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नागरिकता संशोधन क़ानून यानी सिटिज़नशिप अमेंडमेंट ऐक्ट (सीएए) का विरोध देशभर में हो रहा है। दिल्ली के शाहीनबाग़ से लेकर हर छोटे-बड़े शहर और गांव में धरने, प्रदर्शन और रैलियां ज़ोर शोर से चालू हैं। ऐसी ही एक रैली पिछले हफ्ते बेंगलूरु में हुई। ऑल इंडिया मजलिस ए इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) की इस रैली का एक वीडियो इस बीच वायरल हुआ, जिसमें एक लड़की को ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ का नारा लगाते हुए देखा गया। वीडियो में एआईएमआईएम के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी लड़की का माइक्रोफोन छीनकर उसे रोकते हुए भी नज़र आते हैं। छानबीन से पता चला कि ये लड़की कर्नाटक के चिकमग्गालूरु ज़िले से है। 19 साल की है और बेंगलूरु में पत्रकारिता की पढ़ाई करती है। नाम है अमूल्या लियोना।

ट्विटर पर असदुद्दीन ओवैसी ने अमूल्या की हरकतों पर कड़ी निंदा जताई। उन्होंने कहा कि ‘दुश्मन देश’ का पक्ष लेने वालों के लिए आंदोलन में कोई जगह नहीं है  और वो ऐसे ‘पागल’ लोगों का समर्थन नहीं करते जिन्हें भारत से प्रेम न हो।  अमूल्या के पिता ने भी कहा कि वे अपनी बेटी के विचारों का समर्थन नहीं करते कि वो अपनी बेटी के लिए कड़ी से कड़ी सज़ा चाहते हैं और उन्हें कोई ऐतराज़ नहीं अगर अमूल्या ‘सारी ज़िंदगी जेल में सड़े।” घटना के कुछ ही समय बाद अमूल्या को इंडियन पीनल कोड के सेक्शन 124A (राजद्रोह), सेक्शन 153A (सामाजिक भेदभाव) और सेक्शन 153B (देशविरोधी नारे) के तहत गिरफ़्तार किया गया।

पर क्या ये आरोप सही हैं? क्या सचमुच अमूल्या का मक़सद भारत का विरोध या समाज में नफ़रत पैदा करने का था?

अमूल्या की दोस्त, जो उस वक़्त उसके साथ मौजूद थी कहती है कि अमूल्या दरअसल एक स्पीच देने जा रही थी। ‘पाकिस्तान ज़िंदाबाद’ के बाद उसने ‘हिंदुस्तान ज़िंदाबाद’ भी कहा था पर तब तक उसका माइक्रोफोन बंद कर दिया गया और उसे रोक लिया गया था। पूरी स्पीच, जो कन्नड भाषा में अमूल्या ने फ़ेसबुक पर पोस्ट किया था, वो यहां है –

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“पाकिस्तान ज़िंदाबाद…! हिंदुस्तान ज़िंदाबाद…! बांग्लादेश ज़िंदाबाद…! श्री लंका ज़िंदाबाद…! नेपाल ज़िंदाबाद…! अफ़ग़ानिस्तान ज़िंदाबाद…! चीन ज़िंदाबाद …! भूटान ज़िंदाबाद…!

चाहे कोई भी देश हो, हर देश ज़िंदाबाद…!

बच्चों को सिखाया जाता है कि एक देश उसकी मिट्टी से बनता है। अब हम बच्चे आपको सिखाएंगे कि देश मिट्टी नहीं, लोगों से बनता है। हर इंसान को न्यूनतम सुविधाएं मिलनी चाहिएं। हर किसी को अपने हक़ मिलने चाहिए। सरकारों को अपने देश के लोगों का ख्याल रखना आना चाहिए। लोगों की सेवा करनेवाला हर वो शख़्स ज़िंदाबाद।

किसी और देश को ज़िंदाबाद कहने से मैं उस देश की नागरिक नहीं बन जाती। क़ानूनी तौर पर मैं एक भारतीय नागरिक हूं और मेरा फ़र्ज़ है मेरे देश की इज़्ज़त करना और उसके लोगों के लिए काम करना। और मैं ऐसा करूंगी। देखते हैं आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) वाले क्या कर लेते हैं।

संघियों को ये सुनकर गुस्सा आएगा। आप इस पर जो भी कहना चाहते हों, कहिए। मैं जो कह रही हूं वो कहती रहूंगी।

ज़ाहिर सी बात है कि इस स्पीच में ऐसा कुछ भी नहीं है जो भड़काऊ, देशविरोधी या नफ़रत पैदा करनेवाला हो। फिर महज़ एक पड़ोसी मुल्क की तारीफ़ करने के लिए अमूल्या पर ऐसे इलज़ाम क्यों लगे?

