हमारे समाज में जब कोई महिला ऑफ़िस में जाती है और तनख्वाह लेती है तो उसका सम्मान किया जाता है। क्योंकि वो न केवल घर के ख़र्चो में हाथ बटाती है बल्कि वो भारत की अर्थव्यवस्था में भी अपना बहुमूल्य योगदान दे रही है। लेकिन दूसरी ओर जब कोई महिला घरेलू काम करती है यानी की वो हाउसवाइफ़ बनती है तब समाज उसे वैसा ही सम्मान नहीं देता है। घर में सबसे पहले उठने वाली और सबसे आख़िर में सोने वाली, बिना किसी छुट्टी और बोनस के सालभर काम करने वाली हाउसवाइफ़ के लिए आसानी से कह दिया है – ‘वो कुछ नहीं करती। घर पर रहती है।’

समाज में महिला सशक्तिकरण की परिभाषा ऐसे तय कर रखी है कि अगर वो बाहर जाकर कुछ करती है तो ही वो सशक्त कहलाएगी। वरना घर पर रहने वाली महिलाएं शक्तिशाली महिलाओं की गिनती में नहीं आती। महिलाओं को अपना चुनाव करने की वो स्वतंत्रता ही नहीं दी जाती जिससे वो चुन सके वो क्या करना चाहती है। ये देखकर ऐसा लगता है कि हम महिलाओं को एक खाँचे से निकालकर दूसरे खाँचे में ढालने की कोशिश करते है।

समाज में अधिकतर पुरूषों को वो औरत पसंद आती है जो घर में रहे और अगर बाहर भी जा रही है तो घर को न भूलें। इसी जद्दोजहद में औरतें बाहर का काम छोड़ देती है जिससे वो घर में ज्यादा समय बिता पाएँ। दूसरी वजह यह भी है कि घर के पुरूष और बाकी परिवार के लोग भी महिलाओं के काम में हाथ नहीं बँटाते जिससे मजबूरी में आकर महिलाओं को बाहर का काम छोड़ना पढ़ता है। जब वो एक हाउसवाइफ बनती है तब भी वो सम्मान उसे नहीं मिल पाता क्योंकि सदियों से घरेलू काम की अहमियत ही कम आंकी गई है। हमेशा से समाज में उसी की इज्जत होती है जो रोटी कमाता है न की उसकी जो रोटी बनाता है।

हाउसवाइफ़ के लिए आसानी से कह दिया है – ‘वो कुछ नहीं करती। घर पर रहती है।’

सबसे पहले उठकर एक हाउसवाइफ़ घर के सभी सदस्यों के लिए खाने से लेकर उनके कपड़े प्रेस तक सभी काम करती है जिसकी बदौलत वो काम पर जा पाते है। जैसे ही एक महिला कि शादी होती है उसका काम केवल अपने पति तक ही सीमित नहीं होता है। उसके ऊपर पूरे परिवार की जिम्मेदारी होती है।

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इसके बाद जब वो मां बनती है तो एक अति भावनात्मक प्रक्रिया से जुड़ती है जिससे उसकी जिम्मेदारी अब घर के बाद बच्चों की भी हो जाती है। यहाँ हमें अपनी भाषा में भी सुधार करने की ज़रूरत अब हाउसवाइफ कहना गलत होगा क्योंकि वो एक होममेकर यानी घर को बनाने वाली होती है। अगर मै अपना उदाहरण दूं तो मैं कह सकती हूं कि अगर मेरी मां ने मेरे काम नहीं किया करती तो मैं स्कूल या काम पर ले जाने लायक नहीं होती। अक्सर ब्रैड विनर यानी रोटी कमाने वालो को बोलते सुना है कि औरतें घर पर करती ही क्या है। लेकिन अगर उनका किया हुआ काम एक दिन रूक जाए तो देश की अर्थव्यवस्था चौपट हो जाएगी क्योंकि कोई भी पुरूष काम पर जा ही नहीं पाएगा। लेख के शुरूआत में ही मैने जिक्र किया था कि जीडीपी में औरतों के घरेलू काम को जगह नहीं मिलती औऱ उनका सभी काम नज़रअंदाज़ किया जाता है। 

अक्सर ब्रैड विनर यानी रोटी कमाने वालो को बोलते सुना है कि औरतें घर पर करती ही क्या है।

अक्सर लोगों को आपस में बात करते हुए सुनती हूं कि हाउसवाइफ करती ही क्या हैं? मेरी मां मुझे कहा करती थी कि पापा हमेशा उनसे एक ही बात बोला करते थे कि दो रोटी ही तो बनानी होती है वो भी तुमसे नहीं होता। औरतें जो घर के काम को देखती है उन्हें दिशाहीन समझा जाता है औऱ हमें भी अपने आप से यह सवाल करना चाहिए कि क्या कभी हमने भी हाउसवाईफ सुनते ही ये नहीं सोचा था कि ‘अच्छा तो कुछ नहीं करती हो।’

वास्तविकता ये है कि जिस दिन हाउसमेकर के कामों का हिसाब किया जाएगा उसदिन समाज की सबसे बड़ी चोरी पकड़ी जाएगी। इसलिए अगर हम वास्तव में समानता की तर्ज़ पर एक स्वस्थ समाज की कल्पना करते हैं तो हमें सभी को समान भाव से सम्मान देने और उनका सहयोग करने की ज़रूरत है।

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स्वीर साभार : flickr.com

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