इंटरसेक्शनलजेंडर सीसीटीवी, जीपीएस और हेल्पलाइन के बीच महिलाओं की सुरक्षा का सवाल

सीसीटीवी, जीपीएस और हेल्पलाइन के बीच महिलाओं की सुरक्षा का सवाल

दिल्ली में सुरक्षा का मतलब केवल तकनीक की उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविकता और सूचना के बीच कोई अंतर न होना और आपात स्थिति में साधन का काम करना है। तकनीक केवल उपकरण है, समाधान नहीं। प्रशिक्षण, नियमित निरीक्षण और पारदर्शी शिकायत प्रक्रिया अनिवार्य होने चाहिए।

दिल्ली को अक्सर एक ऐसे शहर के रूप में दिखाया जाता है जहां असुरक्षित माहौल के बीच भी सुरक्षा के लिए अनेक प्रकार की तकनीक मौजूद हैं। शहर में जगह-जगह बड़ी संख्या में सीसीटीवी कैमरे लगाए गए हैं। ऐप-आधारित कैब सेवाएं यह दावा करती हैं कि हर गाड़ी में जीपीएस ट्रैकिंग होती है और ड्राइवर की पूरी जानकारी पहले से दर्ज रहती है। यात्रियों को ड्राइवर की तस्वीर, वाहन का नंबर और ओटीपी जैसी सुविधाएं भी मिलती हैं। इसके अलावा महिलाओं के लिए 1091 जैसी हेल्पलाइन और राष्ट्रीय आपातकालीन नंबर 112 भी उपलब्ध हैं। हालांकि ये सब महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक मजबूत कदम के रूप में देखा जाता है, जो पहली नज़र में सुव्यवस्थित और भरोसेमंद दिखाई देती है। लेकिन जब इन व्यवस्थाओं को रोज़मर्रा के अनुभव की कसौटी पर परखा जाता है, तो तस्वीर अधिक जटिल नज़र आती है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की साल 2022 रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में महिलाओं के खिलाफ 4,45,256 मामले दर्ज किए गए। इनमें अपहरण और जबरन ले जाने के मामले लगभग 19 प्रतिशत रहे। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली जैसे बड़े शहरों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है। एनसीआरबी के आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि असुरक्षा का प्रश्न केवल लैंगिक नहीं है, बल्कि सामाजिक पृष्ठभूमि से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जाति (एससी) के महिलाओं के खिलाफ कुल 57,582 मामले दर्ज किए गए, जो 2021 में दर्ज 50,900 मामलों की तुलना में 13.1 प्रतिशत की वृद्धि दिखाता है। साल 2021 में अपराध दर 25.3 से बढ़कर साल 2022 में 28.6 हो गया। इन्हीं मामलों में सबसे अधिक 18,428 मामले यानी 32 प्रतिशत साधारण मारपीट के थे, 5,274 मामले यानी 9.2 प्रतिशत आपराधिक धमकी से जुड़े थे और 4,703 मामले यानी 8.2 प्रतिशत एससी/एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत दर्ज किए गए।

एनसीआरबी की साल 2022 रिपोर्ट के अनुसार, देश भर में महिलाओं के खिलाफ 4,45,256 मामले दर्ज किए गए। इनमें अपहरण और जबरन ले जाने के मामले लगभग 19 प्रतिशत रहे। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार दिल्ली जैसे बड़े शहरों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है।

अनुसूचित जनजाति (एसटी) समुदायों के संदर्भ में भी इसी अवधि में 10 हजार से ज्यादा मामले दर्ज किए गए, जो साल 2021 में दर्ज 8,802 मामलों की तुलना में 14.3 प्रतिशत अधिक है। साल 2021 में अपराध दर 8.4 से बढ़कर साल 2022 में 9.6 हो गया। इन मामलों में 2,826 मामले यानी 28.1 प्रतिशत साधारण मारपीट के थे, जबकि 1,347 मामले यानी 13.4 प्रतिशत बलात्कार से जुड़े थे और 1022 मामले यानी 10.2 प्रतिशत महिलाओं की गरिमा भंग करने के इरादे से किए गए हमलों के थे। इन आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं की सुरक्षा का प्रश्न जाति और सामाजिक पहचान से अलग करके नहीं देखा जा सकता। सार्वजनिक परिवहन, कैब सेवाओं और शहरी ढांचे में सुरक्षा की चर्चा करते समय यह भी देखना जरूरी है कि क्या ये व्यवस्थाएं सभी समुदायों के लिए समान रूप से सुरक्षित अनुभव प्रदान कर पा रही हैं।

