ग्राउंड ज़ीरो से आगामी लोकसभा चुनाव और महिला मतदाताओं की राजनीतिक चेतना

आगामी लोकसभा चुनाव और महिला मतदाताओं की राजनीतिक चेतना

महिलाएं विचार-विमर्श की प्रक्रिया को योजना बनाने में अपने अनूठे दृष्टिकोण, अनुभव और प्राथमिकताओं के साथ लाती हैं जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया को समृद्धि मिलती है। दूसरी ओर, महिलाओं की अधिक भागीदारी से एक समावेशी समाज और लोकतंत्र को बढ़ावा मिलता है।

लोकतांत्रिक संरचना में चुनाव एक अहम स्तंभ हैं, जो नागरिकों को उनके देश के भविष्य को आकार देने वाले प्रतिनिधियों का चयन करने का अवसर प्रदान करता हैं। महिलाओं की भागीदारी चुनावी प्रक्रिया में महत्वपूर्ण है ताकि राजनीतिक और सामाजिक दोनों स्तर पर उनका प्रतिनिधित्व मजबूत हो सके और एक समावेशी समाज का निर्माण हो सके। पितृसत्ता ने हमेशा महिलाओं को राजनीति से दूर रहने की बात कही है लेकिन एक लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक की राजनीतिक भागीदारी महत्वपूर्ण है। आगामी आम चुनाव को लेकर महिलाएं अपनी भागीदारी किस तरह से देखती है, उनकी राजनीतिक चेतना क्या है और चुनाव के बारे में वह क्या सोचती है, इन विषयों पर फेमिनिज़म इन इंडिया ने कुछ महिलाओं से बातचीत की है।

राजनीति और महिलाएं का प्रतिनिधित्व

भारतीय संविधान ने पुरुषों और महिलाओं को समान अधिकार देने की गारंटी देता है। अलग-अलग संशोधन और अधिनियम महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को बढ़ावा देने के लिए अपनाए गए हैं। 73वें और 74वें संशोधनों के तहत स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए तिहाई आरक्षण की प्रावधान एक प्रमुख कदम रहा है, जो समाज में समानता और न्याय के सिद्धांतों को दर्शाता है। कानूनी प्रावधानों के बावजूद, महिलाएं लोकसभा चुनावों में सक्रिय भागीदारी में कई चुनौतियों का सामना करती है जैसे सामाजिक और सांस्कृतिक बाधाएं, जेंडर स्टीरियोटाइप्स और आर्थिक संसाधनों की कमी अक्सर रुकावट के रूप में कार्य करती हैं। इसके अलावा, व्यक्तिगत सुरक्षा से संबंधित चिंताएं, राजनीति में महिलाओं की नकारात्मक धारणाओं और राजनीतिक पार्टियों से सीमित समर्थन से महिलाओं को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं। 

“मुझे लगता है कि कोई भी सरकार कभी भी औरतों के हक के लिए नहीं सोचती उनको लगता है कि औरतों को समझ नहीं है जो कह दो मान लेंगी पर सच पूछो तो हम सब होशियार हैं, हम ज्यादा पढ़े लिखे नहीं हैं तो क्या हुआ, सही और ग़लत को समझते हैं उसके लिए कोई अख़बार और मोबाइल की ज़रूरत नहीं है।”

महिलाओं की भागीदारी चुनावों में कई कारणों के लिए आवश्यक हैं जैसे जनसंख्या को विविध और समृद्धि संपन्न प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए। महिलाएं विचार-विमर्श की प्रक्रिया को योजना बनाने में अपने अनूठे दृष्टिकोण, अनुभव और प्राथमिकताओं के साथ लाती हैं जिससे निर्णय लेने की प्रक्रिया को समृद्धि मिलती है। दूसरी ओर, महिलाओं की अधिक भागीदारी से एक समावेशी समाज और लोकतंत्र को बढ़ावा मिलता है। इसके अलावा, महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी से उन मुद्दों का समर्थन करने में योगदान होता है जो सीधे रूप से उन्हें प्रभावित करते हैं जैसे कि लैंगिक हिंसा, स्वास्थ्य, शिक्षा और आर्थिक सशक्तिकरण। 

