संस्कृतिख़ास बात ख़ास बातः साइकलिंग करके लोगों को जागरूक करने वाली युवा पर्यावरण एक्टिविस्ट सवी शेखावत से

ख़ास बातः साइकलिंग करके लोगों को जागरूक करने वाली युवा पर्यावरण एक्टिविस्ट सवी शेखावत से

हमें ये सीखना चाहिए कि हम हर दिन कैसे पर्यावरण को बचाने का प्रयास कर सकते है। उसके लिए हमें क्या करना चाहिए। हमारे स्कूल की किताब में पर्यावरण के संरक्षण के बारे में बताया जाना चाहिए। कुछ प्रेक्टिकल भी करवाना चाहिए। ताकि वो हमारी आदत में आ जाए।

राजस्थान के जयपुर की रहने वाली ग्याहर साल की सवी शेखावत वह नाम है, जो अपनी छोटी सी उम्र में लोगों को पर्यावरण संरक्षण को लेकर सजग कर रही है। प्रकृति की बिगड़ती सेहत को लेकर चिंतित है और इसी दिशा में आगे बढ़ते हुए समाज में जागरूकता फैला रही हैं। बीते वर्ष जयपुर में ढोल का बाड़ (वन्य क्षेत्र) को बचाने के लिए वो लगभग एक साल तक आंदोलन किया। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने 2021 के अपने बजट में जयपुर में फिनटेक पार्क बनाने की घोषणा की थी। यह पार्क रीको की जिस जमीन पर बनना है, वहां नैसर्गिक वन है। लगभग 40 हेक्टेयर में फैले इस क्षेत्र में हजारों पेड़ हैं। लेकिन फिनटेक पार्क के निर्माण के लिए यहां लगे हुए सारे पेड़ काटे जाने थे और उसके बाद फिनटेक पार्क का निर्माण होना था। लेकिन बहुत लोगों ने इसके खिलाफ आंदोलन किया जिसमें से एक सवी शेखावत भी हैं। इसके आलावा वह साइकलिंग कर जयपुर के बहुत इलाकों में घूम-घूम कर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के बारे जागरूक करने का काम कर रही हैं।

फेमिनिज़म इन इंडियाः पर्यावण के मुद्दों से कैसे जुड़ी? आपकी क्या प्रेरणा थी कि इतनी छोटी उम्र में आपने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक्टिविज़म में आ गईं?

सवी: हमारा परिवार हाथी के गोबर से कागज बनाने का काम करता है। मेरे पिता हमेशा से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करना चाहते थे। यही कारण है कि वो जो काम करते है उससे पर्यावरण को लाभ मिलता है। मेरे पिता ने ही मुझे सबसे पहले पर्यावरण के बारे में जानकारी दी और समझाया था। धीरे-धीरे मुझे इसके महत्व के बारे में पता चला और उन्हीं के वजह से मैं पर्यावरण एक्टिविजम से भी जुड़ी। फिर जब मुझे पता चला कि मेरे घर के पास एक इतना बड़ा जंगल है और उसको काटने के लिए सरकारी कर्मचारी आए हुए है क्योंकि वहां एक फिटनेस पार्क बनाने का टेंडर आया है। उस जंगल में 83 प्रकार के पक्षी है, बड़ी संख्या में नीलगायों के रहने की जगह है। अगर वो जगंल कटता है तो वो सब बेघर हो जायेंगे। वर्तमान में जयपुर में इससे बड़ा कोई वन्य क्षेत्र नहीं बचा हुआ है तो इसलिए मुझे लगा कि हमें आवाज़ उठाने की ज़रूरत है और मैं उस आंदोलन से जुड़ गई।

मेरे पिता के एक करीबी मित्र है जो लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ढोल का बाड़ (वन्य क्षेत्र) को काटने के लिए बुलडोजर आया है तो मेरा पूरा परिवार उस जगह गया। उसी दिन मैं उस प्रोटेस्ट से जुड़ी। अगर इस वन्य क्षेत्र को काट दिया गया तो पूरे जयपुर के लिए ये बहुत घातक होगा।

फेमिनिज़म इन इंडियाः जैसे कि आपने बहुत छोटी उम्र में एक्टिविज़म शुरू किया है आप अपनी पढ़ाई और पर्यावरण का काम किस तरह से करती हैं?

