समाजख़बर मानव विकास सूचकांक में भारत का मामूली सुधार लेकिन श्रम बल भागीदारी में व्यापक लैंगिक अंतर

मानव विकास सूचकांक में भारत का मामूली सुधार लेकिन श्रम बल भागीदारी में व्यापक लैंगिक अंतर

यूएनडीपी इंडिया की रेजिडेंट रिप्रेजेंटेटिव केटलीन विसेन के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में मानव विकास में उल्लेखनीय प्रगति दिखाई है। 1990 के बाद से, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 9.1 वर्ष बढ़ गई है; स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्षों में 4.6 वर्ष की वृद्धि हुई है, और स्कूली शिक्षा के औसत वर्षों में 3.8 वर्ष की वृद्धि हुई है।

संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, भारत के मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) मूल्य में 2022 में वृद्धि देखी गई। इस सुधार ने भारत को 193 देशों और क्षेत्रों में से 134वें स्थान पर रखते हुए मध्यम मानव विकास श्रेणी में स्थान दिया है। बता दें कि साल 2021 में भारत 191 देशों में से 135वें स्थान पर था। हालांकि लैंगिक असमानता सूचकांक (जीआईआई) 2022 में, भारत 0.437 स्कोर के साथ 193 देशों में से 108वें स्थान पर है। जीआईआई-2021 में 191 देशों में इसकी रैंक 122 थी। भारत ने पिछली बार के मुक़ाबले यूएनडीपी लैंगिक असमानता सूचकांक में 14 पायदान की छलांग लगाई है।

यूएनडीपी द्वारा जारी मानव विकास रिपोर्ट ‘ब्रेकिंग दा ग्रिडलॉक- रिइमेजिनिंग कोऑपरेशन इन अ पोलराईज़ेड वर्ल्ड’ 2023-2024 के अनुसार, भारत ने लिंग विभाजन को पाटने में महत्वपूर्ण प्रगति की है। पिछले दशक में, जीआईआई में भारत की रैंक में लगातार सुधार हुआ है, जो लैंगिक समानता हासिल करने की दिशा में लगातार प्रगति का संकेत देता है। आर्थिक विकास में तेजी लाने और अपने नागरिकों के लिए जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने की भारत की प्रतिबद्धता लैंगिक असमानता सूचकांक और अन्य मानव विकास संकेतकों पर इसकी निरंतर प्रगति में परिलक्षित है। हालांकि, भारत में श्रम बल भागीदारी दर में सबसे बड़ा लैंगिक अंतर है। देश में महिलाओं के लिए यह दर 28.3 फीसद और पुरुषों के लिए 76.1 फीसद है। भारत सरकार की ओर से जारी एक बयान में कहा गया कि यह उनके दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक और राजनीतिक विकास के उद्देश्य से नीतिगत पहलों के माध्यम से महिला सशक्तीकरण सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा निर्धारित निर्णायक एजेंडे का परिणाम है।

यूएनडीपी इंडिया की रेजिडेंट रिप्रेजेंटेटिव केटलीन विसेन के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में मानव विकास में उल्लेखनीय प्रगति दिखाई है। 1990 के बाद से, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 9.1 वर्ष बढ़ गई है; स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्षों में 4.6 वर्ष की वृद्धि हुई है।

लैंगिक असमानता सूचकांक पर भारत की प्रगति

यूएनडीपी इंडिया की रेजिडेंट रिप्रेजेंटेटिव केटलीन विसेन के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में मानव विकास में उल्लेखनीय प्रगति दिखाई है। 1990 के बाद से, जन्म के समय जीवन प्रत्याशा 9.1 वर्ष बढ़ गई है; स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्षों में 4.6 वर्ष की वृद्धि हुई है, और स्कूली शिक्षा के औसत वर्षों में 3.8 वर्ष की वृद्धि हुई है। भारत की प्रति व्यक्ति जीएनआई लगभग 287 प्रतिशत बढ़ी है। यह समय के साथ न केवल आर्थिक विकास में तेजी लाने बल्कि अपने सभी नागरिकों के लिए जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने की देश की प्रतिबद्धता को उजागर करता है।

