इतिहास बीबा जगमोहन कौर: पंजाबी लोकसंगीत की सशक्त आवाज़| #IndianWomenInHistory

बीबा जगमोहन कौर: पंजाबी लोकसंगीत की सशक्त आवाज़| #IndianWomenInHistory

बीबा जगमोहन कौर ने पंजाबी लोकसंगीत की दुनिया में अपनी मधुर आवाज़ और अभिनय के माध्यम से रुढ़िवादी पितृसत्तात्मक समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनके गीतों में पंजाबी लोकजीवन की झलक, सामाजिक हास्य, रिश्तों की बारीकियां और ग्रामीण संस्कृति की सहजता देखने को मिलती है।

भारतीय पितृसत्तात्मक समाज में लंबे समय तक संगीत और मनोरंजन के क्षेत्र में केवल पुरुषों का ही बोलबाला रहा है। वहीं उस दौर में महिलाओं के लिए सार्वजनिक मंचों पर गाना या अभिनय करना आसान नहीं था, क्योंकि महिलाओं को केवल घरेलू कामों और आदर्श महिला की छवि से जोड़कर देखा गया। ऐसे दौर में कुछ महिला कलाकारों ने अपनी प्रतिभा, साहस और मेहनत के माध्यम से इन रुढ़िवादी सीमाओं को चुनौती दी और लोकसंगीत की दुनिया में अपनी पहचान बनाई। इन्हीं में से एक महिला कलाकार थीं, बीबा जगमोहन कौर जिन्होंने पंजाबी लोकसंगीत की दुनिया में अपनी मधुर आवाज़ और अभिनय के माध्यम से रुढ़िवादी पितृसत्तात्मक समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई। 

उनके गीतों में पंजाबी लोकजीवन की झलक, सामाजिक हास्य, रिश्तों की बारीकियां और ग्रामीण संस्कृति की सहजता देखने को मिलती है। उन्होंने कई कार्यक्रमों में अपने हास्यपूर्ण और जीवंत किरदारों में अभिनय के माध्यम से दर्शकों को आकर्षित किया। इन्होंने न केवल संगीत और अभिनय के क्षेत्र में अपनी जगह बनाई, बल्कि समाज में महिलाओं की भूमिका को लेकर मौजूद पारंपरिक सोच को भी धीरे-धीरे बदलने में योगदान दिया। उनका जीवन हर उस महिला के लिए प्रेरणा है, जो संगीत और अभिनय के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहती हैं। 

बीबा जगमोहन कौर जिन्होंने पंजाबी लोकसंगीत की दुनिया में अपनी मधुर आवाज़ और अभिनय के माध्यम से रुढ़िवादी पितृसत्तात्मक समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनके गीतों में पंजाबी लोकजीवन की झलक, सामाजिक हास्य, रिश्तों की बारीकियां और ग्रामीण संस्कृति की सहजता देखने को मिलती है।

शुरुआती जीवन, शिक्षा और संगीत की ओर पहला कदम

बीबा जगमोहन कौर का जन्म 16 अप्रैल 1948 में पठानकोट, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम  गुरबचन सिंह और माता का नाम प्रकाश कौर था। उनका परिवार शिक्षा और संस्कृति को महत्व देने वाला था, इसलिए बचपन से ही उन्हें पढ़ाई और कला दोनों के लिए प्रोत्साहन मिला। उनका पालन-पोषण उनके पैतृक गाँव बूर माजरा (अब रोपड़ जिले) में हुआ और उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा गाँव के ही एक स्कूल से पूरी की।इसके बाद उन्होंने खालसा हाई स्कूल, कुराली और आर्य ट्रेनिंग स्कूल, खार में दाखिला लिया और वहां से जे.बी.टी. की पढ़ाई पूरी की। 

इसके बाद उन्होंने चंडीगढ़ के पास मणि माजरा में कुछ समय तक शिक्षक के रूप में काम भी किया। इसके बाद उन्होंने कंवर एस. मोहिंदर सिंह बेदी से संगीत की शिक्षा ली। संगीत के प्रति अपने जुनून के कारण उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी और गाना शुरू कर दिया। कलकत्ता में एक कार्यक्रम के दौरान वह गायक के. दीप से मिलीं। उनकी मुलाक़ात प्रेम बदल गई और फिर उनकी शादी भी हो गई। स्क्रोल में प्रकाशित एक लेख के मुताबिक, कुछ समय के लिए वे कलकत्ता में रहीं और 1970 के दशक के मध्य तक वे एक उभरती हुई गायिका बन चुकी थीं। उन्होंने अपने पति,के साथ 1971 में एचएमवी के लिए अपना पहला रिकॉर्ड जारी किया। 

बीबा जगमोहन कौर का जन्म 16 अप्रैल 1948 में पठानकोट, पंजाब में हुआ था। उनके पिता का नाम  गुरबचन सिंह और माता का नाम प्रकाश कौर था। उनका परिवार शिक्षा और संस्कृति को महत्व देने वाला था, इसलिए बचपन से ही उन्हें पढ़ाई और कला दोनों के लिए प्रोत्साहन मिला।

