कला केवल सुंदरता रचने का माध्यम नहीं है। यह देखने और देखे जाने की राजनीति को भी उजागर करती है। आम तौर पर हम मानते हैं कि किसी चीज़ को देखना एक स्वाभाविक और सहज क्रिया है। लेकिन कला और दृश्य संस्कृति में देखना कभी भी तटस्थ नहीं होता। प्रसिद्ध विचारक जॉन बर्जर ने अपनी किताब वेज़ ऑफ़ सीइंग में कहा है कि देखना हमेशा एक चुनाव होता है। इसलिए जब हम किसी पेंटिंग, फिल्म या तस्वीर को देखते हैं, तो सवाल यह नहीं होता कि क्या दिखाया गया है, बल्कि यह होता है कि कौन देख रहा है और किस नज़र से देख रहा है।
कला में ‘गेज़’ का सीधा संबंध सत्ता से है। जिसके हाथ में कैमरा, कलम या ब्रश होता है, उसके पास यह ताकत होती है कि वह सामने वाले को कैसे दिखाए। ऐतिहासिक रूप से यह ज़्यादातर पुरुषों के पास रही है। इसी वजह से कला, साहित्य और सिनेमा में महिलाओं को अक्सर एक सोचने-समझने वाले व्यक्ति के बजाय एक ऐसी वस्तु के रूप में दिखाया गया, जिसे केवल देखा जाए। मेल गेज़ ने महिलाओं को लंबे समय तक एक सुंदर शरीर या निष्क्रिय उपभोग की वस्तु बनाकर रखा। इस नज़र में महिला की इच्छा, सहमति और अनुभव को महत्व नहीं दिया गया। उसके शरीर को ही उसकी पहचान बना दिया गया।
मेल गेज़ ने महिलाओं को लंबे समय तक एक सुंदर शरीर या निष्क्रिय उपभोग की वस्तु बनाकर रखा। इस नज़र में महिला की इच्छा, सहमति और अनुभव को महत्व नहीं दिया गया। उसके शरीर को ही उसकी पहचान बना दिया गया। फीमेल गेज़ इस सत्ता संतुलन को चुनौती देता है। फीमेल गेज़ का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि कैमरे के पीछे एक महिला है।
इसके उलट, फीमेल गेज़ इस सत्ता संतुलन को चुनौती देता है। फीमेल गेज़ का मतलब सिर्फ यह नहीं है कि कैमरे के पीछे एक महिला है। इसका अर्थ है एक अलग नज़र, जो महिला को उसकी पूरी इंसानियत के साथ देखती है। यहां शरीर से ज़्यादा महत्व आत्म-स्वीकृति, अनुभव, सहमति, भावनाओं और व्यक्तिगत सीमाओं को दिया जाता है। महिला को अपनी इच्छा और पहचान के साथ मौजूद रहने की जगह मिलती है। फीमेल गेज़ में देखने का उद्देश्य नियंत्रण नहीं होता। यह संवाद, संवेदना और भावनात्मक निकटता पर आधारित होता है। यह नज़रिया कामुकता को भी एक मानवीय अनुभव के रूप में देखता है, न कि केवल उपभोग की चीज़ के रूप में। इस तरह फीमेल गेज़ कला को केवल देखने का नहीं, बल्कि समझने और महसूस करने का माध्यम बनाता है।
मेल गेज़ का वर्चस्व: इतिहास और संदर्भ
कला और दृश्य संस्कृति के इतिहास में देखने वाला और जिसे देखा जा रहा है, उनके बीच बराबरी नहीं रही है। पेंटिंग से लेकर सिनेमा तक, दुनिया को ज़्यादातर पुरुष नज़रिए से दिखाया गया है। इसी असमान दृष्टि को नारीवादी सिद्धांत में मेल गेज़ कहा जाता है, जहां स्त्री को देखने वाली नहीं, बल्कि देखी जाने वाली वस्तु बना दिया जाता है। इस अवधारणा को साल 1975 में ब्रिटिश फिल्म सिद्धांतकार लौरा मल्वी ने अपने निबंध ‘विजुअल प्लेज़र एंड नैरेटिव सिनेमा’ के ज़रिए स्पष्ट किया। उनके अनुसार, मुख्यधारा का सिनेमा दर्शक को पुरुष मानकर चलता है। कैमरा, कहानी और संपादन मिलकर ऐसी दृष्टि रचते हैं, जिसमें पुरुष सक्रिय और नियंत्रक होता है, जबकि महिला निष्क्रिय और दृश्य आनंद का साधन बन जाती है।
