इंटरसेक्शनलजेंडर कैसे जेंडर-आधारित हिंसा के खिलाफ़ रिपोर्ट करने में सहायक है डिजिटल साक्षरता 

कैसे जेंडर-आधारित हिंसा के खिलाफ़ रिपोर्ट करने में सहायक है डिजिटल साक्षरता 

यूनेस्को के अनुसार, डिजिटल साक्षरता लोगों को तकनीक का सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग करना सिखाती है, जिससे वे समाज में बेहतर तरीके से भाग ले सकें। हालांकि, हकीकत यह है कि डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण दुनिया भर में डिजिटल तकनीक तक पहुंच और उसके उपयोग में बड़ा जेंडर गैप मौजूद है।

साक्षरता इंसान को अपने अधिकारों के प्रति जागरूक बनाती है और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत देती है। डिजिटल युग में महिलाओं के लिए डिजिटल साक्षरता भी उतनी ही जरूरी है, क्योंकि यह उन्हें ऑनलाइन दुनिया के अवसरों और खतरों को समझने में मदद करती है। आज महिलाएं डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए अपनी पहचान बना रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। लेकिन यह स्पेस पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। ट्रोलिंग, साइबर स्टॉकिंग, फर्जी प्रोफाइल, बिना अनुमति फोटो शेयर करना और डीपफेक जैसी ऑनलाइन हिंसा तेजी से बढ़ रही संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार यह सिर्फ ऑनलाइन समस्या नहीं, बल्कि मानवाधिकार का मुद्दा है।

दुनिया में हर तीन में से एक महिला हिंसा का सामना करती है, और डिजिटल स्पेस में यह खतरा और बढ़ जाता है। भारत में भी स्थिति चिंताजनक है। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं, खासकर बिना अनुमति निजी तस्वीरें साझा करने के मामले। नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, कोविड के बाद ऐसे मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है। इनमें ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग, बदनाम करना, तस्वीरों से छेड़छाड़, अभद्र संदेश भेजना और फर्जी प्रोफाइल बनाना जैसी घटनाएं शामिल हैं। इसलिए यह जरूरी है कि महिलाओं को डिजिटल रूप से साक्षर बनाया जाए, ताकि वे न सिर्फ इन खतरों को पहचान सकें बल्कि अपने अधिकारों की रक्षा भी कर सकें।

नैशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के मुताबिक, कोविड के बाद ऐसे मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है। इनमें ऑनलाइन ब्लैकमेलिंग, बदनाम करना, तस्वीरों से छेड़छाड़, अभद्र संदेश भेजना और फर्जी प्रोफाइल बनाना जैसी घटनाएं शामिल हैं।

महिलाओं के खिलाफ ऑनलाइन जेंडर आधारित हिंसा सिर्फ इंटरनेट तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह उनकी गरिमा, आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है। महिलाएं पहले से ही घर और बाहर कई तरह की हिंसा का सामना करती हैं, और अब डिजिटल स्पेस ने इस हिंसा के दायरे को और बढ़ा दिया है। ऐसे में डिजिटल साक्षरता महिलाओं के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह काम कर सकती है। एक अध्ययन के अनुसार, डिजिटल साक्षरता महिलाओं को ऑनलाइन हिंसा की रिपोर्ट करने के लिए प्रेरित करती है और उन्हें डिजिटल दुनिया में ज्यादा सशक्त बनाती है।

क्या है डिजिटल साक्षरता?

