रांझणा फिल्म का वह सीन याद है, जब कुंदन जोया से कहता है, “कह दो तुम्हें प्यार नहीं, वरना अभी कलाई काट लेंगे।” जैसे ही जोया मना करती है, वह खुद को नुकसान पहुंचा लेता है। यह दृश्य एक खतरनाक सोच को दिखाता है, जिसमें एक व्यक्ति अपनी इच्छा दूसरे पर भावनात्मक दबाव के जरिए थोपने की कोशिश करता है। उसे दूसरे व्यक्ति की इच्छा और सहमति की परवाह नहीं होती। इस तरह के व्यवहार को इमोशनल ब्लैकमेल या भावनात्मक हिंसा कहा जाता है। यह सिर्फ फिल्मों तक सीमित नहीं है, बल्कि वास्तविक जीवन में भी ऐसी घटनाएं अक्सर देखने को मिलती हैं। जनवरी 2026 में बेंगलुरु में एक ऐसा ही मामला सामने आया। एक युवक ने एक युवती पर उससे प्यार करने का दबाव बनाया।
अपनी बात मनवाने के लिए उसने युवती के घर के बाहर उसने खुद को शारीरिक तौर पर नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। ऐसी स्थिति में सर्वाइवर व्यक्ति खुद को दोषी महसूस करने लगता है। खासकर महिलाओं के मामलों में सामाजिक दबाव भी बढ़ जाता है। कई बार परिवार उनकी आवाजाही पर रोक लगा देता है और उनकी स्वतंत्रता सीमित कर दी जाती है। मई 2025 में बेंगलुरु हाईकोर्ट ने कहा था कि अपनी बात मनवाने के लिए खुद को नुकसान पहुंचाने की धमकी देना मानसिक क्रूरता और मनोवैज्ञानिक नियंत्रण का रूप है। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं लगातार हो रही हैं।
इमोशनल ब्लैकमेल हमेशा हिंसा के रूप में दिखाई नहीं देता। कई बार यह प्यार, चिंता और सुरक्षा के नाम पर किया जाता है। लेकिन इसका असर व्यक्ति के आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य और स्वतंत्रता पर गहरा पड़ता है। असल में प्यार का मतलब नियंत्रण नहीं, बल्कि सम्मान, सहमति और स्वतंत्रता होना चाहिए।
आज कई रिश्तों में प्यार के नाम पर नियंत्रण और हिंसा को सामान्य बना दिया गया है। इमोशनल ब्लैकमेल वह स्थिति है, जब एक व्यक्ति अपनी बात मनवाने के लिए प्यार, सुरक्षा या अपराधबोध का सहारा लेता है। दूसरा व्यक्ति इसे प्यार या चिंता समझकर अपनी इच्छाओं से समझौता करने लगता है। मनोविज्ञान में इसे भावनात्मक शोषण कहा जाता है। 25 वर्षीय राधिका (बदला हुआ नाम), जो क्वीयर समुदाय से आती हैं, बताती हैं, “जब भी मैं अपनी पहचान और रिश्ते को सार्वजनिक करने की बात करती थी, मेरी पार्टनर मुझ पर दबाव बनाती थी। शुरू में मुझे लगता था कि वह मेरी चिंता कर रही है। लेकिन धीरे-धीरे वह हर बात पर नियंत्रण करने लगी। उसने कभी चिल्लाया नहीं, लेकिन वह हमेशा कहती थी कि यह सब मेरे ही भले के लिए है। इससे मुझे लगने लगा कि मैं अपने फैसले खुद नहीं ले सकती। समय के साथ मेरा आत्मविश्वास कम होने लगा।”
लखनऊ की रहने वाली रिया (बदला हुआ नाम) अपने अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, “रिलेशनशिप में आने के बाद मेरे पार्टनर ने सुरक्षा के नाम पर मुझ पर कई तरह के नियम लागू कर दिए। वह तय करते थे कि मैं क्या पहनूंगी, कहां जाऊंगी और किससे मिलूंगी। अगर मैं उनकी बात नहीं मानती थी, तो वह रिश्ते को खत्म करने की धमकी देते थे। वह कहते थे कि अगर तुम्हें इस रिश्ते में रहना है, तो तुम्हें मेरी बात माननी होगी। मुझे हर समय उन्हें अपनी गतिविधियों की जानकारी देनी पड़ती थी। यहां तक कि अपने रिसर्च गाइड के बारे में भी सफाई देनी पड़ती थी। इस दबाव की वजह से मुझे माइग्रेन की समस्या भी हो गई।” ये अनुभव दिखाते हैं कि इमोशनल ब्लैकमेल हमेशा हिंसा के रूप में दिखाई नहीं देता। कई बार यह प्यार, चिंता और सुरक्षा के नाम पर किया जाता है। लेकिन इसका असर व्यक्ति के आत्मविश्वास, मानसिक स्वास्थ्य और स्वतंत्रता पर गहरा पड़ता है। असल में प्यार का मतलब नियंत्रण नहीं, बल्कि सम्मान, सहमति और स्वतंत्रता होना चाहिए।
