नारीवाद मर्दानगी के पुराने ढांचे से बाहर क्या हो सकता है नया नजरिया और असली ‘मर्द’?

मर्दानगी के पुराने ढांचे से बाहर क्या हो सकता है नया नजरिया और असली ‘मर्द’?

पितृसत्ता सिर्फ सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि असमानता और नियंत्रण की संरचना है। यह पुरुषों को एक खास रूप में बांधती है और ज़हरीली मर्दानगी को जन्म देती है, जो हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देती है।

हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जिसकी बुनियाद पितृसत्तात्मक सोच पर टिकी है। यहां पुरुषों के लिए कुछ तय ढांचे बना दिए गए हैं। मजबूत रहो, कमजोरी मत दिखाओ, रोओ मत, दर्द जाहिर मत करो, घर के कामों से दूर रहो और परिवार की आर्थिक ज़िम्मेदारी अकेले उठाओ। इन अपेक्षाओं को निभाना ही ‘अच्छा पुरुष’ होने की पहली शर्त मान ली जाती है। जो इन मानकों पर खरा उतरता है, उसकी सराहना होती है, और जो इससे अलग जाता है, उसे सवालों का सामना करना पड़ता है। लेकिन, क्या सच में यही अच्छाई है? क्या संवेदनशील होना, बराबरी की बात करना, अपनी भावनाएं व्यक्त करना या घर की ज़िम्मेदारियां साझा करना किसी पुरुष को कमतर बनाता है?

या फिर अच्छा पुरुष की यह परिभाषा सिर्फ सामाजिक दबावों का नतीजा है? सदियों से आइडडियल पुरुष की परिभाषा को गढ़ने में भारतीय सिनेमा ने भी एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। हालांकि, आज हम इससे इतर सिनेमा भी देखते हैं। लेकिन यह जरूरी है कि हम ये समझने की कोशिश करें कि समाज किन मानकों पर पुरुषों को अच्छा या बुरा मानता है, पुरुष खुद इन मानकों को कैसे देखते हैं, और इस छवि में ढलने की प्रक्रिया में उन्हें किस तरह की भावनात्मक, मानसिक और व्यक्तिगत कीमत चुकानी पड़ती है। साथ ही, क्या हमें ‘अच्छे पुरुष’ की परिभाषा को नए नजरिए से देखने की कोशिश करनी चाहिए।

पितृसत्ता से पुरुषों को सिर्फ लाभ नहीं मिलता

हम बचपन से जिस समाज में बड़े होते हैं, वहीं से जीने के तौर-तरीके सीखते हैं। यह समाज पितृसत्तात्मक ढांचे पर खड़ा है, जहां पुरुष होना अपने आप में कई अदृश्य सुविधाएं लेकर आता है। जैसे देर रात बाहर रहने की स्वतंत्रता, करियर को प्राथमिकता देने की सामाजिक स्वीकृति, और घरेलू जिम्मेदारियों से अपेक्षाकृत छूट। ये ऐसे फायदे हैं, जो अक्सर बिना मांगे ही मिल जाते हैं। लेकिन, इस व्यवस्था को केवल महिलाओं के लिए अन्यायपूर्ण कहना अधूरा होगा। यह पुरुषों को भी अपने तरीके से सीमित करती है।

भावनाओं को दबाकर रखने की मजबूरी, हर हाल में कमाने की जिम्मेदारी, और हमेशा मजबूत दिखने का दबाव, ये सब पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालते हैं। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की साल 2023 की रिपोर्ट के अनुसार, देश में लगभग 1.71 लाख लोगों की आत्महत्या से मौत हुई, जिनमें करीब 72 प्रतिशत यानी लगभग 1.23 लाख पुरुष थे। ये आंकड़े बताते हैं कि मानसिक तनाव, पारिवारिक और आर्थिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं किस तरह पुरुषों पर भारी पड़ती हैं। यह भी स्पष्ट होता है कि हमेशा मजबूत बने रहने की सामाजिक अपेक्षा कई बार कितनी गंभीर कीमत वसूलती है।

हमारी सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक है। इसलिए, इस समाज में पले-बढ़े कोई भी पुरुष पूरी तरह से इस ढांचे से अलग नहीं रह सकता। कई फायदे उसे अपने आप मिल जाते हैं, चाहे वह उन्हें स्वीकार करे या नहीं। लेकिन, समझदार और जागरूक पुरुष इन फायदों को बिना सोचे-समझे स्वीकार नहीं करते।