तकनीक के बावजूद क्या है सुरक्षा की स्थिति

सुरक्षा के विषय पर बातचीत में नागपुर की 25 वर्षीय तान्या जो दिल्ली में डिज़ाइन की पढ़ाई और काम दोनों कर रही हैं, कहती हैं, उनके लिए कैब बुक करना एक सामान्य प्रक्रिया नहीं है। वे कहती हैं, “मैं गाड़ी आने से पहले ही ऐप में दिख रहे नंबर को बार-बार देखती रहती हूं। गाड़ी रुकते ही नंबर प्लेट से उसे मिलाती हूं। कई बार एक अंक अलग होता है या सीरीज़ बदल जाती है। उस समय तुरंत तय करना होता है कि क्या करना है।” ये स्थिति अक्सर असमंजस पैदा करती है। अगर राइड रद्द कर दूं तो देर हो सकती है, और अगर बैठ जाऊं तो मन में असहजता बनी रहती है। ड्राइवर अक्सर कह देता है कि ऐप अपडेट नहीं हुआ या गाड़ी बदल दी गई है, लेकिन उस समय पूरी तरह भरोसा कर पाना आसान नहीं होता।”

तान्या बताती हैं कि उन्होंने यह सावधानी किसी एक घटना के बाद नहीं अपनाई। “मैं हमेशा अपनी लोकेशन अपने परिवार वालों को भेजती हूं। कई बार पूरी राइड के दौरान फोन पर बात करती रहती हूं ताकि कैब ड्राइवर को लगे कि मैं अकेली नहीं हूं हालांकि यह अब आदत बन चुकी है।” उनके अनुसार, तकनीक मौजूद होने के बावजूद अंतिम निर्णय का बोझ अक्सर यात्री पर ही रहता है। वे जोड़ती हैं, “अगर कुछ गलत लगे तो फैसला मुझे ही करना है। कंपनी बाद में देखेगी, लेकिन उस समय मैं अकेली होती हूं और कैंसिल करना या नहीं करना हमारी ज़िम्मेदारी है।”

मैं हमेशा अपनी लोकेशन अपने परिवार वालों को भेजती हूं। कई बार पूरी राइड के दौरान फोन पर बात करती रहती हूं ताकि कैब ड्राइवर को लगे कि मैं अकेली नहीं हूं हालांकि यह अब आदत बन चुकी है।

हमारे आस-पास कई महिलाएं अब अतिरिक्त सावधानी बरतती हैं, किसी ने गाड़ी की तस्वीर लेनी, किसी ने रास्ते भर मैप देखना। यह सुविधा से अधिक सुरक्षा की व्यक्तिगत रणनीति बन गई है। एक ड्राइवर ने बताया कि उनकी गाड़ी वर्कशॉप में थी, इसलिए दूसरी गाड़ी भेजी गई। तय नंबर और वास्तविक नंबर में अंतर था। उन्होंने कहा कि वे प्लेटफ़ॉर्म पर नए हैं और बाकी ड्राइवरों के व्यवहार की जानकारी नहीं है। उनका काम केवल सवारी को सुरक्षित पहुंचाना है, और वे देर रात की राइड्स से बचते हैं। प्रशिक्षण में केवल ऐप चलाने की बुनियादी जानकारी दी जाती है; महिला सुरक्षा या वाहन बदलने पर सूचित करने का कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं है। वाहन सत्यापन आसान है, लेकिन नंबर बदलना या अपडेट करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। यह स्पष्ट है कि यात्री इसे सुरक्षा का सवाल मानते हैं, जबकि ड्राइवर इसे तकनीकी प्रक्रिया और कामकाजी सुविधा समझते हैं। यही अंतर प्लेटफ़ॉर्म-आधारित परिवहन व्यवस्था की खाई को दिखाता है। सिर्फ कैब ही नहीं, दिल्ली की सार्वजनिक बसों में भी महिलाएं असहज हैं। कई बार एसओएस बटन काम नहीं करते या उनका इस्तेमाल व्यावहारिक रूप से मुश्किल होता है।

