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यह समाज हमेशा से एक औरत को अपने सपनें, अभिलाषाओं और इच्छाओं को दबाकर एक आदर्श नारी का उदाहरण पेश करने के लिए प्रेरित करता रहा है। वह आदर्श नारी जिसकी सीमा इस पितृसत्तात्मक समाज द्वारा तय की जाती है। वह आदर्श नारी जिसकी जिम्मेदारियों की सूची यह समाज तय करता है। वह आदर्श नारी जिसे अपने सपने को चूल्हे में झोंककर पूरे परिवार के लिए खाना बनाने की सलाह दी जाती है। वह आदर्श नारी जिसे अपने पति की परछाईं बनकर जीवन जीना सिखाया जाता है और इसी आदर्श नारी बनने के इर्द-गिर्द एक नारी का पूरा जीवन समाप्त हो जाता है। जब कोई स्त्री समाज के इन नियमों के विरुद्ध जाकर, सबसे पहले खुद के बारे में सोचती है, अपने पति का परछाईं ना बनकर उससे कदम से कदम मिलाकर जिंदगी में चलना चाहती है, तो यह समाज उन्हें मतलबी औरत, स्वार्थी औरत और संस्कारविहीन औरत का तबका दे देता है। लेकिन फिर भी कुछ स्त्रियां समाज के इन बंदिशों को तोड़ने में कामयाब हो ही जाती है। ऐसी औरतें समाज के कड़वे तानों को अनसुना करके भी अपनी अलग राह चुन ही लेती हैं। इसी तरह अपने जीवन को अपने हिसाब से मोड़ा है, ‘नारी गुंजन सरगम बैंड की औरतों ने।’ यह बैंड बिहार का पहला ऐसा बैंड है जो सारी पितृसत्तात्मक चुनौतियों का सामना करते हुए इस समाज में एक मिसाल पेश कर रहा है।

शादी और दूसरे समाराहों में आपने अक्सर पुरुषों के समूह को बैंड बजाते हुए देखा होगा लेकिन इसे चुनौती दी है नारी गुंजन सरगम बैंड की औरतों ने। नारी गुंजन सरगम बैंड कुल दस औरतों का समूह है और ये सारी औरतें दलित समुदाय से आती हैं। इसमें लालती देवी, मालती देवी, डोमनी देवी, सोना देवी, वीजान्ती देवी, अनीता देवी, सावित्री देवी, पंचम देवी, सविता देवी और छठिया देवी शामिल हैं। ये औरतें ना केवल शानदार सरगम बजाती हैं बल्कि अनेक कार्यक्रमों में अपनी कला का बखूबी प्रदर्शन करके बिहार को भी गौरवान्वित कर रही हैं। बड़े शहरों की औरतों के लिए इस समाज में अपना अस्तित्व ढूंढना फिर भी थोड़ा आसान होता है। लेकिन एक छोटे से गांव के छोटे से तबके के दलित समुदाय की औरतों के लिए ये कितना कठिन होगा, शायद इसका हम अंदाजा भी नहीं लगा सकते।

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इस बैंड में शामिल महिलाएं बिहार के ढ़िबरा-मुबारकपुर गांव की रहने वाली हैं। पिछड़े समुदाय की यह महिलाएं पहले किसी तरह अपना गुज़ारा कर रही थी। फिर ये महिलाएं पद्मश्री सुधा वर्गीज़ के एनजीओ नारी गुंजन से जुड़ीं। जहां ये हर हफ्ते ये 5 से 10 रुपये जमा करती थी। फिर उन रुपयों के आधार पर इन्हें एनजीओ द्वारा लोन मुहैया कराया गया। जिससे यह कृषि का काम करने लगी। लेकिन फिर भी पूरा दिन काम करने के बावजूद इनकी आमदनी बहुत कम थी। बस किसी तरह घर का खर्च निकल पाता था। तब सुधा वर्गीज के कहने और समझाने पर यह महिलाएं सरगम बैंड सीखने को राजी हो गईं। फिर सुधा वर्गीज जी ने ही पटना से एक मास्टर, ‘आदित्य गुंजन’ को इन्हें बैंड सिखाने के लिए बुलाया। लगभग एक साल की मेहनत के बाद ही इन महिलाओं ने अच्छे तरीके से बैंड बजाना सीख लिया।

