समाजख़बर बच्चों को यौन अपराध की ओर धकेलते समाज, स्कूल और रेप कल्चर की गहरी परतें

बच्चों को यौन अपराध की ओर धकेलते समाज, स्कूल और रेप कल्चर की गहरी परतें

आज के आधुनिक दौर में भी भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की रुढ़िवादी मानसिकता के कारण सेक्स, शरीर और सहमती पर कभी भी खुलकर बातचीत नहीं होती है। चाहे फिर वो घर हो या स्कूल, जो  जगहें बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित होनी चाहिए, उनके लिए अक्सर बातचीत की जगह चुप्पी और डर पैदा करते हैं।

आज के आधुनिक दौर में भी भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की रुढ़िवादी मानसिकता के कारण सेक्स, शरीर और सहमती पर कभी भी खुलकर बातचीत नहीं होती है। चाहे फिर वो घर हो या स्कूल, जो  जगहें बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित होनी चाहिए, उनके लिए अक्सर बातचीत की जगह चुप्पी और डर पैदा करते हैं। नतीजन बच्चे सवाल नहीं पूछते और जो देखते हैं, उसकी नकल करते हैं। क्योंकि परिवार में जब कोई बच्चा इससे जुड़ी बात करने की कोशिश भी करता है, तो उसे अक्सर यह कहकर भी टाल दिया जाता है, कि यह तो गंदी बात होती है। गौरतलब है कि स्कूलों में भी इससे जुड़ी बात करना जरूरी नहीं समझा जता। यहां तक कि भारत के कई राज्यों के शिक्षण संस्थानों में सेक्स एजुकेशन पर प्रतिबंध लगा दिया गया है । सेज जर्नल्स में छपे साल 2023 के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत में 44.4 करोड़ बच्चे और किशोर रहते हैं।

 लेकिन सरकार और नागरिक समाज में कोई भी इस वैश्विक बदलाव को समझने और उस पर अपने नज़रिये को व्यापक बनाने की कोशिश करते हुए नजर नहीं आ पा रहा है। इसके अलावा, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और कर्नाटक जैसे राज्यों ने अपने विद्यालयों में यौन शिक्षा पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसलिए यौन हिंसा की घटनाओं में बढ़ोतरी हो रही है। बच्चों को सेक्स एजुकेशन की जानकारी न होने की वजह से, जब यौन हिंसा की किसी घटना में सर्वाइवर भी बच्चा हो और आरोपी भी कोई नाबालिग, तो समाज में एक असहज चुप्पी छा जाती है। बात यह नहीं है कि कम उम्र के बच्चे ऐसे काम कर रहे हैं या नहीं। असली सवाल उस सामाजिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक माहौल पर है, जिसे हम गढ़ रहे हैं,जहां बचपन में ही हिंसा की भाषा सामान्य होती जा रही है और बच्चे बहुत जल्दी उसे सीखने और दोहराने लगते हैं।

आज के आधुनिक दौर में भी भारतीय पितृसत्तात्मक समाज की रुढ़िवादी मानसिकता के कारण सेक्स, शरीर और सहमती पर कभी भी खुलकर बातचीत नहीं होती है। चाहे फिर वो घर हो या स्कूल, जो  जगहें बच्चों के लिए सबसे सुरक्षित होनी चाहिए, उनके लिए अक्सर बातचीत की जगह चुप्पी और डर पैदा करते हैं।

क्या है पूरा मामला ?

द प्रिंट में छपी एक खबर के मुताबिक, बीते दिनों उत्तर-पूर्वी दिल्ली में एक 6 साल की बच्ची के साथ बलात्कार का मामला सामने आया है। परिवार को इसकी जानकारी तब मिली, जब बच्ची ने सब कुछ अपनी माँ को बताया। उसके बाद बच्ची की माँ उसी दिन उत्तर-पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद पुलिस स्टेशन पहुंची और रिपोर्ट दर्ज करवाई और सर्वाइवर को मेडिकल जांच के लिए अस्पताल भेजा गया। मिडिया रिपोर्ट के अनुसार, घटना के लिए कथित आरोपी के तौर पर तीन नाबालिग लड़कों को चिह्नित किया गया , जिनकी उम्र 10, 13 और 15 साल है। रिपोर्ट के अनुसार, बच्ची को 10 रुपये का लालच देकर उसे उस यूनिट की सीढ़ियों पर बुलाया, जहां वे काम करते थे।

