इतिहास गोवा की पीटी उषा कहलाने वाली युवा एथलीट और तैराक प्रतिमा गांवकर| #IndianWomenInHistory

गोवा की पीटी उषा कहलाने वाली युवा एथलीट और तैराक प्रतिमा गांवकर| #IndianWomenInHistory

प्रतिमा केवल अच्छी धावक ही नहीं थीं, बल्कि एक कुशल तैराक भी थीं। उनकी रफ्तार और सहनशक्ति उन्हें अन्य खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। कड़ी मेहनत से उन्होंने गोवा में कई राज्य स्तरीय रिकॉर्ड तोड़े। इसी कारण लोग उन्हें “गोवा एक्सप्रेस” और “भारत की दूसरी पीटी उषा” कहकर पुकारने लगे।

प्रतिमा गांवकर भारतीय खेल इतिहास की एक प्रतिभाशाली एथलीट थीं। उनकी कहानी केवल सफलता की नहीं, बल्कि समाज और व्यवस्था की असंवेदनशीलता की भी है। दक्षिण गोवा के सादगल गांव के एक साधारण परिवार से निकलकर उन्होंने बहुत कम उम्र में एथलेटिक्स और तैराकी में राज्य स्तर पर रिकॉर्ड बनाए। वे एक अव्वल धावक थीं और उनका सपना था कि वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लिए बेहतर प्रदर्शन करें। उनका जन्म गोवा के सादगल गांव में हुआ था। उनका बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता।

खेलों में करियर बनाना आसान नहीं था, लेकिन उनकी प्रतिभा और मेहनत ने उन्हें आगे बढ़ाया। उन्होंने कक्षा पांच से दस तक की पढ़ाई कालसाई-दाभाल स्थित इमैक्युलेट हाई स्कूल में की। स्कूल में उनके पीटी शिक्षक फ्रांसिस फर्नांडिस ने उनकी दौड़ने की क्षमता को पहचाना। उन्होंने ही प्रतिमा को एथलेटिक्स की ट्रेनिंग दी। उनके मार्गदर्शन में प्रतिमा ने स्कूल की ओर से कई प्रतियोगिताओं में भाग लिया और पुरस्कार जीते। धीरे-धीरे वे एक उभरती हुई धावक के रूप में पहचानी जाने लगीं।

प्रतिमा केवल अच्छी धावक ही नहीं थीं, बल्कि एक कुशल तैराक भी थीं। उनकी रफ्तार और सहनशक्ति उन्हें अन्य खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। कड़ी मेहनत से उन्होंने गोवा में कई राज्य स्तरीय रिकॉर्ड तोड़े। इसी कारण लोग उन्हें “गोवा एक्सप्रेस” और “भारत की दूसरी पीटी उषा” कहकर पुकारने लगे।

खेलों में प्रतिभा और उपलब्धियां

प्रतिमा केवल अच्छी धावक ही नहीं थीं, बल्कि एक कुशल तैराक भी थीं। उनकी रफ्तार और सहनशक्ति उन्हें अन्य खिलाड़ियों से अलग बनाती थी। कड़ी मेहनत से उन्होंने गोवा में कई राज्य स्तरीय रिकॉर्ड तोड़े। इसी कारण लोग उन्हें “गोवा एक्सप्रेस” और “भारत की दूसरी पीटी उषा” कहकर पुकारने लगे। जब उन्होंने पदक जीतना शुरू किया, तो उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में भी सुधार आने लगा। स्थानीय लोगों और व्यवसायियों ने उनकी मदद की। राज्य सरकार ने भी पुरस्कार राशि देने का वादा किया। प्रतिमा ने मिली हुई राशि से अपने लिए अच्छे जूते खरीदे और अपने खान-पान पर ध्यान दिया। वे बहुत समझदार और जिम्मेदार थीं। उन्होंने अपने परिवार की जरूरतों का भी ध्यान रखा। मापुसा के प्रशिक्षण केंद्र में रहते समय उन्होंने घर में लैंडलाइन फोन लगवाया, ताकि परिवार से संपर्क बना रहे। उस समय गांव में बहुत कम घरों में फोन हुआ करता था।