महिलाओं की सत्ता में भागीदारी होने से नीतियों के अधिक लैंगिक संवेदनशील दृष्टिकोण के साथ तैयार किया जाएगा जिससे समग्र विकास को प्रोत्साहित किया जाएगा। महिलाओं की सहभागिता के महत्व को मानते हुए, राजनीतिक रूप से महिलाओं को सशक्तिकरण के लिए विभिन्न पहलुओं को अपनाया गया है। शिक्षा कार्यक्रम, नेतृत्व प्रशिक्षण, और जागरूकता अभियान उपस्थित हैं ताकि स्टीरियोटाइप्स को तोड़ा जा सके और महिलाओं को राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। राजनीतिक पार्टियों से यह भी मांग की गई है कि वे अधिक से अधिक महिला उम्मीदवारों को नामित करें और उनकी सक्रिय भागीदारी के लिए एक सुसंगत वातावरण बनाएं।

सरकार से ज्यादा उम्मीद नहीं है

इस चरण में बातचीत के दौरान फेमिनिज़म इन इंडिया ने अनेक महिलाओं से बातचीत की है जो समाज के विभिन्न वर्गों से हैं। उसी क्रम में पहली बार अपने वोट का अधिकार का इस्तेमाल करने वाली 19 वर्षीय ऊर्जा इमाम हैं। ऊर्जा, पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में समाजशास्त्र में अध्ययन कर रही हैं। वह कहती है, “उनका परिवार राजनीतिक रूप से काफी सजग है और मैं खुद भी राजनीतिक रूप से जागरूक हूं। बचपन से ही लेनिन, मार्क्स, और भगत सिंह को पढ़ती आ रही हूं और यह सब मुझे वर्तमान भारतीय राजनीति की समझ देता है।” 

तस्वीर में ऊर्जा इमाम, तस्वीर साभारः अतिका

चुनाव के संदर्भ में वह आगे कहती हैं, “मेरी सरकार से कुछ खास आशा नहीं है। लेकिन मैं आशावादी हूँ कि आने वाले दिनों में चीजें और लोगों की सोच में परिवर्तन होगा। हालांकि, मेरी एक चिंता है कि चुनावों के दौरान किसी तरह के धार्मिक दंगे न हो जैसा कि पिछले दशक में होता आया है। सरकार ज़रूरी विषयों पर चुप्पी साधे हुए है चाहे वो मणिपुर हिंसा हो, महिला पहलवान हो या बिलकिस बानो का मामला हो। वर्तमान सरकार में ईमानदारी की कमी होने के कारण वह लैंगिक हिंसा करने वाले अपराधियों को कुछ नहीं कहती। महिलाओं को जागरूक और शिक्षित होने की आवश्यकता है, ताकि वे अपने अधिकारों को समझ सकें और सामाजिक शोषण से बच सकें।” 

राजनीति सबके जीवन को प्रभावित करती है

तस्वीर में राशदा बेगम, तस्वीर साभारः अतिका

37 वर्षीय राशदा बेगम एक गृहणी हैं। चुनाव और राजनीति के बारे में बोलते हुए वह कहती हैं, “राजनीति के बारे में ज्यादा कुछ पता नहीं है। लेकिन थोड़ा-थोड़ा समझ आता है। सारा समय घर के काम में बीतता है और रुचि न होने के कारण कभी भी राजनीतिक रूप से जागरूक नहीं हो पायी। लेकिन घर में स्मार्ट फोन के आने के बाद से कुछ खबरें सुनने और समझने लगी हूं।” राजनीति से दूर रहने का कारण पूछने पर वे बताती हैं, “परिवार के पुरुष कभी भी उन्हें ऐसे मुद्दों में हिस्सा लेने नहीं देते और उन्हें हमेशा घरेलू काम में ध्यान देने को कहते रहते हैं। राजनीति हम सभी के जीवन को बहुत तरीके से प्रभावित करती है और हमें इस बारे में जागरूक होना चाहिए।” वह चाहती हैं कि समाज में किसी भी प्रकार का भेदभाव न हो और महिलाओं को भी पुरुषों की तरह उतना ही अधिकार मिले जितने की वे हकदार हैं। 

