स्वास्थ्यशारीरिक स्वास्थ्य ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर महिलाओं के लिए सहायक देखभाल क्यों है जरूरी?

ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर महिलाओं के लिए सहायक देखभाल क्यों है जरूरी?

स्प्रिंगएर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के हिसाब से ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं को प्राथमिक उपचार पूरा होने के बाद सर्वाइवर के तौर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं। इनमें मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद सबसे आम समस्याएं हैं। यह चिंता और अवसाद सर्वाइवर महिलाओं को मानसिक तौर पर बहुत प्रभावित करते है।

ब्रेस्ट कैंसर रिसर्च फाउंडेशन (बीसीआरएफ) के मुताबिक ब्रेस्ट कैंसर वैश्विक स्तर पर महिलाओं में होने वाला सबसे आम कैंसर है। इसके चलते दुनिया भर में महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले सबसे अधिक सामने आते हैं और इससे होने वाली मौतों के आंकड़े भी पहले नंबर पर हैं। बीसीआरएफ के हिसाब से हर 14 सेकंड में, दुनिया में कहीं न कहीं एक महिला में ब्रेस्ट कैंसर का पता चलता है। इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम (आईसीएमआर एनसीआरपी) के अनुसार, भारत में कैंसर के मामले साल 2022 में 14.61 लाख थे, जो 2025 तक बढ़कर 15.7 लाख तक होने की संभावना थी। ग्लोबल कैंसर ऑब्ज़र्वेटरी, आईएआरसी-डब्ल्यूएचओ 2022 बताता है कि भारत  साल 2022 में ब्रेस्ट कैंसर से 98,337 महिलाओं की मौत हुई, यह संख्या दुनियाभर में इस कैंसर से होने वाली मौतों में सबसे अधिक थी।

अगर विश्व स्वास्थ्य संघटन(डब्ल्यूएचओ) की पिछले साल 2025 की रिपोर्ट पर नजर डाले तो डब्ल्यूएचओ दावा करता है कि दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हर 20 में से 1 महिला अपने जीवन काल में ब्रेस्ट कैंसर का सामना करती हैं। डब्ल्यूएचओ चेतावनी देता है कि अगर यही स्थिति बनी रही तो साल 2050 तक हर साल लगभग 3.2 मिलियन नए मामले सामने आएंगे और 1.1 मिलियन मौतें होंगी। वहीं भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) की हालिया स्टडी दिखाती है कि भारत में कैंसर के मामले और उससे होने वाली मौतों के आंकड़े दिन पर दिन बढ़ रहे है। इसके चलते भारत में हर पांच में से तीन लोग निदान के बाद भी कैंसर से मारे जाते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संघटन(डब्ल्यूएचओ) की पिछले साल 2025 की रिपोर्ट पर नजर डाले तो डब्ल्यूएचओ दावा करता है कि दुनिया भर में ब्रेस्ट कैंसर के मामले तेज़ी से बढ़ रहे हैं। वैश्विक स्तर पर हर 20 में से 1 महिला अपने जीवन काल में ब्रेस्ट कैंसर का सामना करती हैं।

इससे पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज्यादा प्रभावित होती है। टेक्नॉलजी के बढ़ते उपयोग के चलते ब्रेस्ट कैंसर के लिए जांच और इलाज जैसी सुविधाएं बढ़ी हैं, जिससे सर्वाइवरशिप भी बढ़ी है। लेकिन, ब्रेस्ट कैंसर का इलाज पूरा हो जाना और सर्जरी सफल हो जाना ही संघर्ष का अंत नहीं होता है। सर्वाइवरशिप के दौरान भी व्यक्ति हर प्रकार की सहायक देखभाल की जरूरत होती है, जो अक्सर एक सर्वाइवर को पूरी तरह से नहीं मिल पाती है। अगर बात महिलाओं की करें तो सामाजिक और पारिवारिक अपेक्षाओं के चलते उनपर घरेलू जिम्मेदारियां अधिक होती है। इसके कारण कम सहायक देखभाल में सर्वाइवर महिलाएं अक्सर एक अनदेखे संघर्ष का सामना अपनी रोजमर्रा के जीवन में करती है, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करता है। 

ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर्स में मानसिक तनाव 

स्प्रिंगएर जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के हिसाब से ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं को प्राथमिक उपचार पूरा होने के बाद सर्वाइवर के तौर पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता हैं। इनमें मानसिक तनाव, चिंता और अवसाद सबसे आम समस्याएं हैं। यह चिंता और अवसाद सर्वाइवर महिलाओं को मानसिक तौर पर बहुत प्रभावित करते है। हालांकि इस मानसिक तनाव के पीछे के बहुत से कारक जिम्मेदार हैं, लेकिन कुछ अहम कारणों पर गौर किया जाए, तो सर्वाइवर महिलाओं में कैंसर के दोबारा होने का डर, सर्जरी के बाद के शारीरिक परिवर्तन और आत्मस्वीकृति की कमी, आर्थिक चिंताएं, समाजिक और पारिवारिक अपेक्षाएं जैसे कारण उनके मानसिक स्वास्थ्य पर ज्यादा असर डालते हैं।

इस पर बात करते हुए भुवनेश्वर की रहने वाली 47 वर्षीय ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर शकुंतला स्वांग बताती हैं, “सर्जरी पूरा होने के बाद अब तो मैं पहले से ज्यादा घर का काम कर लेती हूं। सर्जरी और सभी आठ कीमोथेरपी होने के बाद अब सब ठीक लगता है। कोई परेशानी नहीं है। लेकिन जब कभी टी. वी. और मोबाईल में देख लेती हूं कि किसी को दूबरा से कैंसर हो गया तो डर लग जाता है। दुखी हो जाती हूं और बहुत खराब लगता है।”

सर्जरी पूरा होने के बाद अब तो मैं पहले से ज्यादा घर का काम कर लेती हूं। सर्जरी और सभी आठ कीमोथेरपी होने के बाद अब सब ठीक लगता है। कोई परेशानी नहीं है। लेकिन जब कभी टी. वी. और मोबाईल में देख लेती हूं कि किसी को दूबरा से कैंसर हो गया तो डर लग जाता है। दुखी हो जाती हूं और बहुत खराब लगता है। 

सर्जरी के बाद हुए शारीरिक परिवर्तन के चलते एक सर्वाइवर को अपने शरीर में हुए बदलाव को स्वीकार करने में एक लंबा वक्त लगता है, जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। इस विषय पर बात करते हुए उड़ीसा की 37 वर्षीय ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर स्वाती प्रियदर्शिनी कहती हैं, “मैंने अपनी सर्जरी के एक साल बाद महसूस किया कि मैं पहले की तरह टी-शर्ट और पायजामा पहनकर बाहर नहीं जा पाती हूं। यह भी है कि लोग बहुत ही अजीब सवाल करते हैं।” अध्ययन के अनुसार उपचार के बाद एक सर्वाइवर के तौर पर महिलाओं में चिंता और अवसाद को समझने और पहचानने को लेकर जहां प्रगति हुई वहीं अभी तक इन मुद्दों के समाधान और जागरूकता को लेकर अभी तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है। शारीरिक बदलाव पर बात करते हुए शकुंतला स्वांग बताती हैं, “मैं सर्जरी के बाद से ज्यादा बाहर कही नहीं निकलती हूं। मेरे ब्लाउज उस तरीके से अब नहीं होते मुझे, जब कभी थोड़ा बच्चों के जोर देने पर बाहर निकलती हूं, तो ब्लाउज के ऊपरी हिस्सों में कपड़ा डाल लेती हूं। फिर मुझे ठीक लगता है।”