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अपने जीवन को अपने हिसाब से मोड़ा है, ‘नारी गुंजन सरगम बैंड की औरतों ने।’ यह बैंड बिहार का पहला ऐसा बैंड है जो सारी पितृसत्तात्मक चुनौतियों का सामना करते हुए इस समाज में एक मिसाल पेश कर रहा है।

नारी गुंजन सरगम बैंड की एक सदस्य सविता देवी ने बताया कि, “पहले कुल 16 महिलाएं यह बैंड सीखने के लिए आती थी। लेकिन सामाजिक दबाव और परिवार और काम के बीच सामंजस्य ना बैठा पाने की वजह से 6 महिलाओं ने बीच में ही सीखना बंद कर दिया। लेकिन हम 10 महिलाओं ने यह कला सीखने की ठान ली थी। लगभग डेढ़ साल बाद हमने अच्छे-तरीके से बैंड बजाना सीख लिया।” एक इंटरव्यू के दौरान सुधा वर्गीज ने कहा कि,”अखबारों के ज़रिये नारी गुंजन सरगम बैंड के बारे में जानकर बिहार-शरीफ का एक लड़के का मेरे पास फोन किया और अपनी शादी में इनसे बैंड बजवाने का उसने आग्रह किया।” तब पहली बार किसी शादी में महिलाओं के समूह ने सरगम बैंड बजाया था और यहीं से नारी गुंजन सरगम बैंड के सफर की शुरुआत हो गई। मात्र एक साल के अंदर ही इन्होंने पूरे पटना में धूम मचा दी। सुधा वर्गीज़ बताती हैं कि पहले से इन औरतों के आत्मविश्वास में काफी बदलाव आया है। अब यह कहीं भी निडर होकर जाती और घूमती हैं।

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नारी गुंजन की औरतें यह भी बताती हैं कि पहले उनके पति, सास-ससुर हमें यह कला सीखने से रोकते थे। वे कहते थे कि बैंड में गा-बजाकर कैसे पैसा कमाओगी, यह पुरुषों का काम है, अब यही काम बाकी रह गया है? सफलता के इस मुकाम तक पहुंचने के लिए इन महिलाओं को इस पितृसत्तात्मक समाज के कई तानों से होकर गुज़रना पड़ा। लेकिन अब यही महिलाएं जब दिल्ली, मुंबई हवाई जहाज से प्रदर्शन करने जाती हैं तो वही लोग अब कहते हैं कि ये औरतें तो बहुत आगे निकल गई हैं। बच्चे भी हमपर गर्व करते हैं। अब हमारे पास भी रुपए होते हैं तो बच्चों के लिए मनचाहे चीज खरीदते हैं। उन्हें अच्छी शिक्षा दिलवाते हैं। घर-परिवार वाले भी अब बहुत इज्जत देते हैं।यह औरतें अमिताभ बच्चन के शो,”कौन बनेगा करोड़पति” में भी प्रदर्शन कर चुकी है। महिला दिवस के अवसर पर सुषमा स्वराज ने भी इन औरतों को सम्मानित किया है। जो आंखें सपने देखती हैं उन्हें उन सपनों को पूरा करने की होड़ लगना लाजि़मी है। लेकिन जो आंखें सपने ना देखती हो उन्हें सपने देखना सिखाना काफी दिलचस्प है। सुधा वर्गीज जी ने यही काम किया है। इन्होंने ना सिर्फ इन औरतों की जिंदगी सुधारी है। बल्कि इन जैसी कई औरतों के लिए कमाई का एक विकल्प भी ढूंढा है।

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तस्वीर साभार : The Print

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