डिजिटल साक्षरता का मतलब है डिजिटल तकनीक को समझना, जानना और सही तरीके से इस्तेमाल करना। इसमें इंटरनेट, सोशल मीडिया और मोबाइल जैसे साधनों का सुरक्षित, समझदारी से और प्रभावी उपयोग करना शामिल है। इसके साथ ही इसमें जानकारी को ढूंढना, समझना, परखना, बनाना और साझा करना भी आता है। डिजिटल साक्षरता से लोग ऑनलाइन अपनी पहचान बना सकते हैं और सुरक्षित तरीके से डिजिटल दुनिया में भाग ले सकते हैं। आज के समय में यह सिर्फ एक कौशल नहीं, बल्कि सामाजिक भागीदारी, रोजगार के अवसर और अपने अधिकारों तक पहुंच का एक जरूरी माध्यम बन गया है।

यूनेस्को के अनुसार, डिजिटल साक्षरता लोगों को तकनीक का सुरक्षित और जिम्मेदार उपयोग करना सिखाती है, जिससे वे समाज में बेहतर तरीके से भाग ले सकें। हालांकि, हकीकत यह है कि डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण दुनिया भर में डिजिटल तकनीक तक पहुंच और उसके उपयोग में बड़ा जेंडर गैप मौजूद है। महिलाओं के लिए डिजिटल साक्षरता बहुत जरूरी है, क्योंकि इससे वे सशक्त बनती हैं और ऑनलाइन हिंसा जैसी समस्याओं से निपट सकती हैं। लेकिन सभी महिलाओं तक डिजिटल तकनीक की पहुंच समान नहीं है। सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत बाधाएं उनकी डिजिटल भागीदारी को सीमित कर देती हैं।

जब मैंने इंस्टाग्राम इस्तेमाल करना शुरू किया, तो मुझे कई परेशान करने वाले मैसेज मिले। शुरुआत में मुझे समझ नहीं आया कि क्या करें, लेकिन जैसे-जैसे मेरी डिजिटल समझ बढ़ी, मैंने  चुप रहने के बजाय उस व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से सामने लाने का फैसला किया।

महिलाओं को डिजिटल साक्षरता हासिल करने में चुनौतियां

डिजिटल साक्षरता महिलाओं को सशक्त बनाने, डिजिटल जेंडर गैप कम करने और ऑनलाइन जेंडर आधारित हिंसा से निपटने के लिए बहुत जरूरी है, लेकिन सभी महिलाओं तक इसकी पहुंच समान नहीं है। सामाजिक, आर्थिक और संस्थागत चुनौतियां उनकी डिजिटल भागीदारी को सीमित करती हैं, जिससे डिजिटल डिवाइड बढ़ता है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 70 फीसद आबादी तक डिजिटल सेवाओं की पहुंच सीमित या नहीं के बराबर है, और महिलाओं के मामले में यह स्थिति और भी कमजोर है।

जीएसएमए के 2021 सर्वे के मुताबिक, भारत में महिलाओं के मोबाइल इंटरनेट इस्तेमाल करने की संभावना पुरुषों से 41 फीसद कम है। डिजिटल पहुंच और साक्षरता में आर्थिक असमानता भी एक बड़ी बाधा है। कम आय वर्ग की महिलाओं के लिए स्मार्टफोन और इंटरनेट तक नियमित पहुंच बनाना मुश्किल होता है। कई महिलाएं परिवार के एक ही फोन पर निर्भर रहती हैं, जिससे उनका डिजिटल उपयोग सीमित रह जाता है। डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं के पास मोबाइल फोन का स्वामित्व पुरुषों की तुलना में काफी कम है, और अक्सर फोन घर के पुरुष के पास होता है।

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की लगभग 70 फीसद आबादी तक डिजिटल सेवाओं की पहुंच सीमित या नहीं के बराबर है, और महिलाओं के मामले में यह स्थिति और भी कमजोर है।