सर्वाइवरशिप के दौरान अधूरी सहायक देखभाल की कमी और समस्याएं 

एसटीएम जर्नल पर भारत के ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर पर किए गए अध्ययन से पता चलता है कि ब्रेस्ट कैंसर का सामना कर चुके लोगों में सबसे ज़्यादा भावनात्मक और मनोवैज्ञानिक जरूरतों की कमी रहती है। इसके साथ ही स्वास्थ्य प्रणाली संबंधी जानकारी, शारीरिक और दैनिक जीवन की आवश्यकताएं, सहायक घरेलू देखभाल, और यौनिक जरूरते एक सर्वाइवर की अधूरी रह जाती है। अध्ययन आगे इस बात पर जोर देता है कि एक ब्रेस्ट कैंसर मरीज के लिए केवल शारीरिक और प्राथमिक उपचार पर्याप्त नहीं होता है बल्कि उसे प्राथमिक उपचार और सर्जरी के बाद भावनात्मक, मनोवैज्ञानिक, स्वास्थ्य संबंधी सभी जानकारी, सामाजिक, परिवारिक और दैनिक जीवन से जुड़े आवश्यकताओं में समर्थन बहुत जरूरी हैं। यह अक्सर देखा जाता है कि सर्वाइवरों को यह सभी सहायक देखभाल पर्याप्त रूप से नहीं मिल पाती है।

अध्ययन के अनुसार उपचार के बाद एक सर्वाइवर के तौर पर महिलाओं में चिंता और अवसाद को समझने और पहचानने को लेकर जहां प्रगति हुई वहीं अभी तक इन मुद्दों के समाधान और जागरूकता को लेकर अभी तक कोई ठोस पहल नहीं हुई है।

इसपर बात करते हुए उड़ीसा की 37 वर्षीय ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर स्वाती बताती हैं, “मैं पढ़ी-लिखी हूं तो सब कुछ अपने स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी पढ़कर जाती थी। इसके बाद भी मेरे साथ यह हुआ कि डॉक्टर ने मुझे मेरी सर्जरी से पहले यह जानकारी नहीं दी कि इस सर्जरी का असर मेरे फर्टिलिटी पर हो सकता है। इस कारण मैं कभी मां नहीं बन सकती। मैं एक यंग सर्वाइवर हूं। अगर डॉक्टर मुझे यह जानकारी मेरी सर्जरी से पहले देते, तो मैं अपना एग फ्रीजिंग भी करवा सकती थी। लेकिन, मुझे इसकी पूरी जानकारी नहीं मिली। वैसे ब्रेस्ट कैंसर के मामले सबके के केस में एक जैसे नहीं होते है। मेरे साथ हुआ कि कैंसर दोबारा न हो इसलिए मेरे दोनों ब्रेस्ट सर्जरी के साथ मेरी ओवरी को भी रिमूव कर दिया गया है।” 

अमूमन एक ब्रेस्ट कैंसर सर्वाइवर को सामाजिक जागरूकता की कमी के कारण कई तरीके की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इस पर बात करते हुए भुवनेश्वर की 47 वर्षीय शकुंतला कहती हैं, “मुझे सर्जरी के दौरान और बाद दोनों समय मुझे मेरे अपने परिवार से हर तरीके की देखभाल मिली और अभी भी है। लेकिन जो आस-पड़ोस के लोग मिलने आते थे, वह जब ऐसे बोलते कि तुमने तो कुछ गलत नहीं किया फिर तुम्हें यह किन कर्मों का फल भगवान दे रहा है। यह बहुत तकलीफ देता है और फिर मैं सोचने लगती हूं कि क्या मैंने सच में कुछ गलत किया जिसकी सजा भगवान दे रहा है।” 

ब्रेस्ट कैंसर पर बायोमेड सेंट्रल मेडिकल पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट भी बताती है कि वैश्विक स्तर पर महिलाओं को सभी प्रकार के कैंसर में ब्रेस्ट कैंसर से सबसे ज़्यादा खतरा है और सबसे अधिक मौते अक्सर इसी के चलते होती हैं। वहीं भारत में पर बात करते हुए रिपार्ट खुलासा करती है कि भारत में 45 साल और उससे ऊपर की सिर्फ 1.3 फीसदी  महिलाओं ने ही मैमोग्राफ़ी करवाई है।