फिल्में देखने में भले ही एंटरटेनिंग हो, इसका खामियाजा अमूमन सड़कों पर आम लड़कियों को भुगतना पड़ता है। कॉलेज से घर जाते वक्त लड़के अक्सर हमें देखकर ऐसे ही गानों के बोल दोहराते हैं। जब भी मैं उन सड़कों से गुजरने के बारे में सोचती हूं, तो मेरे मन में डर बना रहता है कि कहीं फिर वही झुंड न दिख जाए।
पॉप कल्चर में उत्पीड़न और दुर्व्यवहार को प्यार का नाम देना
पॉप कल्चर में प्रेम को जिस तरह दिखाया जाता है, उसका असर समाज पर साफ दिखाई देता है। अमूमन फिल्मों और गानों में पुरुष को ताकतवर और महिला का कथित रक्षा की जरूरत वाले व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। कई बार वह महिला की मर्ज़ी के बिना उसे छूता है या उसके निजी दायरे में हस्तक्षेप करता है, लेकिन इसे प्यार के रूप में पेश किया जाता है। फिल्मों के अलावा गानों के बोल भी कई बार महिलाओं की सहमति और व्यक्तिगत स्पेस को नजरअंदाज करते हैं। उदाहरण के लिए, डर फिल्म का गाना, “तू हां कर या न कर, तू है मेरी किरण…” यह संदेश देता है कि किसी एक व्यक्ति की सहमति जरूरी नहीं है।
इस तरह फिल्में प्रेमिका का पीछा करना, उसकी सहमति के बिना उसे छूना, या भावनात्मक दबाव बनाना जैसे व्यवहार को जुनून और सच्चे प्यार के रूप में दिखाती हैं। लेकिन, इसका असर सिर्फ फिल्मों तक नहीं, वास्तविक जीवन में भी दिखाई देता है। लखनऊ की 23 वर्षीय प्रियंका बताती हैं, “फिल्में देखने में भले ही एंटरटेनिंग हो, इसका खामियाजा अमूमन सड़कों पर आम लड़कियों को भुगतना पड़ता है। कॉलेज से घर जाते वक्त लड़के अक्सर हमें देखकर ऐसे ही गानों के बोल दोहराते हैं। जब भी मैं उन सड़कों से गुजरने के बारे में सोचती हूं, तो मेरे मन में डर बना रहता है कि कहीं फिर वही झुंड न दिख जाए।”
मैं दलित समुदाय से आती हूं जबकि मेरे साथी सवर्ण समुदाय से हैं। उसने मेरे साथ कभी वह भेदभाव नहीं किया, जिसे हम किताबों में पढ़ते हैं। लेकिन पता नहीं क्यों, जाने-अनजाने वह अक्सर अपनी जाति का बखान करता रहता था, और मैं ख़ुद को नीचा महसूस करती थी।
इसी तरह मलिहाबाद की 22 वर्षीय अंजलि अपने बचपन का अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, “यह वही साल था जब फिल्म कबीर सिंह आई थी। मैं शाम 6 बजे कोचिंग से निकली। उस वक्त मैं दसवीं कक्षा में थी। हल्का अंधेरा था। एक लड़का, जिससे मेरा सिर्फ़ परिचय मात्र था, मेरे पास आया और उसने मेरे गालों को चूम लिया। मैं कुछ समय के लिए एकदम सन्न रह गई। मुझे कुछ नहीं समझ में आ रहा था। मैं रोते-रोते घर चली गई। घर पर भी मुझे डांट और मार पड़ी। कुछ सालों बाद मैंने यह फिल्म देखी, जिसमें कबीर सिंह (शाहिद कपूर), प्रीति (कियारा आडवाणी) को कुछ इसी तरह से प्रपोज करता है, जिसमें प्रीति की मर्ज़ी भी नहीं पूछी जाती। मैं इसका खामियाजा भुगत चुकी थी।” ये अनुभव बताते हैं कि पॉप कल्चर में दिखाया गया यह व्यवहार केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह वास्तविक जीवन में महिलाओं के खिलाफ दुर्व्यवहार और हिंसा को सामान्य बनाने में भी भूमिका निभाता है।
रोमांटिक रिश्तों में जातिगत श्रेष्ठता और धार्मिक नियंत्रण