संस्थागत समस्याएं जैसे डिजिटल शिक्षा और प्रशिक्षण तक सीमित पहुंच, तकनीकी शिक्षा में कम भागीदारी और ग्रामीण क्षेत्रों में कमजोर डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर महिलाओं को डिजिटली साक्षर होने में बाधा का कारण बनती है। यूनेस्को के अनुसार, दुनिया में लगभग 763 मिलियन लोग बुनियादी साक्षरता से वंचित हैं, जिनमें दो-तिहाई महिलाएं हैं, जिससे डिजिटल साक्षरता हासिल करना और कठिन हो जाता है। वहीं पितृसत्तात्मक सोच जैसे लड़कियों को फोन न देना और उनके डिजिटल उपयोग पर नियंत्रण जैसी धारणाएं उन्हें पीछे रखती हैं। यूनिसेफ के अनुसार, सामाजिक मानदंड और जेंडर भेदभाव डिजिटल जेंडर गैप को और बढ़ाते हैं। इन सभी कारणों से कई महिलाओं को डिजिटल प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन सुरक्षा और शिकायत प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती। नतीजतन, वे रोजाना ऑनलाइन जेंडर आधारित हिंसा का सामना करती हैं, लेकिन डिजिटल साक्षरता की कमी के कारण उसके खिलाफ आवाज उठाने में खुद को असमर्थ पाती हैं।

लैंगिक हिंसा के खिलाफ लड़ने के डिजिटल साक्षरता की जरूरत

डिजिटल युग में जेंडर आधारित हिंसा के रूप तेजी से बदल रहे हैं। अब यह हिंसा सिर्फ घर या सार्वजनिक जगहों तक सीमित नहीं रही, बल्कि सोशल मीडिया, मैसेजिंग ऐप्स और अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी फैल गई है। भारत और दुनिया भर के शोध बताते हैं कि ऑनलाइन जेंडर आधारित हिंसा लगातार बढ़ रही है और इसका असर महिलाओं पर ज्यादा पड़ता है। द इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट के एक सर्वे के अनुसार, दुनिया भर में 85 फीसद महिलाएं किसी न किसी रूप में ऑनलाइन हिंसा का सामना कर चुकी हैं। वहीं भारत में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, कोविड के बाद महिलाओं के खिलाफ साइबर अपराध के मामले तेजी से बढ़े हैं। इन अपराधों में ब्लैकमेलिंग, बदनाम करना, फोटो के साथ मॉर्फ करना, अभद्र मैसेज भेजना और फर्जी प्रोफाइल बनाना शामिल है। इसके कारण कई महिलाएं ऑनलाइन अपनी भागीदारी कम कर देती हैं, जिससे उनकी अभिव्यक्ति और सार्वजनिक जीवन में हिस्सेदारी भी प्रभावित होती है।

यूनेस्को के अनुसार, दुनिया में लगभग 763 मिलियन लोग बुनियादी साक्षरता से वंचित हैं, जिनमें दो-तिहाई महिलाएं हैं, जिससे डिजिटल साक्षरता हासिल करना और कठिन हो जाता है। वहीं पितृसत्तात्मक सोच जैसे लड़कियों को फोन न देना और उनके डिजिटल उपयोग पर नियंत्रण जैसी धारणाएं उन्हें पीछे रखती हैं।

संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के अनुसार, ऑनलाइन हिंसा महिलाओं और लड़कियों के लिए बदनामी से जुड़ जाती है। इसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है और वे ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों जगह खुद को अकेला महसूस करने लगती हैं। इसका प्रभाव उनके काम, पढ़ाई और नेतृत्व की भूमिकाओं पर भी पड़ता है। हालांकि, एक बड़ी समस्या यह है कि इतनी हिंसा के बावजूद इसकी रिपोर्टिंग बहुत कम होती है। इसका मुख्य कारण महिलाओं में डिजिटल साक्षरता की कमी है। परिवीएट सोशल साइंसेज जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, कई महिलाएं ऑनलाइन हिंसा की शिकायत इसलिए दर्ज नहीं करतीं क्योंकि उन्हें रिपोर्ट करने की प्रक्रिया की जानकारी नहीं होती, कानून जटिल लगता है, और समाज के डर और शर्मिंदगी का दबाव होता है। इससे साफ है कि समस्या सिर्फ हिंसा की नहीं, बल्कि ‘रिपोर्टिंग गैप’ की भी है।

