इंटरसेक्शनलजेंडर लैंगिक हिंसा का एक क्रूर रूप है स्त्रियों को सरेआम निर्वस्त्र करना

लैंगिक हिंसा का एक क्रूर रूप है स्त्रियों को सरेआम निर्वस्त्र करना

अगर इस घटना को भारतीय समाज के चलन की तरह देखा जाए तो इसमें कुछ नया नहीं है। पहले भी और यहां तक कि आज भी यहां आए दिन इस तरह की खबरें आती रहती हैं जिसमें स्त्री को कभी डायन के नाम पर ,कभी भूत-प्रेत टोना-टोटका के नाम पर या कभी इसी तरह उसके प्रेम करने के चयन को लेकर ऐसी दुर्दांत सजा दी जाती है।

भारतीय समाज में स्त्री की देह स्त्री की पहचान में पूरी तरह नत्थी है। उससे अलग एक सामान्य मनुष्य होने की पहचान में उसे देख पाना इस पुरुषवादी समाज के लिए मुमकिन ही नहीं हो सका है। एक मर्दवादी समाज पहले स्त्री के भीतर देह को लेकर तमाम तरह की शर्म भरता है। फिर उसी स्त्री को सजा के तौर पर उसी लाज-शर्म को खींचकर देह को उघाड़कर सरेआम दिखाया जाता है। जो समाज स्त्री के छोटे कपड़े पहनने को लेकर नाराज़ होता है वही समाज उसे निर्वस्त्र भी करता है। स्त्री को यौनिक सजा देना उसकी सबसे चहेती फैंटसी है। आंकड़ों के अनुसार जिस देश में हर घंटे एक बलात्कार होता है वहां के लिए स्त्री को निर्वस्त्र करके घुमाने की घटना उसी आपराधिक क्रिया का दूसरा रूप है।

अभी कुछ दिन पहले राजस्थान से एक वीडियो वायरल होता है जिसमें एक स्त्री को जबरन निर्वस्त्र किया जा रहा है। स्त्री का चेहरा घूंघट में है जैसा कि स्त्री का घूंघट में रहना सामन्ती इलाकों की शान समझा जाता है। इस देश के मर्दवादी पठारों की मर्यादा माना जाता है। ये वही अन्याय में ढली परंपरा है जिसमें चीखती स्त्री को निर्वस्त्र किया जा रहा है और सामने खड़ी भीड़ चुपचाप वीडियो बना रही है। भीड़ इस हिंसा को, इस क्रूरता को रोमांच भरा तमाशा मान आनंद ले रही है। घटना राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के धरियावद की है। रिपोर्ट के मुताबिक स्त्री छह महीने की गर्भवती थी और सजा के तौर पर महिला को निर्वस्त्र कर घुमाया गया। ऐसा करने वाला व्यक्ति स्त्री का पति ही था जिसने स्त्री को निर्वस्त्र करके पूरे गाँव के समाज के सामने लगभग एक कि.मी तक दौड़ाया। यह घटना 31 अगस्त को हुई थी लेकिन बीते हफ्ते वीडियो वायरल होने के बाद मामले का खुलासा हुआ।

अगर इस घटना को भारतीय समाज के चलन की तरह देखा जाए तो इसमें कुछ नया नहीं है। पहले भी और यहां तक कि आज भी यहां आए दिन इस तरह की खबरें आती रहती हैं जिसमें स्त्री को कभी डायन के नाम पर ,कभी भूत-प्रेत टोना-टोटका के नाम पर या कभी इसी तरह उसके प्रेम करने के चयन को लेकर ऐसी दुर्दांत सजा दी जाती है। हमारे यहां किसी भी वर्ग की स्त्री के लिए पुरुष नियंत्रक है उनकी सोच और समाज की पारम्परिक सोच के दायरे में स्त्री अपनी इच्छा से जीने के लिए बनी ही नहीं है। यहां हर वर्ग का पुरुष स्त्री को अपने शासन में रखना चाहता है समाज में हर पुरुष पति परमेश्वर की भूमिका में ही रहना चाहता है लेकिन फिर भी वर्गीय ढांचे में अगर स्त्री अपराध के आंकड़ों का अध्ययन किया जाए तो पता चलता है कि हाशिये की स्त्री के साथ इस तरह के दुर्दांत अपराध ज्यादा होते हैं।

