डियर पांच बेटियों के पापा…

0
623
डियर पांच बेटियों के पापा …
डियर पांच बेटियों के पापा …

रितिका

यहां पांच बेटियां लिखना इसलिए ज़रूरी लगा क्योंकि पांच बेटियों का होना ही आपको खास बनाता है। रश्मि, रितिका, गोदावरी, शिप्रा और कावेरी ये पांचों नाम आपने खुद रखे थे न| यहां मुझे चर्चा उन बातों की करनी ही नहीं है कि किन हालातों में आप पांच बेटियों के पिता बने| सच कहूं तो अब वे बातें गैर-ज़रूरी लगती हैं| हां एक बात जो मुझे आज भी सताती है, वो ये कि जब आपकी जुड़वां बेटियों शिप्रा और कावेरी का जन्म हुआ था तो किस तरह हमारे खानदान ने छाती पीट-पीटकर मातम बनाया था| किस तरह आजी ने कहा था – हमार लइका तो लुट गइलन|

खैर! आज आपके नाम का यह खत दूसरी बार लिख रही हूं| पहली बार क्लास वन में लिखा था जब अंग्रेज़ी वाली मैडम ने ‘लेटर टू योर फादर’ लिखने को कहा था| उस लेटर में मैंने बहुत सी ऐसी बातें नहीं लिखी थी जो आज लिखने जा रही हूं| घर, पड़ोसी, कलीग्स, रिश्तेदार सबने आपको हमेशा ताने दिए कि पांच बेटियों के पिता हो पैसे बचाओ| आपने उल्टा किया| वैसे मुझे पता है कि आपके पास सिर्फ सैलरी अकाउंट है| बचत के नाम पर 2-3 एलआईसी ले रखी है| सबने कहा सरकारी मास्टर हो सरकारी स्कूल में दाखिला करवाओ, आपने प्राइवेट में करवाया| सबने कहा बारहवीं तक पढ़ाकर रफा-दफा करो, आपने पीएचडी का पक्ष लिया| सबने कहा बाहर मत भेजो, आपने मुझे दिल्ली भेजा| सबने कहा कंट्रोल में रखो, आपने हमारी आज़ादी को चुना| ऐसे कई उदाहरण मेरे पास हैं| मुझे आज भी वह दिन याद है जब फूफा ने कहा था कि लड़की को दिल्ली मत भेजो| तब आप ही ने कहा था उसका रास्ता वह खुद चुनेगी|

और पढ़ें : मेरी कहानी – लड़की का मायना सिर्फ शादी ही नहीं

आपको लोगों से हमेशा सुनना पड़ा है – पांच बेटियों का बाप कहीं का| ये शब्द जैसे गाली बन गए| पांच बेटियों का पिता होना जैसे कोई अपराध हो गया है| आपने और मां ने हमेशा हमारे कारण लोगों की बातें सुनी हैं| क्यों सुनी, लोगों ने क्यों कहीं सिर्फ इसलिए न कि आपकी पांच बेटियां हैं|

जब हम छोटे थे तो मां ने ही हमें बड़ा किया क्योंकि आप तो भागलपुर में पोस्टेड थे| जब भी आप हर शनिवार पटना आते तो हम सब रातभर आपका इंतज़ार किया करते| मुझे ज़्यादा इंतज़ार वैसे आपके उस गोल डिब्बे का होता था जिसमें आप पेड़े भरकर लाते थे| हम सारी बहनें आपसे दूर भागती| आपके सामने तभी आते जब आप बुलाते| गर्मी की छुट्टियों में आप राज्यों के नाम और उनकी राजधानी याद करने का होमवर्क देकर जाते जिसे वापस शायद ही कभी आपने चेक किया हो| हमारे ऐडमिशन से लेकर पैरेंट्स-टीचर मीट में मम्मी ही जाती थी| आपका जाना कभी-कभार ही हो पाया| जब आप 2006 में भागलपुर से पटना ट्रांसफर लेकर आए तो लगा अब हमारे बीच दूरी कम होगी| लेकिन हमारे बीच बाप-बेटी के रिश्ते का वह डर हमेशा बना रहा| दीदी हमेशा से शांत स्वभाव की रही कभी आपसे कुछ कहती नहीं| मैं थोड़ी अलग थी तो कभी-कभी आपसे उलझ जाती| बाकी बहनें उम्र में इतनी छोटी हैं कि आज भी आपसे डरती हैं| आप अपने बैग से मुझे इंडिया टुडे और कादंबिनी जैसी पत्रिकाएं निकालकर देते| सच कहूं तो पढ़ने की आदत आपने ही लगवाई|

