ग्राउंड ज़ीरो से राजस्थान में 18 घंटे काम करती खेतिहर महिला मजदूरों का एक दिन

राजस्थान में 18 घंटे काम करती खेतिहर महिला मजदूरों का एक दिन

हिंदुस्तान में महिलाओं की बड़ी संख्या किसानी के पेशे में लगी हुई है। लेकिन मालिकाना हक सबके पास नहीं है। 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार 13.96 प्रतिशत जमीन पर महिलाओं का मालिकाना हक है। वर्ष 2010-11 में यह आंकड़ा 12.79 प्रतिशत का था।

पश्चिमी राजस्थान के गाँव थोबाऊ में सुबह के करीब आठ बज रहे हैं। सपनों की भाँति सूरज भी उग आया है। टूटी-फूटी सड़क पर चहल-पहल नाममात्र की है। कुछ किसान खेतों से घरों की ओर और कुछ घरों से खेतों की जा रहे हैं। सिर पर गगरा रखा हुआ है; हाथ में बड़ा-सा थैला। ज्योति, भात लेकर अपने खेत की ओर जा रही है। जहां सूर्योदय से पहले ही उसकी माँ मुनिया बाजरे की फसल काटने चली गई थी। ज्योति के घर से खेत के बीच की दूरी करीब दो किलोमीटर की है।

ज्योति खेत में पहुंच गई है। मुनिया ने आकर गगरा उतरवाया और पूछा कि आने में इतनी देर क्यों लगा दी। ज्योति ने बताया कि सुबह-सुबह कुछ मेहमान आ गए थे। उनकी सेवा-साकरी में वक्त बीत गया। वहीं सुरका ने अपना हँसिया जमीन पर रखा और ज्योति को पानी पिलाने के लिए कहा। ज्योति, पानी का लोटा भरकर सुरका के पास गई। सुरका ने हाथ धोकर, दोनों हाथों को अपने मुंह से सटा लिया। ज्योति ने पानी की लंबी-सी धार बनाई ताकि लोटा सुरका के संपर्क में न आएँ।

किताबों में इसे ‘अस्पृश्यता’ कहा गया है और सबसे हास्यास्पद बात यह है कि हमारे मुल्क में इसे अपराध भी घोषित किया है। लेकिन, सदियों से चले आ रहे इस अमानवीय बर्ताव को धूमधाम से बरता जा रहा है। सुरका का परिवार काश्तकारी करता है। विरासत में मिली जमीन का आकार बहुत छोटा है। इसलिए गुजारा नहीं हो पाता है। गाँव में तथाकथिक ऊंची जाति के किसानों के पास ठीक-ठाक ज़मीन है। सुरका का परिवार इन खेतों में काम करता है। बदले में चौथा हिस्सा मिलता है।

भगाराम कहते है, “जब बारिश की जरूरत होती है तब बारिश आती नहीं है। और जब ज़रूरत नहीं होती है तब बारिश के आने की संभावना बढ़ जाती है। इस साल बरसात के सीजन में ट्यूबवेल के पानी से फसल को जिंदा रखा है। अब अगर बरसात आ जाती है तो सारी मेहनत मिट्टी में मिल जाएंगी।”

चार महीनों की मेहनत को बचाने की कोशिश

तस्वीर में बाजरे के खेत में काम करते हुए ज्योति।

थार, मरुस्थल का इलाका। जून महीने की गर्मी। किसान बारिश की उम्मीद में खेत तैयार करने लगता है। दीपावली तक इसी फ़सल को देख-देखकर सपने बांधता है। सुरका का कहना है कि कई लोगों ने तूफान (बिपरजॉय) की बारिश में फ़सल बो दी थी। कइयों ने मानसून की बरसात का इंतजार किया था। मानसून का क्या ही भरोसा है। पूरे अगस्त महीने में बारिश नहीं हुई। जिन किसानों के पास सिंचाई का विकल्प नहीं था उनकी खड़ी फसल ठूंठ हो गई। चार महीनों के कठिन परिश्रम के बाद अब फसल को खेतों से घर लेकर जाना है।

करीब नौ बज चुके हैं। हाथ में बीड़ी पकड़े हुए, कंधे पर गमछा रखे एक आदमी आ रहा है। सुरका ने घूंघट निकाल लिया।सुरका के पति भगाराम आए हैं। भगाराम ने आते ही आसमान की तरफ़ देखते हुए बारिश के आने की आशंका जताई। भगाराम कहते है, “जब बारिश की जरूरत होती है तब बारिश आती नहीं है। और जब ज़रूरत नहीं होती है तब बारिश के आने की संभावना बढ़ जाती है। इस साल बरसात के सीजन में ट्यूबवेल के पानी से फसल को जिंदा रखा है। अब अगर बरसात आ जाती है तो सारी मेहनत मिट्टी में मिल जाएंगी।”

इन महिला किसानों के दिन की शुरुआत कब होती है?

