केट मिलेट: जिनके लेखन ने नारीवाद की दूसरी लहर को सशक्त किया
तस्वीर साभार: The Guardian
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स्त्रीवाद आंदोलन की विश्व में अब तक चार लहर आ गई है। इसमें दूसरी लहर के दौरान औरतें घर की चार दिवारी से बाहर आ गईं और अपने अधिकारों की मांग करने लगीं। इस समय औरतें अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो रही थीं। अब उन्हें अपने घरों की उन पितृसत्तात्मक दीवारों में रहना बर्दाशत नहीं था। पितृसत्तात्मक पुरुष स्त्री के इस बदले रूप को सहन नहीं कर पा रहा था। यह कदम व बदलाव उसे अपनी सत्ता, शक्ति और संपत्ति पर वार की तरह प्रतीत हुआ जिसका परिणाम तलाक था। यही कारण है कि जब औरतें यह जानने लगीं कि विवाह कुछ और नहीं बल्कि मर्दों की सहूलियत के अनुसार बनाई गई एक व्यवस्था है जिसमें उनकी सत्ता होती है और औरत मात्र एक ज़रिया होती है उस सत्ता को उसके वंश के हाथों में सौंपने का।

स्त्रीवादी आंदोलन के दूसरे दौर में केट मिलेट जो कि एक अमेरिकी लेखिका, शिक्षिका और कलाकार थीं, उन्होंने ‘सेक्सुअल पॉलिटिक्स’ नाम की एक किताब लिखी जो दूसरे स्त्रीवादी आंदोलन की नींव बनी। इस किताब ने 1970 के दौरान होनेवाले स्त्रीवादी आंदोलन को दृढ़ता और मज़बूती दी। केट मिलेट के अनुसार पॉलिटिक्स केवल वह नहीं जिससे हम सब परिचित हैं या यह राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने के उद्देश्य से चलनेवाला संघर्ष मात्र भी नहीं है बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा है। मिलेट के अनुसार पुरुष द्वारा दूसरे सेक्स को कमतर आंकना राजनीति है। सत्ता केवल पुरुष के हाथ में हो और स्त्री उसके बनाए रास्ते पर चले यह राजनीति है। एक व्यक्ति का दूसरे व्यक्ति पर अधिकार राजनीति है। सेक्सुअल राजनीति का केंद्रीय विचारे ऐसे संबंध स्थापित करने का है जहां सब बराबर हो।

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मिलेट के खुद के शब्दों में ऐसा प्रेम जिसमें दमन की राजनीति न हो, जहां असुरक्षाएं न हो और दो लोग बराबर हो और जहां पर संबंधों का निर्धारण नियंत्रण से तय न होता हो। मिलेट ने इस पुस्तक में डीएच लॉरेंस की आलोचना कि और कहा कि स्त्री को प्रताड़ित करके ही पुरुषत्व का प्रदर्शन लॉरेंस के लेखों की संवेदना है। यह शक्ति एक जेंडर से कैसे आधारित हो सकती है?

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मिलेट अपने प्रेम संबंधी विचारों को लेकर हमेशा आलोचना का विषय रहीं। कभी एक स्त्री होकर दूसरी स्त्री को प्यार करने को लेकर तो कभी उस विवाह को खत्म करने को लेकर जो 1965 में उन्होंने फ्यूमियो याशिमुरा नामक जापानी शख्स से किया था। मिलेट स्त्रियों से प्यार करती थीं जिसके कारण आलोचना के घेरे में आती रहीं। सेक्सुअल पॉलिटिक्स में केट पुरुष द्वारा महिला का दमन ही प्रस्तुत नहीं करतीं बल्कि वह बात करती हैं उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने की, समान अधिकार दिलाने की।

तस्वीर साभार: The Guardian

1970 के दौरान स्त्री आंदोलन अपने ज़ोर पर था जो अधिकार चाहता था, समान वेतन चाहता था और चाहता था उस समान रवैये को खत्म करना जिसकी कीमत औरतों को केवल अपने जेंडर के कारण चुकानी पड़ती है। इसी समय एक और घटना का उदय हुआ जहां महिलाओं द्वारा ब्रा ना पहने को एक अवैध प्रक्रिया माना गया और पितृसत्ता इससे और मज़बूत हुई और इस विचार का प्रचार किया गया कि अब औरतों को बराबर अधिकार मिल चुके हैं और अब किसी भी तरह के स्त्री आंदोलन की आवश्यकता नहीं है।