पुरुषों का मानसिक स्वास्थ्य और पितृसत्ता

यह समझना ज़रूरी है कि पुरुषों का अकेलापन एक वास्तविक समस्या है, जो उस सामाजिक ढांचे से पैदा होती है जहां उनसे भावनाएं छिपाने, कमजोर न दिखने और हर हाल में मजबूत बने रहने की अपेक्षा की जाती है। इसलिए, समाधान पितृसत्ता को और मजबूत करने में नहीं, बल्कि उसे चुनौती देने में है। इस विषय पर जामिया मिल्लिया इस्लामिया के शोधार्थी ज़िशान चिश्ती कहते हैं, “हमारी सामाजिक व्यवस्था पितृसत्तात्मक है। इसलिए, इस समाज में पले-बढ़े कोई भी पुरुष पूरी तरह से इस ढांचे से अलग नहीं रह सकता। कई फायदे उसे अपने आप मिल जाते हैं, चाहे वह उन्हें स्वीकार करे या नहीं। लेकिन, समझदार और जागरूक पुरुष इन फायदों को बिना सोचे-समझे स्वीकार नहीं करते। वे सवाल उठाते हैं कि महिलाओं के साथ बराबरी क्यों नहीं है, और गलत परंपराओं और सोच का विरोध करते हुए समाज में समानता लाने की कोशिश करते हैं। पितृसत्ता से अलग होना केवल निष्क्रिय दूरी बनाना नहीं है, बल्कि इसका मतलब सक्रिय हस्तक्षेप करना और असमानता के ढांचे को चुनौती देना भी है।” वह आगे जोड़ते हैं कि यह केवल व्यक्तिगत नैतिकता का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी का भी विषय है। जब पुरुष अपने विशेषाधिकारों को पहचानते हैं और उनके खिलाफ बोलते हैं, तभी बराबरी की प्रक्रिया वास्तविक और टिकाऊ बनती है।

पुरुषों के विशेषाधिकार को छोड़ने की कीमत

हमारे समाज ने पुरुषों को कई विशेषाधिकार दिए हैं। जैसे घर के कामों से छूट, देर रात तक बाहर रहने की आज़ादी या और शादी के समय लड़की वालों से प्यार और रिश्ते के नाम पर पैसे या सामान लेना। ये सुविधाएं महिलाओं के हिस्से में अक्सर नहीं आतीं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे घर संभालें, देखभाल करें, रिश्तों को निभाएं और बिना सवाल उठाए जिम्मेदारियां उठाएं। यही असमान श्रम-विभाजन पितृसत्ता की जड़ों को मजबूत करता है। इस विषय पर बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के पोस्ट-डॉक्टोरल फेलो और कवि-आलोचक डॉ. विहाग वैभव कहते हैं, “सभ्य समाज में बदलाव हमेशा अल्पसंख्यक लोगों से शुरू होता है। ऐसे पुरुष जो लैंगिक असमानता को चुनौती देते हैं, उन्हें कई विशेषाधिकार छोड़ने पड़ते हैं और ‘स्त्रैण’ होना सीखना पड़ता है। चूंकि समाज में इसे कमतर या हास्यास्पद माना जाता है, उन्हें मर्दवादी संस्कृति में अपमान और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। फिर भी इस रास्ते से डरना नहीं चाहिए। यही सही रास्ता और बदलाव लाता है।”

सभ्य समाज में बदलाव हमेशा अल्पसंख्यक लोगों से शुरू होता है। ऐसे पुरुष जो लैंगिक असमानता को चुनौती देते हैं, उन्हें कई विशेषाधिकार छोड़ने पड़ते हैं और ‘स्त्रैण’ होना सीखना पड़ता है। चूंकि समाज में इसे कमतर या हास्यास्पद माना जाता है, उन्हें मर्दवादी संस्कृति में अपमान और कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। फिर भी इस रास्ते से डरना नहीं चाहिए। यही सही रास्ता और बदलाव लाता है।

बराबरी का रास्ता अपनाना केवल एक विचार चुनने की बात नहीं है। यह अक्सर सामाजिक विरोध, तानों और रिश्तों में तनाव का कारण बन सकता है। समानता का समर्थन करने वाला व्यक्ति परंपराओं और रूढ़िवादी सोच से टकराने का जोखिम उठाता है। दहेज निषेध कानून दहेज को अपराध घोषित करता है, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की साल 2022 रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 6589 दहेज-संबंधित मौतें दर्ज हुईं। यानी औसतन हर दिन 18 से अधिक दहेज-सम्बंधित मौतें हो रही हैं, जो दिखाती हैं कि यह प्रथा आज भी गंभीर समस्या बनी हुई है। बिहार के मोतिहारी के सत्यम का अनुभव इस दबाव को स्पष्ट करता है। वे बताते हैं, “मैंने अपनी शादी में दहेज लेने से मना कर दिया। इसके बाद रिश्तेदारों और आस-पास के लोगों के ताने सुनने पड़े कि क्या तुम्हें कोई सुंदर लड़की नहीं मिल रही थी? क्या लड़के में कोई दिक्कत है?”

