संस्कृतिकला भारतीय क्वीयर-फेमिनिस्ट कलाकारों की कला, स्मृति और प्रतिरोध की यात्रा 

भारतीय क्वीयर-फेमिनिस्ट कलाकारों की कला, स्मृति और प्रतिरोध की यात्रा 

क्वीयर-फेमिनिस्ट कला केवल प्रतिनिधित्व की मांग नहीं करती, बल्कि वह देखने, समझने और याद रखने के तरीकों को चुनौती देती है। यह कला किसी एक कैनवस, किसी गैलरी या किसी तयशुदा फ्रेम में क़ैद नहीं रहती। यह दीवारों से निकलकर सड़कों पर आती है, शरीर के भीतर उतरती है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है।

भारतीय कला का इतिहास अक्सर कुछ गिनी-चुनी तस्वीरों या दृश्यों के आसपास रचा गया है, जैसे देवता, राजा, युद्ध, प्रेम, त्याग और सुंदरता की तय की हुई परिभाषाएं। यह वही दुनिया रही है जिसे कला की दीवारों पर जगह मिली। जो इन परिभाषाओं में फिट बैठा, वह कला कहलाया, और जो बाहर रह गया, वह धीरे-धीरे अनदेखा कर दिया गया। यह अदृश्यता केवल विषयों की नहीं थी, बल्कि उन शरीरों, इच्छाओं और अनुभवों की भी थी, जिन्हें समाज ने देखना या स्वीकार करना कभी ज़रूरी नहीं समझा। कुछ आवाज़ें इतनी असहज मानी गईं कि उन्हें कला मानने से ही इनकार कर दिया गया। भारतीय क्वीयर-फेमिनिस्ट कलाकार इसी इनकार, इसी चुप्पी और इसी अदृश्यता के ख़िलाफ़ खड़े होते हैं।

क्वीयर-फेमिनिस्ट कला केवल प्रतिनिधित्व की मांग नहीं करती, बल्कि वह देखने, समझने और याद रखने के तरीकों को चुनौती देती है। यह कला किसी एक कैनवस, किसी गैलरी या किसी तयशुदा फ्रेम में क़ैद नहीं रहती। यह दीवारों से निकलकर सड़कों पर आती है, शरीर के भीतर उतरती है और रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती है। यह लेख भारतीय क्वीयर-फेमिनिस्ट कलाकारों की उसी कला पर केंद्रित है, जिसमें एक ऐसी कला जो शरीर को वस्तु नहीं, अनुभव मानती है, जो स्मृति को निजी नहीं, राजनीतिक बनाती है और जो प्रतिरोध को नारे की बजाय रोज़मर्रा की सच्चाइयों में तलाशती है। 

यह वही दुनिया रही है जिसे कला की दीवारों पर जगह मिली। जो इन परिभाषाओं में फिट बैठा, वह कला कहलाया, और जो बाहर रह गया, वह धीरे-धीरे अनदेखा कर दिया गया। यह अदृश्यता केवल विषयों की नहीं थी, बल्कि उन शरीरों, इच्छाओं और अनुभवों की भी थी। 

क्वीयर-फेमिनिस्ट कला में शरीर की मौजूदगी

क्वीयर-फेमिनिस्ट कला का पहला और सबसे अहम स्थल अक्सर कलाकार का अपना शरीर है। लेकिन जब यही शरीर कला में प्रवेश करता है, तो वह किसी आदर्श या सजाए गए रूप में नहीं आता। वह अपनी थकान के साथ आता है। कभी लेटा हुआ, कभी झुका हुआ, कभी स्थिर और रुका हुआ। यह थकान कमजोरी नहीं है, बल्कि अनुभव की निशानी है। उसकी मौजूदगी अपने आप में ही एक सवाल और एक प्रतिरोध बन जाती है। भारतीय समकालीन कला में सोनिया खुराना का काम इसी संदर्भ में बहुत गहरे स्तर पर असर डालता है। उनके वीडियो और परफॉर्मेंस में शरीर चुप रहता है। लेकिन कमजोर नहीं दिखता। वह कैमरे की आंख से डरता नहीं, बल्कि उसे लौटकर देखता है। ‘लाइंग डाउन’ जैसे कामों में उनका शरीर उस स्त्री-दृष्टि को उलट देता है, जिसमें महिलाओं को केवल देखने की वस्तु माना गया है। यहां शरीर लेटा हुआ है, लेकिन नियंत्रण में है। कला समीक्षक इसे क्वाइट रेसिस्टेंस कहते हैं, ऐसा प्रतिरोध जो शोर नहीं मचाता, लेकिन पीछे भी नहीं हटता। सोनिया बताती हैं, “मेरे लिए शरीर कोई प्रतीक नहीं है, बल्कि अनुभव है।”