तस्वीर में ज्योति पशुओं का गोबर उठाते हुए।

दिन के बारह बज चुके हैं। सूरज की किरणें सीधी माथे पर पड़ रही हैं। सभी पसीने से लथपथ हो चुके हैं। खेजड़ी की छांव में आ जाते हैं। ज्योति थैले में से बाजरी की रोटी, मतीरे की सब्जी और छाछ निकालती है। सुरका भी अपना भात खाने लगती है। मुनिया बताती है कि वह चार बजे उठ जाती है। अपनी बेटी के साथ पशुओं को सानी-पानी डालती है। फिर दूध दूह कर मुनिया अंधेरे–अंधेरे ही खेत में आ जाती है। ज्योति, घर के कामों को निपटाने में जुट जाती है। दूध गर्म करना, पशुओं के गोबर फेंकना, दही मथना, बर्तन धोना और रोटी बनाकर खेत की तरफ आ जाती है। घड़ी की सुई करीब एक बजे के आस-पास मंडरा रही है। सुरका, मुनिया और ज्योति फिर से तपिश का सामना करने निकली पड़ी हैं।

भगाराम घर चले गए हैं। कभी-कभार मुनिया की पड़ोसी महिलाएं भी हाथ बटाने आ जाती हैं। यहां एक दूसरे के सुख-दुख पर बात की जाती है। हँसी–ठिठौली का माहौल सूरज की गर्मी से निजात दिलाने की कोशिश करता है। बीच-बीच में ज्योति मोबाइल में गाने भी चला लेती है। ज्योति मुश्किल से आठवीं पास कर पायी थी और उसके बाद से घर और खेती के कामों में लगी हुई है। करीब पाँच बजने को है। ज्योति ने पशुओं के लिए घास काट ली है। मुनिया उसे उठवा कर ज्योति के सिर पर रख देती है। खुद लकड़ियों का गट्ठर अपने सिर पर रखती है। चप्पलों से धूल उछल रही है। थकान के थपेड़े चेहरे पर साफ़-साफ़ दिख रहे हैं। ज्योति के पिता सोनाराम ने पशुओं को पानी पिलाकर ठिकाने पर बांध दिया था।

ज्योति ने घास की गठरी खोल कर दुधारू पशुओं के सामने बिखेर दिया। सोनाराम दूध लेकर गाँव जा रहे हैं। डेयरी पर बेचने के लिए। ज्योति चूल्हे में लकड़ी डालकर आग जलाती है। खाना बनाने लग जाती है। जब तक ज्योति खाना बना लेती है तब तक मुनिया पशुओं की सार-संभाल ले लेती है। आठ बजे के करीब रोटी नसीब होती है। खाने के बाद मुनिया बर्तनों को साफ करने लग जाती है। और ज्योति कपड़े धोने चली जाती है। ऐसे ही दौड़-भाग करते हुए रात के 10 बज जाते हैं। चारों ओर घुप्प अंधेरा है। ज्योति, सुरका और मुनिया जैसी लाखों महिलाएं इस अंधेरे को चीरने की नाकामयाब कोशिश कर रही हैं। खेती-किसानी में अदृश्य इन महिलाओं के काम पर चर्चा नहीं होती है क्योंकि हमारे समाज में किसान का सिर्फ एक ही जेंडर है- पुरुष।

किसानों के ऊपर जब भी बात की जाती है तब उस बातचीत का दायरा बहुत सीमित हो जाता है। सिर्फ ‘पुरुष’ किसान को ही किसानों का एकमात्र प्रतिनिधि मान लिया जाता है। ऐसा क्यों? तमाम अखबारों से लेकर टीवी चैनलों के चित्रपटों पर ‘पुरुष’ किसान ही पूरे कृषक समुदाय का प्रतिनिधित्व कर रहा होता है। क्या इस देश की खेती-बाड़ी में महिलाओं का कोई योगदान नहीं है? पीढ़ी दर पीढ़ी महिलाएं खेती और घर के काम साथ-साथ संभाल रही हैं। इन महिलाओं ने हिंदुस्तान के कृषि क्षेत्र को मजबूती दी फिर उनके योगदान को क्यों नज़रअंदाज़ किया गया? गौर करने वाली बात यह है कि हाशिये पर केवल महिला किसानों को ही नहीं धकेला है बल्कि उनके साथ-साथ बटाईदार किसानों (Sharecroppers) की भी उपेक्षा की जाती है।

