इंटरसेक्शनलजेंडर आखिर क्यों एंटी-एजिंग उद्योग में महिलाओं की उम्र को एक समस्या बना दिया गया है?

आखिर क्यों एंटी-एजिंग उद्योग में महिलाओं की उम्र को एक समस्या बना दिया गया है?

आजकल सोशल मीडिया में भी एंटी-एजिंग क्रीम, सीरम, कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट और युवा बनाये रखने के वादों से भरे विज्ञापन यह संदेश देते हैं, कि झुर्रियां और सफेद बाल या उम्र का बढना सही नहीं है और इन्हें ठीक करने की ज़रूरत है। भारत में एंटी-एजिंग उत्पादों का तेज़ी से बढ़ता बाज़ार इस सोच का एक पुख्ता प्रमाण है।

उम्र का बढ़ना अनुभवों, यादों और सीख से भरी एक प्रक्रिया रहा है। लेकिन आज के उपभोक्तावादी दौर में, खासतौर पर महिलाओं के लिए, उम्र का बढ़ना एक स्वाभाविक परिवर्तन नहीं रहा है, बल्कि एक समस्या के रूप में देखा जा रहा है। आजकल सोशल मीडिया में भी एंटी-एजिंग क्रीम, सीरम, कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट और जवान या युवा बनाये रखने के वादों से भरे विज्ञापन यह संदेश देते हैं, कि झुर्रियां और सफेद बाल या उम्र का बढना सही नहीं है और इन्हें ठीक करने की ज़रूरत है। भारत में एंटी-एजिंग उत्पादों का तेज़ी से बढ़ता बाज़ार इस सोच का एक पुख्ता प्रमाण है।

 यह केवल सुंदरता की बदलती परिभाषा नहीं है, बल्कि महिलाओं के शरीर पर बढ़ते उपभोक्तावादी नियंत्रण की कहानी भी है, जहां उम्र का बढ़ना अब जीवन का पड़ाव नहीं रहा है, बल्कि एक ऐसी कमी बनती जा रही है, जिसे हर एक महिला या पुरुष, छुपाना ज़रूरी समझ रहा है। गौरतलब है कि इन प्रोडक्ट्स की कीमत भी दिन प्रतिदिन बढती जा रही है। असल में यह उपभोक्तावाद को बढ़ावा देने का एक जाल बनता जा रहा है, जिसमें न जाने कितनी महिलाएं प्रभावित हो चुकी हैं।

आजकल सोशल मीडिया में भी एंटी-एजिंग क्रीम, सीरम, कॉस्मेटिक ट्रीटमेंट और जवान या युवा बनाये रखने के वादों से भरे विज्ञापन यह संदेश देते हैं, कि झुर्रियां और सफेद बाल या उम्र का बढना सही नहीं है और इन्हें ठीक करने की ज़रूरत है।

भारत में बढ़ता एंटी-एजिंग बाज़ार और महिलाओं की बेचैनी

भारत में एंटी एजिंग का बाजार तेजी से बढ़ता जा रहा है। इंडिया टुडे में साल 2025 में छपी मार्केट एनालिसिस रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक एंटी-एजिंग उत्पादों के बाजार का आकार साल 2024 में 52.44 बिलियन डॉलर होने का अनुमान था और साल 2030 तक 80.61 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है, जो कि साल 2025 से 2030 तक 7.7 फीसदी की सीएजीआर से बढ़ रहा है। वहीं भारत में यह बाजार साल  2025 से 2034 के बीच 12.10 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि की दर से बढ़ने की संभावना है। यह बढ़ोतरी केवल सुन्दरता तक सिमित नहीं है , बल्कि उस सामाजिक दबाव को भी सामने लाती है, जो महिलाओं पर हमेशा जवान दिखने के लिए डाला जा रहा है।

यह महिलाओं के लिए हानिकारक भी सवित हो रहा है। लेकिन फिर भी इसका इस्तेमाल दिन प्रतिदिन बढ़ता चला जा रहा है।इसका एक उदाहरण साल 2025 का हालिया मामला एक अभिनेत्री की मृत्यु का भी देखा जा सकता है, क्योंकि उसकी मृत्यु का कारण एंटी एजिंग सप्लीमेंट का इस्तेमाल बताया गया था।  विशेषज्ञों के अनुसार, एंटी-एजिंग उत्पादों में सक्रिय (एक्टिव) तत्व शामिल होते हैं, जबकि दवाओं के सुरक्षित विकल्प के रूप में प्रचारित किए जाने वाले हर्बल सप्लीमेंट्स में स्टेरॉयड भी हो सकते हैं, जिनका इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह के बगैर खतरनाक भी साबित हो सकता है।  