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देखा जाए तो स्त्री आंदोलन की आवश्कता तब तक है जब तक पितृसत्ता मौजूद है। स्त्री आंदोलन को निरर्थक साबित करना पितृसत्तात्मक प्रतिमान ही तो है।आप बात कर रहे हैं 1970 में स्त्री आंदोलन के ज़रूरी न होने की। आज 21वीं सदी चल रही है और एक मामूली उदाहरण से समझते हैं कि स्त्री आंदोलन की आवश्यकता कब तक है। आज भी जीडीपी में उस काम को नहीं गिना जाता जिसे यह परिवार और पितृसत्ता औरतों का जन्मसिद्ध अधिकार मानती है और चाहे वह डॉक्टर बन जाए या कलेक्टर, ‘हाउसवाइफ’ का पद उसके साथ हमेशा के लिए जुड़ जाता है। खाना बनाना, कपड़े धोना जैसे काम जो कि एक मनुष्य की व्यक्तिगत आवश्यकता है और उसको करना एक व्यक्ति का व्यक्तिगत कर्तव्य होना चाहिए वह एक स्त्री के लिए निश्चित काम के रूप में माना जाता है।

केट मिलेट के अनुसार पॉलिटिक्स केवल वह नहीं जिससे हम सब परिचित हैं या यह राजनीतिक दलों के बीच सत्ता की बागडोर अपने हाथ में लेने के उद्देश्य से चलनेवाला संघर्ष मात्र भी नहीं है बल्कि इसका दायरा बहुत बड़ा है। मिलेट के अनुसार पुरुष द्वारा दूसरे सेक्स को कमतर आंकना राजनीति है। सत्ता केवल पुरुष के हाथ में हो और स्त्री उसके बनाए रास्ते पर चले यह राजनीति है।

अनुमान लगाएं तो एक रोटी का मूल्य 10 रुपये होगा, ऐसी लाखों रोटियां हाउसवाइफ बना चुकी हैं और अगर वे इस विवाह व्यवस्था को समाप्त कर अपना श्रम वापस लें तो यह अर्थव्यवस्था ढह जाएगी। जब 70 के दशक में लोगों में यह भ्रांति फैली कि स्त्री आंदोलन की आवश्यकता अब और नहीं है तो मिलेट की पुस्तकें छपनी बंद हो गईं। जो पुस्तकें स्त्री अध्यन के लिए अनिवार्य होनी चाहिए थीं उनको पुस्तकों की सूची से ही बाहर कर दिया।

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मिलेट रेडिकल स्त्रीवादी थीं और उनकी कोई संतान नहीं थीं। एक धारणा आम तौर पर यह बन जाती है कि जो व्यक्ति स्त्रीवादी है तो वह प्रेम से बहुत दूर है लेकिन यह एक भ्रांति है। स्त्रीवादी प्रेम से भरी होती हैं लेकिन प्रेम जब सामाजिक मसला बन जाए तो उसकी कीमत स्त्री के त्याग और उसको एक मनुष्य न मानकर आदर्श की मूर्ति मान लिया जाता है। वह प्रेम में बराबरी की बात करती है, वह प्रेम में दमन की राजनीति का विरोध करती है, जो कि मिलेट ने अपनी पुस्तक सेक्सुअल पॉलिटिक्स के माध्यम से किया। मिलेट ने अपना पूरा जीवन ‘बराबरी वाला प्रेम’ और दमन की राजनीति को खत्म करने में व्यतीत किया। उनका यह जीवन किसी एक व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि मनुष्यता के लिए समर्पित रहा।

मिलेट की किताबों को पढ़कर एक मनुष्य की मानसिकता सकारात्मक रूप में विकसित होती है। फिर वह पुरुष हो या स्त्री बस बराबरी की बात करता है। प्रेम में फिर एडजस्टमेंट की बात नहीं की जाती और प्रेम किसी के भी प्रति हो सकता है। मिलेट वह थीं जो प्रेम से भरी थीं और स्त्रियों से प्यार करती थीं और हर उस व्यक्ति का विरोध अपनी लेखनी के माध्यम से करती थीं जो औरतों को दमन के योग्य मानता है।

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