अक्सर कहा जाता है कि प्यार का कोई धर्म या जाति नहीं होता। लेकिन वास्तविक जीवन में स्थिति इससे बहुत अलग होती है। कई लोगों के अनुभव बताते हैं कि समाज में आज भी प्रेम को जाति और धर्म के दायरे में ही स्वीकार किया जाता है। उत्तर प्रदेश की रौशनी (बदला हुआ नाम) अपना अनुभव साझा करते हुए बताती हैं, “मैं दलित समुदाय से आती हूं जबकि मेरे साथी सवर्ण समुदाय से हैं। उसने मेरे साथ कभी वह भेदभाव नहीं किया, जिसे हम किताबों में पढ़ते हैं। लेकिन पता नहीं क्यों, जाने-अनजाने वह अक्सर अपनी जाति का बखान करता रहता था, और मैं ख़ुद को नीचा महसूस करती थी। वह अक्सर कहता था कि उसके घर में दूसरी जातियों के लोग उसके और उसके परिवार वालों के पैर छूते हैं, क्योंकि वे जन्म से कथित तौर पर श्रेष्ठ हैं। वह मुझे बार-बार यह भी बताता था कि कैसे मैं कथित नीची जाति से होने के बावजूद वह मुझसे प्यार करता है और इस तरह वह जातिवादी नहीं है। लेकिन, उसके ये दावे सुनकर मैं असहज हो जाती थी।”
वह बार-बार वीडियो कॉल करता और पता करता कि मैं कहां और किसके साथ हूं। वह मेरे सोशल मीडिया अकाउंट्स के पासवर्ड भी मांगता था और चाहता था कि मैं किसी भी पुरुष से बात न करूं। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि निजी स्पेस खत्म हो गया है। मेरा साथी अपने घर के पितृसत्तात्मक नियमों की बात करता था और भविष्य में मुझसे भी वैसी ही उम्मीदें रखता था।
कई बार रिश्तों में खुला भेदभाव नहीं होता, लेकिन जातिगत श्रेष्ठता की भावना व्यवहार और बातचीत में दिखाई देती है। इससे रिश्ते में बराबरी और सम्मान की भावना कमजोर हो जाती है। यह स्थिति बताती है कि प्रेम केवल व्यक्तिगत भावना नहीं है, बल्कि वह समाज की जातिगत और पितृसत्तात्मक संरचनाओं से भी प्रभावित होता है। रौशनी आगे बताती हैं, “जब मैं रिश्ते में थीं, तब मैं नास्तिक थीं। लेकिन मेरे साथी मुझपर धार्मिक दबाव डालते थे। मैं आंबेडकर और फुले को पढ़ती थी, जबकि वो मेरे समुदाय का मज़ाक उड़ाता था। वह कभी-कभी जाति-प्रथा को सही ठहराते हुए कहता था कि पहले जाति व्यवस्था इसलिए थी क्योंकि कुछ जातियों के लोग कूड़ा-कचरा उठाते थे, इसलिए उनके घर का छुआ नहीं खाया जाता था। मुझे लगता है कि प्रेम में बहुत कुछ सहा जा सकता है, लेकिन अपनी पहचान और अपने समुदाय के संघर्षों का अपमान नहीं सहा जा सकता। मेरे साथी अपने दोस्तों की बातें कहकर मुझे यह महसूस कराता था कि हम दोनों के बीच फर्क है और वह अपने जन्म के आधार पर खुद को मुझसे श्रेष्ठ समझता था।”
लखनऊ की श्रद्धा सिंह ने भी इस विषय पर अपने अनुभव साझा करती हैं। उन्होंने बताया कि उनके साथी प्यार और चिंता के नाम पर उनकी निजी ज़िंदगी पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया था। वह कहती हैं, “वह बार-बार वीडियो कॉल करता और पता करता कि मैं कहां और किसके साथ हूं। वह मेरे सोशल मीडिया अकाउंट्स के पासवर्ड भी मांगता था और चाहता था कि मैं किसी भी पुरुष से बात न करूं। धीरे-धीरे मुझे लगने लगा कि निजी स्पेस खत्म हो गया है। मेरा साथी अपने घर के पितृसत्तात्मक नियमों की बात करता था और भविष्य में मुझसे भी वैसी ही उम्मीदें रखता था। विरोध करने पर वह कहता था कि तुम जैसी लड़कियों का कोई भविष्य नहीं होता।”
इस तरह के भावनात्मक उत्पीड़न से उन्हें चिंता और अवसाद जैसी मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ा। इन सभी अनुभवों से यह साफ होता है कि प्रेम में भावनात्मक शोषण और नियंत्रण कई रूपों में सामने आ सकता है। कभी यह जाति और धर्म के आधार पर होता है, कभी निजी जीवन में दखल के रूप में, और कभी सामाजिक दबाव के जरिए। सच्चा प्रेम बराबरी, सम्मान और भरोसे पर आधारित होता है। अगर किसी रिश्ते में पहचान का अपमान, निजी स्वतंत्रता पर नियंत्रण या मानसिक दबाव हो, तो वह प्रेम नहीं, बल्कि शोषण है। स्वस्थ संबंध वही है, जिसमें दोनों को अपनी सोच, पहचान और व्यक्तिगत स्पेस के साथ जीने की आज़ादी मिले।