साल 1947 के बंटवारे के बाद से ही भारत और पाकिस्तान के बीच रिश्ते बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। ऐसे हालातों में कोशिश ये होनी चाहिए कि दोनों देशों में भेदभाव कम हो और उनका आपसी रिश्ता बेहतर हो। पर जहां इंसानियत और सद्भाव की बात होनी चाहिए, वहां हम पाकिस्तान की बुराई करने और उसे गालियां देने को ‘देशभक्ति’ का प्रतीक बना बैठे हैं। ‘पाकिस्तान मुर्दाबाद’ कहने, उसके चार टुकड़े करने की बात करने और सोशल मीडिया पर गंदी भाषा वाले हैशटैग चलाने वालों की निंदा तो होती ही नहीं, बल्कि तारीफ़ ही होती है। ऐसे में अगर कोई सौहार्द की बात करे या एक पूरे देश के खिलाफ नफ़रत फैलाने से इंकार करे तो उसे तुरंत ‘देशद्रोही’ या ‘देशविरोधी’ का तमगा दे दिया जाता है।

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साल 2016 में लेडी श्रीराम कॉलेज, दिल्ली की छात्रा गुरमेहर कौर ने एक यूट्यूब वीडियो में भारत और पाकिस्तान के बीच अमन की बात की थी। उन्होंने बताया किस तरह उनके पिता पाकिस्तान के साथ जंग में शहीद हुए थे। उन्होंने ये भी कहा कि, “पाकिस्तान ने मेरे पिता को नहीं मारा।  युद्ध ने मारा था।” और इसलिए पाकिस्तान के साथ भारत की दुश्मनी ख़त्म होनी चाहिए ताकि सरहद के दोनों तरफ़ लोग चैन से जी सकें और जंग में अपनी जान न खोएं। गुरमेहर के इस बयान पर बहुत विवाद हुआ। उन पर ‘देशविरोधी’, ‘पाक-परस्त’, ‘शहरी नक्सल’ होने के इल्ज़ाम लगे। यहां तक कि उन्हें सोशल मीडिया पर मौत और बलात्कार की धमकियां तक दी गईं। सिर्फ इतना कहने के लिए कि पाकिस्तान के साथ दुश्मनी नहीं सौहार्द की ज़रुरत है।

पाकिस्तान सरकार की या उसकी सेना की आलोचना करना एक बात है। पर एक पूरे देश के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना, उसकी आमजनता को नफरत की निगाहों से देखना कहां तक जायज़ है?

पाकिस्तान सरकार की या उसकी सेना की आलोचना करना एक बात है, जो करनी भी चाहिए। पर एक पूरे देश के ख़िलाफ़ ज़हर उगलना, उसकी आमजनता को नफरत की निगाहों से देखना कहां तक जायज़ है? क्या ‘देशभक्ति’ इंसानियत से बड़ी है? और ये किस तरह की देशभक्ति है जो दूसरे देशों का अपमान करके ही जताई जा सके? क्या भारत की बुनियाद इतनी कमज़ोर है कि पाकिस्तान की ज़रा-सी तारीफ़ कर देने से डगमगा जाए?

पाकिस्तान और पाकिस्तानियों के ख़िलाफ़ ये ज़हरीला नफ़रत मुस्लिम-द्वेष का एक बहाना भी बन गया है। भारतीय मुसलमानों को बार-बार साबित करना पड़ता है कि वे उतने ही ‘भारतीय’ हैं जितने कि बहुसंख्यक हिंदू  और उनकी वफ़ादारी पाकिस्तान नहीं भारत की तरफ़ है। हिन्दुओं के ज़रिए किसी मुस्लमान पर अत्याचार होता है तो सवाल अक्सर मुसलमान पर ही उठता है कि कहीं उसका संबंध पाकिस्तान या बांग्लादेश से तो नहीं है? कहीं वो ‘अवैध घुसपैठिया’  या ‘आतंकी’ तो नहीं? जैसे इन सब की वजह से उस पर अत्याचार करना जायज़ हो जाता है। सांप्रदायिक संगठन मुस्लिमों के ख़िलाफ़ नफरत पैदा करने के लिए अक्सर ऐसा कहते हैं कि मुस्लिम-बहुल इलाकों में पाकिस्तानी टीम के मैच जीतने पर पटाखे फोड़े जाते हैं और पाकिस्तान का झंडा फहराया जाता है।

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क्रिकेट का मैदान तक इस ज़हर से वंचित नहीं है। क्रिकेट महज़ एक खेल है और ऐसा हो ही सकता है कि एक टीम दूसरी टीम से अच्छा खेलती हो, चाहे भारत की हो या पाकिस्तान की। पर इसे भी युद्ध की तरह ही देखा जाता है और पाकिस्तानी खिलाड़ियों की प्रशंसा या समर्थन को गद्दारी से कम नहीं समझा जाता।

बहुत ही शर्म की बात है कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र, जो ‘विश्वगुरु’ बनने के सपने देखता है, अंदर से इतना कमज़ोर है कि उससे पड़ोसियों की तारीफ़ बर्दाश्त नहीं होती। जिससे प्रेम और भक्ति दूसरे की बुराई किए बिना नहीं जताए जा सकते। ऐसे में हमें ज़रूरत है अमूल्या लियोना या गुरमेहर कौर जैसे लोगों की जो हमें विनम्रता की अहमियत सिखा सकें। जो हमें दिखा सकें कि दूसरों को नीचा दिखाकर, उनकी बुराई करके बड़ा नहीं बना जा सकता है। बल्कि बड़प्पन औरों की अच्छाइयों की क़दर करने और उनका सम्मान करने में ही है।

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तस्वीर साभार : zeenews

Eesha is a feminist based in Delhi. Her interests are psychology, pop culture, sexuality, and intersectionality. Writing is her first love. She also loves books, movies, music, and memes.

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