साल 1975 में ब्रिटिश फिल्म सिद्धांतकार लौरा मल्वी ने अपने निबंध ‘विजुअल प्लेज़र एंड नैरेटिव सिनेमा’ के ज़रिए स्पष्ट किया। उनके अनुसार, मुख्यधारा का सिनेमा दर्शक को पुरुष मानकर चलता है।
मल्वी बताती हैं कि सिनेमा देखने के सुख यानी स्कोपोफिलिया पर आधारित है। कैमरा पुरुष की आँख का विस्तार बन जाता है। नतीजतन, दर्शक का जेंडर चाहे जो हो, उसे महिला पात्र को एक होमोसेक्शुअल पुरुष की नज़र से देखने के लिए मजबूर किया जाता है। यहां महिला का शरीर कहानी से अधिक दृश्य आकर्षण का हिस्सा बनता है। यह प्रवृत्ति केवल सिनेमा में नहीं, बल्कि चित्रकला और दूसरी दृश्य कलाओं में भी दिखती है। स्त्री शरीर को अक्सर सौंदर्य या कामुकता के प्रतीक के रूप में दिखाया गया, न कि एक स्वतंत्र व्यक्ति के रूप में। इस ढांचे में पुरुष देखने वाला होता है और महिला केवल एक दृश्य बनकर रह जाती है, जिसकी अपनी इच्छा और एजेंसी को अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है।
मूक दर्शक बनाम सक्रिय उपभोक्ता
लौरा मल्वी का सिद्धांत यह बताता है कि स्क्रीन पर महिलाओं को कैसे दिखाया जाता है। इसके विपरीत, फेमिनिस्ट रिसेप्शन थ्योरी इस बात पर ध्यान देती है कि महिलाएं कला, सिनेमा और मीडिया को कैसे देखती और समझती हैं। यह सिद्धांत उस धारणा को खारिज करता है कि महिलाएं मीडिया की निष्क्रिय या मूर्ख उपभोक्ता हैं, जो पितृसत्तात्मक संदेशों को बिना सवाल किए स्वीकार कर लेती हैं। इस दिशा में एक अहम मोड़ साल 1984 में आया, जब जेनिस रेडवे की किताब रीडिंग द रोमांस प्रकाशित हुई। उस समय रोमांस उपन्यासों को हल्का और महिलाओं को गुलाम बनाए रखने वाला साहित्य माना जाता था। आलोचकों का मानना था कि ऐसी कहानियां महिलाओं को ‘कोई आएगा और बचाएगा’ जैसी कल्पनाओं में उलझाकर पितृसत्ता को मजबूत करती हैं। रेडवे ने इस सोच को चुनौती दी।
मल्वी बताती हैं कि सिनेमा देखने के सुख यानी स्कोपोफिलिया पर आधारित है। कैमरा पुरुष की आँख का विस्तार बन जाता है। नतीजतन, दर्शक का जेंडर चाहे जो हो, उसे महिला पात्र को एक होमोसेक्शुअल पुरुष की नज़र से देखने के लिए मजबूर किया जाता है।
उन्होंने सीधे महिला पाठकों से बातचीत की और पाया कि इन किताबों को पढ़ना महिलाओं के लिए केवल पलायन नहीं था। यह अपने आप में एक तरह का विरोध था। एक ऐसी दुनिया में, जहां महिला से उम्मीद की जाती है कि वह हर समय पति और बच्चों की सेवा करे, किताब पढ़ने के लिए समय निकालना एक विद्रोही कदम था। यह उनके लिए खुद को संभालने, ऊर्जा पाने और भावनात्मक सहारा लेने का एक तरीका था। इसी तरह इयन एंग की किताब वॉचिंग डलास भी अहम है। टीवी शो डलास को अक्सर पूंजीवादी और महिला-विरोधी कहा जाता था। लेकिन एंग ने पाया कि महिला दर्शक इसे यथार्थ की तरह नहीं देखती थीं। वे इसके भावनात्मक सच से जुड़ती थीं।
