इंटरसेक्शनलग्रामीण भारत सुंदरबन में जलवायु संकट और बाल विवाह का खतरनाक संबंध

सुंदरबन में जलवायु संकट और बाल विवाह का खतरनाक संबंध

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2019–21 में भारत में सबसे ज्यादा बाल विवाह पश्चिम बंगाल में हुए। चक्रवात प्रभावित इलाकों, खासकर सुंदरबन में, यह दर और भी ज्यादा है।

पश्चिम बंगाल के उत्तर और दक्षिण 24-परगना में फैले सुंदरबन के डेल्टा क्षेत्र में जीवन पहले से ही कठिन है। हर साल समुद्र जमीन काटता है और तटबंध टूटते हैं, जिससे लोग लगातार जोखिम में जीते हैं। चक्रवात के बाद स्थिति और खराब हो जाती है—सरकारी मदद के बावजूद गरीबी बढ़ती जाती है। ऐसे हालात में कई परिवार मजबूरी में नाबालिग लड़कियों की शादी कर देते हैं। यह समस्या सिर्फ गरीबी नहीं, बल्कि जलवायु संकट, पितृसत्ता और सामाजिक असमानताओं से जुड़ी है, जिसका सबसे ज्यादा असर गरीब और हाशिए की लड़कियों पर पड़ता है। चक्रवात सिर्फ घर नहीं उजाड़ते, वे लड़कियों का बचपन भी छीन लेते हैं। साल 2025 में 13 साल की रेशमा, 14 साल की पायल और 15 साल की सुल्ताना की कम उम्र में शादी या पढ़ाई छूटने की घटनाएं इसी सच्चाई को दिखाती हैं। हर आपदा के बाद एक जैसा पैटर्न दिखता है। पहले पढ़ाई छूटती है, फिर कम उम्र में शादी हो जाती है। गरीबी, कर्ज़ और नुकसान के दबाव में परिवार ऐसे फैसले लेने को मजबूर हो जाते हैं।

क्या कहते हैं आंकड़ें

सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2019–21 में भारत में सबसे ज्यादा बाल विवाह पश्चिम बंगाल में हुए। चक्रवात प्रभावित इलाकों, खासकर सुंदरबन में, यह दर और भी ज्यादा है। यूएनएफपीए के अनुसार पिछले डेढ़ दशकों में बाल विवाह में कमी आई है; हालांकि पश्चिम बंगाल में इसका प्रचलन अभी भी काफ़ी ज़्यादा है, जहां 20-24 साल आयु वर्ग की लगभग 42 फीसद महिलाओं की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले ही हो जाती है, जो राष्ट्रीय औसत 23.3 फीसद से काफी अधिक है। साल 2019 से 2021 के बीच तीन सालों में देश में 13.13 लाख से ज़्यादा लड़कियां और महिलाएं लापता हो गईं; इनमें सबसे ज़्यादा संख्या मध्य प्रदेश की थी, जहां करीब दो लाख लोग लापता हुए, और उसके बाद पश्चिम बंगाल का नंबर आता है। सुंदरबन के लिए अलग आंकड़े नहीं हैं। लेकिन, इस क्षेत्र के जिलों में तस्करी से जुड़े 32 फीसद मामले सामने आते हैं, जबकि यहां राज्य की 20 फीसद से भी कम आबादी रहती है।

यूएनएफपीए के अनुसार पिछले डेढ़ दशकों में बाल विवाह में कमी आई है; हालांकि पश्चिम बंगाल में इसका प्रचलन अभी भी काफ़ी ज़्यादा है, जहां 20-24 साल आयु वर्ग की लगभग 42 फीसद महिलाओं की शादी 18 वर्ष की आयु से पहले ही हो जाती है, जो राष्ट्रीय औसत 23.3 फीसद से काफी अधिक है।