तस्वीर साभार: Indian Express

लेकिन इसमें सुधार की गुंजाइश है। महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास और लोगों के लिए डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित करने के साथ, उन्हें विश्वास है कि भारत सामाजिक-आर्थिक प्रगति को और आगे बढ़ा सकता है। सभी के लिए एक उज्जवल और अधिक न्यायसंगत भविष्य का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।

2023-2024 एचडीआर 2021-2022 मानव विकास रिपोर्ट के निष्कर्षों पर आधारित है, जिसमें पहली बार लगातार दो वर्षों में वैश्विक एचडीआई मूल्य में गिरावट देखी गई। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि मानव विकास पुनर्प्राप्ति प्रकृति में असमान है।

क्या है लैंगिक असमानता सूचकांक

लैंगिक असमानता सूचकांक (जीआईआई) एक समग्र माप है जो तीन आयामों में लैंगिक असमानता का मूल्यांकन करता है- प्रजनन स्वास्थ्य, अधिकारिता (एम्पावरमेंट) और श्रम बाज़ार में भागीदारी। यह मातृ मृत्यु अनुपात, किशोर जन्म दर, महिलाओं द्वारा आयोजित संसदीय सीटों का प्रतिशत, लिंग के आधार पर माध्यमिक शिक्षा प्राप्त जनसंख्या और लिंग के आधार पर श्रम बल में भागीदारी जैसे संकेतकों को ध्यान में रखता है। कम जीआईआई मान महिलाओं और पुरुषों के बीच कम असमानता को दर्शाता है। प्रजनन स्वास्थ्य में भारत का प्रदर्शन मध्यम मानव विकास समूह या दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में बेहतर है। 2022 में भारत की किशोर जन्म दर 16.3 (15-19 आयु वर्ग की प्रति 1,000 महिलाओं पर जन्म) थी, जो 2021 में 17.1 से सुधार है। हालांकि, भारत में श्रम बल भागीदारी दर में सबसे बड़ा लैंगिक अंतर अब भी मौजूद है।

एचडीआई मूल्य में गिरावट

2023-2024 एचडीआर 2021-2022 मानव विकास रिपोर्ट के निष्कर्षों पर आधारित है, जिसमें पहली बार लगातार दो वर्षों में वैश्विक एचडीआई मूल्य में गिरावट देखी गई। इस रिपोर्ट से पता चलता है कि मानव विकास पुनर्प्राप्ति प्रकृति में असमान है। हालांकि अमीर देश इस क्षेत्र में मजबूत सुधार के संकेत दिखा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सबसे गरीब इसे प्राप्त करने में संघर्ष कर रहे हैं। आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (ओईसीडी) के सभी सदस्य देशों ने अपने 2019 एचडीआई स्तर को पार कर लिया है। लेकिन सबसे कम विकसित देशों में से केवल दो में से एक ने अपने पहले से ही संकट-पूर्व एचडीआई स्तर को दोबारा प्राप्त कर लिया है।

प्रजनन स्वास्थ्य में भारत का प्रदर्शन मध्यम मानव विकास समूह या दक्षिण एशिया के अन्य देशों की तुलना में बेहतर है। 2022 में भारत की किशोर जन्म दर 16.3 थी, जो 2021 में 17.1 से सुधार है। हालांकि, भारत में श्रम बल भागीदारी दर में सबसे बड़ा लैंगिक अंतर अब भी मौजूद है।

मानव विकास सूचकांक (एचडीआई)

भारत का मानव विकास सूचकांक में सुधार 2021 में एचडीआई मूल्य में गिरावट और पिछले कुछ वर्षों में एक सपाट प्रवृत्ति के बाद आया है। 1990 के बाद से, भारत ने जीवन प्रत्याशा, स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष, स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष और प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) में वृद्धि के साथ मानव विकास में उल्लेखनीय प्रगति की है। चीन 75वें और श्रीलंका 78वें स्थान के साथ भारत से आगे हैं।