वे कहती हैं, “मैं शरीर को दिखाना नहीं चाहती, मैं शरीर के साथ रुकना चाहती हूं । वहां, जहां असहजता शुरू होती है।” उनके काम में शरीर को किसी निशान या प्रतीक की तरह नहीं, बल्कि एक जीते-जागते अनुभव की तरह दिखाया गया है। बातचीत के दौरान उनसे एक सवाल पूछा गया कि आपके लिए शरीर, कला में क्या अर्थ रखता है, खासकर एक क्वीयर-फेमिनिस्ट संदर्भ में? वह बताती हैं,  “मेरे लिए शरीर कोई प्रतीक नहीं है, वह अनुभव है। वह समय, थकान, डर और यादों को अपने भीतर रखता है। जब मैं अपने शरीर के साथ काम करती हूं, तो मैं उसे सुंदर या मजबूत साबित करने की कोशिश नहीं करती। मैं बस उसे मौजूद रहने देती हूं। क्वीयर-फेमिनिस्ट संदर्भ में शरीर सत्ता से बातचीत करता है। कभी चुप रहकर, कभी स्थिर रहकर। यह एक तरह की राजनीति है, जो शब्दों से पहले शरीर में शुरू होती है।” 

मेरे लिए शरीर कोई प्रतीक नहीं है, वह अनुभव है। वह समय, थकान, डर और यादों को अपने भीतर रखता है। जब मैं अपने शरीर के साथ काम करती हूं, तो मैं उसे सुंदर या मजबूत साबित करने की कोशिश नहीं करती। मैं बस उसे मौजूद रहने देती हूं।

अक्षरों से स्मृति तक क्रुत्तिका सुसरला और रेया अहमद की क्वीयर कला

क्वीयर-फेमिनिस्ट और समावेशी दृष्टि से रची गई कला केवल कलाकार के निजी अनुभव तक सीमित नहीं रहती। यह उन सामाजिक धारणाओं, रूढ़ियों और सत्ता के ढांचों को चुनौती देती है, जो जेंडर, यौनिकता और पहचान की सीमाएं तय करते हैं। इस विषय में  क्रुत्तिका सुसरला एक भारतीय इलस्ट्रेटर, कॉमिक मेकर और ग्राफ़िक डिज़ाइनर, अपने काम में जेंडर, यौनिकता, पहचान और सामाजिक असमानताओं जैसे जटिल सवालों को सामने लाती हैं। उनके चित्र हमें दिखाते हैं कि कला केवल देखने या सराहने के लिए नहीं होती, बल्कि यह सोचने, सवाल करने और बदलने के लिए एक ज़रिया भी बन सकती है। उनकी कला केवल सौंदर्य तक सीमित नहीं रहती, बल्कि सामाजिक मानदंडों और जमे हुए विश्वासों को सवालों के घेरे में लाती है। 36 डेज़ ऑफ़ टाइप परियोजना में क्रुत्तिका ने अंग्रेज़ी वर्णमाला को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। इसके माध्यम से उन्होंने जेंडर, इंटरसेक्शनैलिटी, क्वीयर पहचान और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर बात की। ‘क्यू’ को उन्होंने क्वीयर पहचान से और ‘आई’ को इंटरसेक्शनैलिटी से जोड़कर उन्होंने यह दिखाया कि रोज़मर्रा के प्रतीक भी गहरे सामाजिक अर्थ और अनुभव व्यक्त कर सकते हैं। 

रेया अहमद एक भारतीय क्वीयर कलाकार, इलस्ट्रेटर और विज़ुअल आर्टिस्ट हैं, जिनका काम जेंडर पहचान, परिवार, संस्कृति और क्वीयर अनुभव के जटिल सवालों को सामने लाता है। उनके चित्र केवल व्यक्तिगत कहानी नहीं कहते, वे सामूहिक अनुभव और सांस्कृतिक स्मृति की परतों को उजागर करते हैं, और दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करते हैं कि हमारी रोज़मर्रा की दुनिया में कौन-सी पहचानें छिपी रहती हैं। उनके काम में दक्षिण एशियाई दृश्य संस्कृति,  मिनिएचर चित्रकला और बंगाली‑इस्लामिक डिज़ाइन मोटिफ़ का समावेश है, जो पुराने सांस्कृतिक मानदंडों को तोड़कर उन्हें लचीला, बहुआयामी और राजनीतिक रूप देता है। उनके प्रोजेक्ट्स जैसे द मार्जिन्स ऑफ़ मेमरी और इलस्ट्रेशन फॉर क्वीयर नरेटिव्स यह दिखाते हैं कि कला सिर्फ़ सौंदर्य का सवाल नहीं है, बल्कि पहचान, विरोध और इतिहास के अनुभवों को महसूस करने का माध्यम भी है। उनकी कला यह याद दिलाती है कि क्वीयर अस्तित्व केवल यौनिकता तक सीमित नहीं, बल्कि स्मृति, संस्कृति, भाषा और सामूहिक अनुभव का भी हिस्सा है। 

