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हाल ही में डाबर कंपनी के उत्पाद फेम ब्लीच ने एक विज्ञापन जारी किया था। विज्ञापन में दो महिलाएं चेहरे पर ब्लीच लगाकर बैठी हैं। उनमें से एक पूछती है, “तुम करवाचौथ का डिफिकल्ट व्रत क्यों रख रही हो?” जवाब आता है, “उनकी खुशी के लिए।” दूसरी महिला अपने व्रत का कारण बताती है, “उनकी लम्बी उम्र के लिए।” सीन में एक बड़ी उम्र की महिला आती है और उन्हें उनके ‘पहले करवाचौथ’ के लिए साड़ी देती है। रात में छन्नी लेकर दोनों महिलाओं को एक-दूसरे को उससे देखते हुए दिखाया जाता है यानि कि दोनों ने एक दूसरे के लिए व्रत रखा था। इस विज्ञापन पर तीन तरह की प्रतिक्रियाएं आई हैं। पहली प्रतिक्रिया है इसे एलजीबीटीक्यीएआई+ फ्रेंडली समझे जाने की। दूसरी है दक्षिणपंथी विचार वाले लोगों का संकीर्ण गुस्सा और विरोध। उन को यह विज्ञापन इसलिए खल रहा है क्योंकि इनमें एक पुरुष पति और स्त्री पत्नी की जगह दो महिला साथियों को दिखाया गया है। रूढ़िवादी दक्षिणपंथी मानसिकता इतरलिंगी रिश्तों के अलावा समाज में किसी और जेंडर या सेक्सुअल पहचान के लोगों को स्वीकार करना नहीं चाहते।

विज्ञापन पर विवाद बढ़ने के बाद बीजेपी नेता नरोत्तम मिश्रा ने इसका विरोध करते हुए कहा कि आज महिलाओं को एक दूसरे के लिए करवाचौथ करता दिखाया है कल दो पुरुषों को फेरे लेता दिखाया जाएगा। ऐसे बयान होमोफोबिया और हिन्दू धर्म की ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से प्रेरित हैं। विवाद बढ़ने के बाद आखिरकार डाबर कंपनी ने बीते 26 अक्टूबर को यह विज्ञापन सार्वजनिक स्पेस से हटा लिया। 

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प्रगतिशीलता की ओट में रूढ़िवादी मानसिकता

लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि यह विज्ञापन एलजीबीटीक्यीएआई+ समुदाय की तरफदारी कर रहा है। इस विज्ञापन की प्रगतिशीलता पर तालियां बजाने और इसे ‘रूढ़िवादी सोच को तोड़नेवाला कदम’ मानने से पहले कुछ बातें सोची जानी चाहिए। यहां से आते हैं हम विज्ञापन के तीसरे पक्ष पर। करवाचौथ का त्योहार हिन्दू पौराणिक कथाओं के अनुसार सावित्री नामक स्त्री ने अपने मृत पति को जीवित करने के लिए किया था। द्रौपदी द्वारा भी इस दिन को व्रत रखे जाने का जि़क्र है। भारत में हिंदू पत्नी द्वारा पति के लिए रखे जाने वाले कई व्रत मौजूद हैं। करवा चौथ भारत के कुछ राज्यों में खूब मनाया जाता रहा जैसे, दिल्ली, राजस्थान, पंजाब इत्यादि। बिहार जैसे राज्यों में जहां पहले इस त्योहार को मानने का कोई सांस्कृति इतिहास नहीं रहा है वहां भी इसे मनाया जाने लगा है।

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फेम ब्लीच के इस विज्ञापन की पहली दिक़्क़त: भले ही यहां पार्टनर्स दो महिलाएं हैं फिर भी उनपर ‘विशेष दिन’ चेहरे को ब्लीच से गोरा किए जाने के विचार को जीना है। दूसरी दिक्कत यह है कि एलजीबीटीक्यीएआई+ समुदाय के पक्ष में इस विज्ञापन को दिखाना भ्रम पैदा करना है।

टीवी सीरियलों में उच्च वर्ग और उच्च जाति वाले सरनेम के खानदानों में करवाचौथ मनाया जाता देख कई आम लोग इसके प्रभाव में आकर इसे मना रहे हैं। पॉप कल्चर यानि प्रसिद्ध संस्कृति को टीवी विज्ञापन के माध्यम से लोगों तक पहुंचाता है। उन में अक्सर अमीर और ऊंची जातिगत पहचान के लोगों का किरदार निभाते पात्र जब इन पितृसत्तात्मक त्योहारों को केवल सतही विज़ुअल ट्रीटमेंट देते हैं, उन्हें खुशनुमा जीवन जीते दिखाते हैं तब मध्यवर्गीय लोग उन्हें सपनीली आंखों से देखते हैं और उसे पाने की आकांक्षा उनके अंदर पनपने लगती है। नतीज़न उनके जीवन जीने के स्तर में आर्थिक और सामाजिक रूप से कुछ बेहतर हुआ हो न हो वे पॉप कल्चर के बहकावे में इन त्योहारों को हाथो-हाथ ले चुके होते हैं।

