संस्कृतिकिताबें मैं एक कारसेवक था: कारसेवक से दलित चिन्तक बनने तक की यात्रा  

मैं एक कारसेवक था: कारसेवक से दलित चिन्तक बनने तक की यात्रा  

किताब के आधार पर लेखक की जिन्दगी को तीन भागों में बाँट सकते हैं; पहला, आरएसएस के साथ, दूसरा, आरएसएस से मोहभंग और तीसरा दलित चिन्तक के रूप में। वो क्या मनोस्थिति रही होगी जब ग्यारहवीं में पढ़ने वाला किशोर बिना घर वालों को सूचित किए कारसेवा के लिए अयोध्या निकल जाता है।

हिंदी के साहित्यिक जगत में अन्य विधाओं की तरह ही आत्मकथा लिखने के मामले में भी तथाकथित सवर्ण तबके का ही दबदबा रहा है। सवर्णों में भी सवर्ण पुरुषों का। चूंकि आत्मकथा या जीवनी में व्यक्तिगत उपलब्धियों को पेश किया जाता है। ऐसे में हाशिये पर धकेल दिये गए लोगों के पास जीवन में किए गए कामों की तमाम उपलब्धि के साथ जातिगति पहचान के नाम पर होने वाला शोषण भी आता है। आत्मकथा लिखने की पहली शर्त तो यही होती है कि जहाँ तक संभव हो निष्पक्षता को अपनाया जाए।

भंवर मेघवंशी अपनी पुस्तक ‘मैं एक कारसेवक था’ में उन दिनों के सस्मंरणों को दर्ज करते हैं जब वे राष्ट्रीय स्वंयसेवक में एक सक्रिय कार्यकर्ता थे। मेघवंशी ने अपनी व्यक्तिगत पीड़ा और अपमान को निजी दुश्मनी बनाने के बजाय सामाजिक समानता, अस्मिता एवं गरिमा की सामूहिक लड़ाई बनाना तय किया। लेखक अपनी किशोरावस्था में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बन गए थे। रामजन्म भूमि अभियान ने उन्हें सबसे ज्यादा आकर्षित किया। अयोध्या जाने वाले कारसेवकों के जत्थे में वो शामिल थे इसीलिए आत्मकथा का ही शीर्षक है “मैं एक कारसेवक था।”

किताब में संघ द्वारा आयोजित शाखाओं के बारे में लेखक लिखते है कि आरएसएस जो अपने प्रशिक्षण केंद्रों में युवाओं का आत्मसंरक्षण की ट्रेनिंग देता है उसके कई मायने है। आत्मरक्षा प्रशिक्षण की इस प्रक्रिया में दरअसल वह युवाओं में धार्मिक कट्टरता की भावना को बढ़ावा देने का काम करता है।

इस किताब को पढ़ना संघ की साम्प्रदायिक, फांसीवादी गलियों से होते हुए आंबेडकर की ओर सचेत यात्रा से गुजरना की दास्तां है। लेखक बताते हैं कि समरसता का दिखावा करने वाले इस संगठन में भेदभाव और पाखंड भीतर तक रचा-बसा है। आरएसएस हिन्दुओं में एकजुटता और समरसता का कितना ही दिखावा कर ले असल में दलितों के लिए वही जगह “आरक्षित” है जो जातीय ऊँच-नीच की बिसात पर बसे इस जातिवादी समाज ने हजारों वर्षों से दलितों को दी है। संघ के लिए समरसता का अर्थ यही है कि हर जाति अपना तयशुदा नियत काम करे। संघ हिन्दू हित से ज्यादा सवर्ण वर्चस्व को बनाए रखने का आकांक्षी है।

तस्वीर साभारः Flipkart

किताब के आधार पर लेखक की जिन्दगी को तीन भागों में बाँट सकते हैं; पहला, आरएसएस के साथ, दूसरा, आरएसएस से मोहभंग और तीसरा दलित चिन्तक के रूप में। वो क्या मनोस्थिति रही होगी जब ग्यारहवीं में पढ़ने वाला किशोर बिना घर वालों को सूचित किए कारसेवा के लिए अयोध्या निकल जाता है। उसे जोशीले नारे आकर्षित कर रहे थे। आज भी ऐसे नारे भावनाओं के ज्वार में उबाल भर देते हैं। भंवर लिखते हैं कि हमने भी मुठ्टियाँ बाँधी और पूरा ज़ोर लगाकर चीखें। इस तरह से भंवर जैसे कई दूसरे लोगों का सफर अयोध्या की तरफ़ शुरू हो चुका था। इसी दौर में भंवर दूसरे धर्म के लोगों के प्रति नफ़रत से भरा व्यवहार करते हैं। नफ़रत क्यों? जातिगत भेदभाव के लिए मुग़लों को जिम्मेदार ठहराया जाता है। 