36 डेज़ ऑफ़ टाइप परियोजना में क्रुत्तिका ने अंग्रेज़ी वर्णमाला को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। इसके माध्यम से उन्होंने जेंडर, इंटरसेक्शनैलिटी, क्वीयर पहचान और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों पर बात की। ‘क्यू’ को उन्होंने क्वीयर पहचान से और ‘आई’ को इंटरसेक्शनैलिटी से जोड़कर उन्होंने यह दिखाया कि रोज़मर्रा के प्रतीक भी गहरे सामाजिक अर्थ और अनुभव व्यक्त कर सकते हैं। 

ओपाशोना घोष की कला और क्वीयर-फेमिनिस्ट पहचान

ओपाशोना घोष एक भारतीय इलस्ट्रेटर, ग्राफ़िक डिज़ाइनर और कॉमिक मेकर हैं, जिनकी रचनाएं जेंडर, यौनिकता, मानसिक स्वास्थ्य, क्लब संस्कृति और क्वीयर पहचान के सवालों को सामने लाती हैं। उनके काम की ताक़त इस बात में है कि यह सीधे दर्शक की दृष्टि और समझ पर सवाल डालती है, जैसे कोई पुरानी मान्यता या सामाजिक दबाव अचानक रंगीन रूप में सामने आ जाए और उसे चुनौती देने पर मजबूर कर दे। ओपाशोना घोष की कला केवल व्यक्तिगत अनुभव का दस्तावेज़ नहीं है। यह समुदाय, समूह की यादें और क्वीयर जीवन के जटिल अनुभवों का प्रतिनिधित्व भी करती है। 

उनके इंस्टाग्राम और प्रदर्शनों में देखा जा सकता है कि वे जेंडर, शरीर और सामाजिक अपेक्षाओं की राजनीति को उजागर करती हैं। उनका काम दर्शकों को यह महसूस कराता है कि कला केवल सौंदर्य और मनोरंजन नहीं है। यह विरोध, संवाद और पहचान की राजनीति का माध्यम भी बन सकती है। उनकी रचनाएं साधारण रेखा और रंग से कहीं अधिक गहरा अर्थ रखती हैं। वे हमें याद दिलाती हैं कि पहचान केवल देखी या सुनी नहीं जाती, बल्कि अनुभव की जाती है और कभी-कभी असहज होकर भी महसूस की जाती है। उनकी कला दर्शकों को यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमने कभी उन सीमाओं को देखा, जिन्हें समाज ने तय कर रखा है? क्या हमने कभी महसूस किया कि क्वीयर  जीवन के अनुभव कितने जटिल और बहुआयामी हैं? उनकी रचनाएं इस सवाल का उत्तर देती हैं। कला तब सबसे शक्तिशाली होती है जब वह केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव, चुनौती और संवाद का माध्यम बन जाए। 

ओपाशोना घोष एक भारतीय इलस्ट्रेटर, ग्राफ़िक डिज़ाइनर और कॉमिक मेकर हैं, जिनकी रचनाएं जेंडर, यौनिकता, मानसिक स्वास्थ्य, क्लब संस्कृति और क्वीयर पहचान के सवालों को सामने लाती हैं। उनके काम की ताक़त इस बात में है कि यह सीधे दर्शक की दृष्टि और समझ पर सवाल डालती है।

टोट बैग पर बनी कहानियां राशी की कला

दिल्ली की रहने वाली राशी, जो एक ट्रांसवुमन हैं और कई सालों से कला को साथ लेकर चलती हैं और टोट बैग, रुमाल और चादरों पर अपनी कला से समाज में फैली रूढ़ियों को दिखाती हैं। वह साधारण कपड़े के बैग, जिन्हें लोग अक्सर रोज़मर्रा की ज़रूरत समझकर ख़रीद लेते हैं। लेकिन उनके हाथों में आते ही ये बैग सिर्फ़ सामान ढोने की चीज़ नहीं रहते, वे कहानी बन जाते हैं। वह उन पर रंग भरती हैं, कभी दो शरीर हाथ थामे हुए, कभी आधा बना चेहरा, कभी आंखें जो सीधी देखती हैं। ये चित्र बहुत सधे हुए नहीं होते, न ही किसी कला स्कूल की तकनीक से बने होते हैं। लेकिन इनमें एक ईमानदारी होती है, एक बेचैनी होती है, जो देखने वाले को रोक लेती है।