स्क्रीन पर दिखाए गए रिश्ते, दुख और संघर्ष उन्हें अपने जीवन को समझने में मदद करते थे। यह निष्क्रिय देखना नहीं, बल्कि सक्रिय भावनात्मक जुड़ाव था। फेमिनिस्ट रिसेप्शन थ्योरी केवल किताबों या टीवी तक सीमित नहीं है। यह हर तरह की कला पर लागू होती है चाहे वह पेंटिंग हो, सिनेमा हो या डिजिटल आर्ट। यह सिद्धांत बताता है कि कला का अर्थ उसमें पहले से तय नहीं होता। उसका अर्थ दर्शक तय करता है। जब कोई महिला किसी कलाकृति को देखती है, तो वह उसे अपनी शर्तों पर देख सकती है। आज के डिजिटल दौर में यह सक्रियता और आगे बढ़ गई है। महिलाएं फैन फिक्शन, डिजिटल आर्ट और री-राइटिंग के जरिए पुरानी कहानियों को नए अर्थ दे रही हैं।
टीवी शो डलास को अक्सर पूंजीवादी और महिला-विरोधी कहा जाता था। लेकिन एंग ने पाया कि महिला दर्शक इसे यथार्थ की तरह नहीं देखती थीं। वे इसके भावनात्मक सच से जुड़ती थीं। स्क्रीन पर दिखाए गए रिश्ते, दुख और संघर्ष उन्हें अपने जीवन को समझने में मदद करते थे।
इतिहास, कला और मेल गेज़
साल 2021 में इटली में ‘ला स्पिगोलाट्रिस’ नाम की मूर्ति का अनावरण हुआ। यह 19वीं सदी की एक राष्ट्रवादी कविता से प्रेरित थी। लेकिन मूर्ति में महिला को पारदर्शी कपड़ों में दिखाया गया, जहां उसके निजी अंगों पर अनावश्यक ज़ोर था। आलोचकों ने पूछा कि खेत में काम करने वाली एक ऐतिहासिक महिला को कामुक वस्तु की तरह क्यों दिखाया गया। यह मेल गेज़ का उदाहरण था, जहां इतिहास को भी पुरुषों की कामुक नज़र से देखा गया। इसी तरह गाएतानो पेस की मूर्ति ‘माएस्ता सोफरेंते’ महिलाओं के खिलाफ़ हिंसा की आलोचना के लिए बनाई गई थी। इसमें एक नग्न महिला को जंजीरों और तीरों से घायल दिखाया गया। नारीवादियों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि हिंसा के खिलाफ़ बोलते हुए भी कलाकार ने फिर से सर्वाइवर महिला शरीर को ही केंद्र में रखा। इससे महिला केवल एक सर्वाइवर देह बनकर रह जाती है, उसकी एजेंसी गायब हो जाती है।
फीमेल गेज़: देखने का नया तरीका
फीमेल गेज़ को अक्सर मेल गेज़ का उल्टा रूप समझ लिया जाता है। लेकिन, यह केवल पुरुषों को वस्तु की तरह देखने का तरीका नहीं है। फिल्ममेकर जोई सोलोवे इसे ‘फीलिंग सीइंग’ कहती हैं। मेल गेज़ पात्र को बाहर से आंकता है, जबकि फीमेल गेज़ हमें उसके भीतर ले जाता है। भारतीय कला में इस फर्क को राजा रवि वर्मा और अमृता शेरगिल के काम से समझा जा सकता है। राजा रवि वर्मा की स्त्रियां सुंदर, शांत और प्रतीक्षा में दिखती हैं। वे दर्शक को आकर्षित करने के लिए गढ़ी गई लगती हैं। इसके विपरीत अमृता शेरगिल की पेंटिंग्स, जैसे ‘तीन लड़कियां’, स्त्रियों के अकेलेपन, उदासी और ठहराव को दिखाती हैं। उनकी महिलाएं पुरुषों को रिझाने के लिए नहीं हैं। यहां दर्शक को दृश्य सुख नहीं मिलता, बल्कि स्त्रियों के जीवन का अनुभव होता है। यही फीमेल गेज़ है, जहां महिला एक वस्तु नहीं, बल्कि एक जीवित इंसान है।