यह अध्ययन यह भी बताता है कि डिजिटल साक्षरता इस समस्या से निपटने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। डिजिटल रूप से साक्षर महिलाएं ट्रोलिंग, साइबर स्टॉकिंग और यौन उत्पीड़न जैसी हिंसा को पहचान पाती हैं और उसे सामान्य मानने की बजाय उसके खिलाफ खड़ी होती हैं। वे स्क्रीनशॉट जैसे डिजिटल सबूत सुरक्षित रखना और शिकायत दर्ज करना भी सीखती हैं। इसका एक उदाहरण दिल्ली की 25 वर्षीय श्वेता सिन्हा का अनुभव है। वह बताती हैं, “जब मैंने इंस्टाग्राम इस्तेमाल करना शुरू किया, तो मुझे कई परेशान करने वाले मैसेज मिले। शुरुआत में मुझे समझ नहीं आया कि क्या करें, लेकिन जैसे-जैसे मेरी डिजिटल समझ बढ़ी, मैंने  चुप रहने के बजाय उस व्यक्ति को सार्वजनिक रूप से सामने लाने का फैसला किया। डिजिटल साक्षरता ने मुझे यह समझ और आत्मविश्वास दिया कि यह बदनामी की बात नहीं, बल्कि आवाज उठाने का मुद्दा है।”

ऑनलाइन हिंसा की शिकायत दर्ज करने की जागरूकता

भारत में ऑनलाइन हिंसा की शिकायत दर्ज करने के लिए सरकार ने राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल जैसी सुविधा दी है। बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल हिंसा से निपटने के लिए भारतीय कानून में कई प्रावधान मौजूद हैं। सबसे पहले, किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यूज़र संदिग्ध या आपत्तिजनक अकाउंट को ब्लॉक और रिपोर्ट कर सकता है। इसके अलावा, इस तरह की घटनाएं साइबर क्राइम के दायरे में आती हैं, जिन्हें राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज कराया जा सकता है। डिजिटल रूप से साक्षर महिलाएं इन प्रक्रियाओं को बेहतर समझती हैं और उनका उपयोग करने में सक्षम होती हैं। इस संदर्भ में दिल्ली की 26 वर्षीय उन्नति करण बताती हैं, “मेरी डिजिटल समझ ने मुझे ऑनलाइन अनुचित व्यवहार को पहचानने और बिना हिचकिचाहट के कार्रवाई करने का आत्मविश्वास दिया। रिपोर्टिंग टूल्स, कानूनी अधिकारों की जानकारी, और प्लेटफॉर्म पर मौजूद ब्लॉक और रिपोर्ट जैसे फीचर्स की समझ होने से ऑनलाइन उत्पीड़न की शिकायत करना आसान हो जाता है।”

इसके अलावा, साक्षरता महिलाओं को ऑनलाइन समुदायों, सहायता समूहों और नेटवर्क से भी जोड़ती है। इससे उनके भीतर अकेलेपन की भावना कम होती है और उन्हें सामूहिक समर्थन मिलता है। यह उनके आत्मविश्वास और निर्णय लेने की क्षमता को मजबूत करता है, जिससे वे चुप रहने के बजाय कार्रवाई करने का फैसला लेती हैं। इस तरह, डिजिटल साक्षरता सिर्फ व्यक्तिगत सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक बदलाव का भी माध्यम बनती है। जब ज्यादा महिलाएं शिकायत दर्ज करती हैं, तो बेहतर डेटा सामने आता है, जिससे बेहतर नीतियां बनती हैं और जवाबदेही तय होती है। इसलिए, बढ़ती ऑनलाइन जेंडर आधारित हिंसा के समय में डिजिटल साक्षरता अब विकल्प नहीं, बल्कि एक जरूरी आवश्यकता है, जो महिलाओं को हिंसा पहचानने, उसके खिलाफ आवाज उठाने और उसे प्रभावी ढंग से रिपोर्ट करने की ताकत देती है।

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