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बाज़ारवाद और ब्राह्मणवादी पितृसत्ता

फेम ब्लीच बाज़ारवाद और पॉप कल्चर से दो कदम आगे बढ़कर ब्राह्मणवादी पितृसत्ता से उपजे त्योहार को रेनबो वॉशिंग और पिंक वाशिंग का इस्तेमाल कर बेच रहा है। बता दें कि रेनबो वॉशिंग का मतलब होता है कि एलजीबीटीक्यीएआई+ से जुड़े रंग, झंडे, दृश्य किसी विज्ञापन में डाल देना ताकि ऊपर-ऊपर से वह उत्पाद एलजीबीटीक्यीएआई+ फ्रेंडली लगे। लेकिन असल में एलजीबीटीक्यीएआई+ समुदाय को समझने और बारीकियों पर ध्यान देने में न्यूनतम ऊर्जा और कोशिश ख़र्च नहीं की गई हो। पिंक वाशिंग क्या होती है? पिंक वाशिंग का अर्थ है यौन स्वतंत्रता की बात करके रूढ़िवादी यानि रिग्रेसिव विचारों को बढ़ावा दिया जाना।

फेम ब्लीच के इस विज्ञापन की पहली दिक़्क़त यह है कि भले ही यहां पार्टनर्स दो महिलाएं हैं फिर भी उनको एक ‘विशेष दिन’ के लिए चेहरे को ब्लीच से गोरा किए जाने के विचार को जीना है। महिलाओं पर थोपे गए सौंदर्य के पैमाने पितृसत्ता की बड़ी पुरानी रीति है, विज्ञापन में केवल पुरुष साथी की जगह महिला साथी होने से सौंदर्य का मतलब ‘गोरापन’ है के विचार को प्रगतिशील नहीं बना सकता है। हेट्रोनॉर्मल समाज में सांवले रंग की महिलाओं को उनके बचपन से ही “चाय कम पियो”, “हल्दी बेसन लगाओ” जैसे वाक्य सुनने को मिलते हैं। उनके मानसिक ट्रामा को समझते हुए उन्हें अपने रंग में सहज हो सकने लायक वातावरण बनाने के बजाय फेम ब्लीच वही पुरानी सोच बेच रहा है कि त्योहार है तो ‘निखार लाने के लिए’ चेहरा ब्लीच किया जाना चाहिए लेकिन क्योंकि उत्पाद की ब्लीच क्रीम है तो भला और क्या उम्मीद की जाए।

आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय इस विज्ञापन का टारगेट ऑडियंस है ही नहीं। शायद ही उनके पास ब्लीच लगाकर त्योहार मनाने जितना सामर्थ्य और संसाधन हो, जिनके पास ये संसाधन आ चुके हैं उन्हें बाज़ार के ऐसे ढकोसले से बचना चाहिए।

क्यों एलजीबीटीक्यीएआई+ के पक्ष में नहीं है यह विज्ञापन

फेम ब्लीच की एक पात्र करवा चौथ की महत्ता को रेखांकित करती है जब वह इसे मुश्किल बताने के बाद अपनी साथी से इस व्रत को रखने का कारण पूछती है। जवाब में कहे गए दोनों ही कारण करवाचौथ की रूढ़िवादी ब्राह्मणवादी कहानी से निकलकर आई है। इस मान्यता को स्वीकार कर के एलजीबीटीक्यीएआई+ समुदाय के पक्ष में इस विज्ञापन को दिखाना भ्रम पैदा करना है। रूढ़िवाद और ब्राह्मणवाद एलजीबीटीक्यीएआई+ समुदाय के सबसे बड़े दुश्मन हैं। ‘गे ऐंगल’ दिखाकर इस बात पर पर्दा डालना खतरनाक है। भारत में एलजीबीटीक्यीएआई+ समुदाय पर पहले से ही चर्चा और उन्हें लेकर स्वीकृति इतनी कम है।