संरक्षणवादी अनिल मिस्त्री के अनुसार, “अक्सर 15–17 साल की उम्र में ही लड़कियों की शादी कर दी जाती है।” साल 2023 में प्रशासन ने 1,500 से ज्यादा बाल विवाह रोकने का दावा किया, लेकिन कई शादियां आज भी बिना रिकॉर्ड के होती हैं। दक्षिण 24 परगना के बड़ा मोल्लाखाली गांव की 14 साल की अंजू बागदी इसका उदाहरण है। गरीबी के कारण उसकी माँ को कम उम्र में ही उसकी शादी करनी पड़ी। यह दिखाता है कि हाशिए पर रहने वाले परिवार अक्सर मजबूरी में बेटियों की जल्दी शादी को एक आर्थिक समाधान मान लेते हैं।

लोगों की खामोशी की मजबूरी

सबसे बड़ी समस्या यह है कि जिन लड़कियों की कम उम्र में शादी हो चुकी है, उनके परिवार अक्सर इस बारे में बात करने से मना कर देते हैं। कई स्वयंसेवी संस्थाएं भी इस मुद्दे पर साफ आंकड़े साझा नहीं करतीं या यह कह देती हैं कि सुंदरबन में अब बाल विवाह खत्म हो चुका है। सरकारी रिकॉर्ड और कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि आज भी कई शादियां चुपचाप और बिना किसी रिकॉर्ड के होती हैं। आंकड़ों की कमी के कारण यह समझना मुश्किल हो जाता है कि बाल विवाह कितने बड़े स्तर पर हो रहा है और कौन-कौन से इलाके इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।

एक्शन एड इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण 24 परगना में बाल विवाह और मानव तस्करी के बीच गहरा संबंध है। कई बार शादी के बाद लड़कियां अपने परिवार से पूरी तरह कट जाती हैं। पिछले दस सालों में 55 प्रतिशत से ज्यादा प्रभावित परिवारों ने मजबूरी में नाबालिग बेटियों की शादी कर दी। बाल विवाह का संबंध शिक्षा और आर्थिक स्थिति से भी जुड़ा है।

जाति, वर्ग और जेंडर और बाल विवाह का संकट

एंथ्रोपोलॉजिस्ट नरेश कुमार वैद के अनुसार, यहां जाति, वर्ग और जेंडर की असमानताएं इतनी गहरी हैं कि हाशिए पर रहने वाली लड़कियां न सिर्फ समाज में, बल्कि आंकड़ों में भी नजर नहीं आतीं। सुंदरबन में गरीबी और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं ने बाल विवाह को एक तरह से ‘जीवित रहने का तरीका’ बना दिया है। परिवारों के लिए बेटियां अक्सर आर्थिक बोझ की तरह देखी जाने लगती हैं। चक्रवातों ने खेती और मछली पकड़ने जैसे कामों को बहुत नुकसान पहुंचाया है, जिससे लोगों की आमदनी घट गई है। यह इलाका समुद्र से घिरा है और यहां मिट्टी के तटबंध बनाए जाते हैं, जो ज्वार के पानी को रोकते हैं। लेकिन, जब ये तटबंध टूटते हैं, तो पानी जमीन को नुकसान पहुंचाता है और लोगों की जिंदगी और मुश्किल हो जाती है।

गोसाबा के सुंदरबन फाउंडेशन के सचिव प्रसेनजीत मंडल बताते हैं कि तटबंध सिर्फ मिट्टी की दीवारें नहीं, बल्कि लोगों के जीवन और विनाश के बीच खड़ी एक सुरक्षा रेखा हैं। चक्रवात के दौरान खारा पानी खेतों में घुस जाता है, जिससे जमीन बंजर हो जाती है। इसका सीधा असर खेती और लोगों की रोज़ी-रोटी पर पड़ता है। एक्शन एड इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण 24 परगना में बाल विवाह और मानव तस्करी के बीच गहरा संबंध है। कई बार शादी के बाद लड़कियां अपने परिवार से पूरी तरह कट जाती हैं। पिछले दस सालों में 55 प्रतिशत से ज्यादा प्रभावित परिवारों ने मजबूरी में नाबालिग बेटियों की शादी कर दी। बाल विवाह का संबंध शिक्षा और आर्थिक स्थिति से भी जुड़ा है।

