समाजख़बर दलित समुदाय की आंगनवाड़ी सहायक कार्यकर्ताओं का अनदेखा संघर्ष 

दलित समुदाय की आंगनवाड़ी सहायक कार्यकर्ताओं का अनदेखा संघर्ष 

बीते दिनों ओड़िशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में, 23 वर्षीय दलित महिला शर्मिष्ठा सेठी को आंगनवाड़ी सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था। लेकिन उनकी नियुक्ति के तुरंत बाद, कथित उच्च जाति के लोगों ने अपने बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र भेजना बंद कर दिया। यहां तक कि ग्राम समिति के मुखिया ने भी दलित परिवारों सहित, अन्य परिवारों को निर्देश दिया कि वे अपने बच्चों को केंद्र में न भेजें।

आधुनिकता के दौर में जहां एक और भारत में सबका साथ और सबका विकास के नारे आए दिन सुर्ख़ियों में रहते हैं। वहीं दूसरी और जातिगत और धर्म के आधार पर भेदभाव और हिंसा के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। अब सवाल यह है कि क्या असल में सबका विकास हो रहा है। हालांकि भारत में सरकारी योजनाएं जैसे आंगनवाड़ी, मिड-डे मील, स्कूल और अस्पताल हाशिए पर रह रहे लोगों की समस्याओं और सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए बनाए गए हैं। लेकिन इन व्यवस्थाओं में भी वही रुढ़िवादी पितृसत्तात्मक सामाजिक संरचना काम करती है जो समाज को जेंडर, जाति और वर्ग में बांटती है। हाल ही में ओड़िशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में जातिगत भेदभाव आधारित घटना सामने आई है, जिसमें अभिभावकों ने अपने बच्चों को आंगनवाड़ी भेजना बंद कर दिया, क्योंकि वहां का भोजन एक दलित महिला कार्यकर्ता बनाती थी।

आंगनवाड़ी व्यवस्था जो कि इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज (आईसीडीएस) के तहत हाशिए पर रह रही महिलाओं और बच्चों के पोषण और देखभाल के लिए बनाई गई है, जिसका उद्देश्य बराबरी और सुरक्षा सुनिश्चित करना है। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन की एक रिपोर्ट के मुताबिक,भारत में 14 लाख आंगनवाड़ी कार्यकर्ता (ए डब्ल्यू डब्ल्यू ), जो सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (सी एच डब्ल्यू) का एक प्रकार हैं, आईसीडीएस कार्यक्रम के तहत 15 करोड़ लाभार्थियों को सेवाएं प्रदान करती हैं। लेकिन इस व्यवस्था में भी महिलाओं के साथ हिंसा और भेदभाव हो रहा है। इसके अलावा जिन दलित और गरीब महिलाओं को आंगनवाड़ी कार्यकर्ता या हेल्पर  के रूप में नियुक्त किया जाता है, वह कम वेतन में काम ही नहीं करती, बल्कि सामाजिक अपमान और बहिष्कार का बोझ भी उठाती हैं। संविधान में भले ही अस्पृश्यता के भेदभाव को एक अपराध की श्रेणी में डाला गया हो, लेकिन जमीनी तौर पर यह अब भी हो रहा है, कभी भोजन के बहिष्कार के रूप में, तो कभी मौन स्वीकृति के रूप में।

आंगनवाड़ी व्यवस्था जो कि इंटीग्रेटेड चाइल्ड डेवलपमेंट सर्विसेज के तहत हाशिए पर रह रही महिलाओं और बच्चों के पोषण और देखभाल के लिए बनाई गई है, जिसका उद्देश्य बराबरी और सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

क्या है हालिया मामला?