क्या आपात स्थिति के लिए इंतजाम है काफी

कुछ बसों में आपात स्थिति के लिए हथौड़ा होता है, लेकिन कई बार वह जाम या कसकर फिक्स रहता है, जिससे घबराहट में इस्तेमाल मुश्किल हो जाता है। इससे सवाल उठता है कि क्या सुरक्षा केवल उपकरण लगाने से सुनिश्चित होती है या उनके नियमित परीक्षण और रखरखाव भी जरूरी है। शहरी परिवहन विशेषज्ञों के अनुसार डिजिटल और सार्वजनिक दोनों परिवहन में सुधार के तीन स्तर जरूरी हैं-सटीक और त्वरित सूचना, ड्राइवर और कर्मियों का प्रशिक्षण, और शिकायतों पर पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई। दिल्ली में सुरक्षा का मतलब केवल तकनीक की उपस्थिति नहीं, बल्कि वास्तविकता और सूचना के बीच कोई अंतर न होना और आपात स्थिति में साधन का काम करना है। तकनीक केवल उपकरण है, समाधान नहीं। प्रशिक्षण, नियमित निरीक्षण और पारदर्शी शिकायत प्रक्रिया अनिवार्य होने चाहिए। जब तक महिलाओं को हर यात्रा से पहले अतिरिक्त सतर्कता करनी पड़ेगी, सुरक्षा ढांचा पूरी तरह भरोसेमंद नहीं माना जा सकता।

दिल्ली जैसे बड़े शहर में लाखों लोग रोज़ ऐप-आधारित परिवहन सेवाओं पर निर्भर हैं। ऐसे में नियमित जांच, ड्राइवरों का अनिवार्य प्रशिक्षण और वाहन विवरण की समय-समय पर पुष्टि जरूरी है।

सिस्टम और ऐप दोनों की जिम्मेदारी तय हो  

हालांकि यह भी स्पष्ट था कि वाहन की जानकारी और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर को ड्राइवर प्रशासनिक या तकनीकी मुद्दा मानते हैं, न कि सीधे सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न। ऐप आधारित सेवाओं में वाहन और ड्राइवर की जानकारी का सटीक होना केवल सुविधा का मामला नहीं है; यह सीधे तौर पर सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न है। ऐसे में जब ऐप पर दर्ज नंबर और वास्तविक वाहन में अंतर दिखता है, तो जिम्मेदारी किस स्तर पर तय की जाती है, यह स्पष्ट नहीं होता। क्या यह ड्राइवर की जवाबदेही है? क्या प्लेटफ़ॉर्म की तकनीकी निगरानी की कमी है? या दोनों की साझा जिम्मेदारी? परिवहन और शहरी सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर आधारित व्यवस्था में निगरानी और पारदर्शिता बेहद जरूरी है। केवल यह दावा करना काफी नहीं कि हर गाड़ी जीपीएस से जुड़ी है या ड्राइवर का सत्यापन हुआ है। वाहन में किसी भी बदलाव की जानकारी तुरंत अपडेट होना और यात्रियों को स्पष्ट रूप से दिखाई देना आवश्यक है। साथ ही सिस्टम में देरी या गड़बड़ी पर स्पष्ट नियम और जवाबदेही होनी चाहिए।

दिल्ली जैसे बड़े शहर में लाखों लोग रोज़ ऐप-आधारित परिवहन सेवाओं पर निर्भर हैं। ऐसे में नियमित जांच, ड्राइवरों का अनिवार्य प्रशिक्षण और वाहन विवरण की समय-समय पर पुष्टि जरूरी है। साथ ही शिकायतों पर पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि यात्रियों का विश्वास बना रहे। असल में सावधानी अब अपवाद नहीं, बल्कि नियम बन चुकी है। महिलाएं लाइव लोकेशन भेजती हैं, नंबर प्लेट और ड्राइवर की तस्वीर मिलाती हैं, और रास्ते भर मैप देखती रहती हैं। यह दिखाता है कि तकनीक अपने आप में सुरक्षा की गारंटी नहीं है। सुरक्षा तभी प्रभावी मानी जाएगी जब महिलाओं को हर यात्रा से पहले अतिरिक्त सतर्कता बरतने की जरूरत न पड़े और व्यवस्था उन्हें वास्तविक और बिना शर्त भरोसा दे सके।

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