क्या किसान का भी कोई जेंडर होता है

क्या किसान का भी कोई जेंडर (लिंग) होता है? सवाल सुनने में भले ही अटपटा लग रहा हो लेकिन, सच्चाई यही है। हमारे मन-मस्तिष्क में यह बिठा दिया गया है कि किसान माने पुरुष। सरकारी योजनाओं के विज्ञापनों में किसान का अर्थ है हँसता-मुस्कुराता पुरुष। समाचार पत्रों में, किसान से जुड़ी खबरों में पुरुष किसानों का ही वर्चस्व रहता है। इसीलिए किसान के जेंडर की ओर ध्यान खींचा ही नहीं जाता है। तो पहला सवाल यह है कि इस देश में महिला किसानों की संख्या कितनी है?

तस्वीर में सुरका घास ले जाती हुई।  

साल 2011 की जनगणना के अनुसार, कुल महिला श्रमिकों में से 65.1 प्रतिशत महिलाएं खेती-बाड़ी का काम करती हैं। वहीं कुल पुरुष श्रमिकों में 49.8% पुरुष किसानी करते हैं। भारत में खेती-बाड़ी करने वालों की कुल संख्या करीब 26.2 करोड़ है। जिसमें 11.8 करोड़ खेतिहर (Cultivators) हैं और 14.4 करोड़ खेतिहर मजदूर। कृषि क्षेत्र में काम कर रहे कुल खेतिहर मजदूरों में महिलाओं की हिस्सेदारी 42.6 प्रतिशत की है। यानी कुल 6.1 करोड़ महिलाएं खेतिहर मजदूर के रूप में काम करती हैं। कुल खेतिहर किसानों में महिलाओं का अनुपात 30.3 प्रतिशत है।

खेतिहर कौन है? परिभाषा के मुताबिक़ वह व्यक्ति जो सरकारी मालिकाने अथवा निजी मालिकाने या किसी संस्था के मालिकाने की जमीन पर कृषि काम करता है और इसके एवज में भुगतान हासिल करता है जो नकदी या अन्य रूप में अथवा ऊपज के हिस्से के रूप में हो सकता है। वहीं खेतिहर मजदूर कौन है। ऐसा मजदूर जो किसी दूसरे व्यक्ति (खेतिहर किसान) की जमीन पर नकद या एक खास हिस्से के बदले में फ़सल उगाता है। खेतिहर मजदूर को खेती में कोई जोखिम नहीं होता है। वो केवल मजदूरी की एवज में काम करता है। खेतिहर मजदूर के पास को उक्त भूमि पर न तो पट्टे का और न अनुबंध का अधिकार होता है।

खेतिहर मजदूरों का बढ़ता श्रमबल

2011 की जनगणना के आंकड़ों की तुलना 2001 की जनगणना के आंकड़ों से करने पर यह ज्ञात हुआ कि खेतिहरों की संख्या में गिरावट आ रही है, तो वहीं खेतिहर मजदूरों की संख्या में बढ़ोतरी देखी गई। खेतिहर मजदूरों की संख्या में 35 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। साल 2001 की जनगणना के समय इनकी संख्या 10.6 करोड़ थी जो कि बढ़कर 2011 की जनगणना के समय 14.3 करोड़ हो जाती है। वर्ष 1951 की जनगणना के समय कुल श्रमबल में खेतिहर मजदूरों का अनुपात 19 प्रतिशत था जो कि 2011 की जनगणना तक आते-आते बढ़कर 30 प्रतिशत हो जाता है।

खेतिहरों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है। 2001 की जनगणना में खेतिहरों की संख्या 12.7 करोड़ थी जो कि घटकर वर्ष 2011 में 11.8 करोड़ हो जाती है। साल 1951 की जनगणना के अनुसार, कुल खेतिहरों की संख्या कुल श्रम बल का 50 प्रतिशत थी जो कि वर्ष 2011 में घटकर 24 प्रतिशत हो जाती है। लैंगिक नजरिये से देखें तो महिला खेतिहरों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है। 2011 की जनगणना के अनुसार कुल खेतिहरों की संख्या 11.8 करोड़ है और खेतिहर मजदूरों की संख्या 14.4 करोड़ यानी कुल किसानों की संख्या 26.2 करोड़। अगर इसमें वृक्षारोपण, पशुधन, वानिकी, मछली पालन जैसी गतिविधियों में संलग्न लोगों को शामिल कर दे तो यह संख्या 26.8 करोड़ हो जाती है।