“राय जी के पास पइसा है कि लड़की का शादी करेंगे| एक्को लड़की उनकी ढंग की है कि शादी होगी| बड़की लड़की का हाइट कम है, दूसरकी तो बहुत टांय-टांय बोलती है| मास्टर साहब की लड़की सब अभी सब कुंवारी है न जी! बड़की का शादी किए नहीं अभी तक 5 ठो कहां से निपटाएंगे| घर-खेत सब बिक जाएगा शादी में देखिएगा|”

मैं और दीदी उम्र के उस पड़ाव में पहुंच चुके हैं जहां आपको ये सब आजकल सुनने को मिलने लगा है| आपने इन बातों पर कभी ध्यान नहीं दिया था क्योंकि आपको भी पता था ये सब तो हम पांचों बचपन से सुनते आए हैं| पर आजकल आप बदले-बदले नज़र आ रहे हैं| आप कह रहे हैं दीदी की एक तस्वीर खींच दूं लड़के वालों के लिए| यह वही इंसान बोल रहा है जिसने मेरी मां की तस्वीर तक नहीं मांगी थी क्योंकि उसे यह बाज़ारवाद लगता था| आज वही इंसान एक पिता की भूमिका में अपनी बेटी की तस्वीर देने के लिए राज़ी है| मेरी बहस आपसे इस तस्वीर को लेकर नहीं है| मेरी बहस है इस समाज की परिभाषा से जो आपने गढ़ी है पिछले एक साल में|

शादी नहीं करोगी तो कहां जाओगी, रहना इसी समाज में है न| आपने हमारी शादी को अपनी ज़िम्मेदारी समझ ली है| पापा, शादी सिर्फ एक ज़िम्मेदारी नहीं है इसमें दीदी का राज़ी होना सबसे पहले ज़रूरी है| हां, मुझे पता है आप उसकी मर्ज़ी के खिलाफ कभी कोई फैसला नहीं लेंगे| पर यहां आपको ध्यान दिलाना ज़रूरी है कि सिर्फ शादी ही नहीं उसकी तस्वीर लेने में भी आपको उसकी सहमति लेनी होगी| आप सामाजिक विज्ञान के एक बेहतरीन छात्र रहे हैं| आपसे मैंने कई चीज़े सीखी हैं लेकिन आज मुझे अफसोस हो रहा है कि आप कंसेंट के कॉन्सेप्ट को नहीं समझ पा रहे हैं| आज़ादी, बराबरी और आत्मनिर्भरता का हिमायती आज पितृसत्ता की उन्हीं लाइनों पर बात करता दिख रहा है जिनका विरोधी वह खुद था| एक छात्र जो इन चीज़ों को समझता था पिता बनते ही वह उनका समर्थन करता नज़र आने लगा है| बहस के दौरान मैं आपको सारी चीज़ें तोड़-तोड़कर नहीं समझा पाई उसके लिए माफी|

लड़के वालों का तस्वीर मांगना

पापा, यह आप भी जानते हैं कि लड़के वाले शादी से पहले तस्वीर क्यों मांगते हैं इसलिए यहां बताना ज़रूरी नहीं समझती| रश्मि की हाइट कम है, पइसा तो ज़्यादा मांग सकता है लड़का वाला| यह लाइन याद है आपको या भूल गए| आपके भाई ही कहकर गए थे| दीदी की हाइट कम है, बिल्कुल है| भारत में औसतन महिलाओं की लंबाई 5|5 के आस-पास रहती है, दीदी की 5|2 है| मैं जानती हूं आपको, मुझे, मां को या हमारे परिवार को दीदी दो साल पहले तक छोटी नज़र नहीं आती थी| पर जबसे उसकी शादी की बात शुरू हुई आपके मन में यह बात डाल दी गई – राय जी बड़की बेटी का हाइट कम है| यहां ध्यान दीजिएगा आप| मीडिया की एक थ्योरी है बुलेट थ्योरी रिश्तेदारों की इस लाइन ने बुलेट थ्योरी का काम किया और आपने भी भरोसा कर लिया, हां जी रश्मि की हाइट तो कम है, जिसने जब तस्वीर मांगी आपने भेज दी| हालांकि इस बात की मैं तारीफ ज़रूर करूंगी कि आपने हमेशा कहा मैं दहेज नहीं दूंगा एक पैसा भी नहीं| शादी होगी तो बिना पैसे के वर्ना नहीं| अपनी तरफ से बस आप इतना ही विरोध आज तक दर्ज करा पाए| बाकी बातों में आप फंसते चले गए|