जब वह इन बैगों को बेचने बैठती हैं, तो वह सिर्फ़ ग्राहक नहीं ढूंढती हैं। वह बताती हैं,  “मेरी कला किसी गैलरी से नहीं, सड़क से शुरू होती है। मैं लिख नहीं पाई, लेकिन देखना और समझना मैंने वहीं सीखा जहां लोग रुकते नहीं। टोट बैग मेरे लिए सिर्फ़ कपड़ा नहीं, बोलने की जगह हैं,रंग मेरे शब्द हैं। जो बातें मैं लिख नहीं सकी, उन्हें मैं चित्रों में रखती हूं, दो शरीर, अधूरे चेहरे, सीधी आंखें। मेरी क्वीयर पहचान कोई नारा नहीं, मेरी सच्चाई है। मैं चाहती हूं कि लोग रुकें, सवाल करें और सोचें। अगर मेरी कला किसी को थोड़ा असहज करती है, तो शायद वही उसका काम है।” उनके लिए उनकी क्वीयर पहचान किसी नारे या घोषणा का रूप नहीं लेती, बल्कि उनके रोज़मर्रा के जीवन का हिस्सा है। जब समाज पहचान को नाम देने से इनकार करता है, तब रंग और चित्र अभिव्यक्ति का माध्यम बनते हैं। वे मानती हैं कि भाषा के अभाव में दृश्य रूप बोलने लगते हैं। औपचारिक शिक्षा के सीमित अवसरों के बावजूद, राशी ने यह समझ विकसित की कि चुप रहना और अदृश्य हो जाना समान नहीं है। इसी समझ के साथ उन्होंने ऐसी कला को चुना, जो गैलरी से बाहर निकलकर आम लोगों तक पहुंच सके । 

मेरी कला किसी गैलरी से नहीं, सड़क से शुरू होती है। मैं लिख नहीं पाई, लेकिन देखना और समझना मैंने वहीं सीखा जहां लोग रुकते नहीं। टोट बैग मेरे लिए सिर्फ़ कपड़ा नहीं, बोलने की जगह हैं,रंग मेरे शब्द हैं।

अकेलेपन से समुदाय तक: क्वीयर कला में कलेक्टिव आवाज़ों का उभार

इन व्यक्तिगत कलाकारों के साथ-साथ कुछ कलेक्टिव भी हैं, जिन्होंने क्वीयर-फेमिनिस्ट कला को अकेलेपन से बाहर निकाला है। अरावनी आर्ट प्रोजेक्ट ऐसा ही एक कलेक्टिव है, जहां ट्रांस और सिस महिला कलाकार मिलकर सार्वजनिक दीवारों पर म्यूरल बनाते हैं। ये दीवारें शहर की रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा बन जाती हैं। क्वीयर मुस्लिम प्रोजेक्ट एक और अहम पहल है, जो फ़ोटोग्राफ़ी और कहानियों के ज़रिये क्वीयर मुस्लिम पहचान को दर्ज करता है। यह काम इसलिए ज़रूरी है, क्योंकि अक्सर धर्म और क्वीयर पहचान को एक-दूसरे के विरोध में रखा जाता है। इस प्रोजेक्ट की तस्वीरें बताती हैं कि ये पहचानें साथ-साथ मौजूद हो सकती हैं। दर्द के साथ, संघर्ष के साथ, लेकिन पूरी सच्चाई के साथ।

आज के समय में जब क्वीयर समुदाय के अधिकारों और अस्तित्व पर लगातार सवाल उठाए जाते हैं। यह कला एक तरह का प्रतिरोध बन जाती है। यह प्रतिरोध नारेबाज़ी से नहीं, बल्कि रोज़मर्रा की सच्चाइयों से पैदा होता है। यह हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि इतिहास कौन लिखता है और किन जिंदगियों को उसमें जगह मिलती है। क्वीयर-फेमिनिस्ट कला उसी अधूरे इतिहास को पूरा करने की कोशिश है।भारतीय क्वीयर-फेमिनिस्ट कला केवल देखने की वस्तु नहीं, बल्कि अनुभव, स्मृति और प्रतिरोध का माध्यम है। यह उन अदृश्य शरीरों, इच्छाओं और अनुभवों को दृश्य बनाती है, जिन्हें समाज ने अनदेखा किया। कला रोज़मर्रा में, वस्तुओं और सामूहिक स्मृति में प्रतिरोध पैदा करती है। आज, जब क्वीयर अधिकारों और अस्तित्व पर सवाल उठते हैं, यह कला याद दिलाती है कि इतिहास वही लिखता है जो देखा और समझा जाता है और अब हर पहचान को जगह मिलनी चाहिए।

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