स्त्री को निर्वस्त्र करके घुमाना, उसके जननांगों को दागना, मुंह पर कालिख पोतना, गधे पर बिठाना जैसी घटनाएं महज इसीलिए होती रही हैं क्योंकि पुरुष स्त्री को अपनी इच्छा और सामान्य ज़रूरत से बना मनुष्य मानता ही नहीं उसे अपनी संपत्ति समझता है। आज भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी वह अपने सामन्ती मूल्यों को ही स्त्री पर लादना चाहता है और ये स्त्री को नियंत्रित करने का ऐसा वीभत्स रूप सामने आता है।

समाज की संरचना में देखे तो हर वर्ग में पुरुष प्रवृत्ति एक ही दिखती है लेकिन जहां प्रतिरोध ज्यादा है वहां जाहिर है कि दमन भी ज्यादा होगा। वरना तो सवर्ण घरों की स्त्रियों के साथ कम अन्याय के आंकड़े नहीं हैं,लेकिन वहां सहना स्त्री की मर्यादा का मूल होता है जहां से विशेष प्रतिरोध नहीं उठता वहां से दमन की घटनाओं की खबरें भी दबा दी जाती हैं। हाशिये की स्त्रियां अपने जीवन में ज्यादा संघर्षशील होती है क्योंकि वहां जीवन कठिन होता है लेकिन चयन और इच्छा को लेकर मध्यवर्गीय या निम्नमध्यवर्गीय स्त्री से ज्यादा सजग होती है।

जब इन दिनों स्त्री को निर्वस्त्र करके घुमाने की घटनाओं को लेकर दो खबरें लगातार आईं तो मुझे बचपन में गाँव में देखी कुछ इस तरह हिंसा की घटनाओं की याद आई। हमारे पड़ोस में ही एक स्त्री गाँव में शहर से ब्याह करके आई थीं। घरवालों ने पता नहीं किया कि उनके पति खूब नशा करते थे । एक दिन वे किसी बात से नाराज होकर गुस्से से अपनी पत्नी को पीटने लगे। पिटती हुई पत्नी का आँचल देह से गिर गया तो उसने हड़बड़ाहट में आंचल संभालते हुए थोड़ा सा पति को धक्का दे दिया तब तो वह गुस्से में अपना आपा ही खो बैठे। पत्नी को दुवारे खींचकर लाए और उनकी साड़ी देह से खींच दी। गाँव में स्त्री नयी ब्याह कर आई थीं, गाँव के चलन से हमेशा घूँघट में रहती थीं। अचानक घर के बाहर देह से साड़ी खिंच जाने के भय से चीख पड़ीं। हम लोग हमेशा उनको घेरे रहते थे। उनको चीखता देख हम भय से उनकी देह से लिपट गए।

अगर इस घटना को भारतीय समाज के चलन की तरह देखा जाए तो इसमें कुछ नया नहीं है। पहले भी और यहां तक कि आज भी यहां आए दिन इस तरह की खबरें आती रहती हैं जिसमें स्त्री को कभी डायन के नाम पर ,कभी भूत-प्रेत टोना-टोटका के नाम पर या कभी इसी तरह उसके प्रेम करने के चयन को लेकर ऐसी दुर्दांत सजा दी जाती है।

इसी तरह इसी गाँव की एक और घटना है। रानी देवी (बदला हुआ नाम) मुंबई में रहकर एक कंपनी में वर्कर का काम करती हैं। वह ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हैं लेकिन एक आत्मनिर्भर महिला हैं। उनके पति बेरोजगार हैं लेकिन मर्दवादी ढांचे में ढले पुरुष हैं। इसी साल गर्मियों में दोनों घर की एक शादी में शामिल होने आए थे। वह किसी बात से नाराज़ होकर पत्नी रानी को बहुत भयानक तरीके पीटने लगे तो रानी ने भी प्रतिरोध में हाथ उठा दिया। गाँव-घर की स्त्रियों ने उस पल तो बीच बचाव कर दिया लेकिन बाद में वह पत्नी को छोड़ने, जान देने-लेने की बात करता ही रहा। अंत में गाँव में सबके यह कहने पर कि औरत ने हाथ उठाकर गलती कि वह पति के पैर पर गिरकर माफी मांग तो किसी तरह पति इस पर राजी हुआ लेकिन जब दुवारे सबके सामने ये प्रसंग चल रहा तो उसने माफ़ करने की ये शर्त रखी कि पत्नी जमीन पर थूककर चाटे, तब वह माफ करेगा। इस घटना की विडम्बना देखिए कि गाँव में सबने पत्नी से ये मानवीय गरिमा के विरुद्ध यह कृत्य करवाया। ऐसे आपराधिक कृत्यों के बीच स्त्री समाज में कितनी अकेली खड़ी होती है। कई बार ऐसा देखा गया है कि ऐसे अपराधों में समाज की पितृसत्तात्मक सोच की स्त्री भी शामिल होती है।