सरकार न समझे औरतों को नासमझ

चुनाव की बात करते हुए, उन्होंने अपना डर व्यक्त किया है और कहा, “मुझे तो तुम्हें कुछ भी कहने से डर लग रहा है। अगर सरकार ने ये आर्टिकल पढ़ लिया तो कहीं मुझे उठा न ले जाए। देखो सरकार का क्या है, आज इसकी है तो कल उसकी अभी देखो तुम लोग पढ़ी-लिखी हो, हमसे बेहतर जानती हो। मगर मुझे फिर भी लगता है सरकार बहुत कुछ ग़लत कर रही है, कितने काले कानून लाती हैं। कभी मुस्लिम औरतों को लेकर, कभी गैस के दाम बड़ा दिए, खाने के समानों के दाम, पेट्रोल के खर्चे अलग, पढ़ाई महंगी कर दी गई है। मुझे लगता है कि कोई भी सरकार कभी भी औरतों के हक के लिए नहीं सोचती है। उनको लगता है कि औरतों को समझ नहीं है जो कह दो मान लेंगी। पर सच पूछो तो हम सब होशियार हैं, हम ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं तो क्या हुआ, सही और ग़लत को समझते हैं और उसके लिए कोई अख़बार और मोबाइल की ज़रूरत नहीं है।” 

गरीबों के बारे में ज्यादा सोचने की है ज़रूरत

तस्वीर साभारः The Hindu Business Line

42 वर्षीय, सिमरन एक सब्जी विक्रेता हैं। वह कहती है कि राजनीति के बारे में उनकी कोई राय नहीं है और वह इसे लेकर बोलना नहीं चाहती हैं। उन्होंने यह भी व्यक्त किया है कि सरकार जो भी आ जाए काम हमेशा ही चलता रहेगा और किसी भी सरकार के पास उनकी कोई अहमियत नहीं है क्योंकि सरकार गरीबों की समस्याओं को सुनना या देखना नहीं चाहती है सरकार के नजदीक ऐसे लोग हैं ही नहीं। चुनाव के संदर्भ में सिमरन कहती है, “गरीबों का वोट तो सरकार को चाहिए लेकिन फिर जीतने पर सरकार सबसे ज्यादा हमारी ही अनदेखी करती है।”

वर्ग के आधार पर होने वाले भेदभाव को महसूस करते हुए वह आगे कहती है, “अमीर के बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं, गरीब के बच्चे सरकारी या खिचड़ी स्कूलों में हैं।” माहिला सब्ज़ी विक्रेता के मामले में बात करते हुए वे कहती है, “गरीब माहिलाओं के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है। देने को बस झूठे वादे और आश्वासन है। हम सब्जी बेचने वाली महिला शहरों में आ कर सब्ज़ियां बेचती हैं। बारिश में छाता लेकर सड़क किनारे काम करना पड़ता है। गर्मी में भी ऐसी माहिलाओं का यही हाल है। न माहिलाओं के लिए ट्रेन में सुविधा है न घर पर। हम चाहते है कि हेलिकॉप्टर जहाज से उतरकर सड़क पर भी देखें आम आदमी किस तरह से जी रहा है। वोट हर चुनाव में डालते है लेकिन असली में कुछ बदल नहीं रहा है।”

असल मुद्दों पर सरकार की चुप्पी आखिर क्यों

जादवपुर विश्वविद्यालय में इतिहास की रिसर्च स्कॉलर 27 वर्षीय सान्या मजूमदार (बदला हुआ नाम) बातचीत के दौरान कहती है, “वर्तमान समाज में डिमॉक्रेसी और डिमॉक्रेटाईजेशन इस दोनों को समझने की कमी के कारण समस्याएं बहुत हद तक बढ़ गई हैं। जब समाज में डिमॉक्रेसी को थोपा जाता है, तो डिमॉक्रेटाईजेशन का रूप उसे अपना  लेता है।” वे आगे जोड़ते हुए कहती हैं,”चुनाव सामने हैं और हमारे पास बात करने के लिए अनगिनत मुद्दे हैं, जो सरकार ने अब तक अनदेखा अनसुना किया हैं। वोट के लिए सिर्फ राम नाम करने से कुछ नहीं मिलेगा, बल्कि सरकार को चाहिए कि वे जनता के लिए बेहतर पॉलिसी बनाएं, महिलाओं के लिए खासकर कश्मीरी, मणिपुर की महिलाओं के बारे में सोचे। धर्म के नाम पर इतना हल्ला करने वाली सरकार बलात्कार, यौन हिंसा जैसे मुद्दों पर चुप्पी साधी रहती है तो दुख होता है।”

