बेटा आपकी मम्मी क्या करती हैं?’
‘जी वो एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हैं।’

सुनने में तो काफी आम लगता है, लेकिन जब मैं यह बात किसी को बताती हूँ तो मुझे अपनी माँ पर गर्व होता है। इसी तरह जब वो खुद किसी को अपने काम के बारे में बताती हैं तो उनकी आँखों में एक अलग ही चमक और खुशी होती है। यह चमक उनके आत्मविश्वास और आत्मसम्मान को दिखलाती है।

बचपन से ही मेरे मन में एक बात बैठ गयी थी कि बड़े होकर मेरे लिए कुछ काम करना बहुत ज़रूरी है। इस बात के दो पहलू हैं। पहला तो यह कि ज़िन्दगी में एक अच्छा करियर बनाना और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने की सोच हर किसी में होनी चाहिए। पर दूसरी सोच यह भी थी कि अच्छी पढ़ाई-लिखाई करके जीवन में कुछ अच्छा कर जाउंगी तो कोई कभी मुझे अपनी जायदाद नहीं समझेगा। कोई मुझपर शादी करने के लिए ज़ोर नहीं डालेगा। कोई मुझे अपना बोझ नहीं समझेगा। यह पिता और पति दोनों के घर के लिए ही लागू होता है। आखिर समाज की सोच तो यही है ना कि एक लड़की को बड़े होकर शादी करनी है और फिर पति और उसके परिवार की सेवा करनी है।

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यहाँ पर मैं हाउसवाइफ महिलाओं को ना तो कम आंक रही हूँ और  ना ही उनके प्रति सम्मान में कोई कमी दर्शा रही हूँ। मैं केवल पीढ़ी दर पीढ़ी घूमती आ रही उन स्त्री द्वेषी धारणाओं को आपसे साझा कर रही हूँ जिन्हें ख़त्म करना वक़्त की मांग है। जब एक महिला नौकरी करती है और पैसा कमाती है तो गर्व से उसका सिर अपने आप ही ऊपर हो जाता है। इसका मतलब यह नहीं है कि पैसा महत्वपूर्ण है। इसका मतलब यह है कि वह अपने आप को बंधा महसूस नहीं कर रही और उसका आत्मविश्वास चीख-चीख कर यह कह रहा है कि वह अपने कार्य में सक्षम है। क्योंकि महिला अगर पैसे कमाती है तो वो न केवल आत्मनिर्भर बनती है बल्कि उसमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

मज़दूर से लेकर साइट इंजीनियर, क्लर्क से लेकर कलेक्टर, टीचर से लेकर मिनिस्टर, खिलाड़ी से लेकर सैनिका, वकील से लेकर डॉक्टर, लेखिका से लेकर पेंटर जिन भी महिलाओं को आप देखें उनमें किसी भी कार्य को लेकर डर नहीं रहता बल्कि मन में विश्वास रहता है कि वे उसे कर लेंगी। वे जैसा चाहे, जिस तरह से चाहे, अपने सपनों और चाहतों को पूरा कर सकती हैं। आखिर इसलिए तो कहा जाता है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता।

महिला अगर पैसे कमाती है तो वो न केवल आत्मनिर्भर बनती है बल्कि उसमें आत्मविश्वास भी बढ़ता है।

अगर बात करें उन महिलाओं की जो अकेली हैं या फिर सिंगल मदर हैं, उनके लिए एक पेशा उनकी पहचान बन जाता है। उनकी नौकरी ही उनके बेहतर भविष्य का खज़ाना होती है। वे अपने साथ अपने परिवार का पालन-पोषण करती हैं। साथ ही सामाजिक व आर्थिक दोनों तरीकों से ही अपने आप को सुरक्षित रखती हैं। इसका मतलब ये है कि महिलाएं अपनी इच्छा और सक्षमता के अनुरूप जो पेशा अपनाती हैं और उससे जो आत्मविश्वास और आत्मसम्मान उभरकर आता है, वो  समाज के रूढ़िवादी मुँह पर ताला लगाने का काम करता है। लोगों के ताने, हज़ार बातें और अजीब नज़रें भी फिर उनका कुछ नहीं बिगड़ सकतीं। सशक्तिकरण का इससे अच्छा उदाहरण और क्या हो सकता है।

आपकी नौकरी केवल आपका सहारा नहीं बल्कि आपकी साथी बन जाती है जो लोगों की परंपरागत मानसिकता को कठिन चुनौती देती है।

इसका एक लाभ यह भी होता है कि समाज की नज़रों में आपका महत्त्व बढ़ जाता है। कहीं ना कहीं लोग आपको बराबरी की नज़र से देखने लगते हैं। महिला हों या पुरुष, सभी के मन में आपकी इज़्ज़त बढ़ जाती है। जब आप उस पितृसत्ता के आधीन दफ्तरों में जाकर अपना हुनर दिखाती हैं, तो जो लोग यह कहते हैं कि एक औरत का काम घर और बच्चों को संभालना होता है, फिर वही लोग आपकी तारीफ करने लगते हैं। आपकी नौकरी केवल आपका सहारा नहीं बल्कि आपकी साथी बन जाती है जो लोगों की परंपरागत मानसिकता को कठिन चुनौती देती है। साथ ही अगली पीढ़ी व अन्य औरतों के लिए आपको एक प्रेरणा के रूप में भी प्रस्तुत करती है।

मुझे अपने समाज के लिए उस दिन का बेसब्री से इंतज़ार है जब हम सभी महिलाएं अपने कार्य, हुनर और परिश्रम से बराबरी की व्यवस्था बनाएंगी और इस मानसिकता को पूरी तरह सामान्य बना देंगी।

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तस्वीर साभार : fredfoundation.org

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