इतिहास भारत की पहली महिला चार्टर्ड अकाउंटेंट आर. शिवभोगम| #IndianWomenInHistory

भारत की पहली महिला चार्टर्ड अकाउंटेंट आर. शिवभोगम| #IndianWomenInHistory

आर. शिवभोगम भारत की पहली महिला चार्टर्ड अकाउंटेंट थीं। महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित, असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से लेकर चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने तक का उनका सफर यह साबित करता है कि आज़ादी केवल राजनीतिक नहीं होती । वह सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक भी होती है।

भारत देश के आज़ाद होने से पहले पितृसत्तात्मक समाज में महिलाओं को शिक्षा और निर्णय लेने के अधिकार से दूर रखा गया। लेकिन इतिहास में कुछ महिलाएं ऐसी रही हैं, जिन्होंने रुढ़िवादी नियमों को तोड़कर न केवल शिक्षा प्राप्त की बल्कि पुरुष प्रधान माने जाने वाले पेशों या कामों में भी अपनी पहचान बनाई। उन्हीं में से एक थीं आर. शिवभोगम, जो कि भारत की पहली महिला चार्टर्ड अकाउंटेंट थीं। एक ऐसे दौर में जब महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा और पेशेवर पहचान अपने आप में विद्रोह मानी जाती थी, उन्होंने न केवल इस विद्रोह को जिया, बल्कि उसे नेतृत्व में भी बदला।

महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित, असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से लेकर चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने तक का उनका सफर यह साबित करता है कि आज़ादी केवल राजनीतिक नहीं होती । वह सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक भी होती है। उन्होंने अपने जीवन में कई आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। वह भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में एक ऐसा उदाहरण बनकर उभरी, जिसने रुढ़िवादी मानसिकता की नीव को हिलाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनका जीवन हर एक महिला के लिए प्रेरणा का स्त्रोत है, जो रुढ़िवादी नियमों से बाहर निकलकर अपने लिए खुलकर जीना चाहती हैं।      

महात्मा गांधी के विचारों से प्रेरित, असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी से लेकर चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने तक का उनका सफर यह साबित करता है कि आज़ादी केवल राजनीतिक नहीं होती । वह सामाजिक, आर्थिक और लैंगिक भी होती है। उन्होंने अपने जीवन में कई आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया।

शुरूआती जीवन और संघर्ष 

आर. शिवभोगम का जन्म 23 जुलाई 1907 में चेन्नई में हुआ था। उनके माता-पिता के बारे में बहुत कम या न के बराबर जानकारी उपलब्ध है। उन्होंने ट्रिप्लिकेन इलाके में स्थित लेडी वेलिंगटन स्कूल में प्रारंभिक शिक्षा प्राप्त की। वे अग्रणी समाज सुधारक सिस्टर आर.एस. सुब्बलक्ष्मी से बहुत प्रभावित थीं, इसलिए वो उनकी शिष्या बन गई। उन्होंने क्वीन मैरी कॉलेज, चेन्नई से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। वे महात्मा गांधी की विचारधाराओं से भी प्रभावित थीं। ऐसा माना जाता है कि वे सादा जीवन व्यतीत करती थीं और केवल खादी के बने हुए कपड़े पहनती थीं। इसके अलावा उन्होंने महात्मा गांधी  के शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में भाग लिया । वह जीवन भर अविवाहित रहीं और कई आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेती रही। 

साथ ही यूथ लीग और बाद में स्वदेशी लीग के सदस्य के रूप में, उन्होंने खादी आधारित ब्लॉक प्रिंटिंग सिखाने से लेकर विदेशी वस्तुओं का सक्रिय रूप से बहिष्कार करने में बढ़ – चढ़ कर भाग लिया। जिस कारण उन्हें जेल हो गई और वह एक साल  वेल्लोर जेल में रहीं। द बेटर इंडिया में छपे एक लेख के मुताबिक, जेल में रहते हुए ही उन्होंने ग्रेजुएट डिप्लोमा इन अकाउंटेंसी (जीडीए) परीक्षा देने का फैसला किया। हालांकि इस बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिलती है, कि किस वजह से उन्होंने लेखांकन के क्षेत्र में कदम रखा,उन्हें इस पुरुष प्रधान पेशे में जाने से रोका गया था। केवल उनकी बड़ी बहन और सुब्बालक्ष्मी ने ही उनके इस फैसले का समर्थन किया।

ऐसा माना जाता है कि वे सादा जीवन व्यतीत करती थीं और केवल खादी के बने हुए कपड़े पहनती थीं। इसके अलावा उन्होंने महात्मा गांधी  के शुरू किए गए असहयोग आंदोलन में भाग लिया । वह जीवन भर अविवाहित रहीं और कई आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लेती रही। 