सवी: मैं चीज़ों को मैनेज करने की कोशिश करती हूं। थोड़े समय पर्यावरण से जुड़ी आर्टिकल, किताबें पढ़ती हूं और थोड़े समय स्कूल का काम करती हूं। कुल मिलाकर मैं सब कुछ एक साथ अनुपात में करने की कोशिश में लगी रहती हूं। मैं स्कूल में जब एक क्लास से दूसरे क्लास में गैप होता है उस समय भी मैं पर्यावरण विषय के बारे में ही पढ़ने का काम करती हूं। इसका कारण यह है कि मुझे पर्यावरण के बारे में जानना बहुत पसंद है।

फेमिनिज़म इन इंडियाः जब आप ग्राउंड पर लोगों के बीच होती है तो किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। भारत के परिदृश्य से बात करे तो यहां पर्यावरण के मुद्दों को लेकर उतनी सजगता और जागरूकता नहीं देखने को मिलती है ऐसे में आपकी क्या कोशिशें रहती हैं?

सवी: सबसे पहले हमें समय को लेकर परेशानी होती है। सब एक समय पर फ्री नहीं होते हैं और अगर कोई अकेला व्यक्ति जाता है तो उसका कोई प्रभाव रह नहीं जाता है। इस व्यस्त समय में सबका एक साथ मौजूद होना एक बहुत बड़ी चुनौती है। जैसे मैं देखती हूं कि मैं जिस जगह प्रोटेस्ट कर रही हूं तो उस जगह के लोग ये सोचते है कि अगर फिटनेस पार्क बन जायेगा यहां तो उनके घरों के दाम बहुत बढ़ जाएंगे इसलिए लोग उसके खिलाफ नहीं बोलना पसंद करते हैं। बहुत कम ही लोग होते हैं जो उससे इतर सोचते है। यही कारण है कि सबसे मुश्किल चीज होती है लोगों को समझना, पर्यावरण को बचाने के लिए समझना। मेरे साथ बहुत बार हुआ है कि लोग सुनते ही नहीं है, अनसुना करने की कोशिश करते हैं उन्हें ये समय खराब करना लगता है। हर समय प्रोटेस्ट वाली जगह पर रहना अपने आप में एक बहुत मुश्किल का काम है। क्योंकि हम एक ही काम को करते-करते कई बार ऊब जाते है।

फेमिनिज़म इन इंडियाः पिछले साल जो प्रोटेस्ट हुआ उसके बारे में विस्तार से बताइए। आप उससे कैसे जुड़ी।

सवी: जैसे मैं रोज स्कूल जाती थी उस दिन भी गई थी। मेरे पिता के एक करीबी मित्र है जो लंबे समय से पर्यावरण संरक्षण के लिए काम कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि ढोल का बाड़ (वन्य क्षेत्र) को काटने के लिए बुलडोजर आया है तो मेरा पूरा परिवार उस जगह गया। उसी दिन मैं उस प्रोटेस्ट से जुड़ी। अगर इस वन्य क्षेत्र को काट दिया गया तो पूरे जयपुर के लिए ये बहुत घातक होगा। क्योंकि वर्तमान समय में मेरी कॉलोनी जहां बहुत ज्यादा कंपनिया भी नहीं है इधर तब भी यहां की एयर क्वालिटी 200 या 250 के आसपास रहती है। जबकि एयर क्वालिटी इंडेक्स के हिसाब से हमारे स्वास्थ्य के लिए एयर क्वालिटी 50 होना चाहिए। जब ये वन्य है तब हवा इतनी खराब है, अगर नहीं होता तो सोचिए कितनी खराब स्थिति होती। हम कभी ऐसा नही चाहते कि विकास न हो, फिटनेस पार्क नहीं बने, बने लेकिन जंगल काटकर नहीं बनना चाहिए। हमारे प्रोटेस्ट की साथी जब भी बुलडोजर रोकने के लिए उसपे बैठ जाते थे तो वो उसे से हिलाते थे ताकि हमें चोट लग जाए। कई बार हुआ है जब हम प्रोटेस्ट में बैठे हो तो हमारे उपर मिट्टी डाल देते थे ताकि हम वहां से हट जाएं। बहुत बार तो वो बहुत तेज बात करते थे। बहुत भद्दे तरीके से बात किया करते थे। हमारी कोशिश यही होती थी कि हम हर परिस्थितियों का सामना करें पीछे ना हटें। हमारी टीम दो हिस्सों में थी। आधे लोग दिन में प्रोटेस्ट में रहते थे बाकी आधे लोग रात में वहां मौजूद होते थे।

तस्वीर साभारः सुंदरम

फेमिनिज़म इन इंडियाः पहली बार कब आप घर से बाहर पर्यावरण के विषय पर किसी आयोजन में शामिल हुई थी तब से लेकर अबतक आपमें खुद के अंदर क्या बदलाव लगता है?