मानवाधिकारों का हनन हो बंद

वह आगे कहती है, “सरकार छात्रों के लिए क्या कर रही है? आईएएस और आईपीएस जैसे पदों में नौकरी के लिए कितनी सीटें हैं और उनमें हर साल कितने लोग चयन होते हैं? असफल विद्यार्थियों के लिए फॉर्म भरने के पैसे का सरकार कैसे इस्तेमाल करती है? हर साल दो करोड़ नौकरियों का वादा किया था, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।” उसके बाद वह उत्तेजित होकर कहती है, “आज हमारे मीडिया का स्तर क्या है, इसे देखना बहुत महत्वपूर्ण है, हम विश्वगुरु होने के बावजूद हम 161वी रैंक पर हैं। जब अमरीकी प्रेसीडेंट आते हैं, तो भारत की राजधानी को जी-20 के पोस्टरों से ढका जाता है, गरीबों को सड़क से हटा दिया जाता है। किसानों की बात को नहीं सुनते। छात्र नेताओं को जेल में डालते हैं, पत्रकारों को जेल भेजते हैं। धर्म के नाम पर राजनीति करते हैं, वर्तमान सरकार के नेता अल्पसंख्यक महिलाओं के प्रति कहीं न कही अनैतिक टिप्पणियां करके बच जाते हैं, और उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होती। महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचार को अनदेखा कर देती है और सिर्फ लव-जिहाद के नाम पर प्रेमी जोड़े को अलग करने में ही रूचि रखती है।”

“अमीर के बच्चे बड़े स्कूलों में पढ़ते हैं, गरीब के बच्चे सरकारी या खिचड़ी स्कूलों में हैं। माहिला सब्ज़ी विक्रेता के मामले में बात करते हुए वे कहती है की गरीब माहिलाओं के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है, देने को बस झूठे वादे और आश्वासन है।”

समाज में महिला वोटरों का नज़रिया 

आगामी लोकसभा चुनाव को लेकर हर वर्ग की महिला वोटर अपनी वोट की ताकत से परिचित है। अपनी जानकारी के अनुसार वे अपने अधिकारों और समाज में समाहित होने वाले मूल्य समझने लगी हैं। सशक्त और जागरूक महिलाएं वोटर चाहती है कि सरकार उनकी सुरक्षा, शिक्षा और समाज में समान भागीदारी को बनाने का काम करें। वे चाहती है कि चुनावी प्रक्रिया में उनकी सहभागिता बढ़ाई जाए और समाज में नारी की भूमिका को मजबूती से स्थापित किया जाए। नारीशक्ति को बढ़ावा देने के लिए, समाज में जागरूकता और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता है। महिलाएं अपने अधिकारों के लिए आवाज बुलंद करने के लिए उत्सुक हैं और सरकार से विशेष रूप से उम्मीद है कि वह महिलाओं की आवाज़ को सुनेगी और उनके हित में कदम उठाएगी। आगामी लोकसभा चुनाव भारत की महिलाओं के लिए एक महत्वपूर्ण पहलू है। महिलाएं चाहती हैं कि समाज उन्हें बेहतर समझे और समर्थन प्रदान करें, जिससे वे अपने पूर्ण क्षमता को हासिल कर देश के विकास में योगदान दे सकें।


About the author(s)

अतिका कलकत्ता शहर की रहनेवाली है। उन्होंने हाल ही में कलकत्ता विश्वविद्यालय से भाषाविज्ञान में मुख्य डिग्री के साथ स्नातक किया है। वह पत्रकारिता में रुझान रखती है और उन्हें खेल-कूद करना बेहद पसंद है। उन्हें नए चीज़ों की खोज करने और आजमाने में मज़ा आता है। उन्हें खाली समय में चिट्ठी लिखना बेहद पसंद है। वे अक्सर ऐसा करती है। इसके अलावा उन्हें हिंदी, अंग्रेज़ी और उर्दू साहित्य और पुराने गाने और ग़ज़ल सुनने का शौक़ है। उन्हें आप अक्सर कलकत्ते की आवारा सड़कों पर बेताबी से घूमते हुए पा सकते हैं।

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content