कई जगहों पर स्त्री अगर अपनी इच्छा से विवाहेत्तर संबंध बनाती है तो वहां उनके जननांगों को दागने की क्रूर प्रथा थी। हालांकि, यह प्रथा हर जगह चलन में नहीं थी लेकिन बहुत सी स्त्रियां अब भी हैं जो बताती हैं कि जिनके अंगों को उनके पतियों ने निर्वस्त्र करके दाग दिया था। कुछ जगहों पर तो बाकायदा ये चलन था कि औरत अगर किसी से संबंध बना रही है तो उसके जननांगों को दाग करके ही छोड़ा जाए। जौनपुर ज़िले की शालिनी (बदला हुआ नाम) एक शिक्षित और जागरूक स्त्री हैं। विवाह के बाद उनका पति बाहर ही रहकर नौकरी करता था। वहांअलग-अलग स्त्रियों से उसके संबंध थे। शालिनी को वह कभी साथ लेकर नहीं जाता था। अकेलेपन और निराशा से घिरी शालिनी की फोन पर किसी पुरुष से बातचीत होने लगी। कहीं से उनके पति के घरवालों को इस बात का पता चला बस फिर तो शालिनी के लिए एक ही सजा तय की गई कि उसे निर्वस्त्र करके दाग दिया जाए, तब छोड़ा जाए। हालांकि ससुरालवालों की ये मंशा पूरी नहीं हो पाई। पुलिस महिला हेल्पलाइन नंबर का सहारा लिया गया किसी तरह से ससुराल के घर से उन्हें निकाला गया।

स्त्री को निर्वस्त्र करके घुमाना, उसके जननांगों को दागना, मुंह पर कालिख पोतना, गधे पर बिठाना जैसी घटनाएं महज इसीलिए होती रही हैं क्योंकि पुरुष स्त्री को अपनी इच्छा और सामान्य ज़रूरत से बना मनुष्य मानता ही नहीं उसे अपनी संपत्ति समझता है। आज भी इस लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी वह अपने सामन्ती मूल्यों को ही स्त्री पर लादना चाहता है और ये स्त्री को नियंत्रित करने का ऐसा वीभत्स रूप सामने आता है। आज स्त्रियों के ख़िलाफ़ तेज़ी से बढ़ती आपराधिक घटनाएं हो रही हैं तो इसका मूल इस समाज की संरचना में ही छिपा है।

समाज की स्त्रीजनित गालियों में समाज के इस तरह अपराध का मनोविज्ञान छिपा हुआ है। स्त्री के लिए निर्वस्त्र करके मारने की गालीजनित भाषा यहां खूब प्रचलन में रही है। भाषा और बोलियां समाज की स्त्रियों के ख़िलाफ़ आपराधिक फैंटसी का सबसे सटीक भेद खोलती हैं। समाज की लोकभाषा की सर्चलाइट की रोशनी से समाज की कुंठाओं को देखा जाए तो इन अपराधों की जड़ मिल जाती है। आज जब सत्ता और बाजार दोंनो स्त्रियों को पीछे धकेलने की फिराक में है तो हम स्त्रियों की मुक्ति का संघर्ष भी बहुत कठिन होता जा रहा है। आज स्त्रियों को सड़ी-गली परंपराओं के ख़िलाफ़ एकजुट होकर खड़ा होना होगा नये मानव मूल्यों की स्थापना और अपने हक अधिकार की समग्र लड़ाई के सरोकारों और हर बिरादराना आंदोलनों में भागीदारी करनी होगी।


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