स्वास्थ्य नीतियों में सुधार और समाजिक जागरूकता की जरूरत

नैशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम (एनसीआरपी) के मुताबिक़ भारत में ब्रेस्ट कैंसर तेजी से बढ़ रहा है। हर वर्ष नए मामले बढ़ रहे हैं और बहुत सी महिलाएं देर से निदान के कारण अक्सर इलाज में पीछे रह जाती हैं। ब्रेस्ट कैंसर महिलाओं की कम स्क्रीनिंग के आंकड़े और जागरूकता की कमी से पता चलता है कि समाजिक जागरूकता के साथ-साथ नीतिगत सुधार करना बहुत आवश्यक हैं। ब्रेस्ट कैंसर पर बायोमेड सेंट्रल मेडिकल पब्लिक हेल्थ में प्रकाशित रिपोर्ट भी बताती है कि वैश्विक स्तर पर महिलाओं को सभी प्रकार के कैंसर में ब्रेस्ट कैंसर से सबसे ज़्यादा खतरा है और सबसे अधिक मौते अक्सर इसी के चलते होती हैं। वहीं भारत में पर बात करते हुए रिपार्ट खुलासा करती है कि भारत में 45 साल और उससे ऊपर की सिर्फ 1.3 फीसदी  महिलाओं ने ही मैमोग्राफ़ी करवाई है।

इस सब आंकड़ों को देखते हुए समझ आता है कि ब्रेस्ट कैंसर को लेकर सिर्फ़ जागरूकता की ही नहीं बल्कि इसकी जल्दी पहचान, जांच और स्क्रीनिंग की सुविधाओं की जरूरत है। इन सब पर अमल तभी संभव हो सकता है जब ठोस सरकारी नीतियां होंगी। सरकार, स्वास्थ्य विभाग, एनजीओ और अन्य गैर सरकारी संस्थाओ के संयोग से ही देश में ब्रेस्ट कैंसर को कम किया जा सकता है। अगर ब्रेस्ट कैंसर को लेकर भारत की कुछ सरकारी नीतियों को देखे तो साल 2022 में द हिन्दू में छापी एक रिपोर्ट के मुताबिक हालांकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार ब्रेस्ट कैंसर भारत में महिलाओं में होने वाला एक मुख्य कैंसर है इसके बाबजूद स्वास्थ्य मंत्रालय की गणना में इसे राष्ट्रीय और अत्यंत तात्कालिकता का मामला नहीं माना जाता है।

मैं पढ़ी-लिखी हूं तो सब कुछ अपने स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी पढ़कर जाती थी। इसके बाद भी मेरे साथ यह हुआ कि डॉक्टर ने मुझे मेरी सर्जरी से पहले यह जानकारी नहीं दी कि इस सर्जरी का असर मेरे फर्टिलिटी पर हो सकता है। इस कारण मैं कभी मां नहीं बन सकती।

ब्रेस्ट कैंसर सिर्फ़ एक मेडिकल कंडीशन नहीं है, बल्कि यह एक सोशल, साइकोलॉजिकल और पॉलिसी चैलेंज भी है। ब्रेस्ट कैंसर रिसर्च फाउंडेशन, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइज़ेशन और इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च जैसे ऑर्गनाइज़ेशन के डेटा से साफ़ पता चलता है कि ब्रेस्ट कैंसर के मामले और मौतें तेज़ी से बढ़ रही हैं। टेक्नोलॉजी में तरक्की से डायग्नोसिस और ट्रीटमेंट में सुधार हुआ है, लेकिन सर्वाइवर महिलाओं की मेंटल, इमोशनल और सोशल ज़रूरतें अभी भी कम अहमियत रखती हैं। ट्रीटमेंट के बाद की ज़िंदगी भी चुनौतियों से भरी होती है शारीरिक बदलाव, खुद को स्वीकार करने में मुश्किल, माँ बनने की चिंता और समाज की असंवेदनशीलता इन महिलाओं के अनुभवों को और मुश्किल बना देती है।

इस स्थिति में, सिर्फ़ मेडिकल ट्रीटमेंट काफ़ी नहीं है। यह ज़रूरी है कि हेल्थ पॉलिसी में पूरी सर्वाइवर केयर शामिल हो। इसके अलावा, सोशल अवेयरनेस बढ़ाने, रेगुलर स्क्रीनिंग को बढ़ावा देने और महिलाओं के मेंटल हेल्थ और रिप्रोडक्टिव अधिकारों को प्राथमिकता देने की ज़रूरत है। जब तक पॉलिसी, हेल्थ सिस्टम और समाज मिलकर सर्वाइवर महिलाओं की ज़रूरतों को नहीं समझेंगे, ब्रेस्ट कैंसर के ख़िलाफ़ लड़ाई अधूरी रहेगी।

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