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक खबर के मुताबिक,  बीते दिनों ओड़िशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में, 23 वर्षीय दलित समुदाय कि महिला शर्मिष्ठा सेठी को आंगनवाड़ी सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था। लेकिन उनकी नियुक्ति के तुरंत बाद, कथित उच्च जाति के लोगों ने अपने बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र भेजना बंद कर दिया। यहां तक कि ग्राम समिति के मुखिया ने भी दलित परिवारों सहित, अन्य परिवारों को निर्देश दिया कि वे अपने बच्चों को केंद्र में न भेजें। गांव वालों ने उसे और उसके परिवार पर भी दबाव बनाया कि वे इस्तीफ़ा दे दे। लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए उनके लिए इस्तीफ़ा देना संभव नहीं था। हालांकि दलित समाज के जिला अध्यक्ष नागेन जेना ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 20 अप्रैल, 2004 को पीयूसीएल बनाम भारत सरकार मामले में अपने अंतरिम आदेश में साफ़ तौर पर कहा था, कि मध्याह्न भोजन में रसोइयों के रूप में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

 लेकिन यह आदेश या कानून जमीनी तौर पर लागू होने के बजाय आज भी कागजों तक ही सीमित है। इसमें यह भी देखा जा सकता है कि प्रशासनिक कार्रवाई धीमी होने के कारण, इस मामले में सर्वाइवर को अपना हक पाने में काफी वक्त लगा। द हिन्दू में छपी एक खबर के मुताबिक, यह जातिगत विवाद लगभग तीन महीनों तक चलता रहा और 16 फरवरी को खत्म हुआ। जब नामांकित 20 बच्चों में से 16 बच्चे अपने माता-पिता के साथ आंगनवाड़ी केंद्र में आए और सहायक का बनाया हुआ भोजन खाया, जबकि अनुपस्थित बच्चों ने बीमार होने का बहाना बनाया। इससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि जाति के आधार पर लोगों की पितृसत्तात्मक मानसिकता अभी भी बदल नहीं पाई है। जातिगत भेदभाव कहीं न कहीं आज भी गहराई से अपनी जड़े जमाए हुए है।

बीते दिनों ओड़िशा के एक आंगनवाड़ी केंद्र में, 23 वर्षीय शर्मिष्ठा सेठी को आंगनवाड़ी सहायक के रूप में नियुक्त किया गया था। लेकिन उनकी नियुक्ति के तुरंत बाद, कथित उच्च जाति के अधिकांश सदस्यों वाली ग्राम समिति के लोगों ने बच्चों को आंगनबाड़ी केंद्र भेजना बंद कर दिया।

जाति और भोजन की राजनीति 

भारतीय समाज में भोजन केवल आजीविका का ही साधन नहीं हैं, बल्कि सामाजिक पहचान, कथित पवित्रता और सत्ता का प्रतीक भी रहा है, जहां यह तय किया जाता रहा है कि कौन किसके हाथ का बना खाना खा सकता है और किसके साथ एक ही पंक्ति में बैठ सकता है। बीबीसी में छपी खबर के मुताबिक, गांव में व्याप्त जातिभेद को लेकर शर्मिष्ठा कहती हैं कि गांव में कोई पर्व या त्योहार का आयोजन होता है, तो जाति के चलते मेरे परिवार वालों को अलग बैठने को बोला जाता है। देश के कई हिस्सों में आंगनवाड़ी और मिड-डे मील योजना के दौरान दलित रसोइयों के खिलाफ विरोध के मामले सामने आए हैं।

इस तरह की एक खबर साल 2012 में भी सामने आई थी, जब तमिलनाडु के कदयम्पट्टी यूनियन के कई गांवों में स्कूलों में बच्चों के लिए खाना पकाने वाली कई दलित महिलाओं ने कहा था कि उन्हें सामाजिक बहिष्कार का सामना करना पड़ रहा है। कुछ गांवों में कथित सवर्ण हिंदू अपने बच्चों को दलित महिला रसोइयों के पकाए गए दोपहर के भोजन से रोक रहे थे। यह दावा करते हुए कि उनका पकाया गया भोजन खाना पाप है। इस तरह की एक घटना साल 2022 में कर्नाटक के बीदर जिले में एक आंगनवाड़ी केंद्र की भी सामने आई, जब वहां एक गांव के कथित उच्च जाति के लोगों ने आंगनवाड़ी का बहिष्कार कर दिया था, वो भी इसलिए ताकि उनके बच्चों को दलित महिला का बनाया गया भोजन न खाना पड़े। ये घटनाएं बताती हैं कि समस्या किसी एक गांव या राज्य तक सीमित नहीं है। यह व्यापक सामाजिक मानसिकता का हिस्सा है, जहां जाति अदृश्य दीवार की तरह काम करती है।

