मल्लिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बर्बाद होना चाहती हूं’ मुख्य रूप से मराठी भाषा में लिखी गईऔर प्रकाशित हुई थी। इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद प्रसिद्ध कवयित्री और अनुवादक सुनीता डागा ने किया है। उनकी आत्मकथा एक ऐसी कहानी है जिसे पढ़कर हो सकता है, कई पुरुष हैरान हो जाएं। लेकिन महिलाओं के लिए इस यातना का अनुभव जाना-पहचाना होगा। मल्लिका का जन्म 16 फरवरी 1957 को मुंबई महाराष्ट्र में हुआ था। वह आधुनिक विचारों से लैस माता-पिता की संतान थीं।
उनके पिता एक वामपंथी राजनीतिक कार्यकर्ता थे, जहां एक लोकतांत्रिक वातावरण में उन्होंने अपने बच्चों की परवरिश की। स्कूल के ही दिनों से वे कविताएं लिखती थीं। कविता लेखन के साथ उन्होंने कहानियां और उपन्यास आदि भी लिखे। सामूहिकता, सामाजिकता, समता और न्याय के सवालों से जुड़ा राजनीतिक जीवन उन्होंने बचपन से ही देखा और समझा था। इसी वैचारिक और राजनीतिक माहौल ने उनके भीतर सवाल करने की हिम्मत और अपनी सच्चाई को बेझिझक लिखने का साहस पैदा किया।
मल्लिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बर्बाद होना चाहती हूं’ मुख्य रूप से मराठी भाषा में लिखी गईऔर प्रकाशित हुई थी। इस आत्मकथा का हिंदी अनुवाद प्रसिद्ध कवि और अनुवादक सुनीता डागा ने किया है। उनकी आत्मकथा एक ऐसी कहानी है जिसे पढ़कर हो सकता है, कई पुरुष हैरान हो जाएं। लेकिन महिलाओं के लिए इस यातना का अनुभव जाना-पहचाना होगा।
प्रेम का सपना और यथार्थ का तूफ़ान
एक दिन मल्लिका दलित पैंथर के सह-संस्थापक नामदेव ढसाल से मिली। बाद के दिनों में उन्हें उनसे प्रेम हुआ और दोनों की शादी हो गई। वह लिखती हैं कि मटमैले रंग की कमीज-पैंट, माथे पर झूलती लटें ,कंधे पर सबनम बैग और मुंह में चिनार सिगरेट। उस समय के युवाओं में उसका यह स्टाइल प्रिय बनता जा रहा था। वही प्रसन्न और प्रेमिल हंसी, काला-सांवला , तेजतर्रार चेहरा। उन्होंने जन्म से ही खुला हुआ परिवेश देखा था, जहां मनुष्य की मुक्ति की बहसें थीं। प्रेम के चयन और साथ चुनने की आज़ादी थी। लेकिन उन्हें तब नहीं पता था, कि जिस प्रेम की बांह पकड़कर वो जीवन जीना चाहती हैं, वहां कितना कठिन तूफ़ान है।आत्मकथा पढ़ते हुए मैं लेखिका की ईमानदारी और निष्पक्षता को देखकर हैरान रह गई, कि जीवन में प्रेम और घृणा के इतने असामान्य और भयानक स्तर को सहन करके भी कोई महिला इतना तटस्थ होकर कैसे लिख सकती है। उन्होंने आत्मकथा लिखते हुए कहीं से भी नामदेव के वैचारिक मूल्यों पर हमला नहीं किया है। इसके साथ ही उन्होंने पुरुषों में गहरे धंसे पितृसत्तात्मक अभ्यास को ही चिन्हित करके आरोपित किया है।
