कुछ किताबें पाठक को विचलित करती हैं, लेकिन उसी विचलन में अपनी सार्थकता भी रचती हैं। इस तरह लेखिका कान्ता भारती का साल 1975 में प्रकाशित होने वाला उपन्यास रेत की मछली भी ऐसी ही असहज प्रक्रिया से होकर गुजरता है। यह उपन्यास हिंदी साहित्य में स्त्री-विमर्श की एक महत्वपूर्ण मिसाल है, जो प्रेम के रोमांटिक रूप के पीछे छिपी पितृसत्तात्मक हिंसा को भी सामने लाती है। यह कहानी प्रेम और शादी के रोमांटिक सपनों से शुरू होती है।
लेकिन जल्द ही उन दरारों तक पहुंच जाती है, जहां एक महिला का जीवन चुपचाप टूट रहा होता है। इस उपन्यास की रचना लेखक धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ उपन्यास के लगभग सोलह साल बाद की गई, जहां इसमें एक ओर आदर्श प्रेम को उच्च स्थान दिया गया था। वहीं कान्ता भारती ने उसी आदर्श के बोझ तले दबती महिलाओं की पीड़ा और संघर्ष को उजागर किया, जिसे समाज में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है। यही वजह है कि यह रचना न केवल एक कहानी कहती है, बल्कि पाठक को सोचने और महसूस करने पर मजबूर भी करती है।
इस उपन्यास की रचना लेखक धर्मवीर भारती के ‘गुनाहों का देवता’ उपन्यास के लगभग सोलह साल बाद की गई, जहां इसमें एक ओर आदर्श प्रेम को उच्च स्थान दिया गया था। वहीं कान्ता भारती ने उसी आदर्श के बोझ तले दबती महिलाओं की पीड़ा और संघर्ष को उजागर किया, जिसे समाज में अक्सर अनदेखा कर दिया जाता है।
प्रेम से सत्ता तक रिश्तों की अदृश्य राजनीति
उपन्यास की नायिका कुंतल शिक्षित, आत्मनिर्भर सोच रखने वाली महिला है, जो परंपरागत शादी की व्यवस्था से अलग प्रेम-विवाह का चुनाव करती है। शुरुआत में यह फ़ैसला उसे आज़ादी और भरोसे का एहसास देता है। लेकिन जल्दी ही यह समझ में आ जाता है कि पितृसत्ता सिर्फ पुराने सोच वाले लोगों तक सीमित नहीं है। वह खुद को आधुनिक, उदार और पढ़ा-लिखा कहने वाले पुरुषों की सोच में भी उतनी ही गहराई से मौजूद रहती है। इसमें शोभन का चरित्र इसी आधुनिक पितृसत्ता का एक जीवंत चेहरा है, जो भाषा और विचारों में प्रगतिशील दिखता है, लेकिन निजी रिश्तों में एक महिला के प्रति क्रूर और हिंसात्मक है। उसका यह दोहरा चरित्र उपन्यास की सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक परत बनता है और पाठकों को सोचने और समझने पर विवश करता है।
यह खास बात है कि कुंतल और शोभन का प्रेम, परिवार के विरोध के बावजूद, शादी में बदल गया और इतनी शीघ्रता से विकसित हुआ, कि वह पाठक को इस प्रश्न के सामने खड़ा कर देता है कि, क्या कुंतल को अपने निर्णय पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय और मानसिक स्पष्टता मिल पाई थी? उसके पिता का शादी से इनकार करना, नौकरी छुड़वाना और घर में कैद कर देना ये परिस्थितियां उसकी आज़ादी को धीरे-धीरे खत्म कर देती हैं। ऐसे में शोभन का दिया गया आश्वासन, ‘मैं आजीवन तुम्हारे साथ खड़ा रहूंगा’ उसके लिए केवल प्रेम-वाक्य नहीं बल्कि सुरक्षा का वादा भी बन जाता है। इस विषय पर दार्शनिक सिमोन द बोउवार ने कहा था कि, स्त्री को स्वायत्तता नहीं, सुरक्षा की चाह सिखाई जाती है। उनकी द सेकंड सेक्स किताब इस सामाजिक संरचना को बख़ूबी उजागर करती है, जहां परिवार के नियंत्रित माहौल से बाहर भावनात्मक सुरक्षा की तलाश में महिलाएं अक्सर पितृसत्ता के और अधिक गहरे और छिपे हुए रूपों में उलझ कर रह जाती हैं।
उपन्यास की नायिका कुंतल शिक्षित, आत्मनिर्भर सोच रखने वाली महिला है, जो परंपरागत शादी की व्यवस्था से अलग प्रेम-विवाह का चुनाव करती है। शुरुआत में यह फ़ैसला उसे आज़ादी और भरोसे का एहसास देता है। लेकिन जल्दी ही यह समझ में आ जाता है कि पितृसत्ता सिर्फ पुराने सोच वाले लोगों तक सीमित नहीं है।
दाम्पत्य जीवन के भीतर छिपी वैचारिक हिंसा