बच्ची की माँ ने द प्रिंट को बताया कि कथित तौर पर तीनों आरोपी एक ही मोहल्ले के थे। सर्वाइवर के पिता का कहना है कि वे सोमवार से विरोध कर रहे हैं, क्योंकि एक सप्ताह बीत जाने के बावजूद पुलिस अब तक सभी आरोपियों को गिरफ्तार नहीं कर पाई है। ध्यान देने वाली बात है कि, बच्चे भी यौन हिंसा अपराध में शामिल हो रहे हैं, असल सवाल यह है कि इतनी कम उम्र में यौन हिंसा की समझ, उसकी नकल और व्यवहार बच्चों तक पहुंच कैसे रहा है। यह घटना किसी एक परिवार या एक मोहल्ले की नहीं, बल्कि उस सामाजिक माहौल की ओर इशारा करती है, जिसमें बच्चे बड़े हो रहे हैं।

मिडिया रिपोर्ट के अनुसार, घटना के लिए कथित आरोपी के तौर पर तीन नाबालिग लड़कों को चिह्नित किया गया है , जिनकी उम्र 10, 13 और 15 साल है। रिपोर्ट के अनुसार, बच्ची को 10 रुपये का लालच देकर उसे उस यूनिट की सीढ़ियों पर बुलाया, जहां वे काम करते थे।

घर और स्कूल में सेक्स एजुकेशन का अभाव 

भारत में सेक्स एजुकेशन को एक टैबू की तरह देखा जाता है, चाहे फिर घर हो या स्कूल ही क्यों न हो। सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक मानदंडों के कारण माता-पिता और शिक्षक अक्सर इससे बचते हैं। जिस कारण युवा गलत या अधूरी जानकारी पर निर्भर रहते हैं। सेज जर्नल्स द्वारा ‘भारत में यौन शिक्षा आज भी एक वर्जित विषय क्यों है’ इस पर किए गए एक शोध के मुताबिक, लोगों का मानना है कि यौन शिक्षा बच्चों में जोखिम भरे व्यवहार को बढ़ाती है और विद्यालय के शैक्षिक वातावरण को नष्ट कर सकती है। इसके अलावा, शिक्षकों, प्रभावशाली व्यक्तियों और धार्मिक नेताओं जैसे कई प्रमुख शिक्षाविदों का मानना ​​है कि, प्रारंभिक यौन शिक्षा से बच्चों में कम उम्र में ही यौन संबंध बनाने की  प्रवृत्ति विकसित हो सकती है। हालांकि, सर्वे में शामिल 88 फीसदी युवाओं का मानना था कि बच्चों को यौन शिक्षा प्राथमिक कक्षाओं से ही मिलनी चाहिए, ताकि वे अपने शरीर, सीमाओं और सुरक्षा को सही समय पर समझ सकें।

 साथ ही, 66 फीसदी युवाओं का कहना था कि, प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के कई शिक्षकों के पास यौन शिक्षा देने का पर्याप्त ज्ञान और कौशल नहीं है। वहीं, 90 फीसदी युवाओं ने यह भी ज़ोर दिया कि माता-पिता और शिक्षकों को सही और तथ्यात्मक प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। ताकि वे बच्चों से इस विषय पर खुलकर और समझदारी से बात कर सकें। कई माता-पिता अपने बच्चों के साथ यौनिकता के विषय पर चर्चा करने में असहज या असमर्थ महसूस करते हैं, क्योंकि किसी ने भी उनसे इस बारे में तथ्यात्मक या खुलकर बात नहीं की। इसके अलावा बच्चों को जानकारी के जो दूसरे स्रोत मिलते हैं। जैसे दोस्त, आसपास के लोग, पत्रिकाएं या ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म वे अक्सर अधूरे, ग़लत और हकीकत से दूर होते हैं। वैश्विक स्तर पर, 3 में से 1 से भी कम बच्चों ने यह माना कि उनके स्कूल में उचित यौन शिक्षा दी गई थी। भारतीय संदर्भ में, 17 राज्यों में रहने वाले 71 फीसदी युवाओं (13-30 साल की उम्र) ने बताया कि उन्हें न तो शिक्षकों ने और न ही उनके माता-पिता ने यौनिकता के बारे में पढ़ाया गया था।  नतीजतन, कई बच्चे न तो अपने साथ हो रहे शोषण को पहचान पाते हैं और न ही दूसरों की सीमाओं को समझ पाते हैं।