शादी के लिए एक योग्य वधु कैसी होती है- लंबी, गोरी, घर के कामों में निपुण, पढ़ी-लिखी, नौकरीपेशा (सरकारी नौकरी बेहतर, अगर पेशा उनके मन का ना हुआ तो शादी के बाद छुड़वा देंगे), कम बोलने वाली, पतली, हां में हां मिलाने वाली वगैरह-वगैरह| आपकी बेटियां इन मानदंड़ो पर खरी नहीं उतरती| दीदी की हाइट कम है और मेरे बारे मैं क्या ही लिखूं|

और पढ़ें : संस्कारी लड़कियों के नाम एक खुला खत…

पापा आपको समझना होगा कि किस तरह आपके आस-पास के लोग आपकी विचारधारा, मूल्यों और सोच पर हावी हो रहे हैं| अगर आज आपको ये तस्वीर के लिए राज़ी कर रहे हैं तो कल दहेज के लिए भी कर लेंगे| पापा हम चलते-फिरते इंसान हैं| हमारे पास अपने विचार हैं, अपना एक अस्तित्व है| हमारी तस्वीर देखकर और भारत के प्रधानमंत्री का नाम पूछकर कैसे कोई जज कर सकता है? कैसे कोई यह तय कर सकता है कि दीदी की हाइट 3 इंच कम होने से वह किसी की पार्टनर बनने के काबिल नहीं है| किसी मास्टर्स डिग्री वाली लड़की से वॉवेल्स और कॉन्सोनेंट्स पूछकर उसकी बेइज्जती का हक उन्हें किसने दिया|

पापा ये सारे खिलाड़ी हैं| आप प्लीज़ इनके पाले में जाकर इनके लिए खेल का मैदान और साफ न बनाएं| आप शुरू से हमारी टीम में रहे हैं, हमारी ही टीम में रहे| आपका दूसरी टीम में जाना इस हमारी टीम के मनोबल को गिराता है| आपसे इतनी लंबी और कड़वी बहसें करने के बाद मेरा दिल भी दुखता है लेकिन मैं इसबात को ऐसे नहीं जाने दे सकती कि बस तस्वीर ही तो मांगी है| यह बस तस्वीर नहीं मेरी बहन के व्यक्तित्व को छलनी करने का एक तरीका है| वह लड़की जिसने कभी अपनी हाइट नहीं नापी उसे यह एहसास दिलाने का तरीका है कि वह मजबूर हो जाए इंच-टेप खोजने को|

पापा, यह समाज उसी ढांचे पर खड़ा है जहां औरतों को हमेशा हाशिए पर रखा गया है| यह हममें बस ऐब खोजने के बहाने ढूंढ़ता फिरता है| आप हील वाली सैंडल देकर दीदी की लंबाई बढ़ाएंगे, वह कहेगा अरे लड़की को गुड़ की खीर बनानी नहीं आती| जब वह गुड़ की खीर बनाना सीख लेगी तो कहेंगे कद्दू का हलवा बनाती तो मज़ा आ जाता| आप कब तक करेंगे यह सब| मैं दीदी के पक्ष से नहीं बोल रही| मैं हर उस लड़की की तरफ से आपको खत लिख रही हूं जिसकी मर्ज़ी के बिना उसकी तस्वीर खींचकर उसके व्यक्तित्व को एक तस्वीर में समेट दिया गया|

और पढ़ें : ‘शादी करूँ या न करूँ ये मेरी मर्जी है’

