हमारे समाज में महिलाओं को लैंगिक असमानता की वजह से हर स्तर पर अनेक तरह के खतरों को सामना करना पड़ता है। कामकाजी महिलाओं के लिए कार्यस्थल पर अनेक तरह की चुनौतियों में सबसे प्रमुख सुरक्षा की है। घर से बाहर निकलना भी एक चुनौती है। देश में महिलाओं के ख़िलाफ़ हिंसा की घटनाओं को देखते हुए कामकाजी महिलाओं के लिए कार्यस्थल और उस तक पहुंचने की सुरक्षा एक बड़ा विषय है। हाल ही में एक अध्ययन में यह बात सामने आई है कि बेंगलुरु भारत में महिलाओं की सुरक्षा के लिए सबसे अच्छी जगहों में है। इंडियन एक्सप्रेस में छपी जानकारी के मुताबिक़ अवतार ग्रुप द्वारा हाल ही में किए गए “टॉप सिटीज़ फॉर वीमेन इन इंडिया” (TCWI) सर्वे में बेंगलुरु को भारत में महिलाओं के लिए सबसे अच्छे शहर के रूप में पाया गया। इसमें अलग-अलग शहरों का मूल्यांकन लैंगिक समावेशिता, सुरक्षा, बुनियादी ढांचा और रोजगार इत्यादि आधारों पर किया गया। इसमें बेंगलुरु को पहला स्थान मिलना इसकी प्रगतिशीलता और समावेशी पहलू को दिखाता है लेकिन इसके साथ ही यह भी देखना होगा कि यह समावेशिता क्या सिर्फ़ जेंडर बाइनरी तक सीमित है या फिर इसमें क्वीयर समुदाय की भी हिस्सेदारी शामिल है।
आर्थिक अवसर और रोजगार
भारत की ‘सिलिकॉन वैली’ कहा जाने वाला शहर तकनीकी, स्टार्टअप्स और नवाचार के लिए जाना जाता है। बाजार में आती नई तकनीकों और वैज्ञानिक खोजों के साथ ख़ुद को बदलता यह शहर बड़ी टेक कंपनियों का हब बन चुका है। इसी के साथ यहां नौकरी के नए अवसर भी बन रहे हैं। यहां की बहुत सारी आईटी कंपनियों ने महिलाओं के स्किल को बढ़ाने के लिए विशेष तौर पर नई नीतियां अपनाई हैं। इसके साथ ही महिलाओं की विशेष ज़रूरतों को ध्यान में रखते हुए काम के लचीले घंटे, मैटरनिटी लीव और बच्चों के लिए क्रेच की सुविधाएं भी मुहैया कराई जाती हैं जिससे इन वजहों से इन्हें अपने कामकाजी जीवन से समझौता न करना पड़े। इसके अलावा अपना स्टार्टअप शुरू करने वाली महिलाओं के लिए भी ज़रूरी सुविधाएं और नीतियां मौजूद हैं। हालांकि इसके बावजूद यह सवाल बना हुआ है यह सारे लाभ समान रूप से सभी को मिल रहे हैं या नहीं?
किसी भी शहर को सुविधाजनक बनाने के लिए इसका बुनियादी ढांचा सबसे ज़रूरी होता है। इसमें सार्वजनिक यातायात ख़ासतौर पर मेट्रो, बस, ट्रेन सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। जिससे शहर में कहीं भी आने-जाने के लिए किफ़ायती दरों पर सुविधा उपलब्ध हो सके।
बुनियादी ढांचा और सहूलियतें
किसी भी शहर को सुविधाजनक बनाने के लिए इसका बुनियादी ढांचा सबसे ज़रूरी होता है। इसमें सार्वजनिक यातायात ख़ासतौर पर मेट्रो, बस, ट्रेन सबसे अहम भूमिका निभाते हैं। जिससे शहर में कहीं भी आने-जाने के लिए किफ़ायती दरों पर सुविधा उपलब्ध हो सके। इसके साथ ही संस्थानों का सहयोगी वर्क कल्चर, काम के लचीले घंटे कामकाजी महिलाओं के पेशेवर जीवन के लिए बेहद ज़रूरी है। इसके साथ ही बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच की सुविधा होने से कामकाजी महिलाएं अपने काम पर बेहतर तरीके से फ़ोकस कर पाती हैं। हालांकि यह सभी सुविधाएं उच्च, मध्यम वर्ग की कामकाजी महिलाओं तक ही सीमित हैं। अभी भी बाहरी इलाकों में रहने वाले खासतौर पर निम्न आय वर्ग की महिलाओं के लिए यह सुविधाएं सीमित हैं।