जब उन्हें मिली अंतर्राष्ट्रीय सफलता

साल 2001 में प्रतिमा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता हासिल की। उन्होंने ब्रुनेई में आयोजित जूनियर एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 4×400 मीटर रिले दौड़ में हिस्सा लिया और भारत के लिए रजत पदक जीता। यह उनकी मेहनत और प्रतिभा का प्रमाण था। इस सफलता के बाद उनके उज्ज्वल भविष्य की उम्मीदें और बढ़ गईं। वे राष्ट्रीय प्रशिक्षण शिविरों का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी थीं। उनका सपना था कि वे ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व करें और अपनी प्रेरणा पी.टी. उषा की तरह देश का नाम रोशन करें। प्रतिमा गांवकर का जीवन हमें यह सिखाता है कि प्रतिभा और मेहनत से बड़ी उपलब्धियां हासिल की जा सकती हैं, लेकिन साथ ही यह भी कि खिलाड़ियों के साथ संवेदनशील और न्यायपूर्ण व्यवहार होना कितना जरूरी है।

साल 2001 में प्रतिमा ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी सफलता हासिल की। उन्होंने ब्रुनेई में आयोजित जूनियर एशियाई एथलेटिक्स चैंपियनशिप में 4×400 मीटर रिले दौड़ में हिस्सा लिया और भारत के लिए रजत पदक जीता।

जेंडर वेरीफिकेशन और मानवाधिकार का हनन

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में सफलता मिलने के बाद प्रतिमा को नियमों के अनुसार जेंडर वेरीफिकेशन परीक्षण से गुजरना पड़ा। उस समय महिला वर्ग में भाग लेने वाली खिलाड़ियों के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य थी। इस परीक्षण का उद्देश्य यह देखना होता था कि खिलाड़ी तय नियमों के अनुसार ‘महिला’ श्रेणी में आती हैं या नहीं। परीक्षण के दौरान यह सामने आया कि प्रतिमा इन्टरसेक्स समुदाय में आती थीं। इन्टरसेक्स होना एक प्राकृतिक जैविक स्थिति है। इसमें व्यक्ति का शरीर, क्रोमोसोम या हार्मोन पारंपरिक पुरुष या महिला मानकों से पूरी तरह मेल नहीं खाते। यह कोई गलती या धोखाधड़ी नहीं होती, बल्कि प्रकृति की विविधता का हिस्सा है। लेकिन यह निजी और संवेदनशील जानकारी सार्वजनिक हो गई। इसके बाद उन्हें मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा।

असंवेदनशील प्रतिक्रिया और मीडिया का व्यवहार

जैसे ही परीक्षण की बात बाहर आई, मीडिया और समाज के कुछ हिस्सों की प्रतिक्रिया बहुत कठोर और असंवेदनशील थी। उनकी खेल उपलब्धियों के बजाय चर्चा उनके शरीर और लैंगिक पहचान पर होने लगी। कुछ समाचार रिपोर्टों में ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया गया, जो सम्मानजनक नहीं थी। यहां तक कि टेस्ट से जुड़ी निजी चिकित्सीय जानकारी भी सार्वजनिक रूप से साझा की गई। इस तरह की जानकारी किसी भी व्यक्ति की निजी होती है। उसका इस तरह खुलासा होना उनकी गरिमा और निजता के अधिकार का गंभीर उल्लंघन था। मानवाधिकार संगठनों ने बाद में इस तरह की प्रक्रियाओं और उनके सार्वजनिक व्यवहार पर सवाल भी उठाए। उन्होंने कहा कि ऐसे परीक्षण और उनकी सार्वजनिक चर्चा खिलाड़ियों के मानसिक स्वास्थ्य और सम्मान पर गहरा असर डालती है। लेकिन तब तक वो गहरे आघात से गुजर चुकी थीं।

अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिता में सफलता मिलने के बाद प्रतिमा को नियमों के अनुसार जेंडर वेरीफिकेशन परीक्षण से गुजरना पड़ा। उस समय महिला वर्ग में भाग लेने वाली खिलाड़ियों के लिए यह प्रक्रिया अनिवार्य थी। इस परीक्षण का उद्देश्य यह देखना होता था कि खिलाड़ी तय नियमों के अनुसार ‘महिला’ श्रेणी में आती हैं या नहीं।

प्रतिमा की माँ जयश्री के अनुसार, अपने अंतिम दिनों में वह बहुत तनाव में थीं। उन्होंने पुलिस को बताया कि आत्महत्या से मौत से पहले उनकी अपने कोच से फोन पर बहस हुई थी। उनकी माँ का आरोप था कि कोच ने उनसे ₹50,000 की मांग की थी। संभव है कि वे केवल सार्वजनिक अपमान ही नहीं, बल्कि निजी और आर्थिक दबाव का भी सामना कर रही थीं। लगातार मानसिक तनाव ने उनकी स्थिति को और कठिन बना दिया। 9 अक्टूबर 2001 को, मात्र 19 वर्ष की उम्र में, प्रतिमा गोवा में अपने घर के पास एक कुएँ में मृत पाई गईं। पुलिस जांच में इसे आत्महत्या से मौत बताया गया। यह घटना पूरे देश के लिए एक गहरा सदमा था। कई लोगों का मानना है कि जेंडर वेरीफिकेशन विवाद, सार्वजनिक अपमान और व्यक्तिगत तनाव ने उन्हें यह कठोर कदम उठाने के लिए मजबूर कर दिया।

उनके पूर्व कोच फ्रांसिस फर्नांडिस ने दुख व्यक्त करते हुए कहा था कि वह एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी थीं और यदि उन्हें उचित समर्थन और सम्मान मिला होता, तो वे भारतीय एथलेटिक्स में बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकती थीं। जेंडर वेरीफिकेशन परीक्षणों की शुरुआत 1940 के दशक में हुई थी। लंबे समय तक इनका असर मुख्य रूप से महिला खिलाड़ियों पर ही पड़ा। कई बार जैविक विविधता वाली महिला खिलाड़ियों को संदेह की नजर से देखा गया, जबकि पुरुष खिलाड़ियों में मौजूद प्राकृतिक शारीरिक भिन्नताओं को सामान्य या लाभ के रूप में स्वीकार किया गया। साल 2006 में भारत की एथलीट शांति सौंदराजन को भी इसी तरह की प्रक्रिया से गुजरना पड़ा था। एशियाई खेलों में रजत पदक जीतने के बाद उनका पदक छीन लिया गया था। इस अपमान ने उन्हें गहरे अवसाद में धकेल दिया और उन्होंने भी आत्महत्या से मौत का प्रयास किया। बाद में उन्होंने कहा था कि ऐसे फैसले खिलाड़ियों के पूरे जीवन को प्रभावित कर देते हैं, केवल उनके खेल को नहीं।

प्रतिमा गांवकर की कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि खेल केवल जीत और हार का नाम नहीं है। यह इंसान की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य और अधिकारों से भी जुड़ा है। उनकी मृत्यु ने खेल जगत में जेंडर, पहचान और मानवाधिकार को लेकर नई बहस को जन्म दिया। बाद के वर्षों में दुती चंद और कास्टर सेमेन्या जैसे खिलाड़ियों के मामलों ने भी इस विषय पर वैश्विक चर्चा को आगे बढ़ाया। वे हमें यह सिखाती है कि खेल संस्थाओं को अधिक संवेदनशील, गोपनीय और मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। किसी भी खिलाड़ी की पहचान या जैविक स्थिति को अपमान का कारण नहीं बनना चाहिए। हर प्रतिभा सम्मान और सहारे की हकदार है।

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