मार्केट एनालिसिस रिपोर्ट के अनुसार, वैश्विक एंटी-एजिंग उत्पादों के बाजार का आकार साल 2024 में 52.44 बिलियन डॉलर होने का अनुमान था और साल 2030 तक 80.61 बिलियन डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है, जो कि साल 2025 से 2030 तक 7.7 फीसदी की सीएजीआर से बढ़ रहा है।

द हिन्दू के मुताबिक, मुंबई स्थित द एटर्न क्लिनिक की एस्थेटिक डर्मेटोलॉजिस्ट और रीजेनरेटिव मेडिसिन विशेषज्ञ अजारा सय्यद ने चेतावनी दी कि जिसे अक्सर ‘प्राकृतिक’ या ‘सुरक्षित’ बताकर बेचा जाता है। वह कई बार वह खतरनाक भी हो सकता है। अभिनेत्री की मृत्यु हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि हम वेलनेस को किस तरह देखते हैं । ख़ासकर ऐसे समय में जब सप्लीमेंट्स, डिटॉक्स और हर्बल मिश्रण एक क्लिक पर उपलब्ध हैं, बिना किसी स्क्रीनिंग और बिना चिकित्सकीय मार्गदर्शन के। भारत के शहरी क्षेत्रों में जवां त्वचा पाने की चाहत अब केवल वृद्ध लोगों तक ही सीमित नहीं रह गई है। कभी  बुढ़ापे में अपनाई जाने वाली चीज़ मानी जाने वाली यह प्रथा अब त्वचा की देखभाल का एक नियमित हिस्सा बन गई है, और जेनरेशन ज़ी भी एंटी-एजिंग उत्पादों को भारी मात्रा में अपना रही है।

विज्ञापन और डर का निर्माण

टीवी, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर चलने वाले विज्ञापन अक्सर यह संदेश देते हैं कि उम्र बढ़ने के लक्षण झुर्रियां, डार्क सर्कल, सफ़ेद बाल असफलता के संकेत हैं, और लोगों को भ्रमित करते हैं। जैसे कि एक विज्ञापन आमतौर पर देखा जा सकता है। एक हफ्ते में अपने सफेद बाल काले करें। आजकल बहुत से सेलिब्रिटी भी इस तरह के विज्ञापन साझा कर रहे हैं। गौरतलब है कि बहुत से लोग इन प्रोडक्ट्स का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित हो रहे हैं। बिजनेस स्टैंडर्ड में छपे साल 2023 के एक अध्ययन के मुताबिक, विश्व की आधी आबादी महिलाओं की है, लेकिन विज्ञापनों में उनकी उपस्थिति रूढ़िवादी सोच से प्रभावित रही है। अध्ययन से पता चला कि विज्ञापनों में केवल 25 फीसदी पुरुषों की तुलना में 58 फीसदी महिलाओं को गोरे रंग की त्वचा वाली दिखाया गया है। 

कई विज्ञापनों में महिलाओं को आमतौर पर युवा दिखाया गया है, जिनमें से 86 फीसदी महिलाएं 20 से 39 साल की उम्र के बीच हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 62 फीसदी है। इसमें यह भी पाया गया कि भारतीय विज्ञापनों में से केवल 4 फीसदी में ही 65 साल से अधिक उम्र के लोगों को दिखाया गया था। इस तरह से विज्ञापन महिलाओं में चिंता का कारण बन जाते हैं।  

इससे साफ़ पता चलता है कि भारत में पितृसत्तात्मक धारणाएं कितनी गहराई से बसी हुई हैं, जहां महिलाओं को न केवल सुंदरता के रुढ़िवादी मानकों का सामना करना पड़ता है, बल्कि उन्हें यह मानने के लिए भी तैयार किया जाता है, कि उनका मूल्य इसी से निर्धारित होता है। इसके साथ ही बड़े – बड़े  ब्रांड पुरुषों की तुलना में युवा महिलाओं को नौकरी पर रखने पर अधिक जोर देते हैं। कई विज्ञापनों में महिलाओं को आमतौर पर युवा दिखाया गया है, जिनमें से 86 फीसदी महिलाएं 20 से 39 साल की उम्र के बीच हैं, जबकि पुरुषों में यह आंकड़ा 62 फीसदी है। इसमें यह भी पाया गया कि भारतीय विज्ञापनों में से केवल 4 फीसदी में ही 65 साल से अधिक उम्र के लोगों को दिखाया गया था। इस तरह से विज्ञापन महिलाओं में चिंता का कारण बन जाते हैं।  