शादी के शुरूआती दिनों में कुंतल का जीवन एक सुखमय दाम्पत्य का आभास देता है। नीला कमरा, बालकनी में फूलों की बगिया और प्यार करने वाला पति। लेकिन यह प्यार भरे दिन ज्यादा समय तक नहीं टिक पाते हैं, क्योंकि शोभन के मीनल के साथ विकसित होते अवैध संबंध उनके रिश्ते में दरार पैदा कर देते हैं। ऐसे में कुंतल का चुप रहना, सहते जाना और समझौता करते रहना उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उस सामाजिक प्रशिक्षण का नतीजा है, जिसमें महिलाओं को सहना सिखाया जाता है। कुंतल इस दौरान जिस हिंसा से गुजरती है। मारिया रूट के शब्दों में यह इंसीडियस ट्रॉमा या अप्रत्यक्ष आघात है। यानी एक ऐसी हिंसा जो शरीर से अधिक आत्मा को घायल करती है। एक वक्त के बाद उसे आत्महत्या से मौत के विचार भी आने लगते हैं, पर वह अपनी दुधमुंही बच्ची की चिंता और सब कुछ ठीक हो जाने की उम्मीद उसे रोकती रहती है।
उपन्यास में भाषा का इस्तेमाल सत्ता दिखाने के लिए किया गया है। जिसमें शोभन अपनी हर गलती को तर्क और नैतिकता के बहाने छिपा देता है। वहीं कुंतल की भाषा आत्म-संदेह से भरी रहती है। यही असमानता गैसलाइटिंग को जन्म देती है, जहां एक महिला अपने ही अनुभवों पर शक करने लगती है कि समस्या उसके ही भीतर है। इस प्रकार निजी हिंसा वैचारिक हिंसा में परिवर्तित हो जाती है। लेखिका और शोधकर्ता जूडिथ हरमन ने अपनी किताब ट्रॉमा एंड रिकवरी में बताया है कि, साइकोलॉजिकल अब्यूज़ इज़ इनविज़िबल बिकॉज़ इट लीव्स नो ब्रूज़ेस। यानी मानसिक शोषण अदृश्य होता है, क्योंकि यह कोई बाहरी चोट या निशान नहीं छोड़ता। कांता भारती उन्हीं अदृश्य घावों को अपने उपन्यास दर्ज करने की कोशिश की हैं।
कुंतल की सहनशीलता और संयम शोभन को पराजित होने जैसा महसूस कराते हैं, और वह अपने अहंकार के चलते हिंसा का सहारा लेता है। धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी गंभीर हो जाती हैं कि वह उससे जबरन त्याग पत्र लिखवाता है, और उसे अपनी दुधमुंही बच्ची के साथ, घर से बाहर निकाल देता है।
अदृश्य बंधनों से बाहर निकलती महिला का सफर
कुंतल की सहनशीलता और संयम शोभन को पराजित होने जैसा महसूस कराते हैं, और वह अपने अहंकार के चलते हिंसा का सहारा लेता है। धीरे-धीरे परिस्थितियां इतनी गंभीर हो जाती हैं कि वह उससे जबरन त्याग पत्र लिखवाता है, और उसे अपनी दुधमुंही बच्ची के साथ, घर से बाहर निकाल देता है। यह दृश्य साफ़ दिखाता है कि समाज में आदर्श देवता की छवि गढ़ने वाला वर्चस्ववादी पुरुष, अपने आस-पास कितनी अनियंत्रित और निर्मम हिंसा फैला सकता है। केवल शक्ति और नियंत्रण के नाम पर वह अपने प्रेम और जिम्मेदारियों को दरकिनार कर देता है और इस क्रूरता का सामना वो लोग करते हैं, जो उसकी शक्ति और प्रतिष्ठा के सामने असहाय होते हैं। यह कृति अवसाद और निराशा से भरी हुई है। लेकिन इसका अंत उम्मीद की किरण जगाता है। इसके अंतिम खंड में कुंतल का अपनी डायरी और पत्रों को जलाना अतीत की सत्ता से मुक्ति का प्रतीक है। यह केवल भौतिक वस्तुएं जलाने की क्रिया नहीं है, बल्कि उनके साथ जुड़े दर्द, डर और मानसिक दबाव से आज़ाद होने की अभिव्यक्ति भी है। उसका कुमुद के साथ हंस पाना, वो भी उस वक्त जब शोभन की फैलाई गई अफवाहें सबके सामने आती हैं। यह उसकी मजबूती और आत्मविश्वास को दिखता है।
लेकिन ट्रॉमा बॉन्डिंग के कारण यानी वह भावनात्मक जुड़ाव, जिसमें व्यक्ति हिंसा या शोषण सहने के बावजूद अपने ही शोषक से गहराई से बंधा रहता है। वह उसको बार-बार मौके देती रहती है। लेकिन बाद में वह इस रिश्ते से बाहर निकलना ज़रूरी समझती है, जो शायद किसी एब्यूसिव रिश्ते से मानसिक आज़ादी के लिए जरूरी है। ‘इस तपती रेत में अब जो जलता है वहां कुछ उग रहा है। देखो, कहीं वह मैं तो नहीं।’ इस तरह की पंक्तियों के साथ उपन्यास का अंत तो होता है, लेकिन एक नई उम्मीद की रोशनी भी नजर आती है, जो पाठक को आशा और साहस से भर देती है।रेत की मछली को आत्मकथा या कल्पना की बहस में सीमित कर देना उसके महत्व को कम कर देता है। इसमें कान्ता भारती बिना किसी सजावट और बिना सहानुभूति मांगे, सीधी और सरल भाषा में सच्चाई को सामने रखती हैं। यह कृति हिंदी साहित्य में स्त्री-स्वर को न केवल दर्ज करती है, बल्कि यह एक महिला की निजी पीड़ा के बहाने पितृसत्ता की गहरी परतों को उजागर करने वाला महत्वपूर्ण उपन्यास है। यह दिखाता है कि प्रेम और शादी के आदर्शों के पीछे छिपी असमानता किस तरह स्त्री को भीतर से तोड़ देती है। कुंतल का संघर्ष चुप्पी से मुक्ति की यात्रा है, बताती है कि सम्मान और बराबरी के बिना कोई भी संबंध पूर्ण नहीं हो सकता। यही इसे आज भी प्रासंगिक बनाता है और इसकी अहमियत को सामने लाता है।