एलजीबीटीक्यीएआई+ समुदाय को अपनी सेक्सुअलिटी पहचानने में, उसे लेकर किसी को कुछ बता पाने में, अपनी सेक्सुअलिटी पहचान और उसे ख़ुद में स्वीकार कर पाने के बाद के सफ़र में किसी तरह से सामाज का स्पोर्ट नहीं मिलता है। अगर व्यक्ति छोटे शहर, गांव कस्बे, निम्न वर्ग, वंचित पहचान से हो तब मामला और भी गंभीर हो जाता है। ऐसे में फेम द्वारा समलैंगिक जोड़े को करवा चौथ मानते हुए दिखाना ख़ासकर कम उम्र (टीनेजर) के एलजीबीटीक्यीएआई+ पहचान वाले लोगों को ख़तरनाक भ्रम में डालने वाला है। टीनएजर पॉप कल्चर के सबसे बड़े उपभोक्ता हैं, फेम जैसे विज्ञापन उन्हें होमोफोबिया, ट्रांसफोबिया इत्यादि के पीछे ब्राह्मणवादी रूढ़िवाद की भूमिका को जड़ तक जाकर नहीं समझने नहीं देंगे। यह एलजीबीटीक्यीएआई+ टीनएजर्स के लिए नुकसानदायक होगा। 

कई सवर्ण जातिगत पहचान या/और उच्च आर्थिक वर्ग के लोग भी प्रगतिशीलता के नाम पर फेम के विज्ञापन का बचाव करते नज़र आए। भारत में करवा चौथ की ऐतिहासिक और सामाजिक जड़ें हेट्रोनॉर्मल समाज के साथ जुड़ी हैं। इस तरह से एलजीबीटीक्यूएआई+ समुदाय को लेकर एक विज्ञापन बनाकर ऐसे रूढ़िवादी व्रतों की सामाजिक स्वीकृति के विचार नहीं प्रचारित किए जा सकते हैं।

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साल 2019-20 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे के फेज़-1 रिपोर्ट के अनुसार 22 राज्यों में से अधिकांश राज्यों में आधी महिलाएं अनीमिया नामक बीमारी से ग्रसित हैं।यूनिसेफ की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में प्रजनन काल की उम्र सीमा पर एक चौथाई महिलाओं कुपोषित पाई गईं। आर्थिक रूप से कमज़ोर परिवारों से आनेवाली महिलाओं के स्वास्थ्य पर सबसे बुरा असर पड़ता है। एक तो पुरुषों की जरूरतों को आगे रखने वाला पितृसत्तात्मक समाज, दूसरा परिवार की आर्थिक तंगी जिससे कई बार न चाहते हुए भी महिलाओं को इसका खामियाजा अपने स्वास्थ्य को दांव पर लगाकर भुगतना पड़ता है। ऐसे में महिलाओं का एक दिन व्रत करना यानि खाना न खाना किस तरह से खुशियां मनाने के कारण की तरह भारतीय समाज देखता है यह खुद में एक व्यंग्यात्मक विडंबना है। फिर वह उपवास किसी भी जेंडर के साथी के लिए रखा जा रहा हो।

अपने साथी के स्वास्थ्य की देखभाल, खानपान में पोषक तत्व रखे जाने जैसे जानकारी पर बात होनी चाहिए। महिला साथी के नियमित शारीरिक चेकअप, उसके मानसिक स्वास्थ्य पर बात होनी चाहिए। इसके साथ ही आर्थिक और सामाजिक रूप से वंचित समुदाय इस विज्ञापन का टारगेट ऑडियंस है ही नहीं। शायद ही उनके पास ब्लीच लगाकर त्योहार मनाने जितना सामर्थ्य और संसाधन हो, जिनके पास ये संसाधन आ चुके हैं उन्हें बाज़ार के ऐसे ढकोसले से बचना चाहिए। इन त्योहारों की रेनबो वॉशिंग करने की जगह एकसाथ मिलकर ब्राह्मणवादी पितृसत्ता को चुनौती देने की ज़रूरत है।

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मेरा नाम ऐश्वर्य अमृत विजय राज है, मिरांडा हाउस से 2021 में दर्शनशास्त्र से स्नातक है। जन्म और शुरुआती पढ़ाई लिखाई बिहार में हुई। इसलिए बिहार के कस्बों और गांव का अनुभव रहा है। दिल्ली आने के बाद समझ आया कि महानगर से मेरे लोग मीलों नहीं बल्कि सालों पीछे हैं। नारीवाद को ख़ासकर भारतीय संदर्भ में उसकी बारीकियों के साथ थ्योरी में और ज़मीनी स्तर पर समझना, जाति और वर्ग के दख़ल के साथ समझना व्यक्तिगत रुचि और संघर्ष दोनों ही है। मुझे आसपास की घटनाएं डॉक्यूमेंट करना पसंद है, कविताओं या विज़ुअल के माध्यम से। लेकिन कभी कभी/हमेशा लगता है "I am too tired to exist".

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