सेज जर्नल्स द्वारा ‘भारत में यौन शिक्षा आज भी एक वर्जित विषय क्यों है’ इस पर किए गए एक शोध के मुताबिक, लोगों का मानना है कि यौन शिक्षा बच्चों में जोखिम भरे व्यवहार को बढ़ाती है और विद्यालय के शैक्षिक वातावरण को नष्ट कर सकती है।

 सोशल मीडिया, अश्लील सामग्री और रेप कल्चर को बढ़ावा देना

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के अध्ययन के मुताबिक, किशोरावस्था में यौन शोषण, हिंसा और शारीरिक शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस विषय पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के भारत में किए गए बाल शोषण पर एक अध्ययन में बताया गया है, कि सर्वेक्षण में शामिल 53 फीसदी लड़कों और 47 फीसदी लड़कियों को किसी न किसी प्रकार के यौन शोषण का सामना करना पड़ा। इसके अलावा जनसंचार माध्यमों का भारतीय जीवन पर गहरा असर पड़ा है। टीवी, रेडियो और इंटरनेट ने यौन विषयों को खुलकर सामने लाया है । इसने गलत जानकारी रखने वाले या अज्ञानी युवाओं को संबोधित करने की तत्काल आवश्यकता को उजागर किया है।अध्ययनों से पता चलता है कि ज्यादातर माता-पिता यौन शिक्षा देने की जिम्मेदारी नहीं लेते हैं। मुंबई के कॉलेजों में 88 फीसदी पुरुष और 58 फीसदी  महिला विद्यार्थियों ने बताया कि, उन्हें माता-पिता से यौन शिक्षा नहीं मिली है।

उन्हें किताबों, पत्रिकाओं, युवा परामर्शदाताओं और हाल के समय में बढ़ती सुलभता वाली अश्लील सामग्री से जानकारी प्राप्त करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इससे साफ़ पता चलता है कि जब बच्चों को सेक्स एजुकेशन नहीं दी जाती, तब वो खुद इसके बारे में जानने की कोशिश करते हैं, और कई बार सोशल मिडिया के माध्यम से कुछ ऐसे ग्रुप्स में भी शामिल हो जाते हैं, जिसकी वजह से उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इसका एक उदाहरण, साल 2020 की एक घटना बॉयज़ लॉकर रूम की देखी जा सकती है। बीबीसी  में छपी एक खबर के मुताबिक, बॉयज़ लॉकर रूम नामक इस समूह में राजधानी दिल्ली के युवा स्कूली लड़के शामिल थे। इस दौरान भारतीय पुलिस ने एक 15 वर्षीय लड़के को इंस्टाग्राम ग्रुप चैट में भाग लेने के आरोप में हिरासत में लिया था, जिसमें नाबालिग लड़कियों की तस्वीरें साझा की गई थीं और उनके बारे में अश्लील टिप्पणियां की गई थीं।

नैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन के अध्ययन के मुताबिक, किशोरावस्था में यौन शोषण, हिंसा और शारीरिक शोषण की घटनाएं बढ़ रही हैं। इस विषय पर महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के  भारत में किए गए बाल शोषण पर एक अध्ययन में बताया गया है, कि सर्वेक्षण में शामिल 53 फीसदी लड़कों और 47 फीसदी लड़कियों को किसी न किसी प्रकार के यौन शोषण का सामना करना पड़ा।