भावनाओं और दोस्ती का टैबू

आज भी कोई लड़का अपनी महिला दोस्त के साथ भावनात्मक रूप से जुड़ता है या समय बिताता है, तो इसे शक की नजर से देखा जाता है। पितृसत्तात्मक सोच मानती है कि अगर कोई लड़का रोता है या भावनाएं व्यक्त करता है, तो उसे कमज़ोर समझा जाता है। राज सिंह राठौड़ बताते हैं कि इसका कारण जातिवाद और स्त्रियों से जुड़ी सतीत्व, पतिव्रता और वर्जिनिटी जैसी सामाजिक अपेक्षाएं हैं। पुरुषों पर दबाव होता है कि वे आदर्श छवि बनाए रखें और सामाजिक नियमों का पालन करें। समाज पुरुषों से अपेक्षा करता है कि वे केवल तभी मदद करें जब उन्हें उसका लाभ मिले। अगर कोई पुरुष किसी महिला की मदद करता है या मुश्किल समय में खड़ा रहता है, तो उसे शक की नजर से देखा जाता है। प्रदीप्त प्रीत बताते हैं, “ऐसे पुरुषों को अक्सर कमजोर समझा जाता है। समाज पहले से ही ताकतवर और डोमिनेटिंग पुरुषों को पसंद करता है। डोमिनेशन वाले रिश्तों में धीरे-धीरे व्यक्ति अपनी पहचान खो देता है और आत्म‑विश्वास कमजोर पड़ता है।”

मैंने अपनी शादी में दहेज लेने से मना कर दिया। इसके बाद रिश्तेदारों और आस-पास के लोगों के ताने सुनने पड़े कि क्या तुम्हें कोई सुंदर लड़की नहीं मिल रही थी? क्या लड़के में कोई दिक्कत है?

लैंगिक समानता को बढ़ावा देने की व्यक्तिगत कीमत

हममें से बहुत कम लोग ऐसे हैं जिन्हें घर के काम करना बुरा लगे। नैतिक रूप से सबको घर के काम में बराबर हिस्सा लेना चाहिए। लेकिन जब कोई पुरुष घर के कामों में मदद करता है, तो समाज उसका मज़ाक बनाता है और आलोचना करता है। उसे अक्सर कमज़ोर कहकर चिढ़ाया है। डॉ. गोरखनाथ तिवारी, सिक्किम विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर बताते हैं, “अब जब अधिकांश परिवार एकल हैं, तो पुरुषों को पत्नी के काम में हाथ बंटाना पड़ता है। बेटियों को ही काम करवाना और बेटों को दूर रखना सही नहीं है। लड़के और लड़कियां दोनों जब घर और बाहर काम करेंगे, तभी एक शिक्षित और समृद्ध समाज बन सकता है।” राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की टाइम यूस सर्वे 2019 के अनुसार, महिलाएं प्रतिदिन औसतन 299 मिनट घरेलू काम में लगाती हैं, जबकि पुरुष केवल 97 मिनट देते हैं। यानी घरेलू श्रम में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से लगभग तीन गुना अधिक है।

पत्रकार नासिरुद्दीन कहते हैं, “पितृसत्ता सिर्फ सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि असमानता और नियंत्रण की संरचना है। यह पुरुषों को एक खास रूप में बांधती है और ज़हरीली मर्दानगी को जन्म देती है, जो हिंसा और भेदभाव को बढ़ावा देती है। असली बराबरी और न्याय के लिए मर्दानगी का नया, संवेदनशील और समानता आधारित रूप अपनाना होगा। पितृसत्ता के बाहर की दुनिया वह है जहां भावनात्मक समझ, समानता और न्याय को प्राथमिकता दी जाती है। यह महिलाओं के लिए ही नहीं, पुरुषों के मानसिक स्वास्थ्य, रिश्तों की गुणवत्ता और सामाजिक सहयोग के लिए भी लाभकारी है।” अच्छा पुरुष की पारंपरिक परिभाषा समाज के बनाया गया ढांचा है, जो पुरुषों को ताकत और भावनात्मक कठोरता के सांचे में ढालता है। इसे निभाने की कीमत उन्हें अपनी संवेदनाएं, मानसिक स्वास्थ्य और स्वतंत्रता चुकाकर देनी पड़ती है। पितृसत्ता कुछ विशेषाधिकार देती है, लेकिन बदले में चुप्पी, आर्थिक दबाव और सामाजिक प्रदर्शन की अपेक्षा रखती है। जो पुरुष समानता और साझेदारी चुनते हैं, उन्हें प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है। वास्तव में अच्छा पुरुष वह है जो समाज के पुराने ढाँचों को चुनौती देकर समानता और मानवीय मूल्यों को अपनाए।

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