पापा, आप तो बहुत पढ़ते-लिखते, न्यूज़ देखते रहते हैं| आपने प्रिवेसी वाली डिबेट भी सुनी होगी| फर्ज़ कीजिए मैं आपकी तस्वीर लूं और उसे फलाने-ढिमकाने को भेजूं कि वे अपनी राय आप पर दें| ध्यान रहे इसमें आपकी मर्ज़ी शामिल नहीं होगी| दावे के साथ कह सकती हूं आप कहेंगे यह मेरी निजता का हनन है| तो सिर्फ इसलिए कि मेरा जेंडर (जो कि समाज ने ही तय किया है) फीमेल है मेरी सहमति के बिना आप मेरी फोटो सर्कुलेट करते रहेंगे| यह मेरी अच्छाई है कि मैं यहां सिर्फ जेंडर के मामले पर लिख रही हूं| कास्ट के लिए तो एक दूसरा पत्र लिखना होगा|

आप दीदी के भविष्य को अपने तरीके से सुरक्षित करना चाहते हैं| मुझे लगता है आपका तरीका उसे कैद करने का है| क्या गारंटी है कि शादी के बाद सब महफूज़ होगा| अगर शादी के बाद दीदी को उसके ससुराल वाले परेशान करेंगे तो क्या उस वक्त उसका साथ देना आपकी ज़िम्मेदारी नहीं होगी| कहने का मतलब शादी इस समस्या का हल नहीं है| दीदी की असल परेशानी नौकरी न मिलना है| देश के युवाओं को शादी को लेकर नहीं बल्कि रोज़गार को लेकर सड़क पर उतरना चाहिए| यह मैं आपके अनुसार लिख रही हूं क्योंकि I don’t believe in the institution of marriage anymore.

और पढ़ें : ‘बिहार में अब नहीं बिकेंगे दूल्हे’ – नीतीश कुमार का अभियान

मुझे बुरा लगता है जब आप दीदी पर चिल्लाते हैं और कहते हैं- मेरी बेइज्ज़ती करा दो तुमलोग, एक फोटो नहीं दे सकी| अरे यार, किसकी बेइज़्जती हो रही यहां-मेरी बहन की| लोग उसे जज कर रहे हैं आपको नहीं| मुझे पता है कि आपको भी पसंद नहीं होगा कि कोई आपकी संतान को बेमतलब के पैमानों पर जज करे, पर माफ कीजिएगा मौका तो आप ही दे रहे हैं| अगर आप इसबार समाज की परिभाषा में उलझे रहे तो आगे और उलझते चले जाएंगे|

लड़कियों को सिर्फ पढ़ा-लिखाकर, उन्हें आत्मनिर्भर बनाकर अगर आपको लगता है कि आपने इस पितृसत्तात्मक समाज को चुनौती दी है तो आप बिल्कुल गलत हैं| यह मल्टीलेयर है, जैसे आपका दीदी की एक अच्छी तस्वीर लड़के वालों के लिए मांगना पितृसत्ता ही है| जब आप दीदी से तस्वीर में कम मुस्कुराने को कहते हैं तो ध्यान दीजिए यह भी पितृसत्ता है क्योंकि जो़र-ज़ोर से हंसने वाली लड़कियां इस समाज को बर्दाश्त नहीं होती| क्या आपको लगता है वह लड़का अपनी तस्वीर मांगे जाने पर अपने पिता को पत्र लिख रहा होगा – बिल्कुल नहीं| उस लड़के पर किसी तरह का दबाव नहीं है यही है पितृसत्ता|

दीदी किसी की ज़िम्मेदारी नहीं है| उसकी नौकरी लग जाएगी वह एक स्वतंत्र, आत्मनिर्भर महिला बनेगी| (मेरा मानना है वह पहले से ही है)| शादी जब होनी होगी हो जाएगी उसकी मर्ज़ी के साथ| अब कब तक बिना मतलब की टेंशन से खुद का बीपी हाई कीजिएगा| हमें खुद की ज़िम्मेदारी खुद ही निभाने दीजिए| इस गैरबरारबरी, पितृसत्ता के खिलाफ मेरी लड़ाई अगर मैं घर में हारी तो कहीं आगे नहीं जीत पाऊंगी| मुझे हर लेवल पर आप लोगों को यह एहसास दिलाते रहना है कि चूंकि हम लड़की हैं आप हमारे साथ ऐसा नहीं कर सकते|

बहुत-बहुत प्यार,

आपकी नारीवादी बेटी,

 रितिका


यह लेख रितिका ने लिखा है, जो एक स्वतंत्र युवा पत्रकार है|

तस्वीर साभार : cgvdt.vn

Leave a Reply