सोशल साइंस रिसर्च नेटवर्क (एसएसआरएन)  के साल 2025 में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है, किशोरावस्था के दौरान इसका प्रारंभिक संपर्क आम है। हालांकि 59 फीसदी प्रतिभागियों ने 18 साल की उम्र से पहले इसके संपर्क में आने की सूचना दी है। इसमें 75 फीसदी स्मार्टफोन और 74 फीसदी वेबसाइट इसके उपयोग में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसके अलावा आइटम सॉन्ग्स, इंस्टाग्राम-यूट्यूब की छोटी-छोटी रील्स और कई कॉमेडी जोक्स, अक्सर महिलाओं की ऑब्जेक्टिफिकेशन ( वस्तु ) को बढ़ावा देते हैं। जिस वजह से भी रेप कल्चर को बढ़ावा मिल रहा है। इससे यह साफ़ तौर पर देखा जा सकता है, कि हमारी सामाजिक, पारिवारिक और शैक्षणिक व्यवस्था कैसी है, जिसकी वजह से बच्चे इसकी तरफ बढ़ रहे हैं। भारत में पोक्सो एक्ट और किशोर न्याय अधिनियम(जेजेए)  जैसे क़ानून मौजूद हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर रोकथाम के लिए बहुत कमियां हैं।

रोकथाम के लिए क्या किया जा सकता है

यौन हिंसा और बच्चों में गलत व्यवहार को रोकने के लिए सिर्फ अपराध होने के बाद सज़ा देना काफी नहीं है। इसके लिए समाज में हर एक इंसान को भागीदारी निभाने की जरूरत है। इसके साथ ही बच्चों को उम्र के हिसाब से संवेदनशील सेक्स एजुकेशन की जानकारी देना बहुत ज़रूरी है। पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो बच्चों और युवाओं को यौन मामलों में सही फैसले लेने, खुलकर बात करने और एक-दूसरे के साथ सम्मानपूर्ण व्यवहार करने की समझ और क्षमता दे। माता – पिता को अगर बच्चे यौन स्वास्थ्य या शारीरिक बदलाव के बारे में पूछते हैं, तो उन्हें खुलकर और संवेदनशील तरीके से जवाब देना चाहिए, ताकि बच्चे खुद उसका जवाब ढूंढने के लिए गलत तरीकों का इस्तेमाल न करें। इसके साथ ही स्कूलों में बच्चों के लिए एक ऐसा सेफ स्पेस होना चाहिए, जहां बच्चे बिना डरे सवाल पूछ सकें और अपनी बात को बेझिझक बता सकें। यहां तक कि सोशल मीडिया, टीवी और पॉप कल्चर प्लेटफ़ॉर्म बच्चों के दृष्टिकोण पर बड़ा असर डालते हैं। इसके लिए यह ज़रूरी  है कि रेप जोक्स, हिंसक कॉमेडी और  महिलाविरोधी कंटेंट के प्रसार का विरोध किया जाना चाहिए और बच्चों को जितना हो सके इससे दूर रखना चाहिए । 

बच्चों के खिलाफ यौन हिंसा की बढ़ती घटनाएं यह दिखाती हैं कि हमारे समाज में सेक्स, शरीर और सहमति पर चुप्पी अब भी गहरी है। घर और स्कूल, जो बच्चों के सबसे सुरक्षित स्थान होने चाहिए, वहां सवाल पूछने की जगह डर और शर्म पैदा की जाती है। जानकारी के अभाव में बच्चे गलत स्रोतों से सीखते हैं और हिंसक व्यवहार को सामान्य मानने लगते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि उम्र के अनुसार संवेदनशील सेक्स एजुकेशन दी जाए, माता-पिता और शिक्षक खुलकर बात करें और स्कूलों को सुरक्षित संवाद का स्थान बनाया जाए। चुप्पी नहीं, सही जानकारी और समझ ही बच्चों को हिंसा से बचा सकती है और इसी के माध्यम से समावेशी समाज की बुनियाद रखी जा सकती है । 

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