सवी: पहली बार तो मैं पिछले साल ही ढोल का बाड़ वाले प्रोटेस्ट से जुड़ी। ये मेरे जीवन का पहला प्रोटेस्ट था। पिछले एक डेढ़ साल में मैं अपने अंदर बहुत बदलाव देखती हूं। मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है। लोगों को समझने का मौका मिला है। समाज को समझने का मौका मिला है। सबसे बड़ी बात मेरे लिए ये रही कि मैं पर्यावरण के महत्व को और अच्छे से समझ पा रही हूं। आने वाले समय मैं चाहती हूं कि पर्यावरण संरक्षण के कार्यों से जुड़ी रहूं। भारत में पर्यावरण शिक्षा को प्रैक्टिकल चीजें बहुत कम होती दिखती है न के बराबर। स्कूल से ही हमारे भीतर उसतर की आदतों को विकसित कराने के कोशिश नहीं की जाती है जो इनवायरमेंट फ्रेंडली हो।

फेमिनिज़म इन इंडियाः आपको क्या लगता है स्कूल वह पहली सीढ़ी है जहां से हम बच्चों को जागरूक करके आदतें बदलकर स्थिति बदल सकते है और कैसे?

सवी: हमें हमारी युवा पीढ़ी को पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के बारे में बताना बहुत जरूरी है। हम स्कूल में जाकर बच्चों को पर्यावरण के प्रति जागरूक करने का काम करते हैं। मेरी टीम की हमेशा से ये सोच रही है कि बच्चों को जागरूक किया जाए। क्योंकि हमारे स्कूल की किताबों में हमें सिर्फ पर्यावरण के बारे में बता दिया जाता है। ये नहीं बताया जाता की हम पर्यावरण को कैसे संरक्षित कर सकते है। मुझे कभी आपके स्कूल की किताब को पढ़ कर ऐसा लगा ही नहीं की जलवायु परिवर्तन भी कोई समस्या है। हमारे टीचर भी कुछ ज्यादा नहीं बताते है इसके बारे में लेकिन मुझे लगता है उन्हें बताना चाहिए। आने वाले समय और खराब होने वाले है तो हमें युवा पीढ़ी को इसके बारे में बताना और समझना बहुत जरूरी है।

मेरे स्कूल में जलवायु परिवर्तन के बारे में सिर्फ 5वीं तक ही बताया गया था और वो भी बस कुछ पैराग्राफ में ही। उसमें सिर्फ तापमान कितनी तेजी से बढ़ रहा है और कहां का कितना बढ़ा ये ही बताया जाता था। कई बार कहा जाता था कि एक-दो पेड़ लगा दिए। इससे ज्यादा कुछ बताया ही नहीं कहा गया जबकि हमें ये सीखना चाहिए कि हम हर दिन कैसे पर्यावरण को बचाने का प्रयास कर सकते है। उसके लिए हमें क्या करना चाहिए। हमारे स्कूल की किताब में पर्यावरण के संरक्षण के बारे में बताया जाना चाहिए। कुछ प्रेक्टिकल भी करवाना चाहिए ताकि वो हमारी आदत में आ जाए।

तस्वीर साभारः सुंदरम

फेमिनिज़म इन इंडियाः आप साइकलिंग कर जयपुर में लोगों को जागरूक कर रही है ये कब सोचा की ऐसा कुछ करना होगा और इसमें किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है और किस तरह से सपोर्ट की आवश्यकता महसूस होती है?

सवी: जब हम ढोल का बाड़ के बारे में लोगों को जागरूक करने की कोशिश कर रहे थे। तो हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती यह थी कि हम कैसे ज्यादा से ज्यादा लोगों को इसके बारे में बता कर इससे जोड़ सकते है। पहले मैंने सोचा कि पैदल जा कर लोगों को जागरूक करना ठीक रहेगा। पर उसमें बहुत परेशान हो जा रही थी। उस वक्त मैं नई साइकिल खरीदी थी। दूसरी बात की साइकलिंग इसलिए भी मैने चुना की इससे हमारे पर्यावरण को कोई नुकसान नही पहुंचता हैं। इसके अलावा अगर हम दूसरा साधन ढूंढते तो उसमें ईधन की खपत हमारे पर्यावरण को नुकसान पहुंचाती है और हमें एक जगह से दूसरी जगह जाकर लोगों के बीच यह काम करना था। मुझे ये आइडिया आया कि इससे मैं घूम कर लोगों तक पहुंच कर उनसे बात कर सकती हूं। जब मैं लोगों से बताया उसका फायदा ये हुआ कि बहुत लोग हमारे प्रोटेस्ट में जुड़े। कई लोग ने हमसे जुड़ने की इच्छा जताई और इस ड्राइव का यही फायद हुआ कि जब ढोल का बाड़ को कटने के लिए बुलडोजर आए तो उस समय हमारे साथ बहुत सारे लोग जुड़े। जिससे हम सफल रहे बुलडोजर को वापस हटाने में।