साल 2022 में 1,306 में से 100 बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी, जिनमें करीब 60 फीसद लड़कियां थीं। कक्षा 9 के बाद ड्रॉपआउट और बढ़ जाता है, और कई स्कूल अब जर्जर हो चुके हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।

पश्चिम बंगाल में बिना पढ़ाई वाली 58 फीसद लड़कियों की शादी 18 साल से पहले हो जाती है, जबकि उच्च शिक्षा पाने वाली लड़कियों में यह केवल 4 फीसद है। सबसे गरीब परिवारों में 56 फीसद लड़कियों की कम उम्र में शादी हो जाती है, जबकि अमीर परिवारों में यह आंकड़ा 13 फीसद है। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या और गंभीर है, जहां 48 फीसद बाल विवाह होते हैं, जबकि शहरों में यह 26 फीसद है। यह सिर्फ सामाजिक समस्या नहीं, बल्कि एक तरह की संरचनात्मक हिंसा है, जो समय के साथ और गहरी होती जा रही है। यूनिसेफ और एक्शन एड की रिपोर्ट के अनुसार, अनुसूचित जाति और जनजाति समुदायों में करीब 44 फीसद बाल विवाह होते हैं। सुंदरबन के कई इलाकों में इन समुदायों की आबादी भी ज्यादा है, जिससे यह समस्या और बढ़ जाती है।

कोविड महामारी के बाद के हालात

कोविड लॉकडाउन के बाद बाल विवाह के मामलों में तेजी आई। स्कूल बंद होने और मिड-डे मील रुकने से गरीब परिवारों पर बोझ बढ़ा, जिससे कई जगहों पर लड़कियों की कम उम्र में शादी कर दी गई। दक्षिण 24 परगना में साल 2019 के 68 मामले साल 2020 में बढ़कर 159 हो गए। सुंदरबन के कई गांवों में बाल विवाह आज भी चुपचाप घरों के भीतर होते हैं, जैसे 13 साल की रीना सरदार की शादी, जो चक्रवात के बाद तय कर दी गई। स्कूलों की खराब हालत भी इस समस्या को बढ़ाती है। साल 2022 में 1,306 में से 100 बच्चों ने पढ़ाई छोड़ी, जिनमें करीब 60 फीसद लड़कियां थीं। कक्षा 9 के बाद ड्रॉपआउट और बढ़ जाता है, और कई स्कूल अब जर्जर हो चुके हैं, जिससे बच्चों की पढ़ाई लगातार प्रभावित हो रही है।

डॉ. अनिमेष राय के अनुसार, चक्रवातों के बाद खेती और रोज़गार पर असर पड़ा है, जिससे स्कूलों में नामांकन घटा और बाल विवाह का खतरा बढ़ा है। वे कहते हैं, “जब आजीविका खत्म होती है, तो परिवार मजबूरी में कठिन फैसले लेते हैं।”

मौसुनी द्वीप और गोवर्धनपुर के स्कूल अब जर्जर हालत में हैं, पानी भरे कमरे और खाली दीवारें उनकी बदहाली दिखाते हैं। सागर के सामाजिक कार्यकर्ता साहेब दानी कहते हैं कि कई लड़कियों को अपना आखिरी स्कूल दिन तक याद नहीं रहता। डॉ. अनिमेष राय के अनुसार, चक्रवातों के बाद खेती और रोज़गार पर असर पड़ा है, जिससे स्कूलों में नामांकन घटा और बाल विवाह का खतरा बढ़ा है। वे कहते हैं, “जब आजीविका खत्म होती है, तो परिवार मजबूरी में कठिन फैसले लेते हैं।” हालांकि कन्याश्री जैसी योजनाएं मददगार हैं, लेकिन गरीबी, सामाजिक सोच और कमजोर शिक्षा व्यवस्था के कारण बाल विवाह की समस्या अब भी बनी हुई है।