ग्रामीण इलाके की 73.2 प्रतिशत महिलाएं खेती–बाड़ी का काम कर रही थीं। हाल ही में NSO ने PLFS रिपोर्ट 2022-23 जारी की है। उसमें यह अनुपात बढ़कर 76.2 % हो गया है। ऑक्सफेम इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कि भारत में, 85% ग्रामीण महिलाएं कृषि में लगी हुई हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या लगभग 121 करोड़ थी। अगर खेती-बाड़ी करने वालों का अनुपात निकाला जाए तो 22.1 प्रतिशत का आंकड़ा आता है। फिर सवाल यह उठता है कि भारत को कृषि प्रधान राष्ट्र कैसे कहे, किसान की परिभाषा क्या है। यही सवाल जब केंद्र सरकार से किया गया था तब कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला था। आज भी किसान की परिभाषा एक अनसुलझी गुत्थी बनी हुई है। इसीलिए किसानों की संख्या भी एकरूपता देखने को नहीं मिलती है।

कितनी महिलाओं के पास कृषि भूमि का मालिकाना अधिकार

आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) की वार्षिक रिपोर्ट (जुलाई 2021–जून 2022) कहती है कि ग्रामीण इलाकों में करीब 59 प्रतिशत श्रमिक कृषि क्षेत्र में काम करते हैं। महिलाओं के संदर्भ में यह आँकड़ा बढ़ जाता है; 75.9 प्रतिशत महिलाएं कृषि क्षेत्र में काम करती हैं। वहीं 2017–18 की रिपोर्ट कहती है कि ग्रामीण इलाके की 73.2 प्रतिशत महिलाएं खेती-बाड़ी का काम कर रही थीं। हाल ही में NSO ने PLFS रिपोर्ट 2022-23 जारी की है। उसमें यह अनुपात बढ़कर 76.2 % हो गया है। ऑक्सफेम इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ कि भारत में, 85% ग्रामीण महिलाएं कृषि में लगी हुई हैं।

हिंदुस्तान में महिलाओं की बड़ी संख्या किसानी के पेशे में लगी हुई है। लेकिन मालिकाना हक सबके पास नहीं है। 2015-16 की कृषि जनगणना के अनुसार 13.96 प्रतिशत जमीन पर महिलाओं का मालिकाना हक है। वर्ष 2010-11 में यह आंकड़ा 12.79 प्रतिशत का था। उपरोक्त ग्राफ में महिलाओं के मालिकाना हक में आ रही बढ़ोतरी को दर्शाया है। हालाँकि, राज्यवार अधिक विविधता मौजूद है, जिसे संबोधित करने की आवश्यकता है। पंजाब में 98.4 प्रतिशत और पश्चिम बंगाल में 96.8 प्रतिशत भूमि जोत पुरुषों के नाम दर्ज है। वहीं महिलाओं के पास सबसे अधिक मालिकाना हक आंध्र प्रदेश राज्य (69.9%) है।

मालिकाना हक नहीं होने का खामियाजा

सारी सरकारी योजनाओं (जैसे पीएम किसान योजना) का लाभ भूमि धारक शख्स को मिलता है। चूँकि 87 प्रतिशत के करीब मालिकाना हक पुरुषों के पास है। ऐसे में सरकारी योजनाओं का लाभ पुरुष को मिल जाता है। प्राकृतिक और मानवीय आपदाओं के कारण मिलने वाला बीमा भी भूधारक को ही मिलता है। जमीन केवल पुरुषों की होती है और महिलाएं का खेती-जमीन पर अधिकार न होने के कारण वह अनेक सरकारी योजनाओं के लाभ उठाने से वंचित है। पितृसत्ता की इस अवधारणा के कारण महिलाएं खेतों में मजदूर पीढ़ी दर पीढ़ी बनी हुई है और सस्ती मजदूरी का विकल्प भी। 


नोटः लेख में शामिल सारी तस्वीरें अशोक कुमार ने उपलब्ध करवाई हैं।

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