किसी भी आत्मकथा के लिए ये मूल्य उसे ज्यादा प्रमाणिक बनाते हैं। वह एक राजनीतिक कार्यकर्ता थीं । विचार और राजनीतिक जीवन उन्होंने जन्म से ही देख लिया था । लेकिन प्रेम में जब महिला को साथी नहीं पति मिलता है, तो उसकी आत्मा पर जाने कितने घाव मिलते हैं। ये आत्मकथा एक लोकनायक के जीवन में आई महिला की, और उसकी जमीन या पहचान तलाशने और बार-बार घायल होने की कहानी है। साथ ही मराठी दलित आंदोलन , उसकी सफलता ,असफलता और उसके अंतर्विरोधों और उस राजनीति का एक समृद्ध दस्तावेज भी है।हमारी परम्परागत भारतीय संस्कृति के लिहाज से समाज में मर्दवाद का वर्चस्व हर जगह अपनी सहज स्वीकार्यता से चलता है। पितृसत्ता समाज में इतनी गहराई से बैठी हुई है, कि कई बार पुरुषों को खुद भी पता नहीं चलता, कि वे कब महिलाओं के साथ गैर-बराबरी या गलत व्यवहार करने लगते हैं। यही नहीं पितृसत्तात्मक संस्कृति के प्रभाव से कभी-कभी महिलाएं भी एकदम मुक्त नहीं हो पाती हैं। यह बात ये आत्मकथा बखूबी समझाती है।
नामदेव से प्रेम करते हुए मल्लिका जो कि एक आधुनिक विचारों वाली महिला थीं, लेकिन नामदेव के कई मर्दवादी व्यवहार और हिंसा को झेलती रही। एक तरह से उसे लंबे समय तक ऐड्रेस नहीं कर सकीं और ये भ्रम बनना स्वाभाविक था, क्योंकि मल्लिका का जीवन साथी कोई सामान्य मनुष्य नहीं था। वे मराठी के बेहद मशहूर दलित कवि थे, जो दलित पैंथर के अगुआ भी थे
पितृसत्ता का वर्चस्व और प्रेम में छिपी मर्दवादी हिंसा
नामदेव से प्रेम करते हुए मल्लिका जो कि एक आधुनिक विचारों वाली महिला थीं, लेकिन नामदेव के कई मर्दवादी व्यवहार और हिंसा को झेलती रही। एक तरह से उसे लंबे समय तक ऐड्रेस नहीं कर सकीं और ये भ्रम बनना स्वाभाविक था, क्योंकि मल्लिका का जीवन साथी कोई सामान्य मनुष्य नहीं था। वे मराठी के बेहद मशहूर दलित कवि थे, जो दलित पैंथर के अगुआ भी थे। एक सामन्ती पुरुष में जितनी हिंसा और अलोकतांत्रिक मूल्य होते हैं, वे सब उनके भीतर था। वह उनको बेरहमी से पीटता और उनके साथ जबरदस्ती यौन संबंध बनाता था । उसे घर परिवार की जिम्मेदारी से हमेशा उदासीन रहने की आदत थी।मल्लिका एक आधुनिक चेतना वाली महिला थी, फिर भी वे आजीवन नामदेव से एकदम अलग नहीं हो सकीं। इसका कारण उसकी कविताएं और विचार थे, जिसके आभामंडल से मल्लिका कभी एकदम से निकल नहीं सकीं। उन्हें लगता था कि वह कोई सामान्य मनुष्य नहीं है, क्योंकि लाखों लोग उनके दीवाने हैं।
हिंसा और अराजकता के अभ्यस्त नामदेव में तमाम दुर्गुण थे। लेकिन मलिका फिर भी उनकी कविताओं और कवि को पसंद करतीं थीं। अपनी आत्मकथा में वे इस बात को बहुत तटस्थ होकर रेखांकित करती हैं कि एक पति के रूप में वे नामदेव से बहुत नफरत करती थीं। लेकिन कवि और कार्यकर्ता के रूप में उनकी प्रशंसक थीं। उन्होंने जीवन में बहुत बार उससे एकदम अलग होने का फैसला लिया। लेकिन नामदेव माफी मांगते हुए अपनी की गई हिंसाओं के लिए मल्लिका का पांव पकड़ लेते और वह उसे माफ़ कर देती । ये एक सामंती पुरुष ही करता है, पहले पीट देना फिर माफी मांग लेना। ये पीटने मनाने का सिलसिला और कभी नामदेव की गोद में अमर शेख का सिर रखकर सिसकना ही इस सम्बंध की नियति बन गया । वह मल्लिका के देखे गए, किसी भी सपने में फिट नहीं रहे वे न अच्छे पति बन सके न अच्छे पिता और न ही दोस्त।