सागर के सामाजिक कार्यकर्ता साहेब दानी कहते हैं कि कई लड़कियों को अपना आखिरी स्कूल दिन तक याद नहीं रहता। डॉ. अनिमेष राय के अनुसार, चक्रवातों के बाद खेती और रोज़गार पर असर पड़ा है, जिससे स्कूलों में नामांकन घटा और बाल विवाह का खतरा बढ़ा है।

क्या हो सकता है रास्ता

कुछ अध्ययनों में यह भी सामने आया है कि कई बार इन योजनाओं का पैसा पढ़ाई के बजाय शादी में खर्च हो जाता है। इसलिए, सिर्फ आर्थिक मदद से समस्या हल नहीं होती, बल्कि जागरूकता और सख्त निगरानी भी जरूरी है। समाधान के तौर पर नामखाना के शिक्षक सुभाष हालदार कहते हैं, “आपदा प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों के लिए सुरक्षित शिक्षा केंद्र बनाए जाने चाहिए।” सामाजिक कार्यकर्ता मालविका प्रामाणिक का मानना है, “योजनाओं का फायदा तभी मिलेगा जब उन्हें सही तरीके से गाँव-गाँव तक पहुंचाया जाए।” वहीं, झारखाली के बिश्वजीत सरकार कहते हैं, “हर आपदा के बाद एक विशेष टीम बननी चाहिए, जो बाल विवाह और तस्करी को तुरंत रोके।” रिप्रोडक्टिव हेल्थ पर काम कर रही शहनारा बेगम इस स्थिति को ‘तीन तरह का संकट’ बताती हैं—प्रकृति, गरीबी और लापरवाही। पर्यावरणविद अनिल मिस्त्री के अनुसार, “सुंदरबन में हर चक्रवात के बाद सिर्फ जमीन नहीं, बल्कि बच्चों का भविष्य भी टूटता है।”

इसलिए, जरूरी है कि आपदा प्रबंधन, शिक्षा और बच्चों की सुरक्षा को साथ मिलाकर काम किया जाए, ताकि कोई भी लड़की अपने बचपन की कीमत न चुकाए। सुंदरबन की कहानी सिर्फ जलवायु आपदाओं की नहीं, बल्कि उस चुप्पी की भी है जिसमें लड़कियों का बचपन खो जाता है। हर चक्रवात के बाद टूटते तटबंध सिर्फ जमीन नहीं बहाते, वे शिक्षा, सुरक्षा और भविष्य की नींव भी कमजोर कर देते हैं। जब तक गरीबी, सामाजिक सोच और कमजोर व्यवस्थाओं को साथ मिलकर नहीं बदला जाएगा, तब तक बाल विवाह जैसी समस्याएं खत्म नहीं होंगी। जरूरी है कि आपदा प्रबंधन, शिक्षा और बाल सुरक्षा को एक साथ जोड़कर काम किया जाए, ताकि हर लड़की को अपने बचपन और सपनों का हक मिल सके, न कि उन्हें संकट की कीमत के रूप में खोना पड़े।

About the author(s)

अमरेंद्र किशोर विकास पत्रकारिता का सुपरिचित चेहरा हैं। अंग्रेजी और हिंदी दोनों भाषाओं में लिखते हैं। देश के सुदूरवर्ती दुर्गम आदिवासी अंचलों में लंबे समय का प्रवास कर चुके है। ओडिशा की अनब्याही माताओं और सुंदरबन की बाघ विधवाओं की हकीकत पर लगातार लिख रहे हैं। अभी इनकी एक किताब ‘मजदूरों की मंडी कालाहाण्डी’ प्रकाशित हुई है। 

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