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दिल्ली में लगातार तीसरी बार आम आदमी पार्टी की सरकार बन चुकी है। विश्लेषकों ने दिल्ली विधानसभा चुनाव को भाषाई स्तर पर सबसे निचले दर्जे का चुनाव माना है। इसकी वजह रही सत्ताधारी पार्टी बीजेपी की तरफ़ से किया गया नफरत भरा, द्वेषपूर्ण और सांप्रदायिक चुनाव प्रचार। लेकिन दिल्ली की जनता ने 70 में से 62 सीटों पर ‘विकास’ को वोट दिया। ऐसा केजरीवाल और उनकी पार्टी दावा कर रही है। यही जनता को भी यकीन करने पर मजबूर किया जा रहा है। 

चुनाव प्रचार के पहले हिस्से को देखने पर लगेगा कि आम आदमी पार्टी स्थानीय मुद्दों पर टिकी रही। वो अपने एजेंडे में राष्ट्रीय मुद्दों को एक बार भी हावी नहीं होने देना चाह रही थी। यहां तक कि आम आदमी पार्टी ने अपने ही  मुख्य एजेंडे दिल्ली को पूर्ण राज्य बनाने की मांग को छोड़ दिया। जनलोकपाल आंदोलन से पैदा हुई पार्टी के चुनाव प्रचार में जनलोकपाल के एक इश्तेहार नहीं लगे पूरी दिल्ली में। वहीं चुनाव प्रचार का दूसरा हिस्सा, जब भारत के गृहमंत्री समेत भाजपा, शाहीनबाग और राष्ट्रवाद के मार्फ़त मर्दवादी हार्डकोर हिंदुत्व के एजेंडे पर दिल्ली में वोटरों से अपील करने लगे। केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने केजरीवाल को आंतकवादी तक कह दिया। बाकी भाजपा नेताओं ने जावडेकर के सुर में सुर मिलाया। दिल्ली पुलिस पर दिल्ली सरकार के नियंत्रण के संबंध में केजरीवाल ने शाहीनबाग के संदर्भ में ही कहा कि, ‘दिल्ली पुलिस हमारे पास होती तो हम दो घंटे में सड़क क्लियर करवा देते।’

आम आदमी पार्टी का फिर से सत्ता में आना और वह भी भारी बहुमत से आना, इस बात की तस्दीक करता है कि दिल्ली का भरोसा आम आदमी पार्टी में बरकरार है। साल 2013 और साल 2015 के विधानसभा चुनावों में दिल्ली केजरीवाल को एक मौका देना चाहती थी। उसी दिल्ली ने साल 2020 में केजरीवाल और आप पर भरोसा करने के साथ-साथ उनकी राजनीति को स्वीकृति भी दी है। उनकी जनस्वीकृति बढ़ने का ही असर है कि लोकसभा में भाजपा को वोट करने वाले वोटर भी विधानसभा में आप को पहली प्राथमिकता देता है। आखिर ऐसा क्या बदल गया है केजरीवाल की राजनीति में? 

केजरीवाल ने मोदी की पॉलिटिक्स से सीखा है। उन्होंने भाजपा के हिंदुत्व के एजेंडे को कॉ-ऑप्ट किया है। जो केजरीवाल मोदी के ‘कट्टर’ आलोचकों में रहे थे, अब मोदी की एक आलोचना नहीं करते। फरवरी 2019 में पुलवामा हमले के तुरंत बाद उन्होंने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिए जाने की मांग की थी। जिस केजरीवाल ने मोदी सरकार से साल 2016 में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद ‘सुबूत’ मांगा था, उन्होंने पुलवामा हमले के ‘जांच’ की भी  कोई मांग नहीं की।

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केजरीवाल और आम आदमी पार्टी जानती है कि दिल्ली में मुसलमानों के पास कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है। कांग्रेस खडंहर है और किसी दूसरी पार्टी को वोट देकर वे वोटों का विभाजन नहीं होने दे सकते।

कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के फैसले का स्वागत केजरीवाल ने किया। मार्च 2019 में भाजपा के एक विधायक ने केजरीवाल को पाकिस्तानी सेना का गुप्तचर कहा, उसे केजरीवाल का जवाब था कि वह हिंदू हैं और हिंदू संस्कृति उन्हें अभद्र भाषा का इस्तेमाल नहीं सिखाती। थोड़ा और पीछे मुड़कर गौर करें तो केजरीवाल ने दिल्ली में औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपेजी अब्दुल कलाम के नामपर रखने का स्वागत किया। जबकि केंद्र सरकार का यह फैसला घोर राजनीतिक फैसला था। वह गुड और बैड मुस्लिम की धारणा के पुर्नावृति थी। उन्हीं दिनों दिल्ली महकमे के उदारवादियों के बीच इतिहास के पुर्नलेखन को लेकर बहसें जोर पर थीं।

इन्हीं चुनावों के दरमियान एक पत्रकार ने केजरीवाल से साक्षात्कार के दौरान हनुमान चालिसा पढ़ने का आग्रह किया। पत्रकारीय लिहाज़ से यह एक बेहद बकवास सवाल था। किसी का भी धर्म या उसकी धार्मिकता उसके व्यक्तिगत जीवन का मामला है। पत्रकारों को उसमें दखल देने का कोई अधिकार नहीं। हालांकि केजरीवाल ने मौके को लपक लिया। उन्होंने हनुमान चालिसा के चौपाइयों को लाइव कैमरा पर गाकर सुना दिया। उसी साक्षात्कार में उन्होंने दावा भी किया कि वे कट्टर हनुमान भक्त हैं। बहुतेरे केजरीवाल समर्थकों को भी यह पहली बार पता चला कि उनका नेता कट्टर हनुमान भक्त है। सबसे बड़ा गड्ढा भाजपाइयों के प्रौपगैंडा को हुआ। उन्होंने अबतक तो यही प्रचारित किया कि केजरीवाल ‘एंटी-हिंदू’ हैं। एक तरफ तो केजरीवाल पहले से ही भाजपाइयों से आप को वोट दने की अपील कर रहे थे। हनुमान चालिसा के पाठ करके उन्होंने भाजपाई दर्शक दीर्घा में उछालकर छक्का मारा था। हर रैली में ‘भारत माता की जय’ का उद्घोष और रैलियों में लहराते तिरंगों ने भाजपाईयों के एजेंडे को बुरी तरह ध्वस्त करता रहा। 

विश्लेषकों के अनुसार यह केजरीवाल की सॉफ्ट-हिंदुत्व पॉलिटिक्स है। लोकसभा चुनावों के दौरान राहुल और प्रिंयका गांधी के लिए भी यही कहा गया था। बारीक अध्ययन करेंगे तो वर्तमान राजनीति में कोई भी ऐसा जननेता नहीं दिखेगा जिसने पब्लिक लाइफ में सेकुलर होने का सफल अभ्यास किया हो। राजनीति से धर्म को माइनस कर पॉलिटिक्स की हो। कम या ज्यादा सबने भाजपा की पॉलिटिक्स के अनुसार अपनी-अपनी पॉलिटिक्स को साधने की कोशिश की है।

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गौरतलब हो कि केजरीवाल का उदय यूपीए सरकार के भ्रष्ट्राचार के खिलाफ हुआ था। उन दिनों राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से उनकी निकटता बढ़ी। संघ ने उस आंदोलन में सक्रीय भूमिका निभाई। संघ का भी एक बड़ा योगदान रहा कि आंदोलनों के आवेश में यूपीए के खिलाफ पूरे देश में एक माहौल तैयार हो गया। जिसे सींचकर भाजपा सत्ता में आई। अन्ना और केजरीवाल कैंप के कई नेता जो पहली पंक्ति में हुआ करते भाजपा के साथ जा मिले। केजरीवाल के हाथ में दिल्ली की सत्ता आने के बाद अन्ना ने भी अपने शिष्य की आलोचना की। पहले और दूसरे विधानसभा चुनावों में तो अन्ना पर भाजपा के उकसावे पर केजरीवाल के खिलाफ बोलने का आरोप भी लगा। फिलहाल आंकड़ों को देखकर लगता यही लगता है कि केजरीवाल के हिंदुत्व की राजनीति विशुद्ध रूप से चुनावी गणित से प्रभावित है।  नरेंद्र मोदी को साल 2014 में बंपर वोट देने वाली दिल्ली ने साल 2015 में केजरीवाल को दिल्ली की  सत्ता के शिखर पर पहुंचा दिया। आप की ऐताहासिक जीत हुई। 70 में से 67 सीट आप ने जीते। 