अयोध्या जाने वाली ट्रेन का जिक्र करते हुए वह लिखते हैं कि हमारी बोगी में कुछ अल्पसंख्यक मुसाफिर भी थे हमने उन्हें देखकर खूब नारे लगाएं थे। लेखक लिखते है कि उस वक्त मेरे अंदर बहुत गुस्सा था हर हाल में मैं राम जन्मभूमि की मुक्ति चाहता था और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार था। विचारक नहीं प्रचारक चाहिए शुरुआती अध्यायों में लेखक आरएसएस की कार्यशैली पर विस्तार से लिखते हैं। आरएसएस की शाखाओं में क्या सिखाया जाता है? क्या वहाँ जाति के बन्धनों से ऊपर उठने के लिए प्रेरित किया जाता है? वह लिखते हैं कि आरएसएस में संशय नहीं श्रद्धा का बड़ा महत्त्व है। लेकिन, क्या केवल श्रद्धा का होना काफ़ी है? भंवर घर-बार त्याग कर सन्यासी की तरह जीवन जीते हुए राष्ट्रीय सेवा में स्वयं को समर्पित करने के लिए पूर्णकालिक प्रचारक बनना चाहते थे लेकिन उनकी जाति उनके प्रचारक बनने की राह में बाधा बन गई। 

इस किताब को पढ़ना संघ की साम्प्रदायिक, फांसीवादी गलियों से होते हुए आंबेडकर की ओर सचेत यात्रा से गुजरना की दास्तां है। लेखक बताते हैं कि समरसता का दिखावा करने वाले इस संगठन में भेदभाव और पाखंड भीतर तक रचा-बसा है।

लेखक अपनी किताब में पांचजन्य के बारे में लिखते हुए यह स्वीकार करते हैं कि इस तरह के साहित्य ने मेरे दिमाग को पूरी तरह से कट्टरपंथी बना दिया था। राम जन्मभूमि में खड़ी उस इमारत के प्रति इतना बैर था कि हर तरह से उसे हटाना चाहते थे। किताब में आगे लेखक अपनी गुजरात यात्रा के बारे में भी लिखते है। साल 2000 में गुजरात नरसंहार में दलित एवं आदिवासियों के साथ बड़े पैमाने पर दुर्व्यवहार किया गया उसका ज़िक्र करते है। वे लूटपाट और मारपीट के दौरान मची अफरातफरी में पुलिस की बर्बरता का सामना करने वाले लोगों में इन वर्ग के लोगों को भी मानते हैं।

किताब में संघ द्वारा आयोजित शाखाओं के बारे में लेखक लिखते है कि आरएसएस जो अपने प्रशिक्षण केंद्रों में युवाओं का आत्मसंरक्षण की ट्रेनिंग देता है उसके कई मायने है। आत्मरक्षा प्रशिक्षण की इस प्रक्रिया में दरअसल वह युवाओं में धार्मिक कट्टरता की भावना को बढ़ावा देने का काम करता है। युवाओं में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ भावनाओं को बढ़ाने का काम करता है। कई तरह के प्रोपेगेंडा के आधार युवाओं के मन में स्थापित किया जाता है। धार्मिक रूढ़िवादिता को बढ़ाना और वैज्ञानिक स्वभाव को खारिज करना इनकी परंपरागत विधि रही है।

एक संगठन के रूप में आरएसएस में महिलाओं के लिए कोई जगह नहीं है। महिलाओं के लिए इसका एक अलग संगठन है जिसका नाम राष्ट्रीय सेविका समिति है। स्वयंसेवक, स्वायत्त स्वयंसेवा को दर्शाता है जबकि सेविका एक निचली स्थिति का बोध कराती है, जो केवल दूसरों की सेवा करती है। लेखक कहते है कि हमें पुरुष कैसे बना जा सकता है उस तरह की ट्रेनिंग दी जाती थी यानी पितृसत्ता को कैसे स्थापित किया जा सकता है उसके बारे में बताया जाता था। अपने घर के बने खाने के अपमान के बारे में भी वह लिखते है इससे उन्हें संघ के अतार्किकता और पाखंड का असल दृश्य दिखाता है। बाद में यही वजह बनती है कि वह आरएसएस के संग को छोड़ देते हैं।

समय के साथ वह आंबेडकर, कबीर, फुले और पेरियार की विचारधारा से परिचित होते है और उनके आदर्शों को अपनाते हैं। आरएसएस के ख़िलाफ़ उनका संघर्ष उन्हें विभिन्न स्थानों पर ले जाता हैं जहां उन्होंने अपने दलित बहनों और भाइयों को उस चीज़ पर दावा करने के लिए समर्थन दिया जो उनका सही अधिकार था। उन्होंने सांप्रदायिकता, उत्पीड़न और भेदभाव के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलंद की और जातिवादी समाज में अपने हकों की लड़ाई में शामिल हुए।   

मौजूदा दौर के सामाजिक-राजनीतिक हकीकत को समझने के लिए भी यह किताब बहुत आवश्यक है। आज के दौर में आरएसएस की सत्ता से लेकर समाज की दिशा तय करने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ऐसे में आरएसएस को जानना महत्त्वपूर्ण हो जाता है। भंवर ने आरएसएस के साथ लंबे अरसे तक काम किया है और उन्होंने इस किताब में अपने उन्हीं अनुभवों को दर्ज किया है। इस किताब में उन्होंने सैद्धांतिक और व्यवहारिक दोनों पक्षों को एक साथ रखा है।


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