फीमेल गेज़ को अक्सर मेल गेज़ का उल्टा रूप समझ लिया जाता है। लेकिन, यह केवल पुरुषों को वस्तु की तरह देखने का तरीका नहीं है। फिल्ममेकर जोई सोलोवे इसे ‘फीलिंग सीइंग’ कहती हैं। मेल गेज़ पात्र को बाहर से आंकता है, जबकि फीमेल गेज़ हमें उसके भीतर ले जाता है।
सिनेमा में इच्छा और एजेंसी
परंपरागत सिनेमा में महिला की कामुकता पुरुष नायक से जुड़ी होती थी। फीमेल गेज़ ने इच्छा को महिला की अपनी खुशी और खोज के रूप में दिखाया। अलंक्रिता श्रीवास्तव की फिल्म लिपस्टिक अंडर माय बुर्का इसका अहम उदाहरण है। फिल्म में बुआजी का किरदार, जो 55 साल की महिला है, अपनी इच्छाओं को खुद के लिए जीती है। फिल्म पुष्पा का गीत ‘ऊ अंतावा’ एक जटिल उदाहरण है। गीत के बोल सीधे मेल गेज़ पर सवाल उठाते हैं। नायिका कहती है कि समस्या कपड़ों में नहीं, देखने वाली नज़र में है। यह पहली बार था जब किसी बड़े बजट के आइटम सॉन्ग ने खुद अपने अस्तित्व पर सवाल किया। भले ही फिल्मांकन व्यावसायिक सीमाओं में बंधा हो, लेकिन यह मेल गेज़ की आलोचना करता है।
फीमेल गेज़ ने यह सवाल भी उठाया कि किसी दृश्य को कैसे बनाया गया है। मी टू आंदोलन के बाद सहमति केवल कानूनी शब्द नहीं रही, बल्कि रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा बन गई। पहले कला में चोरी-छिपे देखने यानी वोयूयरिज़्म को सामान्य माना जाता था। आज सवाल यह है कि क्या उस दृश्य में शामिल व्यक्ति की सहमति है या नहीं। कैमरा जब शरीर के टुकड़े दिखाता है, तो वह वस्तुकरण है। लेकिन जब वह स्पर्श, सांस और भावनाओं को दिखाता है, तो वह इंटिमेसी है।
इंटिमेसी कोऑर्डिनेटर और सुरक्षित कला
अब फिल्मों और थिएटर में इंटिमेसी कोऑर्डिनेटर की भूमिका अहम हो गई है। वे तय करते हैं कि कौन सा स्पर्श होगा और कैसे होगा। यह साबित करता है कि महान कला के लिए कलाकार का शोषण ज़रूरी नहीं है। यह ‘टॉर्चर्ड आर्टिस्ट’ के मिथक को तोड़ता है। क्वीयर गेज़ केवल देखने की दिशा नहीं बदलता, बल्कि जेंडर की बाइनरी को भी चुनौती देता है। इसमें देखने वाला और जिसे देखा जा रहा है, दोनों बराबरी पर होते हैं। फिल्म पोर्ट्रेट ऑफ ए लेडी ऑन फायर और भारत में भूपेन खखर का काम इसके उदाहरण हैं। यहां नायकत्व, इच्छा और संवेदना नए रूप में सामने आती है। फीमेल और क्विअर गेज़ का उद्देश्य पुरुषों को हटाना नहीं है। इसका मकसद उस एकतरफ़ा नज़र को संतुलित करना है जिसने कला को सीमित किया। भविष्य की कला वह होगी जहां देखने वाला और देखा जाने वाला बराबरी पर होंगे। जहां इच्छा का अर्थ शोषण नहीं, बल्कि साझा अनुभव होगा। जब कला करुणा, सहमति और जटिलता के साथ रची जाती है, तब वह समाज को भी ज़्यादा मानवीय बनाती है। यही सच्ची कलात्मक मुक्ति है।