वरिष्ठ पत्रकार औनिंदो चक्रवर्ती ने अपने लेख में इसे आंकड़ों के जरिए समझाया है। उन्होंने लिखा है कि साल 2013 के विधानसभा चुनावों में भाजपा को 26 लाख वोट पड़े। साल 2014 लोकसभा चुनावों के मोदी लहर में भाजपा को मिले 38 लाख वोट। वापस साल 2015 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को सिर्फ 29 लाख वोट ही पड़े। वहीं दूसरी तरफ आप को मिलने वाले वोटों पर गौर किया जाए। साल 2013 में 23 लाख वोट, साल 2014 में 27 लाख वोट और साल 2015 में 49 लाख वोट। इसमें से एक बड़ा धड़ा मुस्लिम वोटों का था। यह कांग्रेस और बहुजन समाज पार्टी से आम आदमी पार्टी की तरफ शिफ्ट हो गया। आप को झटका लगा साल 2019 लोकसभा चुनावों में। जहां भाजपा को 49  लाख वोट पड़े, आप को मिले महज़ 16 लाख वोट। मतलब कि साल 2015 और साल 2019 के बीच आप से 33 लाख वोट छिटके। जिसमें से कि 11 लाख कांग्रेस की तरफ और 22 लाख मोदी के तरफ चले गए। 

33 लाख वोटों एक बड़ा पॉलिटिक्ल स्विंग जिसे कई मायनों से समझा जा सकता है। एक तो यह कि केजरीवाल और आम आदमी पार्टी जानती है कि दिल्ली में मुसलमानों के पास कोई राजनीतिक विकल्प नहीं है। कांग्रेस खडंहर है और किसी दूसरी पार्टी को वोट देकर वे वोटों का विभाजन नहीं होने दे सकते। भाजपा स्पष्ट है कि मुसलमान उसे वोट नहीं करते। अब तो भाजपा नेताओं ने मुस्लिम इलाकों में प्रचार करने से भी परहेज कर लिया है। हालांकि, थोड़े ही सही लोकसभा में मुसलमानों के भी वोट भाजपा को पड़े हैं। दूसरा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भाजपा  एक बड़ा वोट बेस साझा करती है। वह दिल्ली में केजरीवाल और केंद्र में मोदी की थ्योरी पर चलता है। इसे केजरीवाल भी बखूबी समझते हैं। तीसरी गौर करने वाली बात है कि मुसलमान वोटरों ने अपने बीच एक सामांजस्य बिठा लिया है। वह लोकसभा में कांग्रेस को वरीयता देते हैं। जबकि दिल्ली में आम आदमी पार्टी को। उन्हें लगता है कि केंद्र में सरकार बनाने में कांग्रेस की भूमिका अहम है। वहीं दिल्ली में आम आदमी पार्टी। आने वाले दिनों में दिल्ली के मुसलमानों के बीच राजनीतिक विकल्पहीनता की स्थिति असदद्दुीन औवेसी की पार्टी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहदुल मुस्लमिन को एक राजनीतिक अवसर दे सकती हैं। कोई अचरज न हो अगर अगले विधानसभा चुनावों में औवेसी की पार्टी कुछ मुस्लिम सीटों पर सही, चुनाव लड़े।

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तस्वीर साभार : thestatesman

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