उपभोक्तावाद और लैंगिक असमानता 

एंटी-एजिंग इंडस्ट्री महिलाओं के शरीर को एक ऐसे प्रोजेक्ट के रूप में बदल देती है, जिसे लगातार सुधारने या बदलने की ज़रूरत रहती है। पितृसत्ता और पूंजीवाद मिलकर यह तय करते हैं कि एक कथित अच्छी महिला वही है, जो जवान दिखे और आकर्षक रहे। भारत में यह दबाव और भी ज्यादा देखने को मिलता है, क्योंकि यहां महिलाओं की सामाजिक स्वीकार्यता पहले से ही शादी, मातृत्व और सुंदरता से जोड़ी जाती रही है, जिसका फायदा पूंजीवाद उठाता है, और सुंदरता, जबान रहने वाले प्रोडक्ट का प्रचार करके महिलाओं को अपनी और आकर्षित करता है। सेंटर फॉर एजिंग बेटर के साल 2024 के एज विदाउट लिमिट्स नाम के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि महिलाओं के साथ पुरुषों की तुलना में 50 फीसदी अधिक बार भेदभाव किए जाने की बात सामने आई है ।

सेंटर फॉर एजिंग बेटर के साल 2024 के एज विदाउट लिमिट्स नाम के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि महिलाओं के साथ पुरुषों की तुलना में 50 फीसदी अधिक बार भेदभाव किए जाने की बात सामने आई है ।

गौरतलब है कि उनकी उम्र के कारण उन्हें नजरअंदाज किए जाने की संभावना भी काफी अधिक होती है। नकारात्मक व्यवहार का अनुभव करने वाली 58 फीसदी से अधिक महिलाओं के साथ, अगर उनकी उम्र के कारण उनसे नकारात्मक तरीके से बात की जाती है या उनके साथ नकारात्मक व्यवहार किया जाता है, तो वे शायद ही कभी इसका विरोध कर पाती हैं। उम्र को लेकर भेदभावपूर्ण व्यवहार को चुनौती न देने के कारणों में शर्मिंदगी, आत्मविश्वास की कमी और यह महसूस करना कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा, आदि कारण शामिल हैं।

सुधार के लिए क्या किया जा सकता है ?

बढ़ती उम्र को कमज़ोरी के रूप में देखने के बजाय उसे अनुभव, समझ और आत्मनिर्भरता से जोड़कर देखा जाना बहुत ज़रूरी है। समाज और लोगों को यह समझने की ज़रूरत है कि उम्र का बढना एक  प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो कि बिल्कुल आम बात है। इसके अलावा मीडिया और विज्ञापन उद्योग को यह समझना होगा कि वे केवल उत्पाद नहीं बेच रहे हैं, बल्कि एक सोच भी गढ़ रहे हैं। इसलिए अलग-अलग उम्र की महिलाओं को विज्ञापनों में सम्मानजनक तरीके से दिखाना और बढ़ती उम्र को समस्या नहीं बल्कि जीवन के स्वाभाविक पड़ाव के रूप में प्रस्तुत करना बहुत ज़रूरी है।

इसके साथ ही एंटी-एजिंग उत्पादों और सप्लीमेंट्स के विज्ञापनों पर सख़्त निगरानी और नियम बनाए जाने चाहिए। स्कुल, कोलेज और ग्रामीण स्तर पर बॉडी पोज़िटीविटी और एक्सेप्टेंस को लेकर खुले तौर पर बातचीत होना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि जब कम उम्र से ही यह सिखाया जाएगा कि उम्र बढ़ना स्वाभाविक है और हर शरीर सम्मान के योग्य है, तभी उपभोक्तावादी डर की राजनीति को तोड़ा जा सकेगा और हर एक इंसान बिना किसी बदलाव के, अपने शरीर को अपनाने के साथ -साथ सहज रूप से जीवन जी पाएगा।

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