द हिन्दू में छपी एक खबर के मुताबिक, यह जातिगत विवाद लगभग तीन महीनों तक चलता रहा और 16 फरवरी को खत्म हुआ। जब नामांकित 20 बच्चों में से 16 बच्चे अपने माता-पिता के साथ आंगनवाड़ी केंद्र में आए और सहायक का बनाया हुआ भोजन खाया, जबकि अनुपस्थित बच्चों ने बीमार होने का बहाना बनाया।

कार्यकर्ता दलित महिलाओं का दोहरा हाशियाकरण

सामाजिक ढांचे के आधार पर आंगनवाड़ी में या फिर कम वेतन वाली नौकरी में  अक्सर दलित और गरीब महिलाएं ही अधिक पाई जाती हैं, जिसे सामाजिक रूप से कमतर माना जाता है। इससे  उन्हें दोहरी मार्जिनलाइजेशन का सामना करना पड़ता है, जिसमें जातिगत भेदभाव के साथ आर्थिक शोषण दोनों एक साथ होता है। उदाहरण के लिए सेठी जैसी महिलाएं न केवल जातिवाद का सामना करती हैं, बल्कि गरीबी के कारण इन नौकरियों पर निर्भर रहती हैं और शोषण का सामना करने के लिए मजबूर होती हैं। नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के 1344 महिला एवं शिशु देखभाल कार्यकर्ताओं पर किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि,  आधे से ज्यादा महिला एवं शिशु देखभाल कार्यकर्ता 38 साल से कम उम्र की थीं, जिनमें से ज्यादातर लगभग 81.4 फीसदी महिलाएं ही 10 साल ( दसवीं ) या उससे अधिक की स्कूली शिक्षा पूरी की थी।

अगर जाति के संदर्भ में देखा जाए तो  38.1 फीसदी कार्यकर्ता अन्य पिछड़ा वर्ग से थीं, 37.2 फीसदी अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से और एक चौथाई महिलाएं सामान्य जाति से थीं। इससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि इसमें हाशिए की महिलाएं ज़्यादा कार्यरत हैं, फिर भी कम वेतन और सामाजिक पूर्वाग्रहों के कारण उनके काम को सम्मान नहीं मिलता। हमारे पितृसत्तात्मक समाज में अक्सर सम्मान को वेतन और जाति से जोड़ा जाता है, जिससे महिलाओं की स्थिति और अधिक जटिल हो जाती है। दलित आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं के साथ होने वाला भेदभाव यह दिखाता है कि जाति, जेंडर और वर्ग आधारित असमानताएं आज भी समाज में गहराई से मौजूद है। आंगनवाड़ी जैसी योजनाएं समानता और पोषण सुरक्षा के उद्देश्य से बनी हैं। लेकिन जब उनमें बहिष्कार की राजनीति हावी हो जाती है, तो यह सामाजिक न्याय की अवधारणा को और कमजोर कर देता है। कानूनी प्रावधानों के बावजूद भी वास्तविक परिवर्तन तब तक संभव नहीं हो पाएगा। जब तक सामाजिक मानसिकता नहीं बदलेगी। इसलिए दलित महिलाओं के काम को सम्मान, उचित वेतन और सुरक्षा मिले तब ही असली मायनों में सबका विकास सच में संभव हो पाएगा।

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