पहली बार तो मैं पिछले साल ही ढोल का बाड़ वाले प्रोटेस्ट से जुड़ी। ये मेरे जीवन का पहला प्रोटेस्ट था। पिछले एक डेढ़ साल में मैं अपने अंदर बहुत बदलाव देखती हूं। मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला है। लोगों को समझने का मौका मिला है। समाज को समझने का मौका मिला है। सबसे बड़ी बात मेरे लिए ये रही कि मैं पर्यावरण के महत्व को और अच्छे से समझ पा रही हूं।

फेमिनिज़म इन इंडियाः आज देश में हर जगह जलवायु परिवर्तन की वजह से लोगों को अनेक आपदाओं का सामना करना पड़ रहा है, लोगों की जाने जा रही हैं लेकिन हमारी सरकारें इतनी सजग नहीं है आप इस पर क्या सोचती है।

सवी: देखिए मेरा मानना है कि ये जो ढोल का बाड़ को खत्म करने के लिए राजस्थान सरकार ने करोड़ों का टेंडर निकाला है। जिसमें से 10 करोड़ 5 करोड़ पैसे सीधे उनके ठेकेदारी को पास जायेंगे जो कि इसे कटने का टेंडर लिए है। हम देखते है कि सरकार पर्यावरण को महत्व देती ही नहीं है। उनके हिसाब से विकास का मतलब है कि सारे वन्य को काट कर वहां कुछ न कुछ बना दो। वर्तमान में हम बैंगलोर की हालत देखी तो वहां का पानी का संकट बन गया है। लोगों को पानी खरीद कर पीना पड़ रहा है। वहां टैंकर के दाम 5 हजार तक पहुंच गए है। अगर हम वहां का इतिहास देखे तो हमें पता चलता है कि वहां पहले बहुत सारे तालाब थे। बहुत वन्य क्षेत्र थे। पर उन सब को खत्म कर वहां कुछ न कुछ बना दिया गया। हमारी सरकार ने उसे रोका भी नहीं है। वहां की बड़ी बड़ी कंपनियां जैसे गूगल अपने एम्प्लॉय को कहती है कि आप अपने घर से ही काम कीजिए क्योंकि ऑफिस में पीने के लिए पानी मौजूद नहीं है। इस समस्या से बाहर निकलने के लिए हमारी सरकार को अवैध निर्माण को रोकना चाहिए। जहां भी वन्य क्षेत्र को बढ़ाने पर जोर देना होगा और पर्यावरण के मुद्दे पर नीयत साफ रखकर काम करना होगा।

फेमिनिज़म इन इंडियाः आपकी आगे की क्या योजनाएं है और किस तरह से आप इस देश में चीजों को देखना चाहती है?

सवी: मैं अभी कुछ ज्यादा नहीं सोच रही हूं। फिलहाल अपने आसपास के माहौल में हमारी सबसे पहली योजना ढोल का बाड़ को लेकर ही है कि अगले महीने हम साइकिल से दिल्ली जायेंगे। प्रधानमंत्री से मिल कर इसे रोकने के लिए कहेंगे क्योंकि अभी वहां काम तो रुक गया है पर ये सुनिश्चित नहीं किया गया है कि इसे नहीं काटा जायेगा। मैं चाहती हूं कि लोग पर्यावरण को बचाने की कोशिश करें। हमें पर्यावरण को भी अपने जीवन का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा मानना चाहिए। लोगों की सोच को बदलने की सबसे ज्यादा ज़रूरत है। बड़े स्तर पर जागरूकता क्रार्यक्रम चलने चाहिए। हमारे आदतों को पर्यावरण के हित के अनुरूप होना चाहिए और इसके लिए व्यवस्था को पर्यावरण अनुरूप काम करना होगा तभी तस्वीर बदल सकती है।


नोटः लेख में शामिल सारी तस्वीरें सुंदरम ने उपलब्ध करवाई है।

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