हाशिए से नेतृत्व तक का सफर 

 साल 1933 में उन्होंने परीक्षा पास कर ली और पहली भारतीय महिला लेखाकार बनकर इतिहास रच दिया। इसके बाद उन्होंने चेन्नई में एक लेखा परीक्षक, सी.एस. शास्त्री के अधीन अपनी कलाबाजी का प्रशिक्षण हासिल किया।यह प्रशिक्षण केवल पेशेवर दक्षता का अभ्यास नहीं था, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र में अपनी जगह बनाने का संघर्ष भी था, उन्होंने इस यात्रा के माध्यम से यह साबित किया कि सामाजिक बाधाएं प्रतिभा और संकल्प के आगे टिक नहीं सकतीं। इंटर्नशिप और एक अग्रणी के रूप में उनकी असाधारण क्षमता के बावजूद, उनको निजी और पेशेवर स्तर पर काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। अपनी ट्रेनिंग पूरी करने के तुरंत बाद स्वतंत्र रूप से प्रैक्टिस शुरू नहीं कर सकीं क्योंकि तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने भारत में एक कानून लागू किया था जिसके तहत जेल की सजा काट चुके लोगों को लेखाकार के रूप में पंजीकरण कराने से रोक दिया गया था। 

उन्होंने इस कानून को रद्द करने के लिए एक रिट याचिका दायर की और उनके पक्ष में फैसला आया। इस मामले को दर्ज करने के लिए दिल्ली, भारत में शिवभोगम नाम से एक अलग फाइल खोली गई।उन्होंने मुकदमा जीत लिया और 1937 में अपना व्यवसाय शुरू किया और आगे चलकर सरकारी संस्थानों और सामाजिक संगठनों के लेखापरीक्षा विभाग की प्रमुख बनीं। इसके वाद वह लगातार काम करती रहीं और वह साल 1949 में इंस्टीट्यूट ऑफ चार्टर्ड अकाउंटेंट्स ऑफ इंडिया (आईसीएआई) के गठन पर वह एक सदस्य के रूप में नामांकित हुईं और 17 जून 1950 को फेलो बन गईं। इसके बाद वह दक्षिणी भारत क्षेत्रीय परिषद की अध्यक्ष के रूप में लगातार तीन सालों (1955 से 1958) तक काम करने वाली पहली और एकमात्र महिला हैं। अध्यक्ष के रूप में उन्होंने साल 1956 में प्रथम क्षेत्रीय सम्मेलन की मेजबानी भी की, जिसका उद्घाटन राजनेता सर सी.पी. रामास्वामी अय्यर ने किया था। उन्होंने साल 1965 में एशियाई और प्रशांत लेखाकारों के चौथे सम्मेलन में भी भाग लिया था।

साल 1933 में उन्होंने परीक्षा पास कर ली और पहली भारतीय महिला लेखाकार बनकर इतिहास रच दिया। इसके बाद उन्होंने चेन्नई में एक लेखा परीक्षक, सी.एस. शास्त्री के अधीन अपनी कलाबाजी का प्रशिक्षण हासिल किया।यह प्रशिक्षण केवल पेशेवर दक्षता का अभ्यास नहीं था, बल्कि एक ऐसे क्षेत्र में अपनी जगह बनाने का संघर्ष भी था।

संस्थागत नेतृत्व से सामाजिक परिवर्तन तक का सफर 

 वह मद्रास विश्वविद्यालय की सीनेट सदस्य भी थीं। इसके साथ ही वह भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) सहित विभिन्न सरकारी संस्थानों में लेखा परीक्षा करने के अलावा, उन्होंने युवा लड़कियों के बीच शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए भी प्रयास किए। उन्होंने लड़कियों को छात्रवृत्ति और कोचिंग कक्षाएं प्रदान कीं। इसके अलावा साल 1956 में, उन्होंने आईसीएआई के आयोजित अंतिम परीक्षा को पहली बार में ही उत्तीर्ण करने वाली सर्वश्रेष्ठ महिला उम्मीदवार के लिए सोने के लॉकेट के रूप में एक पुरस्कार की शुरुआत की। साथ ही सामाजिक सेवा में और मुख्य रूप से महिला शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सक्रिय रही। वह गांधीवादी सिद्धांतों में विश्वास रखती थीं और आजीवन खादी से बने हुए कपड़े ही पहना करती थी। वह युवा लीग और स्वदेशी लीग का हिस्सा थीं और खादी आधारित ब्लॉक प्रिंटिंग सिखाने से लेकर विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक का सफर तय किया। 

14 जून 1966 को उनकी मृत्यु हो हई। लेकिन उनके योगदान और संघर्ष के लिए हमेशा याद किया जाता रहेगा। उनका जीवन और योगदान बहुत कारगर सिद्ध हुआ, क्योंकि आज के आधुनिक दौर में बहुत सी महिलाएं चार्टर्ड अकाउंटेंट के क्षेत्र में काम कर रही हैं। आर. शिवभोगम का जीवन साहस, शिक्षा और बराबरी की लड़ाई का प्रतीक है। उन्होंने पितृसत्तात्मक और औपनिवेशिक बाधाओं को चुनौती देकर न केवल भारत की पहली महिला चार्टर्ड अकाउंटेंट बनने का इतिहास रचा, बल्कि संस्थागत स्तर पर महिलाओं के लिए रास्ते भी खोले। उनका संघर्ष यह याद दिलाता है कि असली आज़ादी तभी संभव है, जब न्याय, समानता और अवसर सभी के लिए सुनिश्चित हों और हर एक इंसान अपने हिसाब से जीवन जी सके और काम कर सके, जिसमें सिर्फ काम देखा जाए न कि जेंडर।

 

Leave a Reply

संबंधित लेख

Skip to content