तस्वीर साभार: India Today

यह मानव विकास के विभिन्न आयामों में प्रगति का प्रतीक है, हालांकि महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास पर ध्यान केंद्रित करने की निरंतर आवश्यकता है। 2022 में, भारत ने सभी एचडीआई संकेतकों-जीवन प्रत्याशा, शिक्षा और प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (जीएनआई) में सुधार देखा। जीवन प्रत्याशा 67.2 से बढ़कर 67.7 वर्ष हो गई, स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष 12.6 तक पहुंच गए, स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष बढ़कर 6.57 हो गए, और प्रति व्यक्ति जीएनआई $6,542 से बढ़कर $6,951 हो गई।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक समग्र मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) का मूल्य 2019 की तुलना में अधिक है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया अन्य वैश्विक संकटों से जुड़े कोविड-19 महामारी के प्रभाव से पूरी तरह से उबर गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि वैश्विक समग्र मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) का मूल्य 2019 की तुलना में अधिक है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया अन्य वैश्विक संकटों से जुड़े कोविड-19 महामारी के प्रभाव से पूरी तरह से उबर गई है। 2023 का आंकड़ा उस स्तर से नीचे है जिसकी महामारी से पहले भविष्यवाणी की गई थी। मूल रूप से हम मानव विकास के उस स्तर तक नहीं पहुंच पाए हैं जिसकी उम्मीद की जा सकती थी यदि महामारी नहीं हुई होती।

महामारी से पहले, दुनिया सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की समय सीमा के साथ, 2030 तक औसत ‘बहुत उच्च’ एचडीआई तक पहुंचने की राह पर थी। अब हर क्षेत्र 2019 से पहले के अनुमान से नीचे चल रहा है। रिपोर्ट बताती है कि सबसे गरीब देश अब भी संघर्ष कर रहे हैं। यह ‘आंशिक, अपूर्ण और असमान’ पुनर्प्राप्ति सबसे ज्यादा गरीबों को पीछे छोड़ रही हैं, असमानता को बढ़ा रही है और वैश्विक स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रही है।

रिपोर्ट बताती है कि सबसे गरीब देश अब भी संघर्ष कर रहे हैं। यह ‘आंशिक, अपूर्ण और असमान’ पुनर्प्राप्ति सबसे ज्यादा गरीबों को पीछे छोड़ रही हैं, असमानता को बढ़ा रही है और वैश्विक स्तर पर राजनीतिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा दे रही है।

दुनिया भर में असमानता बढ़ रही है

रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में असमानता फिर से बढ़ रही है। 20 वर्षों के सम्मिलन के बाद, सबसे अमीर और सबसे गरीब देशों के बीच अंतर 2020 से ओर बढ़ना शुरू हो गया है। ये वैश्विक असमानताएं पर्याप्त आर्थिक एकाग्रता से बढ़ी हैं। जैसा कि रिपोर्ट में बताया गया है, वस्तुओं का लगभग 40 प्रतिशत वैश्विक व्यापार तीन या उससे कम देशों में केंद्रित है। 2021 में, तीन सबसे बड़ी तकनीकी कंपनियों में से प्रत्येक का बाजार पूंजीकरण उस वर्ष 90 प्रतिशत से अधिक देशों के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) से आगे निकल गया। असमानता के कारण एचडीआई में भारत की हानि 31.1 प्रतिशत है। असमानता के कारण एचडीआई में दक्षिण एशिया की हानि दुनिया में सबसे अधिक है। हालांकि भारत ने मानव विकास सूचकांक में मामूली सुधार की है, लेकिन श्रम बल भागीदारी में व्यापक अंतर चिंता का विषय बना हुआ है।

About the author(s)

दिल्ली विश्वविद्यालय से लॉ की डिग्री ली फिर जामिया से LLM किया। एक ऐसे मुस्लिम समाज से हूं, जहां लड़कियों की शिक्षा को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता था लेकिन अब लोग बदल रहे हैं। हालांकि, वे शिक्षा तो दिला रहे हैं, मगर सोच वहीं है। कई मामलों में कट्टर पितृसत्तात्मक समाज वाली सोच। बस इसी सोच को बदलने के लिए लॉ किया और महिलाओं और पिछड़े लोगों को उनके अधिकार दिलाने की ठानी। समय-समय पर महिलाओं को उनके अधिकारों से अवगत कराती रहती हूं। स्वतंत्र शोधकर्ता हूं, वकील हूं, समाज-सेवी हूं। सबसे बड़ी बात, मैं एक मुस्लिम हूं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

संबंधित लेख

Skip to content