। मुझे आसमान देखे हुए महीनों हो जाते हैं। दरअसल जब मेरी तबीयत खराब होनी शुरू हुई थी तब इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया गया। मेरे दर्द को कभी बहाना समझ लिया जाता, कभी दवाई खाकर काम कर लो उसके बाद आराम कर लेना यह कह कर इसको गंभीरता से नहीं लिया गया। जैसे-जैसे वक्त बीतता गया हाथ-पैर मुड़ने शुरू हुए तब जाकर तो मुझे पहली बार सही तरीके से डॉक्टर का इलाज मिला। आज जो हालत है उसको तो बस सहन कर रही हूं। इलाज में बहुत लाहपरवाही रही एक सही डॉक्टर को टिक कर नहीं दिखाया गया। दर्द बहुत बुरा होता है अब हड्डियों से चट-चट की आवाज़ आने लगी है सर्दिया में तो स्थिति और भी ज्यादा बुरी हो जाती है। बस दवाई खाकर काम कर रही हूं। ये इसलिए भी ज़रूरी है कि अगर बिलकुल चलना और फिरना बंद कर दूंगी तो पूरी तरह से रूक जाऊंगी। थोड़ी-थोड़ी कोशिश करना बहुत बेहतर लगता है।”

65 वर्ष से अधिक 70 फीसदी महिलाएं में ऑस्टियोआर्थराइटिस के लक्षण देखे गए हैं। एक रिसर्च के अनुसार भारत में 180 मिलियन लोग आर्थराइटिस से प्रभावित हैं, एड्स, कैंसर और डायबिटिज से ज्यादा लोग गठिया से ग्रसित है।

आर्थराइटिस बीमारी का शारीरिक और मनोसामाजिक स्थिति पर भी असर पड़ता है। बॉडी इमेज, पेन और लेवल ऑफ रिसोर्स अमंग आर्थराइटिस पेशेंटः द मॉडरेटिंग रोल ऑफ जेंडर के नाम से प्रकाशित लेख के अनुसार इस अध्ययन में गठिया रोगियों के बीच बॉडी इमेज, सब्जेक्टिव दर्द सहने की क्षमता और सीओरआर थ्योरी पर ध्यान दिया गया है। इस विश्लेषण में जेंडर की भूमिका पर विशेष ध्यान दिया गया। इसमें 141 महिला और 59 पुरुष आर्थराइटिस का सामना कर रहे लोगों को शामिल किया गया। शामिल लोगों के बीच बॉडी इमेज की संतुष्टि के स्तर और दर्द की तीव्रता के बीच एक नकारात्मक संबंध की पुष्टि की गई। बॉडी इमेज और दर्द के बीच सकारात्मक संबंध केवल पुरुषों के बीच देखे गए। लेख में कहा गया है कि शरीर के बारे में जगारूकता बढ़ाना आर्थराइटिस के रोगियों के लिए मनोवैज्ञानिक परामर्श का एक ज़रूरी हिस्सा है। 

इस तरह की स्थिति यह स्पष्ट करती है कि हर बीमारी के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक प्रभाव प्रत्येक व्यक्ति पर अलग तरीके से पड़ते हैं। इसे पहचान कर और इस पर बात करने की बहुत ज्यादा आवश्यकता है। जैविक रूप से महिलाओं के शारीरिक संरचना के बदलावों को स्वीकारते हुए उनके स्वास्थ्य की स्थिति को स्वीकारना समय पर बहुत ज़रूरी है। आर्थराइटिस के मामलों में महिलाओं को सही इलाज न मिलना, लाहपरवाही आदि उनकी शारीरिक और मानसिक दोनों स्थिति को प्रभावित करती है। 


स्रोतः

  1. Intermountain Health
  2. Hindustan Times
  3. Campbell County Health 

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