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बेंगलुरु के एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब कर चुकीं कुमारी अर्चना ने बेंगलुरु में रहने के दौरान का अपना अनुभव साझा करते हुए बताया, “जॉब और सेफ्टी के लिहाज़ से देखा जाए तो बेंगलुरु अच्छा शहर है और यहां का पब्लिक ट्रांसपोर्ट भी बेहतर है। लेकिन यहां रहना काफ़ी महंगा है। ज़्यादातर वीमंस पीजी में चार्जेज ज़्यादा हैं और सुविधाएं कम हैं। इसके अलावा कई जगहों पर तो पीजी के मालिक, महिलाओं की मॉरल पुलिसिंग करते हैं, कुछेक तो पेरेंट्स का कंसेंट लेने के बाद ही पीजी देते हैं। यह सब थोड़ा परेशान करने वाला है।”
सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती
आमतौर पर जब महिलाएं किसी शहर में नौकरी या अपना व्यवसाय करना चाहती हैं तो उनके लिए उनकी पहली प्राथमिकता सुरक्षा होती है। किसी भी शहर का महिलाओं के प्रति समावेशी होना उसकी सुरक्षा पर निर्भर करता है। हर साल महिलाओं के ख़िलाफ़ होने वाले अपराधों में बढ़ोतरी देखी जा रही है ऐसे में सुरक्षा को लेकर होने वाली चिंताएं जायज़ हैं और इनका निपटान बेहद ज़रूरी है। बेंगलुरु ने कई क्षेत्रों में ऊंची रैंकिंग हासिल की है लेकिन यहां अभी भी ख़ासतौर पर रात के समय महिलाएं सुरक्षित महसूस नहीं करती हैं। शहर के पॉश इलाकों में तो स्थिति फिर भी बेहतर है लेकिन बाहरी इलाकों में स्ट्रीट लाइट की कमी, नियमित पुलिस गश्त की कमी और सुनसान सड़कें किसी भी तरह से सुरक्षा का एहसास नहीं दिला पाती हैं। महिलाओं की सुरक्षा के लिए तकनीक आधारित पहलें जैसे कि ट्रैकिंग सिस्टम वाली कैब सर्विसेज और महिला हेल्पलाइन काफी मायने में मददगार हैं। हालांकि यह कैब सर्विसेज थोड़ी महंगी होती है जिस वजह से निम्न और निम्न मध्यम वर्ग वाली महिलाएं इनका इस्तेमाल करने से बचती हैं।
सामाजिक समावेशिता और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय
एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लिए बेंगलुरु एक पसंदीदा शहर माना जाता है। यहां की मल्टीनेशनल कंपनियां क्वीयर समुदाय के अनुकूल माहौल बनाने की दिशा में प्रयास करती रहती हैं। बेंगलुरु में देश के अलग-अलग हिस्सों से जाकर लोग बसे हुए हैं। इस तरह से यह एक बहु सांस्कृतिक शहर बन चुका है। यहां समय-समय पर प्राइड परेड कभी आयोजन किया जाता है जिसमें न सिर्फ़ एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लोग बल्कि इनका सहयोग करने वाले भी बड़े पैमाने पर हिस्सा लेते हैं। इसके अलावा यहां पर जागरुकता बढ़ाने के लिए भी कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लेकिन इसके साथ ही यह भी बात ध्यान रखने योग्य है कि अब भी समुदाय को सामाजिक तौर पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है।
एलजीबीटीक्यू+ समुदाय से ताल्लुक रखने वाली बेंगलुरु की 32 वर्षीय गेम डेवलपर स्वाति ने बताया, “मेरे ऑफिस का वर्क कल्चर इतना अच्छा है कि मुझे क्वीयर कम्युनिटी से होने के नाते कभी भेदभाव का सामना नहीं करना पड़ा। इसके अलावा यहां पर कम्युनिटी के बहुत सारे लोग अपनी आइडेंटिटी के साथ रहते हैं जिसकी वजह से डेटिंग या सोशलाइज करना आसान रहता है। मैं इस शहर के अलावा कहीं और सेटल होने का सोच भी नहीं पाती। लेकिन जो यहां के लोकल लोग हैं उनकी सोच अभी भी जेंडर बाइनरी पर अटकी हुई है। चीजें बेहतर होने के बावजूद यहां भी अभी परिवार, रिश्तेदार और समाज में अपने सेक्सुअल ओरिएंटेशन को खुलकर ज़ाहिर करने का माहौल नहीं है।”