लोकगीतों के माध्यम से प्रेम, विद्रोह और किसानों की पीड़ा  

साल 1972 में, उन्होंने बाबा बुल्ले शाह के कलाम ‘कमली’ को रिकॉर्ड किया, जिसने उनके लाइव परफॉर्मेंस को एक नई पहचान दी। वे अपने सभी परफॉर्मेंस में इसे गाती थीं, जो हीर की त्रासदी को आज हमारे सामने उसी तरह प्रस्तुत करता है जैसे अमृता प्रीतम ने कुछ दशक पहले किया था। वह बुल्ले शाह के गीतों को गहराई से समझती थीं और कवि के हर शब्द को अपने भीतर उतार लेती थीं। उन्होंने  इसी तरह की एक और धुन गाई, ‘मेरा रूठरा यार नी मनदा’ मेरा रूठा हुआ प्रेमी मेरी बात नहीं सुनता। उन्होंने यह गीत इस बात को जानते हुए गाया कि लोग उन पर और पितृसत्तात्मक समाज में महिला कलाकारों पर आपत्ति जताएंगे। लेकिन फिर भी यह जताते हुए कि उन्हें उनकी या समाज  राय की ज़रा भी परवाह नहीं है।ठीक वैसे ही जैसे बुल्ले शाह ने कहा था। इसके साथ ही साल 1976 तक उन्होंने शिव कुमार बटालवी की कविताओं का एक एल्बम भी रिकॉर्ड किया था। इसके अलावा उन्होंने अन्य पंजाबी गायकों की तरह जट्ट के किरदार पर भी कई गीत गाए। पंजाबी लोकसंगीत में जट्ट का चरित्र एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। 

यह आमतौर पर एक ग्रामीण व्यक्ति के रूप में दिखाया जाता है, जिसके पास कुछ ज़मीन, सामाजिक प्रभाव और स्थानीय स्तर पर एक तरह की शक्ति होती है। ऐसे गीत उस समय के ग्रामीण समाज और उसकी जीवनशैली को भी दिखाते हैं।उन्होंने कई गीतों में ग्रामीण जट्टों के जीवन और उनके संघर्षों को भी आवाज़ दी। उनके गीतों में ऐसे जट्टों की कहानी मिलती है जो कर्ज़ के बोझ से दबे हुए थे और सामाजिक-आर्थिक दबावों का सामना कर रहे थे। उनके गीत ‘शाहन दा कर्ज़ बुरा’ (व्यापारियों का कर्ज़ बुरा होता है) में वे किसानों की पीड़ा को व्यक्त करती हैं। इस गीत में खेतों में मेहनत करने वाले जट्टों की परेशानियां, बेटों के गलत रास्ते पर चले जाने की चिंता, गरीबी का दर्द और दोस्तों के विश्वासघात जैसी भावनाओं को मार्मिक तरीके से दिखाया गया है।वह चाहती थीं कि गरीब किसान को अपना गौरव प्राप्त हो, वह मजबूत खड़ा रहे, लेकिन किसी काल्पनिक दुनिया में नहीं, बल्कि अपनी लगन और मेहनत के बल पर।

उनके गीत ‘शाहन दा कर्ज़ बुरा’ (व्यापारियों का कर्ज़ बुरा होता है) में वे किसानों की पीड़ा को व्यक्त करती हैं। इस गीत में खेतों में मेहनत करने वाले जट्टों की परेशानियां, बेटों के गलत रास्ते पर चले जाने की चिंता, गरीबी का दर्द और दोस्तों के विश्वासघात जैसी भावनाओं को मार्मिक तरीके से दिखाया गया है।

गायन के साथ अभिनय की दुनिया में भी पहचान

संगीत के अलावा वह हास्य से भरपूर सीरियल ‘माई मोहनो एंड पोस्टी’ में भी वह नज़र आईं, इसमें अभिनय करने के बाद वह खूब सुर्ख़ियों में रहीं। उन्होंने कुछ पंजाबी फिल्मों में भी अभिनय किया, जिनमें साल 1976 की फिल्म दाज, साल 1979 में मुटियार और साल 1990 में दुश्मनी दी अग आदि  शामिल हैं।इसके अलावा उन्होंने साल 1980 में सुखी परिवार  और दो जट्टियां सहित कई फिल्मों में पार्श्व गायिका (प्लेबैक सिंगर) के रूप में भी गाने गाए। इस तरह वह हमेशा गायन और मनोरंजन के क्षेत्र से जुडी रही। हालांकि 6 दिसंबर 1997 में 49 साल की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। लेकिन अपने गायन और अभिनय के माध्यम से वह आज भी हर एक पंजाबी दिल की गहराइयों में बसी हुई है। उनके गाने आज भी इंस्टा रील पर ट्रेंडिंग में हैं।  

बीबा जगमोहन कौर का जीवन केवल एक सफल गायिका या कलाकार की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस साहस, संवेदनशीलता और सामाजिक चेतना की कहानी भी है जिसके माध्यम से उन्होंने रुढ़िवादी  सीमाओं को चुनौती दी। उनके गीतों में प्रेम, विरह, हास्य और ग्रामीण जीवन की झलक तो मिलती ही है, साथ ही किसानों के संघर्ष, सामाजिक असमानताओं और मानवीय रिश्तों की जटिलताओं का भी गहरा चित्रण दिखाई देता है। यही कारण है कि उनका काम केवल संगीत तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पंजाबी संस्कृति और लोकपरंपराओं को जीवित रखने में भी उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। नई पीढ़ी भी सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों के माध्यम से उनके गीतों को सुन रही है और उन्हें सराह रही है। इस तरह उनका गायन यह साबित करता है कि सच्ची कला समय की सीमाओं से परे होती है और पीढ़ियों तक लोगों के दिलों में जीवित रहती है।

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