अपनी आत्मकथा में वे इस बात को बहुत तटस्थ होकर रेखांकित करती हैं कि एक पति के रूप में वे नामदेव से बहुत नफरत करती थीं। लेकिन कवि और कार्यकर्ता के रूप में उनकी प्रशंसक थीं। उन्होंने जीवन में बहुत बार उससे एकदम अलग होने का फैसला लिया। लेकिन नामदेव माफी मांगते हुए अपनी की गई हिंसाओं के लिए मल्लिका का पांव पकड़ लेते और वह उसे माफ़ कर देती ।
हिंसा से मुक्ति और अस्मिता की तलाश
मल्लिका ने अपने जीवन में दुख, अपमान और धोखे का लंबे समय तक सामना किया। लेकिन वो कोई आम महिला नहीं थी, कि जीवन भर शादी बचाने के नाम पर हिंसा और अपमान सहती रहती। वह उससे अलग होकर रहने लगीं। इस आत्मकथा को पढ़कर हम समझ सकते हैं कि वे आर्टिस्ट और आधुनिक विचारधारा से नई स्त्री थीं। कला साहित्य और सौंदर्य उनकी दुनिया के अभिन्न हिस्सा थे । वे लेखक कवि जरूर थीं, लेकिन जिस तरह का महिला विरोधी हमारा समाज है, वहां महिलाओं का आत्मकथा लिखना आसान काम नहीं है। देश और समाज में रहकर अपनी अस्मिता का मूल्य जब हम पहचानते हैं, तब ही खुद को भी दर्ज कर पाते हैं। वह अपनी आत्मकथा के आखिरी हिस्से में लिखती हैं कि, मेरा जीवन बहुत रोमांचक या असामान्य आदि नहीं है। सफलता का चढ़ता हुआ ग्राफ भी आपको दिखाई नहीं देगा । ऐसा भी नहीं कि मैंने बहुत दुख देखा है। यह कथन लेखिका के सादे अंतर्मन का आईना है, जहां बेवजह की भावुकता और खुद पर तरस खाने वाली बात नहीं है। एक बड़ा सवाल है नई दुनिया में महिला की जगह और उसकी अस्मिता का।
मुक्ति जब महिला और पुरुष के साथ बिना संभव नहीं है, तो क्यों उस विचार की राजनीति के शीर्ष पर खड़ा पुरुष महिला को भुला देता है। मल्लिका किताब के आखिरी हिस्से में लिखती हैं कि “एक पराजित और असफल मन की है ये यात्रा। यह पराजय और असफलता उन तमाम महिलाओं की कथा है, जो नायकों से प्रेम करती हैं और एक दिन खुद को कहीं बहुत पीछे छूटी हुई पाती हैं। वो लड़की जिसे बारिश और कविताएं पसंद थी। वह एक श्रेष्ठता बोध में भरे पुरुष से प्रेम कर बैठती है, और यहीं से उसके जीवन में उजाड़ शुरू होता है। वैसे तो स्त्री-साहित्य हमारे लिए बहुत कीमती है, लेकिन महिलाओं की आत्मकथाओं का सामने आना साहित्य की दुनिया में एक बड़ा और ज़रूरी बदलाव है। क्योंकि जब कोई महिला अपनी कहानी खुद कहती है, तो उसमें ज्यादा प्रामाणिकता होने की गुंजाइश होती है। इस तरह किसी महिला के जीवन की कहानी में केवल उसका निजी जीवन नहीं, बल्कि पूरे समाज या समूह का अनुभव भी दिखाई देता है। क्योंकि महिलाओं की आत्मकथाएं उनके साथ उनके समुदायों की कथा के रूप में भी सामने आती हैं। साहित्य में बहुत सी महिलाओं की आत्मकथाएं हैं, जो उनके जीवन के दुखों से हमारा परिचय करवाती हैं और न जाने कितनी महिलाओं के जीवन की कहानी कहती चलती हैं।