महिलाओं और एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के अनुकूल शहर
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कामकाजी महिलाओं के लिए सबसे अच्छा शहर कहलाने का मतलब रोजगार के अवसरों और बुनियादी ढांचे तक ही सीमित नहीं है। किसी भी व्यक्ति के लिए सबसे अच्छा शहर होने का मतलब है- वहां उसकी पसंद से पहचान के साथ आज़ादी से जीवन जीने की सहूलियत हो। इस मामले में बेंगलुरु की प्रगतिशील संस्कृति और वहां के संस्थानों का समावेशी नज़रिया दूसरे शहरों के लिए प्रेरणादायक है। लेकिन इसके साथ ही सभी लोगों ख़ासतौर पर हाशिए के समुदाय को जब तक उनकी पहचान और पसंद के साथ खुलकर आज़ादी से जीने का मौका नहीं मिलता तब तक यह प्रगति अधूरी ही मानी जाएगी।
मुंबई की रहने वाली 26 वर्षीय खुशबू एक मल्टीनेशनल कंपनी में अकाउंटेंट हैं। इन्होंने अपना अनुभव कुछ इस तरह साझा किया, “मुंबई एक ऐसा शहर है जहां रात के भी किसी समय, किसी सुनसान गली में अकेले जाने में कभी डर नहीं लगा। यहां के पब्लिक ट्रांसपोर्ट की सुविधा काफी अच्छी है मेट्रो के बन जाने से तो यह और बेहतर हुई है। महिलाओं के लिए सबसे अच्छा शहर होने का पहले क्राइटेरिया है- सुरक्षा, जिसकी वजह से हमें आज़ादी से जीने का मौका मिलता है। यहां पर किसी भी तरह के कपड़े पहनने से पहले दस बार नहीं सोचना पड़ता और मैं किसी भी समय अकेले बीच पर भी जा सकती हूं।”
महिलाओं की सुरक्षा के लिए तकनीक आधारित पहलें जैसे कि ट्रैकिंग सिस्टम वाली कैब सर्विसेज और महिला हेल्पलाइन काफी मायने में मददगार हैं। हालांकि यह कैब सर्विसेज थोड़ी महंगी होती है जिस वजह से निम्न और निम्न मध्यम वर्ग वाली महिलाएं इनका इस्तेमाल करने से बचती हैं।
सुधार की ज़रूरत
बेंगलुरु, मुंबई जैसे कुछ चुनिंदा शहरों में स्थितियां बेहतर होने के बावजूद अभी ये शहर आदर्श बनने से दूर हैं। एक समावेशी और प्रगतिशील शहर बनने के लिए उसे सभी नागरिकों को सुरक्षा प्रदान करने होगी इसके लिए सभी इलाकों में बेहतर स्ट्रीट लाइट, संवेदनशील सुरक्षा बल और नियमित पुलिस गश्त सुनिश्चित किया जाना चाहिए। इसके अलावा महिलाओं, एलजीबीटीक्यू+ समुदाय के लिए ख़ासतौर पर नीतियों और योजनाएं बनानी चाहिए। इसके बाद इन्हें सही तरीके से लागू करना भी ज़रूरी है जिससे ज़रूरतमंद को सही समय पर लाभ मिल सके। किसी भी तरह की अप्रिय घटना होने की स्थिति में सही समय पर उचित क़ानूनी सलाह मुहैया कराना चाहिए। साथ ही सर्वाइवर्स के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता भी उपलब्ध कराना ज़रूरी है जिससे वे जल्द ही अपनी सामान्य जीवनशैली में वापस आ सकें। इसके अलावा समाज में व्याप्त रूढ़िवादिता और पूर्वाग्रहों को ख़त्म करने के लिए स्कूलों, कॉलेज और मीडिया में जागरुकता अभियान चलाना भी ज़रूरी है।
बेंगलुरु का कामकाजी महिलाओं के लिए भारत का सर्वश्रेष्ठ शहर बनना काबिले तारीफ़ है इससे दूसरे शहरों को भी सीखना चाहिए। लेकिन इसके साथ ही बेंगलुरु को एक आदर्श शहर बनने के लिए सामाजिक समावेशिता, स्वतंत्रता, सुरक्षा के क्षेत्र में निरंतर सुधार करने की भी ज़रूरत है। एक ऐसा शहर जो सभी को अपने सपने साकार करने के लिए सहूलियतें दे, सबको समान अवसर उपलब्ध कराए, जहां सभी व्यक्ति अपनी पहचान और आज़ादी के साथ खुलकर जी सकें, उसे ही सच्चे मायने में देश का सबसे अच्छा शहर कहा जा सकता है।